✨ लेखिका: निधि श्रीमाली, मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली (जोधपुर)।
अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जो जन्माष्टमी के तीन दिन बाद आती है। दक्षिण और पश्चिम भारत के अमांत पंचांग में यही तिथि श्रावण कृष्ण एकादशी कहलाती है, पर दिन वही रहता है। इस व्रत की कथा राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी है, जिन्होंने सत्य के लिए राज्य, परिवार और सब कुछ खोया और गौतम ऋषि के कहने पर यह व्रत रखा। इस लेख में तिथि कैसे पहचानें, "अजा" नाम का अर्थ, कथा, पूजा विधि, मंत्र, पारण, आसपास की एकादशियों से तुलना, और यह भी कि व्रत क्या कर सकता है और क्या नहीं।
विषय सूची (Table of Contents)
- अजा एकादशी क्या है — परिचय
- अजा एकादशी की तिथि कैसे जानें (2026 सहित)
- अजा एकादशी और आसपास की एकादशियाँ: तुलना
- "अजा" नाम का अर्थ
- धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
- अजा एकादशी की पौराणिक कथा — राजा हरिश्चंद्र
- पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची
- संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
- शुभ मंत्र और जाप विधि
- पारण कब और कैसे करें
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अजा एकादशी क्या है — परिचय
अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाने वाला विष्णु-व्रत है। वर्ष में सामान्यतः 24 एकादशियाँ आती हैं, हर महीने दो, एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। जिस वर्ष अधिक मास होता है, उस वर्ष दो एकादशियाँ और जुड़कर 26 हो जाती हैं। हर एकादशी का अपना नाम और अपनी कथा है, जो एकादशी-माहात्म्य की परंपरा में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को सुनाते हैं।
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है, इसलिए यह एकादशी "भाद्रपद कृष्ण" कहलाती है। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में महीना अमावस्या पर समाप्त होता है, इसलिए वही दिन "श्रावण कृष्ण एकादशी" कहलाता है। इसी कारण कुछ कैलेंडरों में अजा एकादशी श्रावण में और कुछ में भाद्रपद में लिखी मिलती है; व्रत का दिन दोनों में एक ही है।
भाद्रपद का कृष्ण पक्ष उत्सवों से भरा है: पहले कृष्ण जन्माष्टमी, फिर अजा एकादशी, और राजस्थान में उसके अगले दिन बछबारस (गोवत्स द्वादशी)। इसके बाद शुक्ल पक्ष में गणेश चतुर्थी और जलझूलनी एकादशी आती हैं।
व्रत का मुख्य उद्देश्य इंद्रियों पर संयम, मन की शुद्धि और भगवान विष्णु की भक्ति है। "एकादशी" शब्द का अर्थ ही ग्यारहवीं तिथि है।
अजा एकादशी की तिथि कैसे जानें (2026 सहित)
अजा एकादशी पहचानने का सबसे आसान तरीका: जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) से तीन दिन आगे गिनें। तिथियाँ कभी-कभी घटती-बढ़ती हैं, इसलिए अंतिम पुष्टि पंचांग से करें।
| बात | नियम |
|---|---|
| तिथि | भाद्रपद कृष्ण एकादशी (अमांत पंचांग में श्रावण कृष्ण एकादशी) |
| अंग्रेज़ी महीना | प्रायः अगस्त या सितंबर |
| व्रत का दिन | जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी हो; दशमी-विद्ध एकादशी (सूर्योदय से पहले दशमी का अंश) वैष्णव परंपरा में छोड़ी जाती है |
| पारण | अगले दिन, द्वादशी तिथि के भीतर, हरिवासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) बीतने के बाद |
| दो दिन एकादशी लिखी हो तो | गृहस्थ प्रायः पहले दिन, और वैष्णव संप्रदाय दूसरे दिन व्रत रखते हैं; अपने पंचांग या संप्रदाय का नियम मानें |
