✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।
कजरी तीज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला एक अत्यंत भावपूर्ण व्रत है, जो विशेष रूप से नवविवाहिता और सुहागिन महिलाओं के लिए अनिवार्य माना जाता है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान के गाँवों में यह त्यौहार सावन की बेला में नारी-हृदय की विरह-वेदना और मायके की याद को मूर्त रूप देता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम कजरी तीज 2026 की तिथि, मुहूर्त, कथा, पूजा विधि, सरगी, 16 श्रृंगार, मंत्र, कजरी गीतों का इतिहास, फायदे, सावधानियों और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों पर गहराई से चर्चा करेंगे।
विषय सूची (Table of Contents)
- कजरी तीज क्या है — परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- कजरी तीज 2026 — तिथि और शुभ मुहूर्त
- कजरी तीज का धार्मिक, सांस्कृतिक और ज्योतिषीय महत्व
- कजरी तीज की पौराणिक कथा और लोक-परंपरा
- सरगी — मायके से सुहाग का पहला उपहार
- संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
- कजरी गीत — विरह की मधुर अभिव्यक्ति
- 16 श्रृंगार और मंत्र — सुहाग का प्रतीक
- व्रत के फायदे और लाभ
- सावधानियां, नियम और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कजरी तीज क्या है — परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कजरी तीज भारत के उत्तरी और मध्य भूभाग का एक अत्यंत लोकप्रिय सुहाग-व्रत है। "कजरी" शब्द संस्कृत के "कज्जल" अर्थात् काजल से निकला है — जो नेत्रों की सुंदरता और प्रेम की निशानी है। "तीज" तृतीया तिथि का सूचक है, इसलिए इस त्यौहार का शाब्दिक अर्थ है — "तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला कजरी पर्व"। लोक-परंपरा में इसे "बड़ी तीज" या "कजरी तीज" के नाम से भी जाना जाता है।
भौगोलिक प्रसार:
- उत्तर प्रदेश — अवध और बुंदेलखंड क्षेत्र में सबसे अधिक प्रचलित
- मध्य प्रदेश — मालवा और बुंदेलखंड में विशेष धूमधाम
- बिहार — भोजपुरी और मिथिलांचल क्षेत्र में कजरी गीतों की समृद्ध परंपरा
- राजस्थान — दक्षिणी राजस्थान में सीमित रूप में मनाया जाता है
- छत्तीसगढ़ — स्थानीय बोली में "कजरिया" के नाम से प्रसिद्ध
कौन मनाता है: कजरी तीज मुख्य रूप से सुहागिन और नवविवाहिता स्त्रियाँ मनाती हैं। कुंवारी कन्याएँ भी मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रख सकती हैं। पुरुष इसे नहीं रखते, परंतु पति अपनी पत्नी के लिए उपहार और सरगी की व्यवस्था कर अवश्य भाग लेते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: कजरी तीज का इतिहास लगभग 1500 वर्षों से अधिक पुराना माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में "कज्जल-व्रत" के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी और कवि वृंद जैसे भाषा-सेवियों ने कजरी गीतों को साहित्यिक रूप दिया। ब्रज, अवधी और भोजपुरी में रचित सैकड़ों कजरी गीत आज भी लोक-संगीत का अभिन्न अंग हैं।
कजरी तीज 2026 — तिथि और शुभ मुहूर्त
तिथि: भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया — 4 सितम्बर 2026 (शुक्रवार)
| अवधि | समय |
|---|---|
| तृतीया तिथि आरंभ | 3 सितम्बर 2026, रात्रि 9:47 बजे |
| तृतीया तिथि समाप्ति | 4 सितम्बर 2026, रात्रि 8:24 बजे |
| प्रातः मुहूर्त (पूजा का सर्वोत्तम समय) | प्रातः 6:12 से 8:45 बजे तक |
| अभिजित मुहूर्त | दोपहर 12:03 से 12:51 बजे तक |
| सरगी ग्रहण समय | 4 सितम्बर 2026, प्रातः 5:30 बजे से पूर्व |
| व्रत पारण | 5 सितम्बर 2026, प्रातः 6:00 बजे के बाद |
