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पद्मिनी एकादशी व्रत विधि पद्मिनी एकादशी 2026: तिथि, व्रत

# पद्मिनी एकादशी व्रत विधि पद्मिनी एकादशी 2026: तिथि, व्रत विधि, कथा **पद्मिनी एकादशी व्रत विधि पद्मिनी एकादशी 2026** — यह विषय मेरे पास रोजाना सैकड़ों लोग पूछते हैं। जब किसी की कुंडली में ग्रह कमजोर

7 July 2026 19 min read|By Nidhi Shrimali

✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।

मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को "पद्मिनी एकादशी" कहा जाता है — यह वर्ष की 24 एकादशियों में अत्यंत पावन मानी जाती है। "पद्मिनी" नाम का संबंध सीधे भगवान विष्णु के कमल-नाभि स्वरूप और माँ लक्ष्मी के कमल-आसन से है। इस एकादशी पर किया गया व्रत पाप-क्षय, संतान-प्राप्ति, विवाह में विघ्न-निवारण और मोक्ष-प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम 2025-2026 की तिथि-मुहूर्त, पौराणिक कथा, "पद्मिनी" नाम का गूढ़ अर्थ, संपूर्ण व्रत-विधि, मंत्र, 4 पहर की पूजा, फायदे और सावधानियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. पद्मिनी एकादशी क्या है — परिचय
  2. 2025 और 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त
  3. "पद्मिनी" नाम का अर्थ और गूढ़ रहस्य
  4. धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
  5. पद्मिनी एकादशी की पौराणिक कथा
  6. पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची
  7. व्रत विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
  8. चारों पहर की पूजा और शुभ मंत्र
  9. पद्मिनी एकादशी के 8 प्रमुख लाभ
  10. सावधानियां और नियम
  11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पद्मिनी एकादशी क्या है — परिचय

पद्मिनी एकादशी मार्गशीर्ष (अग्रहायण) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाने वाली एक अत्यंत पावन एकादशी है। इसे "पद्मा एकादशी" या "लक्ष्मी एकादशी" के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष में कुल 24 एकादशियां आती हैं — दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) में 12-12। इन सभी में पद्मिनी एकादशी का विशेष स्थान है क्योंकि इसका उल्लेख स्वयं भविष्योत्तर पुराण के पद्मिनी एकादशी व्रत माहात्म्य में विस्तार से मिलता है।

यह व्रत भगवान विष्णु के "पद्मनाभ" (कमल-नाभि) स्वरूप और माँ लक्ष्मी के "पद्मासना" (कमल-आसन) स्वरूप को समर्पित है। शास्त्र कहते हैं कि जो व्यक्ति पूर्ण विधि-विधान और श्रद्धा के साथ इस व्रत को करता है, उसके समस्त पापों का क्षय हो जाता है, अविवाहितों को उत्तम वर/वधू की प्राप्ति होती है और दाम्पत्य-जीवन में आने वाले समस्त विघ्न दूर होते हैं।

मार्गशीर्ष का पूरा मास ही विष्णु-भक्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है — इसी माह विवाह-पंचमी, गोपाष्टमी, दत्तात्रेय जयंती और अन्य शुभ तिथियां आती हैं। अतः यह समय सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और धर्म-कर्म का चरम होता है।

व्रत का मुख्य उद्देश्य इंद्रियों पर संयम, मन की शुद्धि, विष्णु-लक्ष्मी की कृपा और कुंडली के दोषों के शमन की प्राप्ति है। एकादशी का शाब्दिक अर्थ है — "एकादश" अर्थात् ग्यारहवीं (तिथि)। प्रत्येक मास की ग्यारहवीं तिथि को भगवान विष्णु की पूजा का विशेष दिन माना गया है, किंतु मार्गशीर्ष की शुक्ल एकादशी अपने अलौकिक फलों के कारण सबसे विशिष्ट है।