2026 के बारे में सुधार: इस पृष्ठ पर पहले 2026 की तिथि 23 अगस्त लिखी थी और इसे शुक्ल पक्ष की एकादशी बताया गया था। दोनों बातें गलत थीं। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास था, इसलिए श्रावण-भाद्रपद के सारे पर्व सामान्य से लगभग एक महीना आगे खिसक गए। अजा एकादशी जन्माष्टमी के तीन दिन बाद, सितंबर 2026 के पहले पखवाड़े में पड़ी। आने वाले वर्षों के लिए ऊपर का नियम और अपने शहर का पंचांग देखें।
अजा एकादशी और आसपास की एकादशियाँ: तुलना
अजा एकादशी को सबसे अधिक भ्रम परिवर्तिनी और इंदिरा एकादशी से होता है। नीचे श्रावण से आश्विन तक की एकादशियाँ क्रम से हैं (पूर्णिमांत महीनों के नाम के साथ):
| एकादशी | तिथि (पूर्णिमांत) | किस बात के लिए जानी जाती है | प्रचलित कथा |
|---|---|---|---|
| कामिका | श्रावण कृष्ण | चातुर्मास की पहली कृष्ण एकादशी; तुलसी पूजा | कामिका माहात्म्य |
| पुत्रदा (पवित्रा) | श्रावण शुक्ल | संतान की कामना से रखा जाने वाला व्रत | राजा महीजित |
| अजा | भाद्रपद कृष्ण | जन्माष्टमी के तीन दिन बाद; कठिन समय से निकलने की कथा | राजा हरिश्चंद्र |
| परिवर्तिनी (पद्मा, जलझूलनी) | भाद्रपद शुक्ल | योग-निद्रा में विष्णु का करवट बदलना; राजस्थान में ठाकुरजी की जलझूलनी यात्रा | वामन और राजा बलि |
| इंदिरा | आश्विन कृष्ण | पितृ पक्ष के बीच; पितरों के लिए | राजा इंद्रसेन |
| पापांकुशा | आश्विन शुक्ल | दशहरे के बाद की एकादशी | बहेलिया क्रोधन |
परिवर्तिनी एकादशी के बारे में विस्तार से जलझूलनी एकादशी पर हमारे लेख में पढ़ें। पितरों के लिए रखी जाने वाली इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के भीतर आती है, जबकि अजा एकादशी पितृ पक्ष से लगभग तीन सप्ताह पहले।
"अजा" नाम का अर्थ
"अज" संस्कृत में "अजन्मा" को कहते हैं: "अ" (नहीं) + "ज" (जन्मा)। विष्णु सहस्रनाम में "अज" भगवान विष्णु का एक नाम है, और भगवद्गीता में भी परमात्मा को "अज" (अजन्मा) और "अव्यय" (अविनाशी) कहा गया है। अजा एकादशी के नाम को परंपरा इसी अर्थ से जोड़ती है: जो जन्म-मृत्यु से परे है, उसकी आराधना।
"अजा" शब्द का एक सामान्य अर्थ बकरी भी है, पर इस एकादशी से उसका कोई संबंध नहीं मिलता, और इस व्रत में बकरी दान का कोई विधान नहीं है। एकादशी के नाम बहुत बार केवल माहात्म्य-कथा की पहचान होते हैं; हर नाम में कोई छिपा रहस्य खोजना आवश्यक नहीं।
भगवान विष्णु के अवतारों और नामों के बारे में अधिक जानने के लिए विष्णु के 10 अवतारों पर हमारा लेख पढ़ सकते हैं।
धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
धार्मिक दृष्टि से
- पाप-क्षय की मान्यता — एकादशी-माहात्म्य कहता है कि यह व्रत पिछले पापों का प्रायश्चित है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी के साथ किए गए अन्याय की भरपाई व्रत से हो जाती है; वह भरपाई कर्म से ही होती है।
- कठिन समय में धैर्य — हरिश्चंद्र की कथा के कारण यह व्रत संकट के दौर से निकलने की आस्था से जुड़ा है।
- विष्णु भक्ति — तुलसी, विष्णु सहस्रनाम और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" इस दिन के मुख्य अंग हैं।
- चातुर्मास का व्रत — यह एकादशी चातुर्मास के भीतर आती है, जब विष्णु योग-निद्रा में माने जाते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से
- मन की शुद्धि — उपवास और सात्विक आचरण से मन को शांत रखने का अभ्यास
- इंद्रिय-संयम — जीभ, काम, क्रोध पर नियंत्रण का अभ्यास
- सत्य का स्मरण — हरिश्चंद्र की कथा का मूल संदेश सत्य पर टिके रहना है