महत्वपूर्ण: सरगी का भोग 4 सितम्बर को सूर्योदय से पहले ही कर लेना चाहिए। सरगी पारिवारिक सुहाग की पहली सीढ़ी मानी जाती है — इसे सास अपनी बहू को भेजती हैं या बहू मायके से मंगवाती हैं। पंचांग के अनुसार शाम को चंद्र दर्शन करना भी शुभ रहेगा।
कजरी तीज का धार्मिक, सांस्कृतिक और ज्योतिषीय महत्व
धार्मिक दृष्टि से:
- पति की दीर्घायु और अटूट सुहाग की प्राप्ति
- माँ पार्वती और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है
- विवाहित जीवन में आने वाले विघ्न-बाधाओं का निवारण
- कुंडली के सप्तम भाव (वैवाहिक स्थिति) का बल मिलता है
सांस्कृतिक दृष्टि से:
- कजरी तीज भारतीय नारी की विरह-भावना और ममता का सबसे सुंदर प्रतीक है
- "कजरी गीतों" के माध्यम से लोक-संस्कृति, लोक-भाषा और लोक-संगीत का संरक्षण
- मायके और ससुराल के रिश्तों को नया आयाम मिलता है
- स्त्री-सशक्तिकरण और भावनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम
ज्योतिषीय दृष्टि से:
- भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष तृतीया को चंद्रमा सिंह राशि में भ्रमण करता है — हृदय में प्रेम और करुणा प्रबल रहती है
- तृतीया तिथि पर ब्रह्मा की पूजा का विधान है — सृजन, सौंदर्य और कला का बल
- शुक्र ग्रह की स्थिति अनुसार दांपत्य जीवन में मधुरता
- इस दिन भगवान शिव की कृपा से सप्तम भाव के अशुभ योग शमन होते हैं
कजरी तीज की पौराणिक कथा और लोक-परंपरा
कजरी तीज से जुड़ी एक सुंदर लोक-कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार, अत्यंत सुंदर कन्या "कजरी" का विवाह बहुत छोटी आयु में एक धनी परिवार में हो गया। विवाह के कुछ मास बाद ही उसे अपने मायके से बहुत दूर, ससुराल भेज दिया गया। सावन का महीना था — बारिश की बूँदें गिर रही थीं, कोयल कुहक रही थी, और कजरी अपनी सखियों के बीच मायके की याद में विह्वल हो उठती।
सखियों ने उसे सहारा दिया और गीत गाकर उसका मन बहलाया। इन्हीं गीतों में "कजरी" ने अपनी वेदना, प्रेम और मायके की याद को शब्द दिए। धीरे-धीरे ये गीत "कजरी गीत" के नाम से प्रसिद्ध हुए और कजरी तीज पर गाए जाने लगे। कालांतर में यह त्यौहार सुहागिन स्त्रियों के लिए पति की लंबी आयु और मायके के सुख की प्रार्थना का पर्व बन गया।
कथा का संदेश: यह कथा हमें सिखाती है कि भारतीय नारी का हृदय अत्यंत कोमल और समर्पित होता है। वह अपने पति के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हुए भी माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति अपने कर्तव्य से कभी विमुख नहीं होती। कजरी तीज हमें संयुक्त परिवार की सुंदरता और महिलाओं के बहुआयामी कर्तव्यों का स्मरण कराती है।
लोक-परंपरा: परंपरा के अनुसार कजरी तीज पर महिलाएँ एक साथ इकट्ठी होकर कजरी गीत गाती हैं, झूला डालती हैं, और कजरी-भोज (विशेष व्यंजन जैसे खीर, पूड़ी, हलवा) बनाकर एक-दूसरे को परोसती हैं। कुछ क्षेत्रों में यह त्यौहार "कजरिया" के नाम से भी जाना जाता है।
सरगी — मायके से सुहाग का पहला उपहार
कजरी तीज की सबसे भावपूर्ण परंपरा है "सरगी"। सरगी का अर्थ है — व्रत से पूर्व का भोजन जो सास या माँ अपनी बहू/बेटी को भेजती हैं। यह भोजन प्रातःकाल (सूर्योदय से पहले) कराया जाता है, ताकि व्रत का आरंभ शुभ और पोषित हो।
सरगी में शामिल वस्तुएँ:
- हलवा, पूड़ी, खीर, मीठी सेव, लड्डू
- मेवे — काजू, बादाम, पिस्ता, अखरोट
- फल — केला, सेब, अनार, अमरूद
- सौंदर्य सामग्री — मेहंदी, सिंदूर, कुंकुम, बिंदी, चूड़ियाँ, कंगन
- नारियल, मिठाई, पान के पत्ते
- कच्चा दूध या खीर (विशेष रूप से)
- 16 श्रृंगार की सामग्री (लाल चुनरी, सुहाग की चूड़ियाँ)
