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जानिए पितृपक्ष का महत्व , तिथियां , तर्पण विधि एवं उपाय

# जानिए पितृपक्ष का महत्व , तिथियां , तर्पण विधि एवं उपाय - Pitru Paksha - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **जानिए पितृपक्ष का महत्व , तिथियां , तर्पण विधि एवं उपाय** — यह विषय मेरे पास

7 July 2026 13 min read|By Nidhi Shrimali

⚡ संक्षेप में — पितृ पक्ष

लेखिका: निधि श्रीमाली | वैदिक ज्योतिषी, 18+ वर्षों का अनुभव
अद्यतन: अगस्त 2026 | पढ़ने का समय: 13 मिनट
रेटिंग: ★★★★★ 4.9/5 (1,425+ परामर्श समीक्षाओं से)

पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक का सोलह दिवसीय काल है, जो पितरों को समर्पित है। इसमें श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। जिन्हें मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, वे सर्व पितृ अमावस्या को सभी पितरों के लिए एक साथ श्राद्ध कर सकते हैं।


विषय सूची

  1. पितृ पक्ष क्या है
  2. महत्व और शास्त्रीय आधार
  3. सोलह तिथियाँ — किस दिन किसका श्राद्ध
  4. तर्पण विधि — घर पर कैसे करें
  5. श्राद्ध विधि
  6. कौन कर सकता है श्राद्ध
  7. पितृ पक्ष के नियम
  8. कौआ, गाय और कुत्ता — क्यों
  9. सर्व पितृ अमावस्या
  10. पितृ दोष और पितृ पक्ष
  11. यदि श्राद्ध न कर सकें
  12. प्रचलित भ्रांतियाँ

पितृ पक्ष क्या है

पितृ पक्ष — जिसे श्राद्ध पक्ष, महालय पक्ष अथवा कनागत भी कहा जाता है — हिंदू पंचांग का वह सोलह दिवसीय काल है जो पूर्वजों को समर्पित है। यह भाद्रपद मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है, और ग्रेगोरियन कैलेंडर में सामान्यतः सितंबर अथवा अक्टूबर के आरंभ में पड़ता है।

'श्राद्ध' शब्द 'श्रद्धा' से बना है — अर्थात् वह कर्म जो श्रद्धापूर्वक किया जाए। 'तर्पण' का अर्थ है तृप्त करना। दोनों मिलकर इस पक्ष का सार बताते हैं: पूर्वजों को श्रद्धा से तृप्त करना।

परंपरा के अनुसार इस अवधि में पितर पितृलोक से पृथ्वी के निकट आते हैं और अपने वंशजों से अन्न-जल की अपेक्षा रखते हैं। इसी कारण इन सोलह दिनों में किया गया श्राद्ध वर्ष के किसी अन्य समय की तुलना में कहीं अधिक फलदायी माना गया है।

एक व्यावहारिक बात प्रारंभ में — मेरे पास प्रतिवर्ष ऐसे जजमान आते हैं जो यह सोचकर श्राद्ध नहीं करते कि उन्हें विधि नहीं आती, पंडित उपलब्ध नहीं है, अथवा वे घर से दूर हैं। शास्त्र इस विषय में जितना उदार है, उतना लोग जानते नहीं। केवल जल और तिल श्रद्धापूर्वक अर्पित कर देना, और किसी भूखे को भोजन करा देना — शास्त्रों में इसे पर्याप्त कहा गया है।

महत्व और शास्त्रीय आधार

हिंदू परंपरा में तीन ऋण बताए गए हैं — देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पितृ ऋण का निर्वाह संतान उत्पन्न करने और पितरों का श्राद्ध करने से होता है।

गरुड़ पुराण, मार्कंडेय पुराण और मनुस्मृति में श्राद्ध का विस्तृत वर्णन है। महाभारत में कर्ण की कथा इस पक्ष के प्रसंग में विशेष रूप से कही जाती है — मृत्यु के पश्चात कर्ण को स्वर्ग में भोजन के स्थान पर स्वर्ण मिलता रहा, क्योंकि उसने जीवनभर स्वर्ण दान किया था, अन्न नहीं। तब उसे सोलह दिनों के लिए पृथ्वी पर भेजा गया ताकि वह अन्न और जल का दान कर सके। वही सोलह दिन पितृ पक्ष कहलाए।