- कर्म-फल का समर्पण — कर्मों के फल को भगवान को समर्पित करने की भावना
ज्योतिषीय दृष्टि से
- भाद्रपद मास में सूर्य प्रायः सिंह राशि में होते हैं, जो सूर्य की अपनी राशि है।
- एकादशी चंद्र-तिथि है; ज्योतिष में व्रत को मन (चंद्र) के अनुशासन से जोड़ा जाता है।
- किसी विशेष ग्रह-दोष के उपाय के रूप में कौन सा व्रत उचित है, यह आपकी कुंडली देखकर तय होता है, केवल तिथि देखकर नहीं। इसके लिए कुंडली विश्लेषण करवाएँ।
अजा एकादशी की पौराणिक कथा — राजा हरिश्चंद्र
एकादशी-माहात्म्य की परंपरा में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से भाद्रपद कृष्ण एकादशी के बारे में पूछते हैं, और श्रीकृष्ण उन्हें राजा हरिश्चंद्र की कथा सुनाते हैं। (इस पृष्ठ के पुराने संस्करण में यह कथा "राजा मान्धाता और हर्षण" के नाम से थी, जो अजा एकादशी की कथा नहीं है।)
कथा का आरंभ
अयोध्या के सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र अपनी सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। अपने वचन का पालन करने के लिए उन्होंने पूरा राज्य दान कर दिया। दक्षिणा चुकाने के लिए उन्हें अपनी पत्नी तारामती (कुछ कथाओं में शैव्या) और पुत्र रोहिताश्व को बेचना पड़ा, और स्वयं एक चांडाल के यहाँ श्मशान में कर वसूलने का काम करना पड़ा।
कथा का विकास
वर्षों तक इसी दुख में रहते हुए एक दिन उनकी भेंट गौतम ऋषि से हुई। हरिश्चंद्र ने अपनी दशा बताई और पूछा कि इस कष्ट से कैसे निकलें। ऋषि ने कहा कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसका नाम अजा है, निकट है; उस दिन उपवास, रात्रि-जागरण और विष्णु-पूजा करो। हरिश्चंद्र ने वैसा ही किया।
कथा का अंत और संदेश
कथा के अनुसार व्रत के प्रभाव से उनके कष्ट समाप्त हुए, उनका मृत पुत्र पुनर्जीवित हुआ, पत्नी और पुत्र फिर साथ आए, और उन्हें राज्य वापस मिला। इस कथा से तीन बातें निकलती हैं:
- सत्य पर टिके रहना — हरिश्चंद्र ने सब कुछ खोकर भी वचन नहीं तोड़ा। कथा का मूल यही है, व्रत उसके बाद आता है।
- सही समय पर मार्गदर्शन — कथा में मोड़ तब आता है जब हरिश्चंद्र अपनी बात एक ज्ञानी से कहते हैं।
- धैर्य — कठिन समय स्थायी नहीं होता। व्रत उस धैर्य को बनाए रखने का साधन है।
यह पौराणिक कथा है। आज कोई आर्थिक संकट, पारिवारिक बिखराव या कानूनी परेशानी से गुज़र रहा हो, तो व्रत आस्था और मन की दृढ़ता देता है, पर व्यावहारिक कदम, जैसे वकील, वित्तीय सलाहकार या डॉक्टर की सलाह, उसकी जगह नहीं लेता।
पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची
अजा एकादशी की पूजा के लिए निम्न सामग्री एक दिन पहले (दशमी को) ही इकट्ठी कर लें:
| क्र. | सामग्री | उपयोग |
|---|---|---|
| 1 | भगवान विष्णु की मूर्ति, चित्र या शालिग्राम | मुख्य पूजा |
| 2 | तुलसी-दल | अनिवार्य; पर एकादशी को तुलसी न तोड़ें, दशमी को तोड़कर रखें |
| 3 | पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) | अभिषेक के लिए |
| 4 | गंगाजल | शुद्धि और अभिषेक |
| 5 | रोली, मौली, चंदन | तिलक और पूजा |
| 6 | अक्षत (साबुत चावल) | केवल पूजा में अर्पण के लिए; खाने में चावल वर्जित है |
| 7 | पीले फूल | भगवान विष्णु को अर्पित |
| 8 | धूप | पूजा |
| 9 | घी का दीपक | आरती |
| 10 | कपूर | आरती |
| 11 | अगरबत्ती | सुगंध |
| 12 | पान के पत्ते, लौंग, सुपारी | भोग |
| 13 | फल और मेवे | भोग |
| 14 | आसन | बैठने के लिए |
| 15 | कलश (मिट्टी या ताँबे का) | कलश स्थापना |
| 16 | सिक्का | कलश में रखने के लिए |
| 17 | विष्णु सहस्रनाम की पुस्तिका | पाठ के लिए |
