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जानिए हरतालिका तीज का महत्व ,पूजन विधि ,नियम एवं उपाय

# जानिए हरतालिका तीज का महत्व ,पूजन विधि ,नियम एवं उपाय - Hartalika Teej - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **जानिए हरतालिका तीज का महत्व ,पूजन विधि ,नियम एवं उपाय** — यह विषय मेरे पास र

7 July 2026 19 min read|By Nidhi Shrimali

✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।

हरतालिका तीज हिंदू धर्म की उन पावन नारी-व्रत परंपराओं में से एक है, जिसमें सुहागिन स्त्री अपने पति की दीर्घायु, सुख-शांति और अटूट वैवाहिक प्रेम की कामना से स्वयं को समर्पित करती हैं। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाला यह व्रत माँ पार्वती की कठोर तपस्या से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने हरे पत्तों और लकड़ी से निर्मित शिवलिंग की आराधना कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम 2026 की तिथि-मुहूर्त, हरियाली और हरितालिका के सूक्ष्म अंतर, कथा के गहन संदेश, संपूर्ण पूजा विधि, मंत्र, 16 श्रृंगार, नियम और FAQs पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. हरतालिका तीज 2026 — तिथि और शुभ मुहूर्त
  2. हरतालिका तीज क्या है — परिचय और मूल भाव
  3. हरियाली तीज और हरितालिका तीज — मूलभूत अंतर
  4. हरतालिका तीज का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
  5. माँ पार्वती की सम्पूर्ण कथा — संदेश सहित
  6. पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची
  7. संपूर्ण पूजा विधि — 8 चरणों में विस्तार
  8. 16 श्रृंगार — सुहाग का पूर्ण प्रतीक
  9. हरतालिका तीज के शुभ मंत्र और जाप विधि
  10. व्रत के नियम, फायदे और सावधानियां
  11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरतालिका तीज 2026 — तिथि और शुभ मुहूर्त

मुख्य तिथि: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया — 2 सितम्बर 2026, बुधवार

अवधि समय
तृतीया तिथि आरंभ 1 सितम्बर 2026, प्रातः 6:12 बजे
तृतीया तिथि समाप्ति 2 सितम्बर 2026, प्रातः 7:48 बजे
पूजा मुहूर्त (प्रदोष काल) 2 सितम्बर शाम 6:22 से 7:54 बजे तक
अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:03 से 12:51 बजे तक
निशीथ काल रात्रि 11:41 से 12:28 बजे तक
सूर्यास्त लगभग 6:49 बजे

महत्वपूर्ण: वर्ष 2026 में तृतीया तिथि का अधिकांश भाग 2 सितम्बर को ही पड़ रहा है, अतः 2 सितम्बर को प्रदोष काल में पूजा करना सर्वोत्तम रहेगा। सूर्यास्त के पश्चात ही शिवलिंग स्थापना और मुख्य पूजा आरंभ करें।

पारण काल: 3 सितम्बर 2026, प्रातःकाल — ब्रह्म मुहूर्त के बाद सूर्योदय तक पारण कर सकती हैं। पारण में पहले जल, फिर फलाहार और अंत में सात्विक भोजन ग्रहण करें।

हरतालिका तीज क्या है — परिचय और मूल भाव

हरतालिका तीज शब्द की उत्पत्ति दो संस्कृत शब्दों से हुई है — "हरित" (हरा) और "अलिका" (सखी)। कथा के अनुसार जब पार्वती जी भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए वन में तपस्या कर रही थीं, तब उनकी सखी (अलिका) ने हरे पत्तों और लकड़ी से शिवलिंग बनाकर पूजा में सहयोग किया था। इसी कारण इस व्रत का नाम "हरित + अलिका = हरितालिका" पड़ा।

यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, परंतु अविवाहित कन्याएं भी मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रख सकती हैं। यह व्रत निर्जला (बिना जल) रखा जाता है — अर्थात् एक बार जल ग्रहण करने के बाद अगले दिन प्रातः पारण तक जल का सेवन वर्जित रहता है। व्रत का मुख्य उद्देश्य पति की दीर्घायु, सुख-शांति, कलह-मुक्त वैवाहिक जीवन और सुहाग की रक्षा की कामना है।

भारत के अधिकांश हिस्सों — विशेषकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ — में यह व्रत अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर कथा सुनती हैं, साथ में पूजा करती हैं और प्रसाद बांटती हैं।