कथा का सार व्यावहारिक है — पितरों को अन्न और जल चाहिए, स्वर्ण नहीं। इसी कारण इस पक्ष के सभी उपाय भोजन कराने और जल अर्पित करने के हैं, धन व्यय करने के नहीं।

सोलह तिथियाँ — किस दिन किसका श्राद्ध

सिद्धांत सरल है: जिस तिथि को पूर्वज की मृत्यु हुई थी, पितृ पक्ष की उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है — मास से कोई संबंध नहीं। यदि पिता का देहांत किसी भी मास की सप्तमी को हुआ था, तो पितृ पक्ष की सप्तमी उनका श्राद्ध दिवस है।

तिथिकिसका श्राद्ध
पूर्णिमा (प्रोष्ठपदी)पूर्णिमा को दिवंगत हुए; कुछ परंपराओं में इसी से पक्ष आरंभ
प्रतिपदाप्रतिपदा को दिवंगत; नाना-नानी का श्राद्ध भी
द्वितीया से तृतीयातत्संबंधी तिथि को दिवंगत
चतुर्थी–पंचमीअविवाहित अथवा अल्पायु में दिवंगत हुए
नवमी (अविधवा नवमी)वे विवाहित स्त्रियाँ जिनका देहांत पति से पूर्व हुआ
द्वादशीसंन्यासी और वैरागी
चतुर्दशीदुर्घटना, शस्त्र अथवा अकाल मृत्यु से दिवंगत
अमावस्या (सर्व पितृ)सभी पितरों के लिए — तिथि अज्ञात हो तो यही दिन

जिन जजमानों को मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है — और यह बहुत सामान्य है — उनके लिए सर्व पितृ अमावस्या ही उत्तर है। इसी उद्देश्य से यह तिथि नियत की गई है।

तर्पण विधि — घर पर कैसे करें

तर्पण सबसे सरल और सबसे सुलभ कर्म है। इसके लिए न पंडित चाहिए, न व्यय।

  1. प्रातःकाल स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें — श्वेत उत्तम।
  2. दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। दक्षिण पितरों की दिशा है।
  3. जनेऊ धारण करते हों तो उसे दाएँ कंधे पर करें (अपसव्य) — यह पितृ कर्म का चिह्न है।
  4. एक पात्र में स्वच्छ जल लें, उसमें काले तिल और थोड़ा जौ मिलाएँ। कुश हो तो उत्तम।
  5. दोनों हथेलियों में जल लेकर अंगूठे और तर्जनी के बीच के भाग से — जिसे पितृ तीर्थ कहा जाता है — जल गिराएँ।
  6. पितरों के नाम लें यदि ज्ञात हों — पिता, पितामह, प्रपितामह; माता, पितामही, प्रपितामही; और मातृ पक्ष के पितर। नाम ज्ञात न हों तो सामान्य रूप से समस्त पितरों के लिए अर्पित करें।
  7. तीन बार प्रत्येक पितर के लिए जल अर्पित करें।
  8. अंत में हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें।

समय: मध्याह्न काल (लगभग 11:30 से 12:30) सर्वोत्तम माना गया है, जिसे कुतुप काल कहते हैं। नदी अथवा बहते जल के किनारे उत्तम; घर पर स्वच्छ जल के पात्र से भी मान्य है।

सरल तर्पण मंत्र:

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
ॐ पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः॥

श्राद्ध विधि

श्राद्ध तर्पण से बड़ा कर्म है और इसमें पका हुआ अन्न अर्पित किया जाता है।

  1. प्रातः स्नान और संकल्प — अपना नाम, गोत्र और जिनका श्राद्ध कर रहे हैं उनका नाम कहें।
  2. भोजन बनाएँ — बिना प्याज-लहसुन का सात्विक भोजन। खीर अनिवार्य मानी गई है। पूड़ी, सब्जी, दाल-चावल।
  3. पंचबलि निकालें — भोजन के पाँच अंश: गाय, कुत्ता, कौआ, देवता और चींटी के लिए।
  4. ब्राह्मण अथवा आवश्यकतामंद को भोजन कराएँ। यह श्राद्ध का मूल कर्म है — घर के किसी सदस्य के भोजन से पूर्व।
  5. भोजन के पश्चात दक्षिणा और वस्त्र दान करें।
  6. तर्पण करें — ऊपर दी गई विधि से।
  7. पितरों से प्रार्थना करके श्राद्ध पूर्ण करें।

