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पद्मिनी एकादशी व्रत विधि पद्मिनी एकादशी 2026: तिथि, व्रत

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7 July 2026 20 min read|By Nidhi Shrimali

✨ लेखिका: निधि श्रीमाली, मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली (जोधपुर)।

पद्मिनी एकादशी अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। अधिक मास लगभग हर 32-33 महीने में एक बार आता है, इसलिए यह एकादशी हर वर्ष नहीं आती। इसे कमला एकादशी और पुरुषोत्तमी एकादशी भी कहा जाता है। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास था, इसलिए पद्मिनी एकादशी मई 2026 के अंतिम सप्ताह में पड़ी। इस लेख में हम पद्मिनी एकादशी की पहचान, कथा, व्रत विधि, पारण, मंत्र और नियम समझेंगे।

इस लेख में एक बड़ा सुधार: इस लेख के पुराने संस्करण में पद्मिनी एकादशी को मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी बताया गया था, और 28 नवंबर 2025 और 17 दिसंबर 2026 की तारीखें दी गई थीं। यह सही नहीं था। मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी मोक्षदा एकादशी (गीता जयंती) है। 2025 में कोई अधिक मास नहीं था, इसलिए 2025 में पद्मिनी एकादशी आई ही नहीं। पुरानी कथा, तारीखें और मुहूर्त हटाकर सही जानकारी दी गई है।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. पद्मिनी एकादशी क्या है — परिचय
  2. 2025 और 2026 में पद्मिनी एकादशी: तिथि का नियम
  3. पद्मिनी, परमा, मोक्षदा और रमा एकादशी में अंतर
  4. "पद्मिनी" नाम का अर्थ
  5. धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
  6. पद्मिनी एकादशी की कथा — रानी पद्मिनी और कार्तवीर्य अर्जुन
  7. पूजा सामग्री की सूची
  8. व्रत विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
  9. चारों पहर की पूजा और मंत्र
  10. पद्मिनी एकादशी से जुड़ी मान्यताएँ और उनकी सीमा
  11. सावधानियां और नियम
  12. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
  13. परामर्श बुक करें

पद्मिनी एकादशी क्या है — परिचय

सामान्य वर्ष में बारह महीने और चौबीस एकादशियाँ होती हैं। चांद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटा होता है, और इस अंतर को पूरा करने के लिए लगभग हर 32-33 महीने में एक अतिरिक्त चांद्र मास जोड़ा जाता है। इसे अधिक मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। अधिक मास वाले वर्ष में छब्बीस एकादशियाँ होती हैं। इन दो अतिरिक्त एकादशियों में शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मिनी और कृष्ण पक्ष की एकादशी परमा कहलाती है।

परंपरा में अधिक मास को भगवान विष्णु ने अपना नाम "पुरुषोत्तम" दिया, इसलिए इस पूरे महीने को विष्णु-भक्ति का समय माना जाता है। विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन जैसे नए शुभ संस्कार अधिक मास में नहीं किए जाते, पर जप, दान, कथा और व्रत के लिए इसे बहुत पुण्यदायी माना गया है। पद्मिनी एकादशी इसी महीने की सबसे प्रमुख तिथि है।

पद्मिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। इसकी कथा पद्म पुराण में अधिक मास की एकादशियों के माहात्म्य में मिलती है, जहाँ भगवान कृष्ण युधिष्ठिर को यह व्रत बताते हैं।

2025 और 2026 में पद्मिनी एकादशी: तिथि का नियम

वर्ष अधिक मास पद्मिनी एकादशी
2023 श्रावण अधिक मास जुलाई 2023 के अंत में
2025 अधिक मास नहीं पद्मिनी एकादशी नहीं आई
2026 ज्येष्ठ अधिक मास (लगभग मध्य मई से मध्य जून) मई 2026 का अंतिम सप्ताह; बीत चुकी
अगली अगला अधिक मास अगला अधिक मास आने पर; वर्ष और महीना पंचांग से देखें

व्रत का दिन कैसे तय होता है:

  • उदया तिथि: जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी हो, उस दिन व्रत किया जाता है।
  • दशमी-वेध: वैष्णव परंपरा में यदि सूर्योदय से पहले के अरुणोदय काल में दशमी हो, तो व्रत अगले दिन रखा जाता है। इसी कारण कभी-कभी स्मार्त और वैष्णव पंचांगों में एकादशी अलग-अलग दिन दिखती है।
  • पारण: व्रत द्वादशी के दिन, सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले खोला जाता है।
  • हरिवासर: द्वादशी का पहला चौथाई भाग हरिवासर कहलाता है, और इसमें पारण नहीं किया जाता। हरिवासर कोई सप्ताह का दिन नहीं है; पुराने संस्करण में शुक्रवार या रविवार को हरिवासर कहना गलत था।

सटीक तिथि और पारण का समय हर शहर के सूर्योदय के अनुसार बदलता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग देखें।

पद्मिनी, परमा, मोक्षदा और रमा एकादशी में अंतर

पद्मिनी एकादशी को लेकर सबसे अधिक भ्रम इन्हीं नामों से होता है। नीचे की तालिका चारों को अलग करती है।

एकादशी मास और पक्ष कब आती है प्रचलित कथा या संबंध
पद्मिनी (कमला) अधिक मास, शुक्ल पक्ष केवल अधिक मास वाले वर्ष में रानी पद्मिनी, राजा कृतवीर्य और पुत्र कार्तवीर्य अर्जुन
परमा अधिक मास, कृष्ण पक्ष केवल अधिक मास वाले वर्ष में निर्धन ब्राह्मण सुमेधा और उनकी पत्नी पवित्रा की कथा
मोक्षदा मार्गशीर्ष, शुक्ल पक्ष हर वर्ष, नवंबर-दिसंबर में गीता जयंती; राजा वैखानस और उनके पिता की मुक्ति
रमा कार्तिक, कृष्ण पक्ष (पूर्णिमांत), अमांत में आश्विन कृष्ण हर वर्ष, दीपावली से कुछ दिन पहले राजा मुचुकुंद की पुत्री चंद्रभागा और शोभन

भाद्रपद की एकादशियों की तुलना अजा एकादशी और जलझूलनी एकादशी वाले लेखों में है।

"पद्मिनी" नाम का अर्थ

"पद्म" का अर्थ कमल है, और "पद्मिनी" का अर्थ है कमलों वाली या कमल से जुड़ी। इस एकादशी के नाम का सबसे सीधा कारण इसकी कथा है: यह व्रत रानी पद्मिनी ने किया था, और उन्हीं के नाम से यह एकादशी प्रसिद्ध हुई।

1. कमल और लक्ष्मी: कमल लक्ष्मी जी का आसन है, और लक्ष्मी को "पद्मा" भी कहा जाता है। इसी कारण इसका दूसरा नाम "कमला एकादशी" है, और इस दिन विष्णु के साथ लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है।

2. कमल का भाव: कमल कीचड़ में उगकर भी निर्मल रहता है। व्रत की भावना भी यही है: गृहस्थ जीवन में रहते हुए एक दिन संयम और भक्ति में बिताना।

3. पद्मनाभ: भगवान विष्णु का एक नाम पद्मनाभ है, जिनकी नाभि से निकले कमल पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। पूजा में इसी शेषशायी, पद्मनाभ रूप का ध्यान किया जा सकता है।

पुराने संस्करण में श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण के नाम से कुछ वाक्य उद्धृत थे, जो इन ग्रंथों में नहीं मिलते, इसलिए हटा दिए गए हैं।

धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक दृष्टि से

  • अधिक मास की प्रमुख तिथि — पुरुषोत्तम मास की विष्णु-भक्ति का केंद्र
  • दुर्लभता — यह व्रत लगभग तीन वर्ष में एक बार ही मिलता है, इसलिए परंपरा इसे विशेष मानती है
  • संतान की कामना से जुड़ाव — कथा में रानी पद्मिनी ने यह व्रत पुत्र की कामना से किया था
  • दान और कथा — अधिक मास में दान, कथा-श्रवण और जप का विशेष महत्व माना गया है