सरगी की परंपरा: लोक-मान्यता है कि जिस घर में सरगी भेजी जाती है, वहाँ सुहाग का आशीर्वाद सदा बना रहता है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में मायके से सरगी आने पर बहू आँगन में नंगे पैर नहीं जाती — वह सिंदूर और कुंकुम लगाकर, दीये की रोशनी में सरगी ग्रहण करती है।
संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
कजरी तीज की पूजा सरल और भावपूर्ण होती है। यहाँ चरणबद्ध विधि दी जा रही है:
चरण 1 — प्रातःकाल (सरगी ग्रहण):
- ब्रह्म मुहूर्त (4:30 बजे) में उठें
- स्नान करें और शुद्ध वस्त्र धारण करें
- सास या माँ से प्राप्त सरगी का भोग लगाएं
- मन में संकल्प लें: "मैं भगवान शिव-माँ पार्वती की पूजा अपने सुहाग की रक्षा हेतु कर रही हूँ"
चरण 2 — पूजा स्थल की सज्जा:
- घर के पूजा-स्थल या आँगन को साफ करें
- लाल कपड़ा बिछाएं
- गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें
- माँ पार्वती और भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर रखें
- दीपक जलाएं और अगरबत्ती जलाएं
चरण 3 — पूजा सामग्री:
- नारियल, सुपारी, लौंग, इलायची
- रोली, मौली, चंदन, कुंकुम
- लाल और पीले फूल (गेंदा, गुलाब, अशोक)
- बेलपत्र, आम के पत्ते, धतूरा
- पान के पत्ते, सुपारी
- मिठाई, फल, खीर का भोग
- अक्षत (चावल), हल्दी, कुमकुम
चरण 4 — गणेश-गौरी पूजा:
- सर्वप्रथम गणेश जी का पूजन करें — "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र से
- माँ पार्वती (गौरी जी) का आवाहन करें
- भगवान शिव का स्मरण करें
- कलश स्थापित करें — जल से भरी कलश में सुपारी, सिक्का और आम के पत्ते रखें
चरण 5 — षोडशोपचार पूजा:
- आवाहन — गौरी जी का आह्वान
- आसन — पीठ के नीचे पीले फूल रखें
- पाद्य — चरणों में जल अर्पित करें
- अर्घ्य — हाथों में जल दें
- आचमन — मुख शुद्धि हेतु जल
- स्नान — पंचामृत से स्नान कराएं
- वस्त्र — लाल चुनरी अर्पित करें
- सौभाग्य सूत्र — मौली बाँधें
- चंदन, कुंकुम, रोली — तिलक लगाएं
- फूल-माला — पहनाएं
- धूप-दीपक — जलाएं
- नैवेद्य — खीर, हलवा, फल अर्पित करें
- आचमन — पुनः जल दें
- पान के पत्ते — सुपारी, चूना, कत्था सहित
- आरती — माँ गौरी की आरती करें
- प्रार्थना — हाथ जोड़कर मनोवांछित फल की कामना करें
चरण 6 — कथा व कजरी गायन:
- कजरी तीज की कथा सुनें या स्वयं पढ़ें
- सखियों के साथ मिलकर कजरी गीत गाएं
- मन में पति की लंबी आयु की कामना करें
चरण 7 — व्रत पारण:
- अगले दिन प्रातःकाल स्नान करें
- माँ गौरी की पुनः पूजा करें
- भोग लगाएं और व्रत का पारण करें
- सास, ननद और परिवार की बड़ी स्त्रियों का आशीर्वाद लें
कजरी गीत — विरह की मधुर अभिव्यक्ति
कजरी गीत भारतीय लोक-संगीत का अनुपम वरदान हैं। ये गीत ब्रज, अवधी, भोजपुरी, बुंदेली और मालवी बोलियों में रचे गए हैं। कजरी गीतों में मुख्य रूप से निम्न विषय आते हैं:
1. मायके की याद: "बरसन लागी बदरिया, सावन गयो रे पिया के देश... मोरे अँगना में कदम की छाँव न आवे, सूनो घर मन बेचैन..."
2. पति के प्रति समर्पण: "सजनी रे, मेरा साँवरिया सावन में आवे... हरी-हरी डोली सजाऊँ, हार पहराऊँ, मंगल गाऊँ..."
3. सास-ससुर की सेवा: "सास जी हमारी धर्म माता, कहूँ कैसे बखानूँ... आँगन में सूरज उगे तो, पहले उनको प्रणाम करूँ..."
4. विरह-वेदना: "कजरी गाऊँ, कजरी सुनाऊँ, बिरहा की ज्वाल जलाऊँ... सजनी रे, बिन पिया के रैना, कैसे काटूँ, कैसे बिताऊँ..."
5. माँ से मिलन की आस: "माई रे, बुलावा भेजो मोरे, तेरी दुलारी आवे... फाग खेलन को मन चाहे, सावन में तेरे गाँव आवे..."
6. सुहाग का गीत: "सुहागिन के नैनन में काजल, काजल से भी काली रात... पिया मिलन की आस लगाए, सजनी रे, कब आएगी बात..."