यदि ब्राह्मण उपलब्ध न हों, तो किसी भी आवश्यकतामंद व्यक्ति को भोजन कराना समान फलदायी माना गया है। शास्त्रों में भूखे को भोजन कराने को ही श्राद्ध का सार कहा गया है।

कौन कर सकता है श्राद्ध

यह प्रश्न सर्वाधिक भ्रम का विषय है, अतः स्पष्ट रूप से।

  • प्राथमिक अधिकार ज्येष्ठ पुत्र का है। यह परंपरागत विधान है।
  • ज्येष्ठ पुत्र न हो तो कोई भी पुत्र, फिर पौत्र, फिर प्रपौत्र।
  • पुत्र न हो तो पुत्री कर सकती है, और उसका पुत्र भी। अनेक शास्त्रीय संदर्भों में इसकी अनुमति है।
  • भाई, भतीजा, दामाद भी कर सकते हैं।
  • पत्नी पति का श्राद्ध कर सकती है यदि कोई पुत्र न हो।
  • कोई भी न हो तो गया अथवा किसी तीर्थ में श्राद्ध कराया जा सकता है।

मैं जजमानों से बार-बार कहती हूँ — अनुपयुक्त संबंधी द्वारा किया गया श्राद्ध, न किए गए श्राद्ध से कहीं श्रेष्ठ है। जो परिवार इस विवाद में श्राद्ध ही नहीं करते कि कौन करे, वे सबसे बड़ी हानि उठाते हैं।

पितृ पक्ष के नियम

वर्जितअनुकूल
विवाह, सगाई, गृह प्रवेशतर्पण और श्राद्ध
नया व्यापार, नया कार्य आरंभदान — विशेषतः अन्न और वस्त्र
नए वस्त्र, आभूषण, वाहन की खरीदभूखे को भोजन कराना
मांस, मदिरा, प्याज, लहसुनसात्विक आहार
बाल-दाढ़ी कटाना (श्राद्ध करने वाले हेतु)गीता, गरुड़ पुराण का पाठ
क्रोध और कलहपशु-पक्षियों को भोजन

यह पक्ष अशुभ नहीं है — यह शुभ आरंभ के लिए अनुपयुक्त है। अंतर महत्वपूर्ण है। दान, सेवा, पाठ और पितृ कर्म इस काल में वर्ष के किसी भी समय से अधिक फलदायी माने गए हैं।

कौआ, गाय और कुत्ता — क्यों

श्राद्ध में कौए को भोजन देना अनिवार्य माना गया है, और जजमान प्रायः इसका कारण पूछते हैं।

परंपरा के अनुसार कौआ यमराज का दूत है और पितरों का संदेशवाहक। मान्यता है कि कौआ जो ग्रहण करता है, वह पितरों तक पहुँचता है। कुछ कथाओं में इंद्र के पुत्र जयंत का कौए का रूप धारण करना भी इससे जोड़ा जाता है।

पंचबलि के पाँच अंश और उनका आधार:

  • गौ बलि — गाय में समस्त देवताओं का वास माना गया है
  • श्वान बलि — कुत्ता यम का वाहक; धर्म का प्रतीक भी
  • काक बलि — कौआ पितरों का दूत
  • देव बलि — देवताओं का अंश
  • पिपीलिका बलि — चींटी और सूक्ष्म जीवों का अंश

इसका व्यावहारिक अर्थ भी है, जो मैं अवश्य बताती हूँ — श्राद्ध का मूल भाव यह है कि भोजन उन्हें दिया जाए जो उसे लौटा नहीं सकते। पशु, पक्षी और भूखे मनुष्य — तीनों इसी श्रेणी में हैं। यही पितृ ऋण चुकाने की विधि है।

सर्व पितृ अमावस्या

पितृ पक्ष का अंतिम दिन — आश्विन अमावस्या — सर्व पितृ अमावस्या अथवा महालय अमावस्या कहलाता है। यह वर्ष का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पितृ दिवस है।

इस दिन का विधान इन सभी स्थितियों के लिए है:

  • पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो
  • यह ज्ञात न हो कि वंश में किन-किन का श्राद्ध शेष है
  • निर्धारित तिथि पर श्राद्ध छूट गया हो
  • वर्षभर में किसी पितृ कर्म में कोई त्रुटि रह गई हो
  • अकाल मृत्यु से दिवंगत पितरों के लिए

अर्थात् — यदि आप वर्ष में केवल एक दिन पितृ कर्म कर सकते हैं, तो वह यही है। इस दिन तर्पण, ब्राह्मण अथवा किसी भूखे को भोजन, और दान — तीनों करें।

पितृ दोष और पितृ पक्ष

जिनकी कुंडली में पितृ दोष है — सामान्यतः सूर्य की राहु या केतु से युति, अथवा नवम भाव में राहु-केतु — उनके लिए पितृ पक्ष वर्ष का सर्वाधिक प्रभावी काल है।

पितृ दोष का लक्षण एक विशेष प्रकार की रुकावट है: कार्य अंतिम चरण में जाकर रुक जाना, विवाह में विलंब, संतान में बाधा, और धन का आना-जाना बना रहना। इसका शास्त्रीय आधार यह है कि यह वंश का अनिष्पादित ऋण है, जो एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होता है।

पितृ पक्ष में करने योग्य विशेष उपाय:

  • सर्व पितृ अमावस्या को विधिवत श्राद्ध — सर्वोपरि
  • प्रतिदिन तर्पण — सोलहों दिन
  • पीपल को जल अर्पित करें और नीचे दीपक जलाएँ
  • प्रतिदिन कौओं को भोजन
  • गीता का सातवाँ अध्याय अथवा गरुड़ पुराण का पाठ
  • पितृ दोष निवारण पूजा — ई-पूजा के रूप में भी संभव
  • अकाल मृत्यु हुई हो तो नारायण बलि; तीन पीढ़ियों से श्राद्ध न हुआ हो तो त्रिपिंडी श्राद्ध

यदि श्राद्ध न कर सकें

यह भाग सबसे आवश्यक है, क्योंकि अनेक जजमान परिस्थितिवश श्राद्ध नहीं कर पाते और अपराध-भाव में रहते हैं।

शास्त्र इस विषय में उदार हैं। जो न कर सकें, उनके लिए विकल्प हैं:

  • केवल जल और तिल का तर्पण — यह न्यूनतम है और शास्त्रसम्मत है।
  • किसी भूखे को भोजन करा दें पितरों के नाम से। मनुस्मृति में इसे श्राद्ध के समान कहा गया है।
  • गाय अथवा कौए को भोजन दे दें।
  • दक्षिण दिशा की ओर मुख करके हाथ जोड़ें और मन से क्षमा माँग लें। भाव प्रधान है।
  • विदेश में हों तो स्थानीय जल से तर्पण मान्य है; गंगाजल अनिवार्य नहीं।
  • आर्थिक सामर्थ्य न हो तो केवल जल पर्याप्त है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि जिसके पास कुछ न हो, वह घास काटकर गाय को खिला दे अथवा सूर्य की ओर हाथ उठाकर पितरों से क्षमा माँग ले।

यह अंतिम वाक्य मैं जजमानों को अवश्य सुनाती हूँ — शास्त्र ने असमर्थ के लिए मार्ग खुला रखा है। जो श्रद्धा से किया जाए, वही श्राद्ध है।

प्रचलित भ्रांतियाँ

  1. "पितृ पक्ष अशुभ काल है।" असत्य। यह शुभ आरंभ के लिए अनुपयुक्त है, अशुभ नहीं। दान, सेवा और पितृ कर्म के लिए यह वर्ष का सर्वश्रेष्ठ काल है।
  2. "पितर नाराज हैं इसलिए कष्ट है।" यह शास्त्रीय दृष्टिकोण नहीं है। पितृ दोष अनिष्पादित ऋण है, दंड नहीं — और प्रायः आपके जन्म से कई पीढ़ी पूर्व का।
  3. "केवल ज्येष्ठ पुत्र ही श्राद्ध कर सकता है।" प्राथमिक अधिकार उसका है, परंतु कोई भी वंशज कर सकता है — पुत्री सहित। अनुपयुक्त द्वारा किया गया श्राद्ध, न किए गए से श्रेष्ठ है।
  4. "पितृ पक्ष में मृत्यु होना अशुभ है।" ऐसा कोई शास्त्रीय विधान नहीं है।
  5. "श्राद्ध महँगा होना चाहिए।" असत्य। कर्ण की कथा का सार यही है कि पितरों को अन्न-जल चाहिए, स्वर्ण नहीं।
  6. "एक वर्ष श्राद्ध छूट गया तो सब व्यर्थ।" असत्य। अगले वर्ष सर्व पितृ अमावस्या को कर लें। परंपरा में इसी हेतु यह तिथि है।

शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली


क्या आपकी कुंडली में पितृ दोष है?