आध्यात्मिक दृष्टि से

  • मन की शुद्धि — उपवास और सात्विक आचरण से मन के विकारों का शमन
  • इंद्रिय-संयम — जीभ, काम, क्रोध पर नियंत्रण का अभ्यास
  • धैर्य — कथा में फल लंबी प्रतीक्षा और साधना के बाद मिलता है
  • भक्ति-मार्ग पर अग्रसर — विष्णु-भक्ति की ओर आस्था का दृढ़ होना

ज्योतिषीय दृष्टि से

  • अधिक मास वह चांद्र मास है जिसमें सूर्य राशि नहीं बदलता, यानी कोई संक्रांति नहीं होती। ज्योतिष में इसी कारण इसे नए संस्कारों के लिए वर्जित और साधना के लिए उत्तम माना गया है।
  • शुक्ल एकादशी पर चंद्रमा सूर्य से लगभग 120 से 132 अंश आगे होता है। किस राशि में होगा, यह वर्ष और महीने पर निर्भर है; पुराने संस्करण का "चंद्रमा वृषभ में होता है" वाला नियम किसी एक तिथि पर हर वर्ष लागू नहीं होता।
  • एकादशी व्रत का संबंध किसी विशेष ग्रह-दोष के निवारण से शास्त्रों में नहीं जोड़ा गया है। कुंडली में शुक्र, पंचम या सप्तम भाव से जुड़ी चिंता हो, तो उसका आकलन कुंडली विश्लेषण से करें।

पद्मिनी एकादशी की कथा — रानी पद्मिनी और कार्तवीर्य अर्जुन

पुराने संस्करण में "राजा सुकेतु और पुत्री पद्मावती" की कथा दी गई थी, जो पद्मिनी एकादशी की प्रचलित कथा नहीं है। पद्म पुराण में जो कथा मिलती है, वह संक्षेप में इस प्रकार है।

कथा का आरंभ

त्रेता युग में हैहय वंश के राजा कृतवीर्य माहिष्मती नगरी में राज्य करते थे। उनकी कई रानियाँ थीं, पर कोई संतान नहीं थी। संतान की कामना से राजा ने राज्य मंत्रियों को सौंपा और वन में तपस्या करने चले गए। उनकी रानी पद्मिनी, जो राजा हरिश्चंद्र की पुत्री बताई जाती हैं, भी उनके साथ गईं। दोनों ने गंधमादन पर्वत पर लंबे समय तक तप किया, पर संतान का योग नहीं बना।

कथा का विकास

तब रानी पद्मिनी ने महर्षि अत्रि की पत्नी, सती अनसूया से उपाय पूछा। अनसूया ने उन्हें बताया कि अधिक मास, जो लगभग हर तीसरे वर्ष आता है, उसके शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत विधि से करें, रात्रि जागरण करें और भगवान विष्णु की पूजा करें। रानी ने अधिक मास आने पर वैसा ही किया।

कथा का अंत और संदेश

व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। रानी ने राजा के लिए ऐसा पुत्र माँगा जो पराक्रमी हो और जिसे कोई पराजित न कर सके। समय पर उनके यहाँ कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म हुआ, जो सहस्रार्जुन के नाम से भी जाने जाते हैं। कथाओं के अनुसार उन्होंने रावण को भी बंदी बना लिया था, और महर्षि पुलस्त्य के कहने पर उसे छोड़ा। यही कथा भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई।

इस कथा से तीन बातें निकलती हैं:

  1. साधना के साथ सही मार्गदर्शन: राजा-रानी का तप वर्षों चला, और उपाय तब मिला जब रानी ने अनसूया जैसी अनुभवी साधिका से पूछा।
  2. धैर्य: व्रत के लिए रानी को अधिक मास आने तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।
  3. कथा का फल भक्ति से जुड़ा है, गारंटी से नहीं: यह एक भक्ति कथा है। संतान की इच्छा में आज पहला कदम किसी योग्य डॉक्टर से मिलना है; व्रत और प्रार्थना उसके साथ श्रद्धा के रूप में करें।

पूजा सामग्री की सूची

पद्मिनी एकादशी की पूजा के लिए यह सामग्री दशमी के दिन ही इकट्ठी कर लें। सामग्री कम-ज़्यादा हो तो चिंता न करें; विष्णु पूजा में तुलसी और श्रद्धा मुख्य हैं।