| 18 | नारियल | भोग और कलश पर रखने के लिए |
| 19 | पीला वस्त्र | भगवान को चढ़ाने के लिए |
| 20 | तिल, गुड़, अनाज | दान के लिए |
जप के लिए तुलसी की माला परंपरा से विष्णु-जप में प्रयोग होती है। माला न हो तो तुलसी जाप माला या हमारी माला संग्रह देख सकते हैं।
संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
दशमी तिथि — व्रत की पूर्व-तैयारी
- एक बार भोजन: दशमी को सूर्यास्त से पहले एक समय सात्विक भोजन करें।
- पूजा सामग्री संग्रह: ऊपर बताई गई सामग्री इकट्ठी करें, और तुलसी-दल इसी दिन तोड़कर रख लें।
- व्रत का संकल्प: रात को भगवान विष्णु का स्मरण कर अगले दिन के व्रत का निश्चय करें।
- बाल-नख: काटने हों तो दशमी को ही काट लें, एकादशी को नहीं।
- तुलसी में जल दें: प्रतिदिन की तरह तुलसी-सेवा करें।
एकादशी तिथि — मुख्य व्रत दिवस
प्रातः (सूर्योदय से पहले):
- सूर्योदय से पहले उठें।
- स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (पीला रंग श्रेष्ठ) धारण करें।
- भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाएँ।
- संकल्प लें: अपना नाम, गोत्र और "भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए अजा एकादशी का व्रत रखता/रखती हूँ" कहें, और यह भी तय करें कि व्रत निर्जला होगा, फलाहार या एक समय का।
- भगवान विष्णु का ध्यान करें।
कलश स्थापना (वैकल्पिक):
- मिट्टी या ताँबे के कलश में जल भरें।
- उसमें सिक्का, सुपारी और आम के पत्ते रखें।
- कलश पर नारियल रखें।
- कलश के पास तुलसी-दल रखें।
- कलश का पूजन करें।
मुख्य पूजा:
- भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र को पीले वस्त्र पर स्थापित करें।
- मूर्ति या शालिग्राम हो तो पंचामृत से स्नान कराएँ; चित्र हो तो जल छिड़कें।
- शुद्ध जल से पुनः स्नान कराएँ।
- चंदन और रोली का तिलक लगाएँ।
- पीले फूल और तुलसी-दल अर्पित करें।
- पीला वस्त्र भगवान को चढ़ाएँ।
- हरिश्चंद्र वाली अजा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
आरती और धूप-दीप:
- घी का दीपक जलाएँ।
- धूप और अगरबत्ती जलाएँ।
- भगवान विष्णु की आरती करें।
- "ॐ जय जगदीश हरे" आरती गाएँ।
- फल, मेवे और पंचामृत का भोग लगाएँ (चावल और अनाज का नहीं)।
विष्णु सहस्रनाम पाठ:
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- पूरा पाठ संभव न हो तो "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का 108 बार जप करें।
दान:
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या तिल-गुड़ का दान करें।
- गाय को हरा चारा खिलाएँ।
- जरूरतमंदों को भोजन दें।
पितरों के लिए तर्पण इस दिन भी किया जा सकता है, पर पितरों के लिए विशेष एकादशी इंदिरा एकादशी है, जो पितृ पक्ष में आती है।
शाम/रात्रि:
- शाम को पुनः दीपक जलाएँ।
- भजन-कीर्तन करें।
- विष्णु सहस्रनाम का पुनः पाठ करें।
- संभव हो तो रात्रि जागरण करें; हरिश्चंद्र की कथा में जागरण व्रत का अंग है।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
घर पर विधिवत विष्णु-पूजा किसी पंडित से करवानी हो तो हमारी ई-पूजा सेवाएँ देखें।
शुभ मंत्र और जाप विधि
प्रमुख मंत्र
1. द्वादशाक्षर मंत्र (बारह अक्षर):
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
यह विष्णु-उपासना का सबसे प्रचलित मंत्र है। एकादशी को इसकी 1, 3 या 11 माला (108 मनकों की) जप सकते हैं।
2. अष्टाक्षर मंत्र (आठ अक्षर):
ॐ नमो नारायणाय
108 बार या अपनी सुविधा के अनुसार जप करें।
3. नाम मंत्र:
ॐ विष्णवे नमः (या) ॐ केशवाय नमः
सरल नाम-जप, जो बच्चे और बुज़ुर्ग भी आसानी से कर सकते हैं।
