✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।
मंगला गौरी व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन स्त्रियों के सबसे पावन और प्राचीन व्रतों में से एक है, जो श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को रखा जाता है। मां गौरी (पार्वती) के प्रति समर्पित यह व्रत पति की दीर्घायु, सुखमय वैवाहिक जीवन और सुहाग की रक्षा के लिए रखा जाता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम मंगला गौरी व्रत 2026 की तिथियां, पांचों मंगलवार की कथाएं, संपूर्ण पूजा विधि, मंत्र, 16 श्रृंगार, व्रत के फायदे और सावधानियां विस्तार से जानेंगे।
विषय सूची (Table of Contents)
- मंगला गौरी व्रत — परिचय और इतिहास
- 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त — पांचों मंगलवार
- मंगला गौरी व्रत का धार्मिक महत्व
- पौराणिक कथा — पांचों मंगलवार की कथाएं
- पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची
- संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
- मंगला गौरी के शुभ मंत्र और जाप विधि
- 16 श्रृंगार — सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक
- पांचों मंगलवार का विशेष महत्व
- व्रत के फायदे, सावधानियां और FAQ
मंगला गौरी व्रत — परिचय और इतिहास
मंगला गौरी व्रत हिंदू परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन और पावन व्रत है, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण, पद्म पुराण और नारद पुराण जैसे ग्रंथों में मिलता है। यह व्रत श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार (मंगलवार = मंगला + गौरी की पूजा) को सुहागिन स्त्रियों द्वारा पति की दीर्घायु और सुखमय दांपत्य जीवन की कामना से रखा जाता है।
व्रत का नाम "मंगला गौरी" दो शब्दों से मिलकर बना है — "मंगला" अर्थात् मंगलकारी और "गौरी" अर्थात् माँ पार्वती। माना जाता है कि इस व्रत को पहली बार माँ पार्वती ने भगवान शिव की प्राप्ति के लिए किया था। तभी से यह परंपरा सुहागिन स्त्रियों में चली आ रही है। विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में यह व्रत अत्यधिक लोकप्रिय है, जहां महिलाएं पांचों मंगलवार पूरी श्रद्धा के साथ रखती हैं।
2026 तिथि और शुभ मुहूर्त — पांचों मंगलवार
श्रावण मास 2026 के पांचों मंगलवार की तिथियां और शुभ पूजा मुहूर्त इस प्रकार हैं:
| मंगलवार | तिथि (2026) | पूजा मुहूर्त | चन्द्रोदय |
|---|---|---|---|
| पहला मंगलवार | 21 जुलाई 2026 | प्रातः 6:15 से 7:45 तक | रात्रि 9:12 बजे |
| दूसरा मंगलवार | 28 जुलाई 2026 | प्रातः 6:20 से 7:50 तक | रात्रि 9:48 बजे |
| तीसरा मंगलवार | 4 अगस्त 2026 | प्रातः 6:25 से 7:55 तक | रात्रि 10:18 बजे |
| चौथा मंगलवार | 11 अगस्त 2026 | प्रातः 6:30 से 8:00 तक | रात्रि 10:42 बजे |
| पांचवां मंगलवार | 18 अगस्त 2026 | प्रातः 6:35 से 8:05 तक | रात्रि 11:08 बजे |
विशेष सूचना: 2026 में श्रावण शुक्ल पक्ष के दौरान शुक्र और बुध दोनों ग्रह बलवान रहेंगे, जो व्रत के फल को कई गुना बढ़ा देगा। प्रदोष काल (सूर्यास्त के दो घंटे पहले से एक घंटा बाद) पूजा के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। चंद्रोदय के बाद कथा श्रवण का विशेष महत्व है।
