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जलझूलनी एकादशी का महत्व , मुहूर्त , पूजन विधि एवं उपाय

# जलझूलनी एकादशी का महत्व , मुहूर्त , पूजन विधि एवं उपाय - Jaljhulani Ekadashi - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **जलझूलनी एकादशी का महत्व , मुहूर्त , पूजन विधि एवं उपाय** — यह विषय मेर

7 July 2026 12 min read|By Nidhi Shrimali

⚡ संक्षेप में — जलझूलनी एकादशी

लेखिका: निधि श्रीमाली | वैदिक ज्योतिषी, 18+ वर्षों का अनुभव
अद्यतन: अगस्त 2026 | पढ़ने का समय: 12 मिनट
रेटिंग: ★★★★★ 4.9/5 (1,425+ परामर्श समीक्षाओं से)

जलझूलनी एकादशी भाद्रपद शुक्ल एकादशी को आती है और इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि चातुर्मास की निद्रा में भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं — इसीलिए 'परिवर्तिनी'। इस दिन उनकी प्रतिमा को जल में झुलाने की परंपरा है, जिससे 'जलझूलनी' नाम पड़ा।


विषय सूची

  1. जलझूलनी एकादशी क्या है
  2. अनेक नाम और उनका अर्थ
  3. चातुर्मास और तीन एकादशियाँ
  4. व्रत कथा — वामन अवतार
  5. जल झुलाने की परंपरा
  6. व्रत विधि
  7. पारण का नियम
  8. आहार के नियम
  9. मंत्र और पाठ
  10. ज्योतिषीय दृष्टि से
  11. कौन रखे और कौन न रखे

जलझूलनी एकादशी क्या है

जलझूलनी एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह सामान्यतः अगस्त-सितंबर में पड़ती है।

यह एकादशी चातुर्मास के मध्य में आती है — वह चार मास की अवधि जिसमें परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। देवशयनी एकादशी से यह निद्रा आरंभ होती है और देवउठनी एकादशी पर समाप्त।

इसी बीच में यह तिथि आती है, और मान्यता है कि इस दिन विष्णु जी निद्रा में करवट बदलते हैं — शयन की दिशा परिवर्तित करते हैं। यही इसका सबसे विशिष्ट भाव है और इसी से इसका प्रमुख नाम 'परिवर्तिनी एकादशी' बना।

अनेक नाम और उनका अर्थ

इस एकादशी के अनेक नाम हैं और प्रत्येक किसी एक पक्ष को दर्शाता है।

नामअर्थ
परिवर्तिनीविष्णु जी का करवट बदलना; परिवर्तन
जलझूलनीप्रतिमा को जल में झुलाने की परंपरा से
पद्माकमल; विष्णु जी के हाथ का कमल दूसरे हाथ में जाना
वामनइसी काल में वामन अवतार की कथा जुड़ी है
डोल ग्यारसराजस्थान-मध्य प्रदेश में; डोली में झुलाने से

राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में इसे डोल ग्यारस कहा जाता है और यह बड़े उत्सव के रूप में मनाई जाती है — भगवान की प्रतिमा को डोली अथवा झूले में बिठाकर शोभायात्रा निकाली जाती है और जलाशय तक ले जाया जाता है।

चातुर्मास और तीन एकादशियाँ

इस तिथि का महत्व समझने के लिए चातुर्मास की तीन प्रमुख एकादशियों को साथ देखना उपयोगी है।

एकादशीतिथिभाव
देवशयनीआषाढ़ शुक्ल एकादशीविष्णु जी योगनिद्रा में जाते हैं; चातुर्मास आरंभ
जलझूलनी / परिवर्तिनीभाद्रपद शुक्ल एकादशीनिद्रा में करवट बदलते हैं; चातुर्मास का मध्य
देवउठनी / प्रबोधिनीकार्तिक शुक्ल एकादशीनिद्रा से जागते हैं; शुभ कार्य पुनः आरंभ

चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश और नए कार्यों का आरंभ वर्जित रहता है — देवउठनी एकादशी से ही विवाह का काल पुनः आरंभ होता है।

जलझूलनी इस अवधि के ठीक मध्य में है, और इसका भाव भी मध्य का है — न आरंभ, न समापन, अपितु परिवर्तन। यही कारण है कि इसे उन कार्यों के लिए उपयुक्त माना गया है जहाँ दिशा बदलनी हो, न कि जहाँ कुछ नया आरंभ करना हो।

व्रत कथा — वामन अवतार

इस एकादशी से जुड़ी कथा वामन अवतार की है, जो भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को हुआ माना जाता है।