2025 और 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त

पद्मिनी एकादशी 2025: शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

अवधि समय
एकादशी तिथि आरंभ 27 नवंबर 2025, प्रातः 06:18 बजे
एकादशी तिथि समाप्ति 28 नवंबर 2025, प्रातः 04:31 बजे
व्रत और पूजा दिन 28 नवंबर 2025, शुक्रवार
पारण दिन 30 नवंबर 2025, रविवार (सूर्योदय के बाद)
हरिवासर (शुक्रवार) संयोग अत्यंत शुभ — भगवान विष्णु को समर्पित दिन
ब्रह्म मुहूर्त (जाप के लिए) 28 नवंबर प्रातः 5:12 से 6:00 तक
अभिजित मुहूर्त (पूजा के लिए) 28 नवंबर दोपहर 11:54 से 12:36 तक

पद्मिनी एकादशी 2026: रविवार, 17 दिसंबर 2026

अवधि समय
एकादशी तिथि आरंभ 16 दिसंबर 2026, रात्रि 11:46 बजे
एकादशी तिथि समाप्ति 17 दिसंबर 2026, रात्रि 10:14 बजे
व्रत और पूजा दिन 17 दिसंबर 2026, रविवार
पारण दिन 19 दिसंबर 2026, मंगलवार (सूर्योदय के बाद)
हरिवासर (रविवार) संयोग अत्यंत शुभ
ब्रह्म मुहूर्त (जाप के लिए) 17 दिसंबर प्रातः 5:38 से 6:24 तक

विशेष बात: 2026 में पद्मिनी एकादशी रविवार (हरिवासर) को पड़ रही है, जिससे व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। रविवार भगवान विष्णु का ही दिन है, अतः इस संयोग को अत्यंत फलदायी माना जाता है। साथ ही मार्गशीर्ष मास और शुक्ल पक्ष का संयोग इसे और भी अधिक शुभ बनाता है।

2025 की तिथि के संदर्भ में एकादशी तिथि 27 नवंबर प्रातः से ही प्रारंभ हो रही है, ऐसे में बहुत से विद्वान 27 नवंबर की रात्रि से ही सात्विक भोजन आरंभ करने का परामर्श देते हैं। परंतु मुख्य व्रत दिवस 28 नवंबर ही माना जाएगा। दशमी (27 नवंबर 2025) को एक बार भोजन कर सात्विक आहार आरंभ कर दें।

"पद्मिनी" नाम का अर्थ और गूढ़ रहस्य

"पद्मिनी" संस्कृत का एक अत्यंत मधुर और गूढ़ शब्द है। इसके तीन प्रमुख अर्थ हैं जो इस एकादशी की महत्ता को और गहरा करते हैं:

1. कमल-जन्मा (Lotus-born): "पद्म" का अर्थ है कमल और "इनी" प्रत्यय से कमल में उत्पन्न — अर्थात् कमल से जन्मी। यह नाम सीधे माँ लक्ष्मी का सूचक है, जो समुद्र-मंथन से कमल पर प्रकट हुई थीं। इस एकादशी पर व्रत करने वाला व्यक्ति माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा का अधिकारी बनता है।

2. कमल-सदृश (Lotus-like): "पद्मिनी" का दूसरा अर्थ है — "जो कमल के समान हो"। कमल की भांति पवित्र, निर्मल और सुंदर जीवन जीने की प्रेरणा देने वाली यह एकादशी व्यक्ति को चरित्र-निर्माण का अवसर प्रदान करती है। कमल कीचड़ में रहकर भी निर्मल रहता है — इसी प्रकार सांसारिक जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक शुद्धता बनाए रखने की शिक्षा देती है पद्मिनी एकादशी।

3. पद्मनाभ (Lotus-naveled): भगवान विष्णु का एक नाम "पद्मनाभ" भी है — जिनकी नाभि से कमल निकला, उस कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। इस अर्थ में "पद्मिनी" सीधे भगवान विष्णु के कमल-नाभि स्वरूप का वाचक है। इस एकादशी पर भगवान के इसी परम-स्वरूप की आराधना का विधान है।

श्रीमद्भागवत पुराण और भविष्योत्तर पुराण में स्पष्ट लिखा है कि "पद्मिनी एकादशी का व्रत स्त्रियों के लिए विशेष फलदायी है" — क्योंकि यह माँ लक्ष्मी की कृपा से विवाह, संतान और गृह-सुख की प्राप्ति कराता है। कुंडली में शुक्र या सप्तम भाव कमजोर होने पर यह व्रत अत्यंत लाभदायी सिद्ध होता है।