पितृ पक्ष में किए गए उपाय सर्वाधिक प्रभावी तब होते हैं जब यह ज्ञात हो कि कुंडली में पितृ दोष वास्तव में है या नहीं, और वह सक्रिय है या नहीं।

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Frequently Asked Questions

पितृ पक्ष कब से कब तक होता है?+
पितृ पक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है — कुल सोलह दिन। ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह सामान्यतः सितंबर अथवा अक्टूबर के आरंभ में पड़ता है। अंतिम दिन सर्व पितृ अमावस्या कहलाता है और वही वर्ष का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पितृ दिवस है।
यदि पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो श्राद्ध कब करें?+
सर्व पितृ अमावस्या को, जो पितृ पक्ष का अंतिम दिन है। यह तिथि इसी उद्देश्य से नियत की गई है — जिन्हें मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, जिन्हें यह न पता हो कि वंश में किनका श्राद्ध शेष है, अथवा जिनसे निर्धारित तिथि छूट गई हो, वे सभी इस दिन समस्त पितरों के लिए एक साथ श्राद्ध कर सकते हैं।
घर पर तर्पण कैसे करें?+
प्रातः स्नान कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक पात्र में स्वच्छ जल लेकर उसमें काले तिल और थोड़ा जौ मिलाएँ। दोनों हथेलियों में जल लेकर अंगूठे और तर्जनी के बीच के भाग से, जिसे पितृ तीर्थ कहते हैं, जल गिराएँ। पितरों के नाम लें अथवा सामान्य रूप से समस्त पितरों के लिए अर्पित करें। मध्याह्न काल सर्वोत्तम है और पंडित की आवश्यकता नहीं।
क्या पुत्री श्राद्ध कर सकती है?+
हाँ। प्राथमिक अधिकार ज्येष्ठ पुत्र का है, परंतु पुत्र न होने पर पुत्री और उसका पुत्र भी श्राद्ध कर सकते हैं — अनेक शास्त्रीय संदर्भों में इसकी अनुमति है। भाई, भतीजा, दामाद और पत्नी भी कर सकते हैं। अनुपयुक्त संबंधी द्वारा किया गया श्राद्ध, न किए गए श्राद्ध से कहीं श्रेष्ठ है।
पितृ पक्ष में क्या नहीं करना चाहिए?+
विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, नया व्यापार अथवा कोई नया कार्य आरंभ नहीं करना चाहिए, तथा नए वस्त्र, आभूषण और वाहन की खरीद वर्जित है। मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का त्याग किया जाता है। ध्यान रहे कि यह पक्ष अशुभ नहीं है — यह केवल शुभ आरंभ के लिए अनुपयुक्त है, जबकि दान और पितृ कर्म के लिए वर्ष का सर्वश्रेष्ठ काल है।
श्राद्ध में कौए को भोजन क्यों दिया जाता है?+
परंपरा के अनुसार कौआ यमराज का दूत और पितरों का संदेशवाहक है, तथा वह जो ग्रहण करता है वह पितरों तक पहुँचता है। श्राद्ध में पंचबलि निकाली जाती है — गाय, कुत्ता, कौआ, देवता और चींटी के लिए। इसका मूल भाव यह है कि भोजन उन्हें दिया जाए जो उसे लौटा नहीं सकते।
यदि श्राद्ध करने का सामर्थ्य न हो तो क्या करें?+
शास्त्र इस विषय में उदार हैं। केवल जल और काले तिल का तर्पण पर्याप्त माना गया है। किसी भूखे को पितरों के नाम से भोजन करा देना मनुस्मृति में श्राद्ध के समान कहा गया है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट है कि जिसके पास कुछ न हो वह घास काटकर गाय को खिला दे अथवा सूर्य की ओर हाथ उठाकर पितरों से क्षमा माँग ले। भाव प्रधान है।
🧿

Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

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