लेखिका: निधि श्रीमाली, प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली
रक्षाबंधन श्रावण मास की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को मनाया जाने वाला भाई-बहन के स्नेह का पर्व है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि रिश्तों की रक्षा का वचन है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बाँधकर उसकी दीर्घायु और सुख की कामना करती हैं, और भाई बहन का साथ निभाने का संकल्प लेता है। इस मार्गदर्शिका में हम तिथि तय करने का नियम, भद्रा काल, पाँच प्रचलित कथाएँ, राखी बाँधने की विधि, राखी के प्रकार, मंत्र, लाभ और सावधानियों पर बात करेंगे, और यह भी बताएँगे कि रक्षाबंधन भाई दूज से कैसे अलग है।
विषय सूची (Table of Contents)
- रक्षाबंधन क्या है — परिचय और इतिहास
- तिथि और शुभ मुहूर्त कैसे तय होता है
- भद्रा काल — क्या है और क्यों टालें
- रक्षाबंधन का धार्मिक महत्व
- पाँच प्रचलित कथाएँ
- रक्षाबंधन और भाई दूज में अंतर
- राखी बाँधने की संपूर्ण विधि
- राखी के प्रकार
- थाली सजावट और शुभ मंत्र
- रक्षाबंधन के सात लाभ — और उनकी सीमा
- सावधानियाँ और नियम
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- निष्कर्ष — रक्षाबंधन का संदेश
रक्षाबंधन क्या है — परिचय और इतिहास
रक्षाबंधन दो शब्दों "रक्षा" और "बंधन" से बना है, अर्थात् "रक्षा का बंधन"। यह हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को मनाया जाता है। बहन भाई के माथे पर तिलक लगाती है, कलाई पर राखी बाँधती है, मिठाई खिलाती है, और भाई उपहार देकर साथ निभाने का वचन देता है।
पृष्ठभूमि: श्रावण पूर्णिमा पर रक्षा सूत्र बाँधने का विधान पुराणों में मिलता है। भविष्य पुराण की प्रसिद्ध कथा में देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी ने अभिमंत्रित रक्षा सूत्र इंद्र की कलाई पर बाँधा था। यानी प्राचीन रूप में रक्षा सूत्र केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं था। पुरोहित यजमान को, गुरु शिष्य को और पत्नी पति को भी रक्षा सूत्र बाँधते थे। आज भी कई परिवारों में पुरोहित इसी दिन "येन बद्धो बली राजा" मंत्र के साथ रक्षा सूत्र बाँधते हैं। भाई-बहन वाला रूप समय के साथ प्रमुख हुआ।
इसी दिन ब्राह्मण समाज में श्रावणी उपाकर्म होता है, जिसमें यज्ञोपवीत (जनेऊ) बदला जाता है, और महाराष्ट्र व तटीय क्षेत्रों में नारली पूर्णिमा पर समुद्र को नारियल अर्पित किया जाता है। आधुनिक इतिहास में 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए राखी बंधन उत्सव का आह्वान किया था। आज बहन के अभाव में सखी को, और भाई के अभाव में किसी सम्मानित व्यक्ति को राखी बाँधी जाती है।
तिथि और शुभ मुहूर्त कैसे तय होता है
रक्षाबंधन की तारीख अंग्रेज़ी कैलेंडर में हर वर्ष बदलती है, क्योंकि यह श्रावण पूर्णिमा पर निर्भर है। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास होने के कारण श्रावण और उसके बाद के सभी पर्व सामान्य से लगभग एक महीना देर से आए, इसलिए 2026 का रक्षाबंधन अगस्त के अंतिम सप्ताह में पड़ा। राखी बाँधने का सटीक समय हर शहर में अलग होता है, क्योंकि सूर्योदय-सूर्यास्त स्थान के अनुसार बदलते हैं। इसलिए सही समय अपने शहर के पंचांग से ही देखें। नीचे वे नियम हैं जिनसे पंचांग यह समय तय करते हैं:
| पंचांग में स्थिति | राखी कब बाँधें |
|---|---|
| अपराह्न (दोपहर बाद का भाग) में पूर्णिमा हो और भद्रा न हो | अपराह्न सबसे उत्तम माना जाता है |
| अपराह्न में भद्रा हो | भद्रा समाप्त होने के बाद, जब तक पूर्णिमा रहे; प्रायः प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) |
| पूर्णिमा दो दिन पड़े | अधिकांश पंचांग देखते हैं कि अगले दिन सूर्योदय के बाद पूर्णिमा कितनी देर रहती है; बहुत कम समय रहे तो पिछले दिन भद्रा के बाद प्रदोष में राखी बाँधी जाती है |
| पूरा दिन भद्रा से घिरा हो | कुछ परंपराएँ मजबूरी में भद्रा के पुच्छ भाग में राखी की अनुमति देती हैं; भद्रा मुख हर हाल में टाला जाता है |
अपनी पंचांग की गणना पर भरोसा न हो तो किसी जानकार से एक बार पूछ लेना बेहतर है। एक दिन का अंतर पड़ने पर पूरे परिवार की योजना बदल जाती है, इसलिए मोबाइल पर घूम रहे संदेशों के बजाय अपने स्थान का पंचांग देखें।
भद्रा काल — क्या है और क्यों टालें
भद्रा पंचांग के 11 करणों में से एक, विष्टि करण का दूसरा नाम है। यह लगभग हर पक्ष में कुछ घंटों के लिए आती है। पौराणिक रूप से भद्रा को सूर्य देव की पुत्री और शनि देव की बहन कहा गया है, जिनका स्वभाव उग्र बताया गया है। इसी कारण भद्रा के समय मांगलिक कार्य आरंभ करना वर्जित माना जाता है। भद्रा कब कहाँ "वास" करती है, यह उस समय चंद्रमा की राशि से तय होता है। चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन में हो तो भद्रा पृथ्वी पर मानी जाती है और उसे सबसे अधिक टाला जाता है। भद्रा पर विस्तृत जानकारी हमारे भद्रा काल लेख में है।
भद्रा काल में प्रायः वर्जित: राखी बंधन, विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन, नया व्यापार आरंभ।
भद्रा काल में किए जा सकने वाले कार्य: दान-पुण्य, मंत्र जाप, शिव पूजा, और कोई भी आवश्यक चिकित्सा। बीमारी के इलाज को कभी मुहूर्त के लिए न टालें।
राखी के लिए नियम: परंपरा के अनुसार राखी भद्रा समाप्त होने के बाद ही बाँधी जाती है। रावण की बहन शूर्पणखा द्वारा भद्रा में राखी बाँधने की लोककथा इसी नियम के साथ सुनाई जाती है। पर ध्यान रखें, भाई-बहन का रिश्ता किसी एक क्षण से नहीं बनता या बिगड़ता। यदि अनजाने में गलत समय पर राखी बँध गई हो, तो डरने की कोई बात नहीं है।
रक्षाबंधन का धार्मिक महत्व
धार्मिक दृष्टि से: यह रक्षा और समर्पण का वचन है। राखी का धागा बहन की शुभकामनाओं का प्रतीक है। इसी दिन श्रावणी उपाकर्म और ऋषि तर्पण भी होते हैं, इसलिए यह पूर्णिमा स्वाध्याय और पूर्वजों के स्मरण से भी जुड़ी है।
सामाजिक दृष्टि से: यह वह दिन है जब विवाह के बाद दूर रह रही बहनें मायके आती हैं, और बिखरे परिवार एक जगह मिलते हैं। कई परिवारों में यही एक दिन होता है जब सारे भाई-बहन साथ बैठते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से: पूर्णिमा को चंद्रमा पूर्ण होता है, और चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए यह दिन भावनात्मक मेल-मिलाप के लिए अनुकूल माना जाता है। यहाँ एक स्पष्ट बात कहना ज़रूरी है: राखी बाँधने से कुंडली का कोई दोष समाप्त नहीं होता और कोई ग्रह शांत नहीं होता। यदि आपकी कुंडली में कोई विशेष चिंता है, तो उसके लिए अलग से कुंडली विश्लेषण करवाएँ। राखी को उसका विकल्प न समझें।