विष्णु पुराण के अनुसार "पद्मिनी" शब्द का एक और गूढ़ अर्थ है — "वह स्त्री जो कमल-पत्र की कोमलता को धारण करती है"। इस एकादशी पर स्त्रियां विशेष रूप से माँ लक्ष्मी की पूजा करती हैं, तिलक लगाती हैं और व्रत रखती हैं — मान्यता है कि ऐसा करने से माँ लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और गृह में सुख-शांति, धन-धान्य और संतान-सुख की वृद्धि होती है।

धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक दृष्टि से

  • पाप-क्षय का सर्वोत्तम साधन — भविष्योत्तर पुराण के अनुसार इस एकादशी का व्रत समस्त पापों को नष्ट कर देता है
  • मोक्ष-प्राप्ति — अंततः भगवान विष्णु के धाम (वैकुंठ) की प्राप्ति
  • विवाह में विघ्न-निवारण — अविवाहितों को उत्तम वर/वधू की प्राप्ति, विवाह में आ रही बाधाओं का निवारण
  • संतान-प्राप्ति — संतानहीन दंपत्तियों को पुत्र/पुत्री की प्राप्ति
  • पितृ-तर्पण — इस दिन पितरों का स्मरण और तर्पण भी विशेष फलदायी माना गया है

आध्यात्मिक दृष्टि से

  • मन की शुद्धि — उपवास और सात्विक आचरण से मन के विकारों का शमन
  • इंद्रिय-संयम — जीभ, काम, क्रोध पर नियंत्रण का अभ्यास
  • चेतना का विस्तार — भगवान विष्णु के ध्यान से आत्मिक चेतना का विकास
  • कर्म-बंधन से मुक्ति — कर्मों के फल को भगवान को समर्पित करने की भावना
  • भक्ति-मार्ग पर अग्रसर — विष्णु-भक्ति की ओर आस्था का दृढ़ होना

ज्योतिषीय दृष्टि से

  • मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी को चंद्रमा वृषभ राशि में होता है — यह शुक्र की राशि है, अतः शुक्र-संबंधी दोषों का शमन होता है
  • एकादशी तिथि बुध ग्रह से संबंधित है — बुध की कृपा से विद्या, बुद्धि और वाणी में सुधार
  • रविवार (हरिवासर) का संयोग होने से सूर्य की कृपा प्राप्त होती है — आत्मबल, साहस और राज्य-लाभ
  • मार्गशीर्ष मास बृहस्पति से संबद्ध है — ज्ञान, धर्म और संतान का कारक
  • कुंडली में शुक्र, सप्तम भाव, पंचम भाव या बृहस्पति कमजोर होने पर यह व्रत विशेष लाभदायी

पद्मिनी एकादशी की पौराणिक कथा

पद्मिनी एकादशी की कथा भविष्योत्तर पुराण के पद्मिनी एकादशी व्रत माहात्म्य में विस्तार से वर्णित है। यह कथा अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद है:

कथा का आरंभ

अत्यंत प्राचीन काल की बात है। चंद्रवंश में एक महान राजा था जिसका नाम सुकेतु था। राजा सुकेतु अत्यंत धार्मिक, न्यायप्रिय और प्रजा-वत्सल था। उसकी एक पुत्री थी जिसका नाम पद्मावती (पद्मिनी) था — जो अपनी माता के निधन के बाद पिता के साथ रहती थी।

एक बार राज्य में अकाल पड़ा, अनेक रोग फैले और प्रजा दुखी होने लगी। राजा सुकेतु ने अनेक यज्ञ, दान और पूजा-पाठ करवाए, किंतु कोई लाभ नहीं हुआ। अंततः राजा ने नारद मुनि से इस विपत्ति का कारण पूछा।

कथा का विकास

नारद मुनि ने राजा को बताया कि पूर्वजन्म में राजा के परिवार ने एक भयंकर पाप किया था — किसी ब्राह्मण-पत्नी का अपमान किया गया था। इसी पाप के प्रभाव से यह विपत्ति आ रही है। नारद मुनि ने राजा को मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।

नारद मुनि ने कहा — "महाराज, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को 'पद्मिनी एकादशी' कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की पूजा से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। पुत्री पद्मावती के नाम पर ही यह एकादशी 'पद्मिनी' नाम से प्रसिद्ध हुई है।"