हरियाली तीज और हरितालिका तीज — मूलभूत अंतर

बहुत सी महिलाएं हरियाली तीज और हरितालिका तीज को एक ही मान लेती हैं, जबकि दोनों के तिथि, महत्व और विधि में स्पष्ट अंतर है:

पहलू हरियाली तीज हरितालिका तीज
तिथि सावन शुक्ल पक्ष तृतीया (जुलाई-अगस्त) भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया (अगस्त-सितम्बर)
मुख्य उद्देश्य सावन के झूला उत्सव, प्रकृति पूजा पति की दीर्घायु और सुहाग रक्षा
व्रत प्रकार अनिवार्य निर्जला नहीं, कुछ क्षेत्रों में फलाहार निर्जला व्रत (बिना जल) सर्वोत्तम
प्रतीक हरियाली, झूला, मानसून हरितालिका (हरे पत्तों से शिवलिंग)
भौगोलिक प्रचलन राजस्थान, गुजरात, हरियाणा उत्तर-मध्य भारत, बिहार, झारखंड
पौराणिक संबंध सावन मास की शिव-पार्वती लीला माँ पार्वती की कठोर तपस्या
श्रृंगार का महत्व मध्यम अत्यधिक — 16 श्रृंगार अनिवार्य

मुख्य बात: हरियाली तीज मुख्यतः सावन के झूला उत्सव से जुड़ी है जबकि हरितालिका तीज माँ पार्वती की तपस्या और सुहाग रक्षा से जुड़ा गहन व्रत है। दोनों ही तीज सुहागिन स्त्रियों के लिए पावन हैं, परंतु हरितालिका को अधिक कठोर और फलदायी माना जाता है।

हरतालिका तीज का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व

हरतालिका तीज का महत्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय तीनों दृष्टिकोणों से गहन प्रभाव हैं:

धार्मिक दृष्टि से:

  • पति की दीर्घायु और निरोगी जीवन की प्राप्ति
  • वैवाहिक जीवन में मधुरता, प्रेम और सद्भावना की वृद्धि
  • कुंडली के सप्तम भाव (विवाह भाव) के दोषों का शमन
  • सुहाग में आने वाली बाधाओं और विघ्नों का निवारण
  • अकाल मृत्यु, दुर्घटना आदि के भय से मुक्ति

आध्यात्मिक दृष्टि से:

  • माँ पार्वती के प्रति समर्पण और भक्ति भाव का विकास
  • सात्विकता, संयम और इंद्रिय-निग्रह का अभ्यास
  • मन की एकाग्रता और इच्छा शक्ति का संवर्धन
  • शक्ति और शिव के अविच्छिन्न संबंध का स्मरण
  • कुंडली में बलहीन शुक्र और शनि का आध्यात्मिक बल

ज्योतिषीय दृष्टि से:

  • भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष तृतीया को चंद्रमा मिथुन राशि में रहता है, जो प्रेम, सौंदर्य और वैवाहिक सुख का कारक है
  • तृतीया तिथि संतान, साहस और पराक्रम का कारक है — वैवाहिक जीवन में स्थिरता देती है
  • शुक्र ग्रह की स्थिति अनुसार प्रेम संबंधों में मधुरता आती है
  • शिव-पार्वती की पूजा से जातक की कुंडली में शुक्र का बल बढ़ता है
  • मंगल दोष या मंगल-शुक्र अशुभ योग में यह व्रत विशेष लाभकारी

माँ पार्वती की सम्पूर्ण कथा — संदेश सहित

हरतालिका तीज की कथा माँ पार्वती की अनुपम भक्ति और समर्पण की कहानी है। कथा को विस्तार से जानना इसलिए आवश्यक है क्योंकि कथा सुनने-पढ़ने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

कथा का आरंभ:

अत्यंत सुंदर और गुणवती कन्या पार्वती, जो हिमालय के राज परिवार में जन्मी थीं, बाल्यकाल से ही भगवान शिव की परम भक्त थीं। उनका हृदय शिव के प्रति अनुराग से भरा था और उनका एकमात्र लक्ष्य शिव को पति रूप में प्राप्त करना था।

पार्वती जी ने अनेक जन्मों तक इसी संकल्प के साथ तपस्या की। किसी जन्म में उन्होंने फल-मूल खाकर, किसी में केवल जल पीकर, तो किसी जन्म में निराहार रहकर कठोर तप की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें अनेक वरदान दिए, परंतु उनका मन शिव के अतिरिक्त किसी अन्य वर में नहीं लगता था।