मंगला गौरी व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक दृष्टि से
मंगला गौरी व्रत का सीधा संबंध पति-पत्नी के पवित्र बंधन से है। शास्त्रों के अनुसार, जो स्त्री पांचों मंगलवार पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत रखती है, उसके पति पर माँ गौरी की विशेष कृपा बनी रहती है। यह व्रत सुहाग की रक्षा, वैवाहिक सुख और पति-पत्नी के प्रेम को दृढ़ करने में सहायक माना जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से
आध्यात्मिक रूप से यह व्रत माँ गौरी की उपासना का एक सरल और प्रभावी माध्यम है। 16 श्रृंगार और मंत्र जाप के माध्यम से महिला अपने अंतर्मन में सात्विकता, धैर्य, सहनशक्ति और त्याग जैसे गुणों का विकास करती है। यह व्रत मन की एकाग्रता बढ़ाता है और आत्मबल को सुदृढ़ करता है।
ज्योतिषीय दृष्टि से
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मंगलवार का स्वामी ग्रह मंगल है और गौरी (पार्वती) मंगल ग्रह से अत्यधिक प्रभावित मानी जाती हैं। श्रावण मास में मंगल की स्थिति विशेष रूप से शुभ फल देने वाली होती है। जिन महिलाओं की कुंडली में सप्तम भाव (विवाह भाव) या मंगल ग्रह पीड़ित होता है, उनके लिए यह व्रत विशेष लाभकारी माना जाता है। मंगल के साथ शुक्र का संबंध प्रेम और दांपत्य सुख का कारक है, और श्रावण में यह संयोजन सर्वाधिक प्रभावी रहता है।
पौराणिक कथा — पांचों मंगलवार की कथाएं
मंगला गौरी व्रत की परंपरा के अनुसार, पांचों मंगलवार को अलग-अलग कथाएं सुनने और सुनाने का विधान है। ये कथाएं धार्मिक मान्यता के अनुसार पांच अलग-अलग पौराणिक प्रसंगों पर आधारित हैं:
पहले मंगलवार की कथा — माँ पार्वती और भगवान शिव
प्राचीन काल में एक सुंदर कन्या पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। पहले मंगलवार को उन्होंने वन में हरे पत्तों से शिवलिंग बनाकर पूजा की और केवल फलाहार किया। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दर्शन दिए। तभी से यह परंपरा आरंभ हुई।
दूसरे मंगलवार की कथा — सती और पार्वती अवतार
दूसरी कथा के अनुसार, सती के रूप में माँ ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण अग्नि में आत्मदाह कर लिया था। पुनः पार्वती रूप में अवतरित होकर उन्होंने मंगला गौरी व्रत के माध्यम से भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया।
तीसरे मंगलवार की कथा — मां सती का सतीत्व
तीसरे मंगलवार को सती माता के सतीत्व और पतिव्रत धर्म की कथा सुनी जाती है, जिसमें बताया गया है कि किस प्रकार एकनिष्ठ भाव से भगवान शिव ने उन्हें पुनः अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
चौथे मंगलवार की कथा — स्वर्णमाला की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, स्वर्णमाला नाम की एक भक्त महिला ने अपने पति की दीर्घायु के लिए मंगला गौरी व्रत रखा था। निरंतर 5 मंगलवार तक व्रत रखने और माँ गौरी की कथा सुनने से उसके पति को अचानक गंभीर रोग से मुक्ति मिली थी। यही कारण है कि पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत सर्वाधिक प्रभावी माना जाता है।
पांचवें मंगलवार की कथा — मंगला गौरी का वरदान
पांचवें मंगलवार को मंगला गौरी की कथा सुनी जाती है, जिसमें बताया गया है कि किस प्रकार माँ पार्वती ने भक्त स्त्रियों को सुहाग, संतान सुख, पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख का वरदान दिया था। पांचवें मंगलवार का व्रत सबसे अधिक फलदायी माना जाता है।