पाँच प्रचलित कथाएँ
रक्षाबंधन से कई कथाएँ जुड़ी हैं। इनमें कुछ पौराणिक हैं और कुछ ऐतिहासिक प्रसंग, जिनकी सत्यता पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। दोनों को अलग-अलग पहचानना अच्छा है।
1. देवी लक्ष्मी और राजा बलि की कथा
दानवराज बलि ने अपने यज्ञ में भगवान विष्णु के वामन अवतार को तीन पग भूमि दान की। वामन ने दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग नाप लिए, और तीसरा पग बलि ने अपने सिर पर रखवाया। विष्णु ने बलि को पाताल का राज्य दिया, और बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं उसके द्वारपाल बनकर पाताल में रहने का वचन दिया। वैकुंठ सूना हो गया। तब देवी लक्ष्मी साधारण स्त्री के रूप में बलि के पास गईं, उसे रक्षा सूत्र बाँधकर भाई बनाया, और उपहार के रूप में अपने पति को वापस माँग लिया। बलि ने वचन निभाया। "येन बद्धो बली राजा" मंत्र इसी कथा से जुड़ा है। सीख: सच्चा रिश्ता रक्त से नहीं, स्नेह और वचन से बनता है।
2. रानी कर्णावती और हुमायूँ की कथा
1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। प्रचलित कथा के अनुसार चित्तौड़ की राजमाता कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता माँगी, और हुमायूँ सेना लेकर निकला, पर समय पर पहुँच नहीं पाया। चित्तौड़ का पतन हुआ और रानी ने जौहर किया। यह प्रसंग बाद के वृत्तांतों से लोकप्रिय हुआ; उस समय के स्रोतों में राखी भेजने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, इसलिए इतिहासकार इसे सावधानी से देखते हैं। फिर भी यह कथा धर्म और राज्य की सीमाओं से ऊपर उठे वचन का प्रतीक बन गई।
3. यमुना और यमराज की कथा — यम द्वितीया का संबंध
यह कथा मूल रूप से भाई दूज की है, रक्षाबंधन की नहीं, पर दोनों पर्वों को साथ समझने में मदद करती है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए। यमुना ने उनका तिलक किया और भोजन कराया। प्रसन्न होकर यमराज ने वर दिया कि इस दिन जो भाई बहन के घर जाकर भोजन करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसीलिए कार्तिक की यह तिथि यम द्वितीया कहलाती है। कुछ क्षेत्रों में यह लोकमान्यता भी है कि यमुना ने यम को राखी बाँधी थी, पर शास्त्रीय रूप से यह कथा भाई दूज से जुड़ी है। दोनों पर्वों का अंतर नीचे तालिका में देखें।
4. द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण की कथा
लोकप्रिय कथा के अनुसार शिशुपाल वध के समय सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की उँगली कट गई। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर उँगली पर बाँध दिया। श्रीकृष्ण ने इस स्नेह का ऋण चुकाने का वचन दिया, और कौरव सभा में चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाई। यह प्रसंग मूल महाभारत की अपेक्षा लोक-परंपरा में अधिक प्रसिद्ध है, पर इसका संदेश स्पष्ट है: निःस्वार्थ सहायता और कृतज्ञता।
5. सिकंदर की पत्नी और राजा पुरु (पोरस) की कथा