पिता का विवाह-निर्णय:

एक बार पार्वती जी के पिता हिमवान ने भगवान विष्णु से उनका विवाह तय कर दिया। यह सुनकर पार्वती जी अत्यंत व्याकुल हो गईं। उनके हृदय में शिव के अतिरिक्त अन्य कोई स्वीकार्य नहीं था।

सखी का सुझाव और वन-गमन:

पार्वती जी ने अपनं विश्वसनीय सखी (अलिका) से सलाह ली। सखी ने कहा — "यदि तुम्हारा मन शिव में अटल है, तो घर छोड़कर वन में जाओ और कठोर तपस्या करो। मैं तुम्हारे साथ रहूँगी।" पार्वती जी ने सखी की बात मान ली।

रात्रि के अंधेरे में, जब घर के सब लोग सो रहे थे, पार्वती जी अपनी सखी के साथ घर से निकल गईं। वे एक घने और निर्जन वन में पहुंचीं जहां नदी का किनारा और शिव की प्रतिमा के लिए उपयुक्त स्थान था।

कठोर तपस्या:

पार्वती जी ने गंगाजल मिट्टी में मिलाकर हरे पत्तों और लकड़ी से एक शिवलिंग बनाया। वे प्रतिदिन प्रातः स्नान कर इस शिवलिंग की पूजा करतीं। उनकी तपस्या अत्यंत कठोर थी:

  • प्रथम कुछ दिन — केवल फल-मूल का भोजन
  • बाद में — केवल एक समय सूखा भोजन
  • और अंत में — निराहार निर्जला व्रत (बिना भोजन-जल)

वे दिन-रात शिव का ध्यान करतीं, शिव के मंत्रों का जाप करतीं और भजन-कीर्तन में लीन रहतीं। सर्दी, गर्मी, बारिश — किसी भी ऋतु में उनकी तपस्या में व्यवधान नहीं आता था।

शिव की प्रसन्नता और प्राकट्य:

पार्वती जी की अनुपम भक्ति और अडिग संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अंततः प्रकट हुए। उन्होंने पार्वती जी से कहा — "तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करता हूँ।"

तभी से वह तिथि "हरितालिका" के नाम से प्रसिद्ध हुई — हरित (हरे पत्ते) + अलिका (सखी) = हरितालिका, अर्थात् "हरे पत्तों से सखी द्वारा निर्मित शिवलिंग की पूजा"।

कथा के प्रमुख संदेश:

  1. सच्चे समर्पण से असंभव कुछ नहीं: माँ पार्वती ने अनेक जन्मों तक तपस्या की और अंततः सफलता प्राप्त की। यह हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति और अडिग संकल्प से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

  2. सखी का सहयोग महत्वपूर्ण: पार्वती जी अकेले यह तपस्या नहीं कर सकती थीं। सखी का साथ और सहयोग मिला, तभी वे सफल हुईं। यह सिखाता है कि जीवन में सच्चे मित्रों का साथ अनमोल है।

  3. संकल्प की शक्ति: विवाह तय होने के बाद भी पार्वती जी ने अपना संकल्प नहीं छोड़ा। यह हमें बताता है कि एक बार सही दिशा में संकल्प लेने के बाद उसे पूरा करना चाहिए, चाहे कितनी भी बाधाएं आएं।

  4. त्याग और तपस्या का महत्व: बिना त्याग और तपस्या के कोई भी बड़ा लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। माँ पार्वती का त्याग हमें प्रेरित करता है कि अपने प्रियजनों के लिए हमें भी कुछ त्याग करने को तैयार रहना चाहिए।

  5. विश्वास और धैर्य: तपस्या की अवधि लंबी थी, परंतु पार्वती जी ने धैर्य नहीं खोया। यह हमें सिखाता है कि सच्चे विश्वास के साथ धैर्य रखने वालों को अवश्य सफलता मिलती है।

पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची

हरतालिका तीज की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री एक-दो दिन पहले से ही तैयार कर लें:

मुख्य पूजा सामग्री:

  • शिवलिंग निर्माण के लिए गंगाजल मिट्टी
  • हरे पत्ते (आम, बेल, पीपल) और छोटी लकड़ी
  • शिव-पार्वती की मूर्ति या तस्वीर
  • लाल कलावा (मौली) — 2 गांठ वाला
  • रोली, कुंकुम, चंदन (शुद्ध), अशोक, सिंदूर
  • सुपारी, लौंग, इलायची
  • फूल: आम के पत्ते, बेलपत्र, चमेली, गुड़हल, कमल
  • आम का पत्ता विशेष रूप से (पार्वती जी की तपस्या का प्रतीक)
  • अक्षत (चावल) — कच्चे और भूने दोनों
  • पंचामृत सामग्री: दूध, दही, घी, शर्करा (शहद), शहद

दीपक और धूप:

  • शुद्ध देसी घी या सरसों का तेल
  • कपास की बत्तियां
  • धूपबत्ती, अगरबत्ती
  • कपूर
  • दीपक (मिट्टी या पीतल का)

भोग सामग्री:

  • खीर (दूध-चावल-शर्करा से बनी)
  • सूजी का हलवा या आटे का हलवा
  • मेवे: काजू, बादाम, किशमिश, खजूर
  • फल: केला, सेब, अनार, नारियल
  • शर्करा (मिश्री), गुड़, गुड़ से बनी मिठाई
  • पान के पत्ते, सुपारी, चूना, कत्था

सुहाग का सामान (16 श्रृंगार के लिए):

  • लाल चूड़ियां, हरी चूड़ियां
  • सिंदूर, कुंकुम, मेहंदी (हाथ-पैर के लिए)
  • बिंदी, कुंडल
  • काजल, लिपस्टिक या लाली
  • नथ (नाक की अंगूठी), कर्णफूल (बाली)
  • कंगन, पायल, बाजूबंद
  • हार, मंगलसूत्र
  • इत्र/अत्तर
  • लाल या पीली चुनरी
  • रस्सी या ऊनी धागा (चूड़ियां बांधने के लिए)

अतिरिक्त सामग्री:

  • कलश के लिए मिट्टी या तांबे का बर्तन
  • सुपारी, सिक्का, सफेद वस्त्र (कलश पर)
  • आरती की थाली
  • अग्नि के लिए हवन सामग्री (वैकल्पिक)
  • पंचांग पुस्तक या कलेंडर (शुभ मुहूर्त के लिए)

संपूर्ण पूजा विधि — 8 चरणों में विस्तार

हरतालिका तीज की पूजा सवेरे से प्रारंभ होकर अगले दिन प्रातः पारण तक चलती है। नीचे 8 चरणों में पूरी विधि विस्तार से बताई जा रही है:

चरण 1 — प्रातःकालीन स्नान और शुद्धि (ब्रह्म मुहूर्त)

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-5 बजे) में उठें
  • ठंडे या गुनगुने जल से स्नान करें (कुछ क्षेत्रों में गंगाजल मिलाकर)
  • शुद्ध वस्त्र धारण करें — लाल, पीला या केसरिया रंग शुभ
  • बालों को साफ बांधें, आंखों में काजल लगाएं
  • मन में संकल्प लें: "मैं भगवान शिव-माँ पार्वती की पूजा अपने सुहाग की रक्षा और पति की दीर्घायु हेतु कर रही हूँ"

चरण 2 — 16 श्रृंगार और शिवलिंग निर्माण

  • संकल्प के बाद 16 श्रृंगार धारण करें (नीचे विस्तार से)
  • साफ जगह पर चौकी या आसन बिछाएं
  • पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें
  • गंगाजल मिट्टी में मिलाकर हरे पत्तों और लकड़ी से शिवलिंग बनाएं
  • शिवलिंग के पास माँ पार्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें
  • कलश स्थापित करें (वैकल्पिक)

चरण 3 — शिवलिंग का अभिषेक

  • शिवलिंग को जल से धोएं
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शर्करा) से अभिषेक करें
  • अंत में पुनः शुद्ध जल से अभिषेक करें
  • अभिषेक के जल को बहने न दें — वस्त्र पर शोषित करें या पात्र में इकट्ठा करें

चरण 4 — शिव-पार्वती की पूजा

  • रोली से यंत्र बनाएं (वैकल्पिक)
  • शिवलिंग पर रोली, कुंकुम, चंदन, सिंदूर, अशोक लगाएं
  • बेलपत्र, आम के पत्ते, चमेली, गुड़हल, कमल के फूल चढ़ाएं
  • अक्षत (कच्चे चावल) अर्पित करें
  • सुपारी, लौंग, इलायची रखें
  • माँ पार्वती को भी रोली-कुंकुम-सिंदूर लगाएं
  • पार्वती जी को लाल चुनरी, फूल और मिठाई अर्पित करें