4. विष्णु गायत्री मंत्र:
ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।
108 बार जप।
5. "ॐ जय जगदीश हरे": यह मंत्र नहीं, आरती है, जो पूजा के अंत में गाई जाती है।
6. विष्णु ध्यान मंत्र:
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
जाप विधि
| समय | जाप संख्या (सुझाव) | विशेषता |
|---|---|---|
| प्रातः स्नान के बाद | 1 से 11 माला | मुख्य जप |
| संध्या | 1 से 3 माला | आरती के साथ |
| रात्रि जागरण | जितना संभव | भजन और नाम-जप |
| व्रत का पूरा दिन | संख्या से अधिक नियमितता महत्वपूर्ण | मन में नाम-स्मरण |
जाप के नियम:
- विष्णु-जप के लिए तुलसी की माला परंपरा से श्रेष्ठ मानी जाती है
- जाप बैठकर करें — आसन कुश या ऊनी
- सामने भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र रखें
- मन में भगवान का ध्यान करते हुए जप करें
- उच्चारण शुद्ध हो; न आए तो धीरे बोलें, जल्दबाज़ी न करें
पारण कब और कैसे करें
पारण दिन: एकादशी के अगले दिन, द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद। पारण द्वादशी समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए। द्वादशी का पहला चौथाई भाग "हरिवासर" कहलाता है; उसके बीतने तक पारण नहीं किया जाता। पारण का ठीक समय हर वर्ष पंचांग में लिखा रहता है।
पारण की विधि
- सुबह उठकर स्नान करें।
- भगवान विष्णु की पूजा करें।
- "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का 11 या 21 बार जप करें।
- भगवान को भोग लगाएँ।
- संभव हो तो किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएँ या अन्न दान करें।
- फिर स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करें। कई परिवारों में पारण तुलसी-दल या आँवले से शुरू किया जाता है।
पारण में क्या खाएं
- सात्विक भोजन — बिना प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा
- दूध, दही, घी से बनी वस्तुएँ
- खीर या हलवा
- फल और मेवे
- हल्की सब्ज़ियाँ — लंबे उपवास के बाद एकदम भारी भोजन न करें
- ताज़ा भोजन — बासी न खाएँ
पारण की सावधानियां
- पारण पूजा के बाद ही करें
- द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण कर लें; द्वादशी बीत जाने पर पारण न करना दोष माना जाता है
- हरिवासर में पारण न करें — हरिवासर द्वादशी का पहला चौथाई भाग है, यह कोई वार (जैसे रविवार) नहीं
- मध्याह्न में पारण से बचने की परंपरा है; हरिवासर बीतने के बाद सुबह का समय उत्तम है
- मधुमेह या कोई और रोग हो तो लंबा उपवास तोड़ने के समय डॉक्टर की बताई सावधानी रखें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अजा एकादशी 2026 कब है?
अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण एकादशी को होती है, जो जन्माष्टमी के तीन दिन बाद आती है। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण यह सितंबर के पहले पखवाड़े में पड़ी। इस पृष्ठ पर पहले लिखी 23 अगस्त 2026 की तिथि गलत थी। किसी भी वर्ष की सटीक तिथि और पारण का समय अपने शहर के पंचांग में देखें।
क्या अजा और परिवर्तिनी एकादशी एक ही हैं?
नहीं। अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी है और परिवर्तिनी (पद्मा या जलझूलनी) एकादशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की। दोनों के बीच लगभग पंद्रह दिन का अंतर है, और दोनों अलग व्रत हैं जिनकी कथाएँ भी अलग हैं: अजा की कथा राजा हरिश्चंद्र की है और परिवर्तिनी की वामन और राजा बलि की। ऊपर की तुलना तालिका देखें।
क्या व्रत न कर सकें तो क्या करें?