क्र. सामग्री उपयोग
1भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की मूर्ति या चित्रमुख्य पूजा
2तुलसी-दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)विष्णु पूजा में आवश्यक; एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती
3पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)अभिषेक
4गंगाजलशुद्धि और अभिषेक
5रोली, मौली, चंदन, कुमकुमतिलक और पूजा
6पीले फूल; उपलब्ध हो तो कमलअर्पण
7घी का दीपक, धूप, कपूरआरती
8फल, सूखे मेवे, माखन-मिश्रीभोग
9पान, लौंग, सुपारीभोग
10जल से भरा कलश, आम के पत्ते, नारियलकलश स्थापना
11पीला वस्त्रभगवान को अर्पण
12विष्णु सहस्रनाम की पुस्तिकापाठ
13अन्न, वस्त्र या दक्षिणाद्वादशी को दान

जप के लिए तुलसी जाप माला वैष्णव परंपरा में प्रचलित है। घर के पूजा स्थान के लिए शेषशायी रूप की प्रतिमा चाहिए तो पारद शेषनाग विष्णु-लक्ष्मी देख सकते हैं।

व्रत विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन

दशमी तिथि — व्रत की पूर्व-तैयारी

  1. एक बार भोजन: दशमी को एक समय सात्विक भोजन करें; प्याज, लहसुन और मसूर दाल से बचें
  2. पूजा सामग्री संग्रह: ऊपर की सामग्री इकट्ठी करें और तुलसी-दल तोड़कर रख लें
  3. बाल-नख: बाल या नाखून काटने हों तो दशमी को ही काट लें
  4. संकल्प की तैयारी: रात को सोने से पहले भगवान का स्मरण करें

एकादशी तिथि — मुख्य व्रत दिवस

प्रातः:

  1. सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और स्वच्छ (पीले रंग के हों तो अच्छा) वस्त्र पहनें
  2. भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी के सामने दीपक जलाएँ
  3. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: "मैं अधिक मास की पद्मिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए कर रहा/रही हूँ।" यदि आप फलाहार रखेंगे, तो संकल्प में यह भी कह दें।

कलश स्थापना (वैकल्पिक):

  1. मिट्टी या तांबे के कलश में जल भरें
  2. उसमें सिक्का, सुपारी और आम के पत्ते डालें
  3. कलश पर नारियल रखें

मुख्य पूजा:

  1. विष्णु-लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर को पीले वस्त्र पर स्थापित करें
  2. मूर्ति हो तो पंचामृत और फिर गंगाजल से स्नान कराएँ
  3. चंदन, रोली और कुमकुम का तिलक लगाएँ
  4. पीले फूल, तुलसी-दल और पीला वस्त्र अर्पित करें
  5. फल, मेवे और माखन-मिश्री का भोग लगाएँ (भोग में चावल न रखें)
  6. "ॐ जय जगदीश हरे" से आरती करें

कथा और पाठ:

  1. ऊपर दी गई रानी पद्मिनी की कथा पढ़ें या सुनें
  2. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें; पूरा संभव न हो तो "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" की एक माला करें

शाम और रात्रि:

  1. शाम को फिर दीपक जलाकर आरती करें
  2. भजन-कीर्तन करें; रात्रि जागरण परंपरा का अंग है, पर स्वास्थ्य के अनुसार ही करें
  3. ब्रह्मचर्य का पालन करें

द्वादशी — पारण:

  1. स्नान और पूजा के बाद किसी ज़रूरतमंद को अन्न या वस्त्र का दान करें
  2. पंचांग में दिए पारण समय में, हरिवासर बीतने के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले, तुलसी-दल लेकर व्रत खोलें
  3. पारण सात्विक भोजन से करें

चारों पहर की पूजा और मंत्र

चार पहर की पूजा रात्रि जागरण करने वालों के लिए है। एक बार की पूजा भी पूरी मानी जाती है। नीचे दिए समय मोटे तौर पर हैं; पहर सूर्योदय और सूर्यास्त से गिने जाते हैं, घड़ी के तय समय से नहीं।