चरण 5 — धूप-दीप और आरती

  • शुद्ध देसी घी से दीपक जलाएं
  • धूपबत्ती और अगरबत्ती जलाएं
  • कपूर से आरती करें
  • शिव-पार्वती की आरती गाएं या सुनें
  • आरती के बाद भोग लगाएं — खीर, हलवा, मेवे, फल

चरण 6 — कथा वाचन

  • शाम को प्रदोष काल में कथा सुनना या पढ़ना अत्यंत शुभ
  • परिवार की महिलाएं एकत्रित हों और कथा सुनें
  • कथा सुनते समय मन में शिव-पार्वती का स्मरण रखें
  • कथा के बाद प्रसाद बांटें
  • बड़ी महिलाओं से आशीर्वाद प्राप्त करें

चरण 7 — मंत्र जाप

  • प्रदोष काल में 108 बार शिव-पार्वती मंत्र का जाप करें
  • माला पर 11 या 21 बार पार्वती मंत्र जपें
  • सवेरे और शाम दोनों समय जाप करना शुभ
  • मन शांत रखें, एकाग्रचित्त होकर जाप करें

चरण 8 — रात्रि जागरण और अगले दिन पारण

  • संपूर्ण रात्रि जागरण करना पुण्यदायी
  • भजन-कीर्तन करें
  • कथा का पुनः श्रवण करें
  • अगले दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त के बाद पारण करें
  • पहले जल, फिर फल, फिर सात्विक भोजन ग्रहण करें
  • पारण के बाद क्षेत्रीय परंपरा अनुसार ऋषि-मुनियों या ब्राह्मणों को दान करें

16 श्रृंगार — सुहाग का पूर्ण प्रतीक

हरतालिका तीज पर 16 श्रृंगार सुहागिन स्त्री की पहचान और उसके पति के प्रति समर्पण का प्रतीक है। प्रत्येक श्रृंगार का अपना गहन अर्थ है:

  1. स्नान — शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक
  2. वस्त्र (लाल या पीला) — सौभाग्य और ऊर्जा
  3. सिंदूर (मांग में) — पति की दीर्घायु का प्रतीक
  4. कुंकुम (माथे पर) — शुभता और मंगल
  5. मेहंदी (हाथ-पैर पर) — सौंदर्य और प्रेम
  6. बिंदी/कुंडल — तीसरी आंख का प्रतीक, ज्ञान
  7. काजल (आंखों में) — नेत्रों की शोभा
  8. लाली (होंठों पर) — प्रेम और वाणी की मधुरता
  9. नथ (नाक) — सौंदर्य और गृह-संपन्नता
  10. कर्णफूल/बाली — कानों की शोभा, सुनने की शक्ति
  11. चूड़ियां (लाल/हरी) — सुहाग का सर्वोच्च प्रतीक
  12. कंगन (कलाई) — कलाइयों की शोभा
  13. पायल (पैरों) — पद-संचालन की मधुरता
  14. बाजूबंद (भुजाओं) — बाहों की सुंदरता
  15. हार/मंगलसूत्र — गले का आभूषण, विवाह-बंधन
  16. इत्र/अत्तर — सुगंध, आकर्षण

विशेष: 16 श्रृंगार के साथ पूजा करने से सौहाग्य बल में वृद्धि होती है और पति-पत्नी के बीच प्रेम-सद्भाव बना रहता है। यदि संभव हो तो सभी 16 श्रृंगार एक साथ धारण करें, अन्यथा कम से कम सिंदूर, कुंकुम, मेहंदी, चूड़ियां, मांग टीका, काजल, पायल अवश्य धारण करें।

हरतालिका तीज के शुभ मंत्र और जाप विधि

हरतालिका तीज पर मंत्र जाप का विशेष महत्व है। नीचे विभिन्न मंत्र दिए जा रहे हैं:

शिव मंत्र:

  • ॐ नमः शिवाय (सर्वाधिक प्रचलित — 108 बार जपें)
  • ॐ ह्रौं जूं सः शिवाय नमः (शिव का बीज मंत्र)
  • ॐ शं शिवाय नमः

पार्वती मंत्र:

  • ॐ ह्रीं श्रीं गौरि नमः (सर्वाधिक फलदायी — 108 माला जपें)
  • ॐ पार्वत्यै नमः (सरल मंत्र)
  • ॐ ह्रीं पार्वत्यै नमः (पार्वती बीज मंत्र)
  • ॐ गौर्यै नमः

संयुक्त मंत्र (विशेष फलदायी):

  • ॐ शिवायै नमः, ॐ शक्तये नमः
  • ॐ शिव-शक्ति नमः
  • ॐ ह्रीं श्रीं शिव-शक्ति नमः

अध्ययन का पंचोपचार मंत्र (संकल्प): "ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य तृतीया-दिने, हरितालिका-व्रतं करिष्ये।"

जाप विधि:

  • सवेरे — ब्रह्म मुहूर्त (4-5 बजे) में 11 या 21 माला जप
  • दोपहर — अभिजित मुहूर्त (12-1 बजे) में 11 माला जप
  • शाम — प्रदोष काल में 108 बार अवश्य जपें
  • जपते समय रुद्राक्ष या तुलसी की माला का प्रयोग करें
  • मन शांत रखें, श्वास पर ध्यान दें
  • संकल्प के साथ जप करने से फल शीघ्र प्राप्त होता है

व्रत के नियम, फायदे और सावधानियां

व्रत के मुख्य नियम

  • निर्जला व्रत (बिना जल) रखना सर्वोत्तम — एक बार जल ग्रहण करने के बाद अगले दिन प्रातः पारण तक जल वर्जित
  • यदि स्वास्थ्य कारण से असंभव हो तो एक समय फलाहार करें (शास्त्रीय अनुमति है)
  • दिनभर मन में शिव-पार्वती का स्मरण रखें
  • क्रोध, असत्य, निंदा, चुगली का त्याग करें
  • सात्विक भोजन ही ग्रहण करें — मांस, मदिरा, तामसिक भोजन वर्जित
  • सिलाई-कढ़ाई आदि कार्य वर्जित (कुछ क्षेत्रों में)
  • बाल-नाखून न काटें (कुछ क्षेत्रों में)
  • रजस्वला स्त्रियां इस व्रत को नहीं रखतीं — वे अगली तीज को व्रत कर सकती हैं

व्रत के 7 प्रमुख फायदे

  1. पति की दीर्घायु — हरतालिका तीज का व्रत पति की आयु बढ़ाने में सहायक माना जाता है
  2. वैवाहिक सुख — पति-पत्नी के बीच प्रेम, सद्भाव और विश्वास बढ़ता है
  3. सुहाग रक्षा — सुहाग में बाधा डालने वाले ग्रह दोषों का शमन
  4. कुंडली दोष निवारण — कुंडली में सप्तम भाव के दोष, शुक्र दोष, मंगल दोष का शमन
  5. मानसिक शांति — निर्जला व्रत से मन की एकाग्रता और शांति बढ़ती है
  6. संतान सुख — तृतीया तिथि संतान कारक है, संतान सुख की प्राप्ति
  7. आध्यात्मिक उन्नति — शिव-पार्वती की कृपा से आध्यात्मिक विकास

मुख्य सावधानियां

  • रजस्वला स्त्री — रजस्वला होने पर यह व्रत न रखें; अगली तीज को रखें
  • गर्भवती महिला — चिकित्सक से परामर्श लेकर ही व्रत करें; निर्जला व्रत हानिकारक हो सकता है
  • गंभीर रोग — यदि कोई गंभीर बीमारी हो तो एक समय फलाहार कर सकती हैं
  • तिथि व्यतिपात — यदि तिथि व्यतिपात या वैधृति योग हो तो व्रत टाल दें
  • किसी जीव को कष्ट — व्रत में किसी भी जीव को कष्ट न दें
  • अन्न-जल का अपमान — भोजन और जल का अपव्यय न करें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या अविवाहित कन्या हरतालिका तीज का व्रत रख सकती है?

हाँ, अविवाहित कन्याएं मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रख सकती हैं। हालांकि शास्त्रों में सुहागिन महिलाओं का व्रत सर्वोत्तम फलदायी बताया गया है, परंतु कन्याओं के लिए भी इस व्रत का विशेष महत्व है। कन्याओं को 16 श्रृंगार के स्थान पर सादे शुभ वस्त्र धारण करने चाहिए।

क्या वृद्ध महिला यह व्रत रख सकती है?