यदि स्वास्थ्य या किसी अन्य कारण से निर्जला व्रत नहीं रख सकते, तो फलाहार या एक समय का भोजन रखा जा सकता है। गर्भवती महिलाएँ, मधुमेह या रक्तचाप के रोगी, और नियमित दवा लेने वाले लोग डॉक्टर से पूछकर ही उपवास करें। इसके अतिरिक्त:
- केवल दूध या फल ले सकते हैं
- भगवान विष्णु का नाम-स्मरण कर सकते हैं
- 108 बार "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप कर सकते हैं
- तुलसी की सेवा कर सकते हैं
- किसी जरूरतमंद को भोजन करा सकते हैं
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ सुन सकते हैं
क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करें?
हाँ, यही परंपरा है। एकादशी व्रत का नियम दशमी से शुरू होता है: दशमी को एक समय सात्विक भोजन, सूर्यास्त से पहले, और प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग। इससे एकादशी के दिन उपवास भी आसान होता है।
क्या बालक (छोटे बच्चे) अजा एकादशी का व्रत कर सकते हैं?
छोटे बच्चों से कठोर या निर्जला व्रत नहीं करवाना चाहिए। परंपरा में एकादशी व्रत का नियम मोटे तौर पर आठ वर्ष से ऊपर और अस्सी वर्ष से कम आयु के लिए बताया गया है, पर बढ़ते बच्चे के लिए क्या ठीक है, यह माता-पिता और डॉक्टर तय करें। बच्चों को कथा सुनाएँ, तुलसी में जल दिलवाएँ और दीपक जलवाएँ; बड़े बच्चे चाहें तो चावल-अनाज छोड़कर फलाहार कर सकते हैं।
क्या अजा एकादशी पर तिल का दान विशेष फलदायी है?
एकादशी पर दान की परंपरा है, और अन्न, वस्त्र, तिल और गुड़ का दान प्रचलित है। पर तिल-दान को अजा एकादशी का विशेष अंग बताने वाला कोई प्रसिद्ध शास्त्रीय वचन नहीं मिलता। (इस पृष्ठ पर पहले एक संस्कृत पंक्ति इस रूप में उद्धृत थी; उसका स्रोत नहीं मिला, इसलिए हटा दी गई है।) तिल का विशेष संबंध पितृ-कर्म से है, जो पितृ पक्ष में किया जाता है। दान अपनी सामर्थ्य से करें; दान का मूल्य उसकी राशि से नहीं, नीयत से है।
अजा एकादशी का विशेष फल क्या है?
एकादशी-माहात्म्य की परंपरा अजा एकादशी के लिए ये फल बताती है:
- पिछले पापों का प्रायश्चित
- कठिन समय से निकलने का धैर्य, हरिश्चंद्र की कथा के अनुसार
- विष्णु-भक्ति में दृढ़ता
- मृत्यु के बाद विष्णु-लोक की प्राप्ति, धार्मिक मान्यता के रूप में
ये आस्था की बातें हैं। व्रत से संतान, धन, आयु या किसी विशेष परिणाम की गारंटी नहीं दी जा सकती, और यह कुंडली के किसी दोष का अपने आप "शमन" नहीं करता। किसी दोष का उपाय क्या हो, यह कुंडली विश्लेषण से तय होता है।
क्या अजा एकादशी पर श्राद्ध कर सकते हैं?
पितरों का स्मरण और जल-तर्पण किसी भी दिन किया जा सकता है। पर विधिवत श्राद्ध के लिए तय समय पितृ पक्ष है, जो भाद्रपद पूर्णिमा के बाद आता है, और अजा एकादशी उससे लगभग तीन सप्ताह पहले पड़ती है। पितृ पक्ष की एकादशी (इंदिरा एकादशी) पितरों के लिए विशेष मानी जाती है। यदि किसी पूर्वज की मृत्यु इसी तिथि पर हुई हो तो वार्षिक श्राद्ध इस दिन होता है; उसमें एकादशी होने के कारण अन्न के नियम पर अपने पंडित से पूछें।
अजा एकादशी पर कौन-से कार्य वर्जित हैं?