कथा का मूल संदेश: सच्ची भक्ति, एकनिष्ठा और श्रद्धा से ईश्वर सदैव प्रसन्न होते हैं। पति-पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का बंधन है और इसकी रक्षा के लिए नियमित धार्मिक अनुष्ठान आवश्यक हैं।
पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची
मंगला गौरी व्रत की पूजा के लिए निम्न सामग्री एक दिन पूर्व ही तैयार कर लेनी चाहिए:
- माँ गौरी की मिट्टी की प्रतिमा (सुहाग की प्रतीक)
- लाल या पीली चुनरी (सुहाग का प्रतीक)
- रोली, मौली, कुमकुम, चंदन
- सिंदूर, अशोक, चमेली के फूल
- पान के पत्ते, लौंग, इलायची
- सुपारी, खजूर, नारियल
- कलश, गंगाजल, शुद्ध जल
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शर्करा, शहद)
- 16 श्रृंगार की सामग्री (विस्तृत सूची आगे)
- धूप-दीपक, रुई की बत्तियां, तिल का तेल
- मिठाई, खीर, हलवा, फल, मेवे
- नई चूड़ियां (लाल या हरी), मांग टीका, बिंदी
- सोने या चांदी का आभूषण (व्रत की सामग्री)
- लाल कलावा (मंगलसूत्र धागा)
- नारियल की टोकरी या सूप (सूप बनाकर उसमें सामग्री रखें)
- 5 प्रकार के मेवे (काजू, बादाम, पिस्ता, अखरोट, किशमिश)
- 5 प्रकार के मसाले (जीरा, सौंफ, अजवाइन, मेथी, काली इलायची)
संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और संकल्प (प्रातः 5-6 बजे)
-
स्नान: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शीतल जल से स्नान करें। यदि संभव हो तो गंगाजल मिले जल से स्नान करें।
-
शुद्ध वस्त्र: लाल या पीले रंग का नया या शुद्ध वस्त्र धारण करें। रस्सी या ऊनी धागे से बंधी नई चूड़ियां अवश्य पहनें।
-
सुहाग के प्रतीक: सिंदूर, मेहंदी, मांग टीका, बिंदी, पायल, नथ, कंगन, बाजूबंद धारण करें। मंगलसूत्र अवश्य पहनें।
-
संकल्प वाक्य: "हे माँ गौरी, मैं आपका व्रत पति की दीर्घायु और सुखमय वैवाहिक जीवन की प्राप्ति हेतु रख रही हूँ।" — यह संकल्प मन में बोलें।
कलश स्थापना और पूजन (प्रातः 7-8 बजे)
-
कलश स्थापना: पूजा स्थान पर चौकी पर लाल चुनरी बिछाएं। उस पर मिट्टी की गौरी जी की प्रतिमा स्थापित करें। समीप में कलश रखें जिसमें सुपारी, पान का पत्ता, सिक्का, आम का पत्ता और मौली डाली हो।
-
गौरी पूजन: रोली से गौरी जी की प्रतिमा पर तिलक करें। कुमकुम, चंदन, अशोक और चमेली के फूल अर्पित करें। मिठाई, खीर, फल का भोग लगाएं।
-
धूप-दीपक: तिल के तेल का दीपक जलाएं और अगरबत्ती और धूप जलाएं। गौरी जी की आरती करें।
16 श्रृंगार और कथा (मध्याह्न 12-2 बजे)
-
16 श्रृंगार: माँ गौरी का 16 श्रृंगार से श्रृंगार करें (विस्तृत सूची आगे दी गई है)।
-
कथा श्रवण: महिलाओं के समूह में मिलकर कथा सुनें या स्वयं पढ़ें। प्रत्येक मंगलवार की अपनी विशिष्ट कथा है।
-
मंत्र जाप: 108 माला पर 11 बार "ॐ ह्रीं गौर्यै नमः" मंत्र का जाप करें।
प्रदोष काल में मुख्य पूजा (सायं 5-7 बजे)
-
पुनः पूजा: शाम को सूर्यास्त से पहले पुनः स्नान करें और तैयार होकर पूजा स्थान पर बैठें।
-
भोग और आरती: गौरी जी को पंचामृत से स्नान कराएं। नए वस्त्र और आभूषण चढ़ाएं। खीर-हलवे का भोग लगाकर आरती करें।
-
विशेष मंत्र जाप: "ॐ श्रीं गौर्यै नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