दैत्यराज बलि अत्यंत दानी और पराक्रमी था। उसने अपने बल से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और इंद्र सहित देवता स्वर्ग से वंचित हो गए। बलि दुष्ट नहीं था — वह धर्मात्मा और दानशील था, परंतु उसकी शक्ति संतुलन बिगाड़ रही थी।

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन — एक बटु ब्राह्मण — का रूप धारण किया और बलि के यज्ञ में पहुँचे। बलि ने आदरपूर्वक पूछा कि उन्हें क्या चाहिए।

वामन ने केवल तीन पग भूमि माँगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य ने चेतावनी दी कि यह साधारण ब्राह्मण नहीं है, परंतु बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटा — क्योंकि वह दानी था और दिया गया वचन तोड़ना उसके धर्म के विरुद्ध था।

वामन ने विराट रूप धारण किया। एक पग में संपूर्ण पृथ्वी, दूसरे में स्वर्ग नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा। तब बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।

विष्णु जी ने तीसरा पग उसके सिर पर रखा और उसे पाताल का राज्य दिया। बलि की दानशीलता और वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे यह वरदान भी दिया कि वे स्वयं उसके द्वारपाल बनेंगे।

कथा का भाव: बलि हारा नहीं — वह जीता। उसने जो खोया वह राज्य था; जो पाया वह स्वयं भगवान की उपस्थिति थी। परंपरा में यह कथा दान, वचन-पालन और समर्पण की श्रेष्ठता बताने के लिए सुनाई जाती है।

जल झुलाने की परंपरा

इस एकादशी की सबसे विशिष्ट परंपरा यही है, और इसी से इसका नाम बना।

इस दिन भगवान विष्णु अथवा कृष्ण की प्रतिमा को डोली अथवा झूले में बिठाकर शोभायात्रा के साथ जलाशय — नदी, तालाब अथवा कुंड — तक ले जाया जाता है। वहाँ प्रतिमा को जल में झुलाया जाता है, स्नान कराया जाता है, और फिर वापस मंदिर लाया जाता है।

इसके पीछे दो भाव बताए जाते हैं:

  • निद्रा में करवट बदलते समय सुख देना — जैसे सोते हुए व्यक्ति को जल से शीतलता मिले।
  • वर्षा ऋतु के अंत का स्वागत — भाद्रपद वर्षा का अंतिम काल है; जलाशय भरे होते हैं और यह उत्सव उसी समृद्धि का स्मरण है।

राजस्थान और मध्य प्रदेश में डोल ग्यारस के रूप में यह बड़े स्तर पर मनाई जाती है — नाथद्वारा, उदयपुर और बुंदेलखंड क्षेत्र में विशेष रूप से। गुजरात में भी इसका विशेष स्वरूप है।

जो शोभायात्रा में सम्मिलित नहीं हो सकते, वे घर पर ही प्रतिमा को स्नान कराकर, झूले में बिठाकर और झुलाकर यह परंपरा निभा सकते हैं — यह पूर्णतः मान्य है।

व्रत विधि

  1. दशमी को — एक समय सात्विक भोजन लें और संकल्प का मन बना लें।
  2. एकादशी प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें — पीले वस्त्र उत्तम।
  3. संकल्प लें — नाम, गोत्र और उद्देश्य कहते हुए, व्रत का प्रकार स्पष्ट करें।
  4. विष्णु प्रतिमा अथवा शालिग्राम की स्थापना करें।
  5. पंचामृत से अभिषेक — दूध, दही, घी, शहद, शर्करा; फिर शुद्ध जल।
  6. अर्पित करें — पीले पुष्प, तुलसी दल, चंदन, अक्षत, पीले वस्त्र।
  7. तुलसी अनिवार्य है — विष्णु पूजन तुलसी के बिना अपूर्ण माना जाता है।
  8. घी का दीपक और धूप जलाएँ।
  9. नैवेद्य — फल, पंचामृत, खीर। व्रत रखने वाले स्वयं न खाएँ।
  10. व्रत कथा का श्रवण अथवा पाठ।
  11. विष्णु सहस्रनाम अथवा 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप।
  12. जल झुलाने की परंपरा — मंदिर में अथवा घर पर।
  13. रात्रि जागरण — जहाँ परंपरा हो; भजन और पाठ के साथ।
  14. द्वादशी को पारण — नीचे विधि दी गई है।

पारण का नियम

एकादशी व्रत में पारण का नियम उतना ही महत्वपूर्ण है जितना व्रत, और यही सर्वाधिक भूल की जाती है।