- चावल और अनाज, मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का सेवन वर्जित
- बाल-नख काटना वर्जित
- तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित (दशमी को तोड़कर रखें)
- दिन में सोना परंपरा में ठीक नहीं माना जाता
- मैथुन वर्जित
- असत्य, क्रोध, चुगली वर्जित; हरिश्चंद्र की कथा के दिन असत्य से विशेष रूप से बचें
- तामसिक भोजन और व्यवहार वर्जित
- बिना स्नान के पूजा नहीं
क्या अजा एकादशी पर मंदिर जाना चाहिए?
जा सकें तो अच्छा है, अनिवार्य नहीं। घर पर की गई पूजा भी पूरी मानी जाती है। पास के विष्णु या कृष्ण मंदिर में दर्शन करें; जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ, तिरुपति, वृंदावन और मथुरा जैसे वैष्णव धामों में एकादशी पर विशेष पूजा होती है। भगवान को तुलसी-दल, पीले फूल और माखन-मिश्री अर्पित कर सकते हैं।
शुभकामनाओं सहित,
निधि श्रीमाली
मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली (जोधपुर)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
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इस लेख में बताए गए नियम सामान्य मार्गदर्शन हैं। आपकी कुंडली में कौन सा ग्रह किस समय प्रभावी है और उसके लिए कौन सा व्रत या उपाय उचित है, यह जानने के लिए निधि श्रीमाली से व्यक्तिगत परामर्श बुक करें।
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[ { "question": "अजा एकादशी 2026 कब है?", "answer": "अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण एकादशी को होती है, जो जन्माष्टमी के तीन दिन बाद आती है। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण यह सितंबर के पहले पखवाड़े में पड़ी। किसी भी वर्ष की सटीक तिथि और पारण का समय अपने शहर के पंचांग में देखें।" }, { "question": "क्या अजा और परिवर्तिनी एकादशी एक ही हैं?", "answer": "नहीं। अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की और परिवर्तिनी (पद्मा या जलझूलनी) एकादशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी है। दोनों के बीच लगभग पंद्रह दिन का अंतर है। अजा की कथा राजा हरिश्चंद्र की है और परिवर्तिनी की वामन और राजा बलि की।" }, { "question": "व्रत न कर सकें तो क्या करें?", "answer": "स्वास्थ्य कारण से निर्जला व्रत संभव न हो तो फलाहार या एक समय भोजन रखें; गर्भवती महिलाएँ और नियमित दवा लेने वाले लोग डॉक्टर से पूछकर ही उपवास करें। 108 बार 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करें, तुलसी की सेवा करें और विष्णु सहस्रनाम सुनें।" }, { "question": "क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करना चाहिए?", "answer": "हाँ, यही परंपरा है। एकादशी व्रत का नियम दशमी से शुरू होता है: दशमी को सूर्यास्त से पहले एक समय सात्विक भोजन, और प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग। इससे एकादशी का उपवास भी आसान होता है।" }, { "question": "क्या बालक अजा एकादशी का व्रत कर सकते हैं?", "answer": "छोटे बच्चों से कठोर या निर्जला व्रत नहीं करवाना चाहिए। परंपरा में एकादशी व्रत मोटे तौर पर आठ से अस्सी वर्ष की आयु के लिए बताया गया है, पर बच्चे के लिए क्या ठीक है, यह माता-पिता और डॉक्टर तय करें। बच्चों को कथा सुनाएँ और तुलसी में जल दिलवाएँ।" }, { "question": "अजा एकादशी पर तिल का दान क्यों विशेष है?", "answer": "एकादशी पर अन्न, वस्त्र, तिल और गुड़ का दान प्रचलित है, पर तिल-दान को अजा एकादशी का विशेष अंग बताने वाला कोई प्रसिद्ध शास्त्रीय वचन नहीं मिलता। तिल का विशेष संबंध पितृ-कर्म से है, जो पितृ पक्ष में किया जाता है। दान अपनी सामर्थ्य से करें।" } ]
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Frequently Asked Questions
अजा एकादशी 2026 कब है?+
क्या अजा और परिवर्तिनी एकादशी एक ही हैं?+
व्रत न कर सकें तो क्या करें?+
क्या दशमी से ही सात्विक भोजन शुरू करना चाहिए?+
क्या बालक अजा एकादशी का व्रत कर सकते हैं?+
अजा एकादशी पर तिल का दान क्यों विशेष है?+
Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.