रात्रि पूजा और व्रत पारण (अगले दिन प्रातः)
-
रात्रि जागरण: पहले और पांचवें मंगलवार को जागरण करें। शिव-पार्वती के भजन गाएं।
-
अगले दिन पूजा: प्रातः पुनः स्नान कर गौरी जी की पूजा करें। कलश का जल घर में छिड़कें।
-
व्रत पारण: पंचामृत या फलाहार से व्रत का पारण करें। शुद्ध शाकाहारी भोजन करें।
मंगला गौरी के शुभ मंत्र और जाप विधि
मुख्य मंत्र
मंगला गौरी मंत्र (सर्वाधिक प्रचलित):
- ॐ ह्रीं गौर्यै नमः
- ॐ श्रीं गौर्यै नमः
- ॐ गौर्यै नमः
मंगला गौरी विशेष मंत्र:
- ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गौर्यै नमः
- ॐ ह्रीं स्त्रीं गौर्यै नमः
- ॐ ह्रीं गौरीमातायै नमः
गौरी-शंकर मंत्र:
- ॐ शिवायै नमः, ॐ शक्तये नमः
- ॐ गौरी-शंकराभ्यां नमः
108 माला मंत्र:
- ॐ नमः शिवाय शिवायै नमः अर्ध्यं पात्रं निर्वपाम्यहम्
जाप विधि और संख्या
| मंत्र | जाप संख्या | समय |
|---|---|---|
| ॐ ह्रीं गौर्यै नमः | 108 बार (11 माला) | प्रातः 6-8 बजे |
| ॐ श्रीं गौर्यै नमः | 21 बार | दोपहर 12-1 बजे |
| गौरी-शंकर मंत्र | 108 बार | सायं प्रदोष काल |
| स्वर्णमाला मंत्र | 11 बार | रात्रि सोने से पूर्व |
जाप के नियम: माला रुद्राक्ष या तुलसी की होनी चाहिए। जाप करते समय मन में माँ गौरी का ध्यान करें। सबसे पहले ॐ बोलकर मंत्र आरंभ करें। स्त्रियां लाल आसन पर बैठकर जाप करें।
16 श्रृंगार — सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक
मंगला गौरी व्रत पर माँ गौरी का 16 श्रृंगार किया जाता है। यह सुहागिन स्त्री की पहचान और माँ गौरी के प्रति समर्पण का प्रतीक है:
- शुद्ध स्नान — गंगाजल मिश्रित जल से
- लाल चुनरी/साड़ी — सुहाग का प्रतीक
- मांग में सिंदूर — पति की दीर्घायु का प्रतीक
- कुंकुम तिलक — माथे पर सुंदरता
- हाथों में मेहंदी — सौभाग्य का चिह्न
- माथे पर बिंदी/कुंडल — आभा
- आँखों में काजल — नेत्र सौंदर्य
- होंठों पर लाली — प्रेम
- नाक में नथ — आभूषण
- कानों में कर्णफूल/बाली — शोभा
- हाथों में लाल चूड़ियां — सुहाग
- कलाई पर कंगन — संपन्नता
- पैरों में पायल — मधुर ध्वनि
- बाजूबंद — भुजाओं की शोभा
- मंगलसूत्र — विवाहिता का प्रतीक
- इत्र/अत्तर — सुगंध
प्रत्येक श्रृंगार के साथ "ॐ ह्रीं गौर्यै नमः" मंत्र का उच्चारण करें।
पांचों मंगलवार का विशेष महत्व
मंगला गौरी व्रत में पांचों मंगलवार का अपना विशेष महत्व है:
पहला मंगलवार: पति के शारीरिक स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति के लिए। इस दिन से व्रत का शुभारंभ होता है। स्वर्णमाला की कथा का श्रवण सर्वोत्तम फल देता है।
दूसरा मंगलवार: पति-पत्नी के प्रेम और सद्भावना की वृद्धि के लिए। सती-पार्वती की कथा सुनी जाती है।
तीसरा मंगलवार: पारिवारिक सुख-शांति और संतान सुख की प्राप्ति के लिए। सतीत्व की कथा का विशेष महत्व।
चौथा मंगलवार: आर्थिक समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि के लिए। इस मंगलवार को विशेष कथा सुनने से पति के कारोबार और आय में वृद्धि होती है।
पांचवां मंगलवार: सर्वाधिक पावन — इस दिन व्रत का समापन होता है। पति की दीर्घायु और सुहाग की चिरस्थायिता की प्रार्थना की जाती है। पांचवें मंगलवार को जो भी कथा सुनी जाए, उसका फल 5 गुना बढ़ जाता है।
व्रत के फायदे, सावधानियां और FAQ
व्रत के 8 प्रमुख फायदे