  • पारण द्वादशी को ही करें — एकादशी के दिन नहीं। द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना आवश्यक है।
  • पारण का समय सूर्योदय के पश्चात, प्रायः प्रातःकाल। पंचांग से पारण मुहूर्त देख लें।
  • हरि वासर — द्वादशी के प्रथम चतुर्थांश में पारण वर्जित है; उसके बाद करें।
  • पारण से पूर्व स्नान, विष्णु पूजन और यथाशक्ति दान करें।
  • पारण में सर्वप्रथम तुलसी दल सहित जल अथवा पंचामृत लें, फिर सात्विक भोजन।
  • ब्राह्मण अथवा किसी आवश्यकतामंद को भोजन कराने के पश्चात ही स्वयं भोजन करना उत्तम माना गया है।

यदि द्वादशी बहुत छोटी हो अथवा पारण मुहूर्त निकल जाए तो घबराएँ नहीं — जल ग्रहण कर व्रत खोल लें और अगली एकादशी को विधिवत करें। शास्त्र इतने कठोर नहीं हैं।

आहार के नियम

एकादशी व्रत के तीन प्रकार हैं, और अपने सामर्थ्य के अनुसार चुनना शास्त्र सम्मत है।

प्रकारविधिकिसके लिए
निर्जलाजल भी नहींकेवल पूर्ण स्वस्थ; अनिवार्य नहीं
फलाहारफल, दूध, जलसर्वाधिक प्रचलित
एक भुक्तएक बार सात्विक भोजनरोगी, वृद्ध, बालक, गर्भवती, श्रमिक

एकादशी में विशेष रूप से चावल वर्जित है — यह इस व्रत का सर्वाधिक विशिष्ट नियम है। परंपरा के अनुसार महर्षि मेधा का अंश एकादशी को पृथ्वी में समाया और उससे चावल उत्पन्न हुआ, अतः इस दिन चावल का त्याग किया जाता है।

क्या लें: फल, दूध, दही, सिंघाड़े और कुट्टू का आटा, साबूदाना, आलू, शकरकंद, सेंधा नमक, मूँगफली, मखाना, सूखे मेवे।

क्या न लें: चावल, अनाज, दालें, साधारण नमक, प्याज-लहसुन, मांस, मदिरा।

रोगी, मधुमेह से पीड़ित, गर्भवती स्त्रियाँ, बालक और वृद्ध जन फलाहार अथवा एक समय भोजन लें। निर्जला व्रत अनिवार्य नहीं है और शरीर को हानि पहुँचाकर किया गया व्रत पुण्य नहीं देता।

मंत्र और पाठ

मूल मंत्र:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

वामन मंत्र — इस एकादशी हेतु विशेष:

ॐ वामनाय नमः
ॐ त्रिविक्रमाय नमः

विष्णु गायत्री:

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

पाठ हेतु: विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भागवत का अष्टम स्कंध (वामन अवतार प्रसंग), गीता का द्वादश अध्याय, पुरुष सूक्त।

108 बार जाप करें। एकादशी को किया गया जाप अन्य दिनों की तुलना में विशेष फलदायी माना गया है।

ज्योतिषीय दृष्टि से

एकादशी का संबंध मुख्यतः गुरु ग्रह और विष्णु से है। यह विशेष एकादशी 'परिवर्तन' के भाव से जुड़ी है, अतः इसका उपयोग भी वहीं है।

स्थितिक्यों उपयुक्त
गुरु निर्बल — आर्थिक ठहराव, विवेक की कमीविष्णु उपासना गुरु का प्रत्यक्ष उपाय है
जीवन में दिशा परिवर्तन की आवश्यकतापरिवर्तिनी का मूल भाव यही है
कार्य में ठहराव — न आगे, न पीछेचातुर्मास के मध्य की तिथि; रुकाव के काल की साधना
विवाह में विलंबगुरु विवाह का कारक; एकादशी व्रत परंपरागत उपाय
संतान बाधाविष्णु उपासना और संतान गोपाल मंत्र के साथ
पितृ दोषवामन कथा में दान का महत्व; इस दिन दान विशेष फलदायी
ऋण और वचन संबंधी उलझनबलि की कथा वचन-पालन की है

आपकी कुंडली में गुरु की स्थिति क्या है और कौन सा दोष सक्रिय है — यह कुंडली विश्लेषण से ज्ञात होता है।

कौन रखे और कौन न रखे

रख सकते हैं: स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध — कोई प्रतिबंध नहीं। एकादशी व्रत सर्वाधिक सुलभ व्रतों में है।

विशेष रूप से उपयुक्त:

  • जिनकी कुंडली में गुरु निर्बल हो
  • जो जीवन में किसी परिवर्तन के मोड़ पर हों
  • वैष्णव परंपरा के अनुयायी
  • जो नियमित एकादशी व्रत का संकल्प रखते हों
  • दान और सेवा का संकल्प लेने वाले