कथा का अंत और संदेश

राजा सुकेतु ने नारद मुनि के कथनानुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत किया — पूर्ण विधि-विधान के साथ। व्रत के प्रभाव से राज्य की समस्त विपत्तियां दूर हो गईं, अकाल मिटा, रोग समाप्त हुए और प्रजा सुखी हो गई। राजा सुकेतु ने अंततः मोक्ष प्राप्त किया।

इस कथा से हमें चार महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है:

  1. पाप का प्रायश्चित आवश्यक — पूर्वजन्म या इस जन्म के पापों के निवारण के लिए व्रत-पूजा अनिवार्य है
  2. विष्णु-लक्ष्मी की कृपा सर्वोपरि — भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की संयुक्त कृपा से ही सब सुखों की प्राप्ति होती है
  3. स्त्रियों के लिए विशेष फल — पुत्री के नाम पर स्थापित यह व्रत स्त्रियों के लिए अत्यंत शुभ फलदायी
  4. व्रत का फल कभी नष्ट नहीं होता — पूरी श्रद्धा से किया गया व्रत अवश्य फल देता है

पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची

पद्मिनी एकादशी की पूजा के लिए निम्न सामग्री एक दिन पहले (दशमी को) ही इकट्ठी कर लें:

क्र. सामग्री उपयोग
1 भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र मुख्य पूजा
2 तुलसी का पौधा या तुलसी-दल अनिवार्य — एकादशी पर तुलसी अर्पित करें
3 पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शर्करा) अभिषेक के लिए
4 गंगाजल शुद्धि और अभिषेक
5 रोली, मौली, चंदन, कुमकुम तिलक और पूजा
6 अक्षत (चावल) पूजा और तर्पण
7 लाल और पीले फूल (कमल-पुष्प श्रेष्ठ) भगवान को अर्पित
8 धूप-दीपक आरती
9 घी का दीपक (5 या 11) अखंड ज्योति
10 कपूर आरती
11 अगरबत्ती सुगंध
12 पान के पत्ते, लौंग, सुपारी भोग
13 सूखे मेवे और फल भोग
14 पंखा, चादर, आसन पूजा-स्थल की शोभा
15 कलश (मिट्टी या तांबे का) कलश स्थापना
16 सिक्का या सोने-चाँदी का आभूषण कलश में रखने के लिए
17 विष्णु सहस्रनाम की पुस्तिका पाठ के लिए
18 नारियल भोग और कलश पर रखने के लिए
19 पीला वस्त्र (पीतांबर) भगवान को चढ़ाने के लिए
20 तिल और गुड़ दान के लिए
21 माखन-मिश्री भोग के लिए
22 पान का बीड़ा (सुपारी, चूना, कत्था, लौंग) भोग

व्रत विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन

दशमी तिथि (27 नवंबर 2025) — व्रत की पूर्व-तैयारी

  1. एक बार भोजन: दशमी तिथि को केवल एक समय भोजन करें — सात्विक और शुद्ध
  2. पूजा सामग्री संग्रह: ऊपर बताई गई सभी सामग्री इकट्ठी करें
  3. व्रत का संकल्प: शाम को भगवान विष्णु के सामने संकल्प लें
  4. बाल-नख कटवाएं: स्वच्छता का ध्यान रखें
  5. तुलसी में जल दें: प्रतिदिन की तरह तुलसी-सेवा करें
  6. माँ लक्ष्मी की कथा पढ़ें: रात्रि को सोने से पहले पद्मिनी एकादशी की कथा पढ़ें

एकादशी तिथि (28 नवंबर 2025) — मुख्य व्रत दिवस

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00-5:30):

  1. ब्रह्म मुहूर्त में उठें
  2. स्नान करें और शुद्ध वस्त्र (पीला या लाल रंग श्रेष्ठ) धारण करें
  3. भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी के सामने दीपक प्रज्वलित करें
  4. संकल्प लें: "मैं भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की कृपा और पद्मिनी एकादशी के प्रभाव से अपने पापों का क्षय करने तथा सुख-शांति, संतान और विवाह का सुयोग प्राप्त करने हेतु यह व्रत रख रहा/रही हूँ"
  5. भगवान विष्णु का ध्यान करें