इस कथा को अक्सर चंद्रगुप्त मौर्य से जोड़ दिया जाता है, पर प्रचलित रूप राजा पुरु (पोरस) का है। लोककथा के अनुसार 326 ईसा पूर्व में झेलम के युद्ध से पहले सिकंदर की पत्नी रोक्साना ने पुरु को राखी भेजी और अपने पति की रक्षा का वचन माँगा। कहा जाता है कि युद्ध में अवसर मिलने पर भी पुरु ने सिकंदर पर प्राणघातक वार नहीं किया। यूनानी इतिहासकारों के विवरण में राखी का कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए इसे इतिहास नहीं, लोककथा मानें। सीख: एक बार दिया गया वचन शत्रु के सामने भी निभाया जाता है।
रक्षाबंधन और भाई दूज में अंतर
दोनों पर्व भाई-बहन के हैं, इसलिए अक्सर उनकी कथाएँ और नियम आपस में मिल जाते हैं। यह तालिका दोनों को अलग करती है:
| बिंदु | रक्षाबंधन | भाई दूज (यम द्वितीया) |
|---|---|---|
| तिथि | श्रावण शुक्ल पूर्णिमा | कार्तिक शुक्ल द्वितीया, दीपावली के दो दिन बाद |
| मुख्य कर्म | बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है | बहन भाई का तिलक करती है और भोजन कराती है |
| कौन किसके घर | प्रायः बहन मायके आती है | परंपरा से भाई बहन के घर जाता है |
| मुख्य कथा | लक्ष्मी-बलि, इंद्राणी-इंद्र | यमुना-यमराज |
| समय का मुख्य नियम | भद्रा के बाद, अपराह्न या प्रदोष | अपराह्न में तिलक |
| उसी दिन के अन्य अनुष्ठान | श्रावणी उपाकर्म, नारली पूर्णिमा | यमुना स्नान, चित्रगुप्त पूजा |
राखी बाँधने की संपूर्ण विधि
राखी शुभ समय में बाँधें। चरणबद्ध विधि:
1. तैयारी:
- बहन स्नान करके साफ़ वस्त्र पहने; पूजा स्थान पर कुंकुम से स्वस्तिक बनाएँ; आसन पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएँ
- भाई भी स्नान कर साफ़ वस्त्र पहने, और सिर ढककर बैठे जहाँ यह प्रथा हो
2. थाली सज्जा: राखी, अक्षत, रोली या कुंकुम, मिठाई, दीपक और एक सिक्का थाली में रखें। चाहें तो पहले घर के इष्ट देव या भगवान विष्णु को राखी अर्पित करें।
3. भाई का स्वागत: भाई को पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके आसन पर बैठाएँ, तिलक लगाएँ, अक्षत लगाएँ और आरती करें।
4. राखी बंधन: "येन बद्धो बली राजा" मंत्र पढ़ते हुए भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बाँधें, फिर मिठाई खिलाएँ।
5. उपहार और आशीर्वाद: भाई बहन को उपहार दे। छोटे भाई-बहन बड़ों के चरण स्पर्श करें। जो बहनें राखी तक व्रत रखती हैं, वे इसके बाद भोजन करें।
राखी के प्रकार
राखी का असली मूल्य उसकी भावना में है, उसकी कीमत में नहीं। फिर भी परंपरा में कुछ रूप प्रचलित हैं:
- मौली या कलावा (लाल-पीला सूत) — सबसे पारंपरिक रक्षा सूत्र; पुरोहित भी यही बाँधते हैं
- कच्चे सूत या रेशम की सादी राखी — सात्विक, और बच्चों की कलाई के लिए सुरक्षित
- रुद्राक्ष राखी — शिव भक्त परिवारों में प्रिय; मनका असली हो तो बाद में माला या कंगन में भी उपयोग हो सकता है। असली रुद्राक्ष की पहचान के लिए हमारी प्रमाणित रुद्राक्ष श्रेणी देखें
- चाँदी या सोने की राखी — उपहार के रूप में टिकाऊ; इसका कोई अलग ज्योतिषीय फल नहीं है
- मोती या रत्न जड़ी राखी — सजावटी; रत्न धारण का निर्णय कुंडली देखकर ही लें, राखी में जड़ा रत्न उसका विकल्प नहीं
- बीज या इको राखी — बाद में गमले में बोई जा सकती है
- बच्चों की राखी — हल्की और बिना नुकीले भाग वाली चुनें
लोक-मान्यता में राशि के अनुसार रंग चुनने की प्रथा भी है, जैसे मेष, सिंह और धनु के लिए लाल। इसे अपनी पसंद का एक तरीका मानें, नियम नहीं। किसी भी रंग की राखी से भाई का अहित नहीं होता।
थाली सजावट और शुभ मंत्र