सावधानी रखें: मधुमेह के रोगी, गर्भवती स्त्रियाँ, बालक, वृद्ध और वे जो शारीरिक श्रम करते हैं। इनके लिए निर्जला व्रत वर्जित है — फलाहार अथवा एक समय भोजन के साथ व्रत पूर्णतः मान्य है।

एक बात जो मैं बार-बार कहती हूँ — एकादशी का मूल भाव संयम है, भूख नहीं। जो व्यक्ति निर्जला व्रत रखकर दिनभर क्रोध करे, वह व्रत का अर्थ नहीं समझा। जो फलाहार करके शांत, सत्यनिष्ठ और दानशील रहे, उसका व्रत पूर्ण है — और वामन कथा का सार भी यही है।


शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली


आपकी कुंडली में गुरु की स्थिति क्या है?

एकादशी व्रत का संबंध गुरु ग्रह से है — और निर्बल गुरु आर्थिक ठहराव, विवाह में विलंब तथा विवेक की कमी देता है। उपाय व्रत से आगे भी जाता है।

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Frequently Asked Questions

जलझूलनी एकादशी कब और क्यों मनाई जाती है?+
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को, जो सामान्यतः अगस्त-सितंबर में पड़ती है। मान्यता है कि चातुर्मास की योगनिद्रा में भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं, इसीलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन उनकी प्रतिमा को डोली में बिठाकर जलाशय ले जाकर जल में झुलाया जाता है, जिससे जलझूलनी नाम पड़ा।
इस एकादशी की व्रत कथा क्या है?+
यह वामन अवतार की कथा है। दैत्यराज बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। विष्णु जी ने वामन रूप में उससे तीन पग भूमि माँगी। बलि ने गुरु शुक्राचार्य की चेतावनी के बावजूद वचन दिया। वामन ने विराट रूप धारण कर दो पग में पृथ्वी और स्वर्ग नाप लिया, और तीसरे के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। उसकी दानशीलता से प्रसन्न होकर विष्णु स्वयं उसके द्वारपाल बने।
एकादशी व्रत में चावल क्यों वर्जित है?+
परंपरा के अनुसार महर्षि मेधा का अंश एकादशी को पृथ्वी में समाया और उससे चावल की उत्पत्ति हुई, अतः इस दिन चावल का त्याग किया जाता है। यह एकादशी व्रत का सर्वाधिक विशिष्ट नियम है। इसके स्थान पर फल, दूध, सिंघाड़े और कुट्टू का आटा, साबूदाना, आलू और सेंधा नमक लिया जाता है।
एकादशी व्रत का पारण कब करना चाहिए?+
पारण द्वादशी को करें, एकादशी के दिन नहीं, और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना आवश्यक है। द्वादशी के प्रथम चतुर्थांश यानी हरि वासर में पारण वर्जित है। पारण से पूर्व स्नान, विष्णु पूजन और दान करें, फिर तुलसी दल सहित जल या पंचामृत लेकर सात्विक भोजन करें। पंचांग से पारण मुहूर्त देख लें।
चातुर्मास की तीन प्रमुख एकादशियाँ कौन सी हैं?+
देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल को, जब विष्णु जी योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास आरंभ होता है। जलझूलनी या परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद शुक्ल को, जब वे निद्रा में करवट बदलते हैं — यह चातुर्मास का मध्य है। और देवउठनी एकादशी कार्तिक शुक्ल को, जब वे जागते हैं और विवाह सहित शुभ कार्य पुनः आरंभ होते हैं।
डोल ग्यारस क्या है?+
राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में जलझूलनी एकादशी को डोल ग्यारस कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु या कृष्ण की प्रतिमा को डोली अथवा झूले में बिठाकर शोभायात्रा के साथ जलाशय तक ले जाया जाता है, वहाँ जल में झुलाया और स्नान कराया जाता है। नाथद्वारा, उदयपुर और बुंदेलखंड क्षेत्र में यह विशेष रूप से मनाई जाती है।
क्या निर्जला एकादशी व्रत रखना अनिवार्य है?+
नहीं। एकादशी व्रत के तीन प्रकार हैं — निर्जला, फलाहार और एक भुक्त — और अपने सामर्थ्य के अनुसार चुनना शास्त्र सम्मत है। मधुमेह के रोगी, गर्भवती स्त्रियाँ, बालक, वृद्ध और शारीरिक श्रम करने वाले फलाहार अथवा एक समय भोजन के साथ व्रत रखें। शरीर को हानि पहुँचाकर किया गया व्रत पुण्य नहीं देता।
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Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

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