कलश स्थापना:

  1. एक मिट्टी या तांबे के कलश में जल भरें
  2. उसमें सिक्का, सुपारी, आम के पत्ते और पंचामृत डालें
  3. कलश पर नारियल रखें
  4. कलश के ऊपर तुलसी-दल रखें
  5. कलश की विधिवत स्थापना करें

मुख्य पूजा:

  1. भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर को पीले वस्त्र पर स्थापित करें
  2. मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं
  3. गंगाजल से शुद्ध करें
  4. चंदन, रोली, कुमकुम का तिलक लगाएं
  5. कमल-पुष्प, पीले फूल, तुलसी-दल अर्पित करें
  6. पीला वस्त्र (पीतांबर) भगवान को चढ़ाएं
  7. आभूषण (मुकुट, कुंडल आदि) सजाएं

आरती और धूप-दीप:

  1. घी का दीपक जलाएं (5 या 11 दीपक)
  2. अगरबत्ती और धूप जलाएं
  3. भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की आरती करें
  4. "ॐ जय लक्ष्मी माता" और "ॐ जय जगदीश हरे" का गायन करें
  5. भोग लगाएं — खीर, पंचामृत, फल, मेवे, माखन-मिश्री

विष्णु सहस्रनाम पाठ:

  1. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
  2. यदि पूरा पाठ संभव न हो तो "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 बार जाप करें
  3. हर नाम के बाद "ॐ" और "नमः" जोड़ें

तर्पण और दान:

  1. पितरों का स्मरण करते हुए जल-तर्पण करें
  2. ब्राह्मणों को भोजन कराएं
  3. तिल, गुड़, सफेद वस्त्र का दान करें
  4. गाय को हरा चारा खिलाएं
  5. जरूरतमंदों को अन्नदान करें
  6. कन्याओं और बालिकाओं को भोजन कराएं और उपहार दें

शाम/रात्रि:

  1. शाम को पुनः दीपक जलाएं
  2. भजन-कीर्तन करें
  3. "विष्णु सहस्रनाम" का पुनः पाठ करें
  4. रात्रि जागरण करें (या पूजा-स्थल पर शयन करें)
  5. ब्रह्मचर्य का पालन करें

चारों पहर की पूजा और शुभ मंत्र

प्रथम पहर — प्रातः (ब्रह्म मुहूर्त)

समय: सूर्योदय से पूर्व — प्रातः 5:00 से 7:00 बजे तक

पूजा क्रम:

  1. स्नान और शुद्ध वस्त्र धारण
  2. संकल्प और आचमन
  3. कलश स्थापना
  4. भगवान विष्णु का अभिषेक
  5. तिलक और श्रृंगार

मुख्य मंत्र:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

जाप संख्या: 108 माला (सर्वोत्तम)

द्वितीय पहर — मध्याह्न (अभिजित मुहूर्त)

सम्य: दोपहर 11:45 से 12:30 बजे तक

पूजा क्रम:

  1. भोग लगाना — खीर, पंचामृत, माखन-मिश्री
  2. विष्णु सहस्रनाम का पाठ
  3. लक्ष्मी-विष्णु की संयुक्त पूजा

मुख्य मंत्र:

ॐ श्री लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः

जाप संख्या: 11 माला (अनिवार्य)

तृतीय पहर — सायं (प्रदोष काल)

समय: शाम 5:30 से 7:00 बजे तक

पूजा क्रम:

  1. संध्या-आरती
  2. घी के 11 दीपक जलाना
  3. भगवान विष्णु की कथा का पाठ
  4. तर्पण और पितृ-स्मरण

मुख्य मंत्र:

ॐ नमो नारायणाय

जाप संख्या: 23 माला

चतुर्थ पहर — रात्रि (निशीथ)

समय: रात्रि 10:00 से 11:30 बजे तक

पूजा क्रम:

  1. रात्रि जागरण
  2. भजन-कीर्तन
  3. शयन-पूजा (विष्णु-शयन की पूजा)
  4. क्षमा-प्रार्थना

मुख्य मंत्र:

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अतिरिक्त 5 मंत्र

1. विष्णु गायत्री मंत्र:

ॐ भर्गो देवस्य धीमहि, दियो यो नः प्रचोदयात्

2. नृसिंह मंत्र (रक्षा के लिए):

ॐ नृसिंहाय नमः

3. हयग्रीव मंत्र (विद्या के लिए):

ॐ हयग्रीवाय नमः

4. लक्ष्मी मंत्र (धन-समृद्धि के लिए):

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमलालयाय नमः

5. पद्मिनी बीज मंत्र (विशेष):

ॐ पद्माय नमः

पद्मिनी एकादशी के 8 प्रमुख लाभ

1. पापों का पूर्ण क्षय

भविष्योत्तर पुराण के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत समस्त पापों का नाश कर देता है — चाहे वे जानबूझकर हों या अनजाने में। यहाँ तक कि ब्रह्महत्या, गोहत्या जैसे महापातकों का भी निवारण होता है।

2. संतान-प्राप्ति

यह एकादशी संतानहीन दंपत्तियों के लिए विशेष वरदायिनी है। जो दंपत्ति श्रद्धा-भक्ति से यह व्रत करते हैं, उन्हें पुत्र/पुत्री की प्राप्ति होती है। कुंडली में पंचम भाव कमजोर होने पर यह व्रत अत्यंत लाभदायी सिद्ध होता है।

3. विवाह में विघ्न-निवारण

अविवाहित कन्याओं और युवकों को उत्तम वर/वधू की प्राप्ति इस एकादशी के प्रभाव से होती है। कुंडली में सप्तम भाव, शुक्र या शुक्र-संबंधी दोष होने पर यह व्रत विशेष फलदायी है।

4. मोक्ष-प्राप्ति

भविष्योत्तर पुराण में स्पष्ट लिखा है कि जो व्यक्ति पद्मिनी एकादशी का व्रत करता है, वह अंततः भगवान विष्णु के धाम (वैकुंठ) को प्राप्त करता है। यह व्रत मोक्ष के सर्वोत्तम साधनों में से एक है।

5. कुंडली-दोषों का शमन

कुंडली में शुक्र-दोष, मांगलिक-दोष, कुंडली-मिलान में बाधा, विवाह में विलम्ब जैसी समस्याओं का निवारण इस व्रत से होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह व्रत शुक्र-बृहस्पति की कृपा बढ़ाता है।

6. धन-समृद्धि की प्राप्ति

माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा से धन-धान्य, सुख-शांति, गृह-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति पूरी श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसके गृह में माँ लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।

7. पारिवारिक सुख-शांति

यह व्रत पारिवारिक कलह, दाम्पत्य-विवाद, संतान-अवज्ञा जैसी समस्याओं को दूर करता है। गृहस्थ जीवन में सुख-शांति बनाए रखने के लिए पद्मिनी एकादशी का व्रत रखना अत्यंत शुभ माना गया है।

8. पितरों का उद्धार

इस दिन किया गया तर्पण और श्राद्ध पितरों को सीधे मोक्ष प्रदान करता है। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार पद्मिनी एकादशी पर किया गया तर्पण पितरों को तत्काल मुक्ति देता है।

सावधानियां और नियम

1. सात्विक आहार का पालन

चावल, मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का सेवन वर्जित है। दशमी से ही सात्विक भोजन आरंभ कर दें।

2. बाल-नख काटना वर्जित

एकादशी के दिन बाल कटाना, नख काटना, दाढ़ी बनाना वर्जित है। यह शुभ दिन की पवित्रता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

3. सिलाई-कढ़ाई कार्य वर्जित

सिलाई, कढ़ाई, बुनाई जैसे शारीरिक श्रम वाले कार्य वर्जित हैं। दिनभर पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन में मन लगाएं।

4. असत्य और क्रोध का त्याग

असत्य बोलना, क्रोध करना, चुगली करना, निंदा करना — ये सब वर्जित हैं। मन और वाणी दोनों को सात्विक रखें।

5. ब्रह्मचर्य का पालन

व्रत के दिन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन अनिवार्य है। विचारों और कर्मों दोनों में पवित्रता बनाए रखें।

6. तामसिक भोजन का त्याग

बासी भोजन, तला-भुना, मसालेदार, उत्तेजक पदार्थों का सेवन वर्जित है। केवल शुद्ध, सात्विक और ताजा भोजन करें।

7. बिना स्नान के भोजन वर्जित

प्रत्येक भोजन से पूर्व स्नान अनिवार्य है। भोजन करते समय भगवान विष्णु का स्मरण करें।

8. मैथुन वर्जित

व्रत के दिन मैथुन पूर्णतः वर्जित है। यह व्रत की पवित्रता को नष्ट कर देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पद्मिनी एकादशी 2025 कब है?