राखी बाँधते समय का प्रसिद्ध मंत्र:
"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् अनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥"
अर्थ — जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवराज बलि को बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधती हूँ। हे रक्षा सूत्र, तुम स्थिर रहना, विचलित मत होना।
विष्णु मंत्र:
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"
राखी बाँधते समय बहन अपने इष्ट देव का स्मरण करे और भाई के स्वास्थ्य और सुख की कामना करे। मंत्र याद न हो तो मन से की गई प्रार्थना भी पर्याप्त है। जो परिवार इस दिन विधिवत पूजा या रक्षा सूत्र अनुष्ठान करवाना चाहते हैं, वे हमारी ई-पूजा सेवा देख सकते हैं।
रक्षाबंधन के सात लाभ — और उनकी सीमा
रक्षाबंधन का लाभ मुख्यतः रिश्तों और मन पर है। इसे कोई चमत्कारी उपाय बताना ठीक नहीं होगा:
- रिश्ते का नवीकरण — साल में एक दिन जब भाई-बहन जानबूझकर एक-दूसरे के लिए समय निकालते हैं
- परिवार का मिलन — विवाहित बहनों का मायके आना और कई पीढ़ियों का एक जगह मिलना
- वचन की याद — भाई का संकल्प कि वह बहन के कठिन समय में साथ खड़ा होगा, चाहे वह आर्थिक हो या भावनात्मक
- बच्चों को संस्कार — बच्चे देखते हैं कि रिश्ते निभाए जाते हैं, केवल माने नहीं जाते
- पुराने मनमुटाव मिटाने का अवसर — राखी भेजना अक्सर बातचीत फिर शुरू करने का सबसे सहज बहाना होता है
- श्रावणी उपाकर्म और तर्पण — जिन परिवारों में यह परंपरा है, उनके लिए स्वाध्याय और पूर्वजों के स्मरण का दिन
- मन की शांति — पूर्णिमा पर पूजा, मंत्र और परिवार का साथ मन को स्थिर करता है
क्या नहीं होता: राखी किसी ग्रह-दोष, मांगलिक दोष या पितृ दोष का निवारण नहीं है, और यह किसी की आयु या व्यापार की गारंटी नहीं देती। यदि परिवार में कोई गंभीर चिंता है, जैसे स्वास्थ्य, विवाह या आर्थिक संकट, तो उसके लिए उचित विशेषज्ञ से बात करें। ज्योतिषीय प्रश्न के लिए परामर्श बुक करें, और स्वास्थ्य के लिए पहले डॉक्टर से मिलें।
सावधानियाँ और नियम
- भद्रा काल में राखी न बाँधें — परंपरा का सबसे प्रमुख नियम
- मुहूर्त अपने शहर के पंचांग से देखें — दूसरे शहर का समय आपके लिए गलत हो सकता है
- दिशा — भाई का मुख पूर्व या उत्तर दिशा में हो
- हर वर्ष नई राखी — पिछले वर्ष की राखी दोबारा न बाँधें
- राखी का विसर्जन — कुछ दिन बाद या जन्माष्टमी तक पहनकर उतारें; किसी पेड़ की जड़ में रखें या बहते जल में प्रवाहित करें; प्लास्टिक वाली राखी कूड़े में अलग से डालें, नदी में नहीं
- काली राखी — परंपरा में शुभ कार्यों में काला रंग टाला जाता है
- दूर रह रहे भाई — डाक से राखी भेजें, या वीडियो कॉल पर साथ बैठकर बँधवाएँ; भाव वही रहता है
- व्रत और स्वास्थ्य — कई बहनें राखी बाँधने तक कुछ नहीं खातीं। मधुमेह, गर्भावस्था, कम रक्तचाप या नियमित दवा लेने वाली बहनें डॉक्टर की सलाह के बिना निर्जल व्रत न रखें; पानी और फल लेकर भी पूजा पूरी मानी जाती है
- क्रोध का त्याग — शांत मन और प्रेम से राखी बाँधें
रक्षाबंधन के बाद श्रावण के अन्य पर्व, जैसे हरियाली तीज और कजरी तीज, भी परिवार और व्रत की इसी परंपरा से जुड़े हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यदि बहन के पास भाई नहीं तो वह क्या करे?