हाँ, वृद्ध महिलाएं अवश्य रख सकती हैं, बशर्ते स्वास्थ्य ठीक हो। यदि निर्जला व्रत संभव न हो तो एक समय फलाहार कर सकती हैं। वृद्ध महिलाओं का आशीर्वाद व्रत को अधिक फलदायी बनाता है।

क्या पति को भी साथ में व्रत रखना चाहिए?

शास्त्रों में मुख्य रूप से महिलाओं का व्रत बताया गया है, परंतु यदि पति भी पत्नी की सुख-शांति के लिए उपवास रखें तो यह शुभ है। कुछ परिवारों में पति व्रत के दिन पत्नी को उपहार देते हैं और संयुक्त रूप से पूजा करते हैं — यह परंपरा भी शुभ है।

क्या विधवा स्त्री यह व्रत रख सकती है?

शास्त्रानुसार विधवा स्त्री इस व्रत को नहीं रखतीं, क्योंकि यह विशेष रूप से सुहाग रक्षा हेतु है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में विधवाएं माँ पार्वती की पूजा सामान्य रूप से कर सकती हैं, परंतु 16 श्रृंगार और सुहाग वाली पूजा नहीं करतीं।

क्या दो दिन का व्रत रखना आवश्यक है?

नहीं, हरतालिका तीज का व्रत एक दिन का है — तृतीया तिथि के दिन प्रातः से अगले दिन प्रातः पारण तक। कुछ क्षेत्रों में दो दिन का व्रत भी रखा जाता है, परंतु एक दिन का व्रत ही शास्त्रसम्मत है।

क्या निर्जला व्रत अनिवार्य है?

शास्त्रसम्मत मत है कि निर्जला व्रत (बिना जल) सर्वोत्तम है और इसका फल सर्वाधिक मिलता है। परंतु गर्भवती महिलाओं, वृद्ध महिलाओं, बीमार महिलाओं और जिनके स्वास्थ्य की अनुमति न हो, वे एक समय फलाहार (फल, दूध, जल) कर सकती हैं। उनका व्रत भी शुभ फलदायी माना जाता है।


हरतालिका तीज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेशों का वाहक है। यह हमें सिखाता है कि सच्चे प्रेम में त्याग और समर्पण आवश्यक है, धैर्य और एकाग्रता से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, सात्विक जीवनशैली से मानसिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है, और पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए समय-समय पर विशेष अनुष्ठान आवश्यक हैं। इस व्रत को विधिपूर्वक और पूर्ण श्रद्धा से रखने से निश्चित ही जीवन में सुख, शांति और सद्भावना की प्राप्ति होती है।

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Frequently Asked Questions

हरतालिका तीज 2026 कब है?+
2 सितम्बर 2026, बुधवार को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन। मुख्य पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6:22 से 7:54 बजे तक (प्रदोष काल)।
क्या अविवाहित कन्या हरतालिका तीज का व्रत रख सकती है?+
हाँ, अविवाहित कन्याएं मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रख सकती हैं, परंतु 16 श्रृंगार के स्थान पर शुभ वस्त्र धारण करें।
क्या वृद्ध महिला यह व्रत रख सकती है?+
हाँ, वृद्ध महिलाएं रख सकती हैं। निर्जला व्रत संभव न हो तो एक समय फलाहार कर सकती हैं। वृद्ध महिलाओं का आशीर्वाद व्रत को अधिक फलदायी बनाता है।
क्या पति को भी साथ में व्रत रखना चाहिए?+
शास्त्रानुसार यह मुख्य रूप से महिलाओं का व्रत है, परंतु पति भी पत्नी की सुख-शांति के लिए उपवास रख सकते हैं। कुछ परिवारों में पति पत्नी को उपहार देते हैं और संयुक्त रूप से पूजा करते हैं।
हरतालिका तीज और हरियाली तीज में क्या अंतर है?+
हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया (2 सितम्बर 2026) को और हरियाली तीज सावन शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। हरियाली झूला उत्सव है जबकि हरितालिका निर्जला सुहाग व्रत है — अधिक कठोर और फलदायी।
क्या निर्जला व्रत अनिवार्य है?+
शास्त्रसम्मत मत है कि निर्जला व्रत सर्वोत्तम है। गर्भवती महिलाएं, वृद्ध महिलाएं और जिनके स्वास्थ्य की अनुमति न हो, वे एक समय फलाहार कर सकती हैं — उनका व्रत भी शुभ फलदायी माना जाता है।
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Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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