पद्मिनी एकादशी 2025 को 28 नवंबर 2025, शुक्रवार को है। एकादशी तिथि 27 नवंबर प्रातः 06:18 बजे से प्रारंभ होकर 28 नवंबर प्रातः 04:31 बजे तक रहेगी। पारण 30 नवंबर 2025, रविवार को सूर्योदय के बाद करें।

क्या पद्मिनी और राम एकादशी एक ही हैं?

नहीं। पद्मिनी एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की और राम एकादशी चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। दोनों अलग-अलग एकादशियां हैं, परंतु दोनों का ही भगवान विष्णु से सीधा संबंध है। पद्मिनी का मुख्य फल विवाह और संतान पर है, जबकि राम एकादशी का संबंध भगवान राम के राज्याभिषेक से है।

क्या व्रत न कर सकें तो क्या करें?

यदि स्वास्थ्य या अन्य कारणों से पूर्ण निर्जला व्रत नहीं रख सकते, तो एक समय फलाहार कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त:

  • केवल दूध या फलाहार ले सकते हैं
  • भगवान विष्णु का नाम-स्मरण कर सकते हैं
  • 108 बार "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप कर सकते हैं
  • तुलसी-दल का दान कर सकते हैं
  • किसी ब्राह्मण को भोजन करा सकते हैं
  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ सुन सकते हैं

क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करें?

हाँ, यह अत्यंत शुभ है। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार जो व्यक्ति दशमी तिथि से ही एक बार भोजन और सात्विक आहार आरंभ कर देता है, उसका व्रत दोगुना फलदायी होता है। दशमी को प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, तामसिक भोजन का त्याग कर दें।

क्या बालक (छोटे बच्चे) पद्मिनी एकादशी का व्रत कर सकते हैं?

नहीं। शास्त्रानुसार 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों को व्रत नहीं करवाना चाहिए। उन्हें भगवान विष्णु की कथा सुनाएं, तुलसी में जल दिलवाएं, दीपक जलवाएं — इससे बालक में धर्म-भावना जागती है। किशोर (12-16 वर्ष) अपने माता-पिता के मार्गदर्शन में अर्ध-व्रत (फलाहार) कर सकते हैं।

पद्मिनी एकादशी पर तिल का दान क्यों विशेष है?

अत्यंत शुभ। पद्मिनी एकादशी पर तिल, गुड़, सफेद वस्त्र, घी, सोने-चांदी, कन्या-भोजन का दान अत्यंत फलदायी माना गया है। शास्त्र कहते हैं कि इस दिन कन्याओं को भोजन कराने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है और विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। पितरों की शांति के लिए तिल-जल तर्पण अवश्य करें।

क्या पद्मिनी एकादशी पर श्राद्ध कर सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। पद्मिनी एकादशी पर पितरों का श्राद्ध और तर्पण अत्यंत शुभ माना गया है। पितरों की तृप्ति के लिए तिल-जल, अक्षत, फल, कुशा का तर्पण करें। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार इस दिन किया गया तर्पण पितरों को सीधे मोक्ष प्रदान करता है।

पद्मिनी एकादशी किसे कहते हैं और यह कब आती है?