जिन बहनों के भाई नहीं हैं, वे चचेरे-ममेरे भाई, किसी मित्र या सम्मानित पुरुष को राखी बाँध सकती हैं, या भगवान (विशेषकर श्रीकृष्ण) को राखी अर्पित कर सकती हैं। यह पूरी तरह स्वीकार्य है।
क्या बहन अपनी बहन को राखी बाँध सकती है?
हाँ। कई परिवारों में बहनें एक-दूसरे को राखी बाँधती हैं, और भाभी को "लुंबा राखी" बाँधने की प्रथा भी है। रक्षा का वचन किसी लिंग तक सीमित नहीं।
क्या पति-पत्नी राखी बाँध सकते हैं?
भाई-बहन वाली राखी पति-पत्नी के बीच नहीं बाँधी जाती। पर रक्षा सूत्र अलग बात है: भविष्य पुराण की कथा में इंद्राणी ने अपने पति इंद्र को रक्षा सूत्र बाँधा था। इसलिए पत्नी पूजा के बाद पति की कलाई पर कलावा बाँध सकती है।
राखी कब उतारें?
स्थानीय परंपरा के अनुसार कुछ दिन, या जन्माष्टमी तक पहनें, फिर किसी पेड़ की जड़ में रखें या बहते जल में प्रवाहित करें। प्लास्टिक वाली राखी नदी में न डालें। पुरानी राखी को अपमानजनक ढंग से न फेंकें।
क्या भद्रा काल में राखी बाँध सकते हैं?
परंपरा के अनुसार नहीं। भद्रा समाप्त होने के बाद, जब तक पूर्णिमा रहे, अपराह्न या प्रदोष काल में राखी बाँधें। सटीक समय हर वर्ष और हर शहर के लिए अलग होता है, इसलिए अपने स्थान का पंचांग देखें।
क्या पिता-पुत्र राखी बाँध सकते हैं?
भाई-बहन वाली राखी की प्रथा पिता-पुत्र में नहीं है। पर पूजा के बाद परिवार का कोई भी बड़ा सदस्य या पुरोहित रक्षा सूत्र (कलावा) बाँध सकता है; यह पुरानी परंपरा है।
रक्षाबंधन और भाई दूज में क्या अंतर है?
रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को होता है और इसमें बहन राखी बाँधती है। भाई दूज कार्तिक शुक्ल द्वितीया को, दीपावली के दो दिन बाद होता है, और इसमें बहन तिलक करके भाई को भोजन कराती है। यमुना-यमराज की कथा भाई दूज की है।
निष्कर्ष — रक्षाबंधन का संदेश
रक्षाबंधन सिखाता है कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि स्नेह, विश्वास और कर्तव्य से बनते हैं। आज जब परिवार अलग-अलग शहरों में बँट गए हैं, यह पर्व याद दिलाता है कि —
- अपनों का साथ निभाना सबसे बड़ा धर्म है
- छोटी रस्में रिश्तों को जीवित रखती हैं
- बहन की शुभकामना और भाई का वचन, दोनों का मूल्य है
- मुहूर्त का पालन अच्छा है, पर भाव उससे बड़ा है
मुहूर्त अपने शहर के पंचांग से देखें, भद्रा का ध्यान रखें, और राखी शांत मन से बाँधें।
शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली
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Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.