प्रथम पहर — प्रातः

समय: सूर्योदय से पहले से लेकर सुबह तक

पूजा क्रम: स्नान, संकल्प, अभिषेक, तिलक और श्रृंगार

मुख्य मंत्र:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

जाप संख्या: कम से कम एक माला (108); समय हो तो अधिक

द्वितीय पहर — मध्याह्न

समय: दोपहर, स्थानीय मध्याह्न के आसपास

पूजा क्रम: भोग, विष्णु सहस्रनाम पाठ, लक्ष्मी-नारायण की संयुक्त पूजा

मुख्य मंत्र:

ॐ श्री लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः

तृतीय पहर — सायं

समय: सूर्यास्त के आसपास

पूजा क्रम: संध्या आरती, दीपदान, कथा का पाठ

मुख्य मंत्र:

ॐ नमो नारायणाय

चतुर्थ पहर — रात्रि

समय: रात्रि, जागरण के समय

पूजा क्रम: भजन-कीर्तन, विष्णु ध्यान, क्षमा-प्रार्थना

ध्यान मंत्र:

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अतिरिक्त 5 मंत्र

1. विष्णु गायत्री मंत्र:

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

पुराने संस्करण में यहाँ "ॐ भर्गो देवस्य धीमहि…" लिखा था, जो गायत्री मंत्र का अधूरा अंश है, विष्णु गायत्री नहीं।

2. लक्ष्मी मंत्र:

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥

3. महालक्ष्मी का सरल मंत्र:

ॐ महालक्ष्म्यै नमः

4. नृसिंह मंत्र:

ॐ नृसिंहाय नमः

5. पुरुषोत्तम मास का मंत्र:

ॐ पुरुषोत्तमाय नमः

लक्ष्मी उपासना का लंबा अनुष्ठान करवाना हो तो महालक्ष्मी अनुष्ठान का विवरण देखें, और एकादशी की पूजा पंडित से करवानी हो तो ई-पूजा सेवा में पूछें।

पद्मिनी एकादशी से जुड़ी मान्यताएँ और उनकी सीमा

पुराने संस्करण में इस भाग में संतान की प्राप्ति, विवाह, महापातकों का नाश, पितरों को "तत्काल मोक्ष" और मांगलिक दोष के निवारण जैसे पक्के वादे थे। व्रत कथाएँ फल-श्रुति देती हैं, पर कोई व्रत किसी परिणाम की गारंटी नहीं है। नीचे हर मान्यता के साथ उसकी सीमा लिखी है।

1. पाप-क्षय की मान्यता

फल-श्रुति में एकादशी व्रत को पापों का नाश करने वाला कहा गया है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि व्रत आत्म-निरीक्षण और सुधार का अवसर है। किसी के साथ अन्याय हुआ हो तो उसका सुधार उस व्यक्ति के प्रति अपने आचरण से ही होगा।

2. संतान की कामना

कथा में यह व्रत संतान की कामना से जुड़ा है, इसलिए बहुत से दंपती इसे इसी भाव से करते हैं। व्रत चिकित्सा का विकल्प नहीं है। गर्भधारण में देरी हो तो पहले किसी योग्य डॉक्टर से जाँच कराएँ। व्रत और प्रार्थना उसके साथ श्रद्धा के रूप में करें।

3. विवाह की प्रार्थना

पद्मिनी एकादशी की कथा विवाह से जुड़ी नहीं है। विवाह की प्रार्थना किसी भी एकादशी पर की जा सकती है, पर कुंडली से जुड़े प्रश्न हों तो कुंडली मिलान और कुंडली विश्लेषण से ही उत्तर मिलेगा।

4. मोक्ष और भक्ति

वैष्णव परंपरा में एकादशी को भक्ति का सबसे सीधा साधन माना गया है। इसका सार नियमितता में है: एक दुर्लभ एकादशी से अधिक मायने हर महीने की एकादशी पर थोड़ा संयम रखने के हैं।

5. कुंडली दोष

यह व्रत मांगलिक दोष, शुक्र दोष या किसी कुंडली दोष का शास्त्रीय उपाय नहीं है। किसी दोष का उपाय क्या हो, यह कुंडली देखकर ही तय होता है।