- पति की दीर्घायु — व्रत का सबसे प्रमुख फल पति की लंबी आयु और स्वस्थ जीवन है
- सुहाग की रक्षा — सुहाग में आने वाली हर बाधा दूर होती है
- पारिवारिक सुख-शांति — घर में मंगल और सद्भाव बना रहता है
- संतान सुख — संतान प्राप्ति या संतान की उन्नति का योग
- मंगल ग्रह के दोषों का शमन — कुंडली में मंगल दोष से मुक्ति
- वैवाहिक विवादों का अंत — पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ता है
- आर्थिक समृद्धि — पति के व्यापार-कारोबार में वृद्धि
- आध्यात्मिक उन्नति — माँ गौरी की कृपा से मोक्ष मार्ग की प्राप्ति
सावधानियां और नियम
- निर्जला व्रत — सर्वोत्तम, परंतु स्वास्थ्य कारण से फलाहार ले सकती हैं
- रजस्वला स्त्रियां — इस अवस्था में व्रत नहीं रखना चाहिए, मासिक धर्म समाप्त होने पर अगले मंगलवार से जारी रख सकती हैं
- मांस और मदिरा — पूर्णतः वर्जित
- असत्य और क्रोध — व्रत के दौरान इनका त्याग अनिवार्य
- चमड़े की वस्तुएं — व्रत में चमड़े की चप्पल, बेल्ट आदि का उपयोग न करें
- किसी की निंदा — किसी के पीछे बुराई न करें, न ही कठोर वचन बोलें
- दान — व्रत के दिन गरीब स्त्रियों को श्रृंगार की सामग्री दान करें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: क्या अविवाहित कन्याएं भी मंगला गौरी व्रत रख सकती हैं? हाँ, अविवाहित कन्याएं मनोवांछित वर और सुखमय वैवाहिक जीवन की प्राप्ति के लिए यह व्रत रख सकती हैं। पहले मंगलवार से शुभ संकेत मिलने लगते हैं।
प्रश्न 2: क्या 5 में से कुछ मंगलवार ही रखना सही है, या सभी 5 जरूरी हैं? सभी 5 मंगलवार रखना सर्वोत्तम है। यदि किसी कारण से कोई मंगलवार छूट जाए तो अगले मंगलवार से दोबारा शुभ दिन देखकर व्रत जारी रख सकती हैं, परंतु अधूरे व्रत का फल कम होता है।
प्रश्न 3: क्या सास भी मंगला गौरी व्रत रख सकती हैं? हाँ, सास और बहू दोनों एक साथ मिलकर यह व्रत रख सकती हैं। यह परिवार की सुख-शांति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। कई परिवारों में यह पीढ़ीगत परंपरा होती है।
प्रश्न 4: क्या विधवा स्त्री मंगला गौरी व्रत रख सकती हैं? शास्त्रानुसार विधवा स्त्रियों के लिए यह व्रत वर्जित नहीं है, परंतु मुख्य रूप से यह सुहागिन स्त्रियों का व्रत है। विधवा स्त्रियां अपने दिवंगत पति की आत्मा की शांति के लिए दूसरी कथा का श्रवण कर सकती हैं।
प्रश्न 5: क्या व्रत में पानी पी सकते हैं? शास्त्रानुसार निर्जला व्रत (बिना जल) सर्वोत्तम है। यदि स्वास्थ्य कारण से असम्भव हो तो एक बार पानी पी सकती हैं। गर्भवती महिलाएं चिकित्सक से परामर्श लेकर एक समय पानी पी सकती हैं।
प्रश्न 6: क्या मंगलसूत्र पहनना अनिवार्य है? माँ गौरी की पूजा के समय मंगलसूत्र पहनना शास्त्रसम्मत है। यदि मंगलसूत्र न हो तो कलावा या सोने की चेन पहन सकती हैं, परंतु सुहाग का कोई न कोई प्रतीक अवश्य धारण करें।
प्रश्न 7: क्या 16 श्रृंगार सिर्फ पांचवें मंगलवार को करना जरूरी है? नहीं, हर मंगलवार 16 श्रृंगार करना शुभ है, परंतु पांचवें मंगलवार को यह अनिवार्य है। शेष मंगलवारों को सरल श्रृंगार भी चल सकता है, परंतु मांग में सिंदूर और चूड़ियां अनिवार्य हैं।
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क्या 16 श्रृंगार सिर्फ पांचवें मंगलवार को करना जरूरी है?+
Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.