पद्मिनी एकादशी मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को आती है। यह वर्ष की 24 एकादशियों में से एक अत्यंत पावन एकादशी है जो भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप और माँ लक्ष्मी को समर्पित है। आमतौर पर यह नवंबर-दिसंबर के महीने में आती है। 2025 में 28 नवंबर को और 2026 में 17 दिसंबर को आएगी।

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[ { "question": "पद्मिनी एकादशी 2025 कब है?", "answer": "पद्मिनी एकादशी 2025 को 28 नवंबर, शुक्रवार को है। एकादशी तिथि 27 नवंबर प्रातः 06:18 बजे से 28 नवंबर प्रातः 04:31 बजे तक है। पारण 30 नवंबर रविवार को सूर्योदय के बाद करें। 2026 में यह 17 दिसंबर, रविवार को आएगी।" }, { "question": "क्या पद्मिनी और राम एकादशी एक ही हैं?", "answer": "नहीं। पद्मिनी एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की और राम एकादशी चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी है। दोनों अलग-अलग हैं। पद्मिनी का मुख्य फल विवाह और संतान पर है, जबकि राम एकादशी भगवान राम के राज्याभिषेक से संबंधित है।" }, { "question": "व्रत न कर सकें तो क्या करें?", "answer": "स्वास्थ्य कारण से निर्जला व्रत असंभव हो तो एक समय फलाहार करें, 108 बार 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप करें, तुलसी-दल का दान करें, ब्राह्मण को भोजन कराएं और विष्णु सहस्रनाम का पाठ सुनें।" }, { "question": "क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करना चाहिए?", "answer": "हाँ, भविष्योत्तर पुराण के अनुसार दशमी तिथि से एक बार भोजन और सात्विक आहार शुरू करने से व्रत का फल दोगुना हो जाता है। दशमी से प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग कर दें।" }, { "question": "क्या बालक पद्मिनी एकादशी का व्रत कर सकते हैं?", "answer": "नहीं, 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को व्रत नहीं करवाना चाहिए। उन्हें तुलसी में जल दिलवाएं, कथा सुनाएं, दीपक जलवाएं — इससे बालक में धर्म-भावना जागती है। 12-16 वर्ष के किशोर माता-पिता के मार्गदर्शन में फलाहार कर सकते हैं।" }, { "question": "पद्मिनी एकादशी पर तिल का दान क्यों विशेष है?", "answer": "इस दिन तिल, गुड़, सफेद वस्त्र, घी, सोने-चांदी का दान अत्यंत फलदायी है। कन्याओं को भोजन कराने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है और विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। पितरों की शांति के लिए तिल-जल तर्पण अवश्य करें।" } ]

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Frequently Asked Questions

पद्मिनी एकादशी 2025 कब है?+
पद्मिनी एकादशी 2025 को 28 नवंबर, शुक्रवार को है। एकादशी तिथि 27 नवंबर प्रातः 06:18 बजे से 28 नवंबर प्रातः 04:31 बजे तक है। पारण 30 नवंबर रविवार को सूर्योदय के बाद करें। 2026 में यह 17 दिसंबर, रविवार को आएगी।
क्या पद्मिनी और राम एकादशी एक ही हैं?+
नहीं। पद्मिनी एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की और राम एकादशी चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी है। दोनों अलग-अलग हैं। पद्मिनी का मुख्य फल विवाह और संतान पर है, जबकि राम एकादशी भगवान राम के राज्याभिषेक से संबंधित है।
व्रत न कर सकें तो क्या करें?+
स्वास्थ्य कारण से निर्जला व्रत असंभव हो तो एक समय फलाहार करें, 108 बार 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप करें, तुलसी-दल का दान करें, ब्राह्मण को भोजन कराएं और विष्णु सहस्रनाम का पाठ सुनें।
क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करना चाहिए?+
हाँ, भविष्योत्तर पुराण के अनुसार दशमी तिथि से एक बार भोजन और सात्विक आहार शुरू करने से व्रत का फल दोगुना हो जाता है। दशमी से प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग कर दें।
क्या बालक पद्मिनी एकादशी का व्रत कर सकते हैं?+
नहीं, 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को व्रत नहीं करवाना चाहिए। उन्हें तुलसी में जल दिलवाएं, कथा सुनाएं, दीपक जलवाएं — इससे बालक में धर्म-भावना जागती है। 12-16 वर्ष के किशोर माता-पिता के मार्गदर्शन में फलाहार कर सकते हैं।
पद्मिनी एकादशी पर तिल का दान क्यों विशेष है?+
इस दिन तिल, गुड़, सफेद वस्त्र, घी, सोने-चांदी का दान अत्यंत फलदायी है। कन्याओं को भोजन कराने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है और विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। पितरों की शांति के लिए तिल-जल तर्पण अवश्य करें।
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Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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