6. लक्ष्मी और समृद्धि

"कमला एकादशी" नाम के कारण इसे लक्ष्मी की कृपा से जोड़ा जाता है। इसे भक्ति की मान्यता के रूप में लें; आर्थिक निर्णय अपनी आय, बचत और किसी योग्य वित्तीय सलाहकार की सलाह से लें।

7. परिवार के साथ व्रत

जब परिवार साथ बैठकर कथा सुनता है और दान करता है, तो घर में साझा अनुशासन बनता है। पारिवारिक कलह गहरी हो तो बातचीत और ज़रूरत पड़े तो परामर्शदाता की मदद लें।

8. पितरों का स्मरण

पितरों का श्राद्ध उनकी तिथि पर या पितृ पक्ष में किया जाता है। एकादशी पर पितरों का स्मरण और दान किया जा सकता है, पर उस दिन अन्न का श्राद्ध-भोजन नहीं बनता। एकादशी को श्राद्ध की तिथि पड़े तो प्रचलित परंपरा में श्राद्ध द्वादशी को किया जाता है; अपने कुल-पुरोहित से पूछ लें।

सावधानियां और नियम

1. सात्विक आहार का पालन

एकादशी पर चावल और अन्न नहीं खाए जाते। मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का त्याग करें। फलाहार में फल, दूध, साबूदाना, सिंघाड़ा या कुट्टू का आटा और सेंधा नमक प्रचलित हैं।

2. बाल-नख काटना वर्जित

परंपरा में एकादशी को बाल, नाखून काटना और दाढ़ी बनाना वर्जित माना जाता है। ज़रूरी हो तो यह दशमी को कर लें।

3. दिन को भक्ति में लगाना

कई परिवारों में इस दिन सिलाई-कढ़ाई जैसे काम नहीं किए जाते। यह पारिवारिक रीति है। नौकरी या ज़रूरी काम छोड़ने की आवश्यकता नहीं; बचा हुआ समय पूजा, पाठ और भजन में लगाएँ।

4. असत्य और क्रोध का त्याग

असत्य बोलना, क्रोध करना, चुगली और निंदा से बचें। व्रत भोजन से अधिक वाणी और मन का है।

5. ब्रह्मचर्य का पालन

दशमी की रात से द्वादशी के पारण तक ब्रह्मचर्य का पालन परंपरा का नियम है।

6. तामसिक भोजन का त्याग

बासी, बहुत तला-भुना और उत्तेजक भोजन न करें। फलाहार भी हल्का रखें।

7. स्नान के बाद पूजा और फलाहार

सुबह स्नान और पूजा के बाद ही फलाहार लें। हर बार भोजन से पहले फिर से स्नान आवश्यक नहीं; हाथ-मुँह धोकर भगवान का स्मरण करें।

8. स्वास्थ्य पहले

निर्जला व्रत सबके लिए नहीं है। मधुमेह, रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी, गर्भावस्था, स्तनपान या नियमित दवा हो तो व्रत का रूप अपने डॉक्टर से पूछकर तय करें; फलाहार या केवल पूजा भी पूरा व्रत माना जाता है। मई-जून की गर्मी में निर्जला व्रत में चक्कर, बहुत कमज़ोरी या भ्रम हो तो व्रत वहीं तोड़ें और पानी पिएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पद्मिनी एकादशी 2025 कब है?

2025 में पद्मिनी एकादशी नहीं आई, क्योंकि 2025 में अधिक मास नहीं था। यह एकादशी केवल अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आती है। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण यह मई 2026 के अंतिम सप्ताह में पड़ी। पुराने संस्करण में दी गई 28 नवंबर 2025 की तारीख मोक्षदा एकादशी के आसपास की थी और पद्मिनी के लिए गलत थी।

क्या पद्मिनी और राम एकादशी एक ही हैं?

नहीं। पद्मिनी अधिक मास की शुक्ल एकादशी है। रमा (राम) एकादशी कार्तिक कृष्ण पक्ष (पूर्णिमांत गणना) की एकादशी है, जो हर वर्ष दीपावली से कुछ दिन पहले आती है। चैत्र शुक्ल की एकादशी कामदा एकादशी कहलाती है। ऊपर की तुलना तालिका में चारों का अंतर दिया गया है।

क्या व्रत न कर सकें तो क्या करें?

स्वास्थ्य या काम के कारण पूरा व्रत न हो सके, तो:

  • फलाहार या केवल दूध-फल ले सकते हैं
  • अन्न में भी चावल से परहेज़ कर सकते हैं
  • "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" की एक माला कर सकते हैं
  • कथा पढ़ या सुन सकते हैं
  • किसी ज़रूरतमंद को भोजन या अन्न दान कर सकते हैं

क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करें?

हाँ, यह परंपरा का नियम है। दशमी को एक समय सात्विक भोजन करें और प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग करें। इससे एकादशी का उपवास शरीर के लिए भी सहज रहता है।

क्या बालक (छोटे बच्चे) पद्मिनी एकादशी का व्रत कर सकते हैं?

परंपरा में एकादशी व्रत का नियम लगभग आठ से अस्सी वर्ष की आयु के लिए बताया गया है। छोटे बच्चों से उपवास न करवाएँ; उन्हें कथा सुनाएँ, तुलसी में जल दिलवाएँ और दीपक जलवाएँ। किशोर माता-पिता के मार्गदर्शन में फलाहार कर सकते हैं, पर पढ़ाई और खेल वाले बच्चों को भूखा न रखें।

पद्मिनी एकादशी पर तिल का दान क्यों विशेष है?

तिल का दान माघ मास और षटतिला एकादशी से विशेष रूप से जुड़ा है, पद्मिनी एकादशी से नहीं। अधिक मास में दान का महत्व माना गया है, इसलिए इस दिन अन्न, वस्त्र, फल या कोई भी उपयोगी वस्तु दान की जा सकती है। दान व्रत के दिन या द्वादशी को पारण से पहले करें।

क्या पद्मिनी एकादशी पर श्राद्ध कर सकते हैं?

एकादशी को पितरों का स्मरण और दान किया जा सकता है, पर अन्न का श्राद्ध-भोजन उस दिन नहीं बनता। किसी पूर्वज की श्राद्ध-तिथि एकादशी को पड़े, तो प्रचलित परंपरा में श्राद्ध द्वादशी को किया जाता है। अपने परिवार की रीति के लिए कुल-पुरोहित से पूछें।

पद्मिनी एकादशी किसे कहते हैं और यह कब आती है?

पद्मिनी एकादशी अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। अधिक मास लगभग हर 32-33 महीने में आता है, इसलिए यह एकादशी लगभग तीन वर्ष में एक बार आती है, और किस महीने में आएगी, यह इस पर निर्भर करता है कि कौन सा मास अधिक हुआ। 2023 में यह श्रावण अधिक मास में और 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास में आई।


शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली, जोधपुर
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[ { "question": "पद्मिनी एकादशी 2025 कब है?", "answer": "2025 में पद्मिनी एकादशी नहीं आई, क्योंकि 2025 में अधिक मास नहीं था। यह एकादशी केवल अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आती है। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण यह मई 2026 के अंतिम सप्ताह में पड़ी। सटीक तिथि के लिए पंचांग देखें।" }, { "question": "क्या पद्मिनी और राम एकादशी एक ही हैं?", "answer": "नहीं। पद्मिनी अधिक मास की शुक्ल एकादशी है, जो लगभग तीन वर्ष में एक बार आती है। रमा (राम) एकादशी कार्तिक कृष्ण पक्ष (पूर्णिमांत) की एकादशी है, जो हर वर्ष दीपावली से कुछ दिन पहले आती है। चैत्र शुक्ल की एकादशी कामदा कहलाती है।" }, { "question": "व्रत न कर सकें तो क्या करें?", "answer": "स्वास्थ्य या काम के कारण पूरा व्रत न हो सके तो फलाहार करें, चावल से परहेज़ रखें, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' की एक माला करें, कथा पढ़ें या सुनें और किसी ज़रूरतमंद को भोजन दान करें। मधुमेह, रक्तचाप या गर्भावस्था में व्रत का रूप डॉक्टर से पूछकर तय करें।" }, { "question": "क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करना चाहिए?", "answer": "हाँ, यह परंपरा का नियम है। दशमी को एक समय सात्विक भोजन करें और प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग करें। इससे एकादशी का उपवास शरीर के लिए भी सहज रहता है।" }, { "question": "क्या बालक पद्मिनी एकादशी का व्रत कर सकते हैं?", "answer": "परंपरा में एकादशी व्रत का नियम लगभग आठ से अस्सी वर्ष की आयु के लिए है। छोटे बच्चों से उपवास न करवाएँ; उन्हें कथा सुनाएँ, तुलसी में जल दिलवाएँ और दीपक जलवाएँ। किशोर माता-पिता के मार्गदर्शन में फलाहार कर सकते हैं।" }, { "question": "पद्मिनी एकादशी पर तिल का दान क्यों विशेष है?", "answer": "तिल का दान माघ मास और षटतिला एकादशी से विशेष रूप से जुड़ा है, पद्मिनी एकादशी से नहीं। अधिक मास में दान का महत्व माना गया है, इसलिए इस दिन अन्न, वस्त्र, फल या कोई भी उपयोगी वस्तु दान की जा सकती है।" }, { "question": "पद्मिनी एकादशी की कथा क्या है?", "answer": "पद्म पुराण की कथा में माहिष्मती के हैहय राजा कृतवीर्य और रानी पद्मिनी संतान के लिए तप करते हैं। सती अनसूया के बताने पर रानी अधिक मास की शुक्ल एकादशी का व्रत करती हैं, भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं, और उनके यहाँ कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) का जन्म होता है।" } ]

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Frequently Asked Questions

पद्मिनी एकादशी 2025 कब है?+
2025 में पद्मिनी एकादशी नहीं आई, क्योंकि 2025 में अधिक मास नहीं था। यह एकादशी केवल अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आती है। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण यह मई 2026 के अंतिम सप्ताह में पड़ी। सटीक तिथि के लिए पंचांग देखें।
क्या पद्मिनी और राम एकादशी एक ही हैं?+
नहीं। पद्मिनी अधिक मास की शुक्ल एकादशी है, जो लगभग तीन वर्ष में एक बार आती है। रमा (राम) एकादशी कार्तिक कृष्ण पक्ष (पूर्णिमांत) की एकादशी है, जो हर वर्ष दीपावली से कुछ दिन पहले आती है। चैत्र शुक्ल की एकादशी कामदा कहलाती है।
व्रत न कर सकें तो क्या करें?+
स्वास्थ्य या काम के कारण पूरा व्रत न हो सके तो फलाहार करें, चावल से परहेज़ रखें, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' की एक माला करें, कथा पढ़ें या सुनें और किसी ज़रूरतमंद को भोजन दान करें। मधुमेह, रक्तचाप या गर्भावस्था में व्रत का रूप डॉक्टर से पूछकर तय करें।
क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करना चाहिए?+
हाँ, यह परंपरा का नियम है। दशमी को एक समय सात्विक भोजन करें और प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग करें। इससे एकादशी का उपवास शरीर के लिए भी सहज रहता है।
क्या बालक पद्मिनी एकादशी का व्रत कर सकते हैं?+
परंपरा में एकादशी व्रत का नियम लगभग आठ से अस्सी वर्ष की आयु के लिए है। छोटे बच्चों से उपवास न करवाएँ; उन्हें कथा सुनाएँ, तुलसी में जल दिलवाएँ और दीपक जलवाएँ। किशोर माता-पिता के मार्गदर्शन में फलाहार कर सकते हैं।
पद्मिनी एकादशी पर तिल का दान क्यों विशेष है?+
तिल का दान माघ मास और षटतिला एकादशी से विशेष रूप से जुड़ा है, पद्मिनी एकादशी से नहीं। अधिक मास में दान का महत्व माना गया है, इसलिए इस दिन अन्न, वस्त्र, फल या कोई भी उपयोगी वस्तु दान की जा सकती है।
पद्मिनी एकादशी की कथा क्या है?+
पद्म पुराण की कथा में माहिष्मती के हैहय राजा कृतवीर्य और रानी पद्मिनी संतान के लिए तप करते हैं। सती अनसूया के बताने पर रानी अधिक मास की शुक्ल एकादशी का व्रत करती हैं, भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं, और उनके यहाँ कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) का जन्म होता है।
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Written by

Nidhi Shrimali

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Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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