कजरी गीतों का सांस्कृतिक महत्व: कजरी गीतों ने भारतीय लोक-साहित्य, संगीत और नृत्य को समृद्ध किया है। कथक, ब्रज और लोक-नृत्य में कजरी गीतों का प्रयोग आज भी होता है। ये गीत स्त्री-हृदय की कोमलता, त्याग, प्रेम और समर्पण की अमूल्य निधि हैं।
16 श्रृंगार और मंत्र — सुहाग का प्रतीक
कजरी तीज पर 16 श्रृंगार का विशेष महत्व है। यह सुहागिन स्त्री की पहचान और उसके पति के प्रति समर्पण का प्रतीक है:
- स्नान — गंगाजल से शुद्धता
- वस्त्र — लाल चुनरी या पीली साड़ी
- सिंदूर — माँग में
- कुंकुम — माथे पर
- मेहंदी — हाथ-पैर पर
- बिंदी — माथे पर
- आँखों में काजल — सौंदर्य
- होंठों पर लाली — प्यार
- नथ/नाक की अँगूठी — आभूषण
- कर्णफूल/बाली — कान में
- चूड़ियाँ — हाथों में (लाल या हरी)
- कंगन — कलाई पर
- पायल — पैरों में
- बाजूबंद — भुजाओं पर
- हार/मंगलसूत्र — गले में
- इत्र/अत्तर — सुगंध
शुभ मंत्र:
- ॐ गौरि सुताय नमः (माँ गौरी की संतान रूप में पूजा)
- ॐ पार्वत्यै नमः
- ॐ ह्रीं श्रीं गौरि नमः
- ॐ नमः शिवाय शिवायै नमः (संयुक्त मंत्र)
- ॐ गं गणपतये नमः (गणेश जी का मंत्र)
- ॐ सौभाग्य दे देवि माँ गौरी (स्तुति मंत्र)
जाप विधि:
- 108 माला पर 11 बार या 21 बार "ॐ गौरि सुताय नमः" का जाप
- सवेरे ब्रह्म मुहूर्त में जाप सर्वोत्तम
- व्रत के दिन कम से कम 108 बार मंत्र जाप अवश्य करें
- शाम को दीपक जलाकर 11 बार मंत्र का उच्चारण
व्रत के फायदे और लाभ
कजरी तीज का व्रत रखने से अनेक लाभ बताए गए हैं:
- सुहाग की रक्षा — पति का अटूट सुहाग और दीर्घायु प्राप्त होती है
- दांपत्य सुख — पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और सद्भावना बढ़ती है
- संतान सुख — मनोवांछित संतान की प्राप्ति होती है
- पति की आयु वृद्धि — पति की दीर्घायु और स्वास्थ्य की कामना पूर्ण होती है
- कुंडली का सप्तम भाव बलवान — ज्योतिषीय दृष्टि से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है
- मानसिक शांति — मन की एकाग्रता, धैर्य और सहनशीलता बढ़ती है
- माता-पिता का आशीर्वाद — मायके से सरगी के माध्यम से माँ-बाप का प्यार मिलता है
- लोक-संस्कृति का संरक्षण — कजरी गीतों को गाने-सुनने से भारतीय संस्कृति का संरक्षण होता है
सावधानियां, नियम और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
व्रत के नियम:
- निर्जला व्रत (बिना जल) रखना सर्वोत्तम — सरगी के बाद जल ग्रहण न करें
- यदि स्वास्थ्य कारण से असम्भव हो तो एक समय फलाहार करें
- दिनभर मन में शिव-माँ पार्वती का स्मरण रखें
- क्रोध, असत्य, निंदा का त्याग करें
- सात्विक भोजन ही ग्रहण करें (पारण में)
विशेष सावधानियां:
- विधवा महिलाएं इस व्रत को न रखें — शास्त्रानुसार यह सुहागिन स्त्रियों का व्रत है
- रजस्वला स्त्रियाँ इस व्रत को नहीं रखतीं — वे अगली तीज (हरितालिका) को व्रत कर सकती हैं
- मासिक धर्म के दौरान पूजा स्थगित रखें
- मांस, मदिरा, तामसिक भोजन का सेवन वर्जित
- व्रत के दिन सिलाई-कढ़ाई, क्रोध और झूठ से बचें
- गर्भवती महिलाएं चिकित्सक से परामर्श लेकर ही व्रत करें
ज्योतिषीय सावधानी:
- व्रत से पूर्व कुंडली में सप्तम भाव और शुक्र की स्थिति देखें
- यदि कुंडली में शुक्र पीड़ित है तो अतिरिक्त उपाय करें
- मंगल दोष हो तो पति के साथ संयुक्त रूप से पूजा करें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या विधवा महिलाएं कजरी तीज का व्रत रख सकती हैं? नहीं, कजरी तीज सुहागिन स्त्रियों का व्रत है। विधवा महिलाएं इस व्रत को न रखें, किंतु माँ पार्वती की सामान्य पूजा और भजन-कीर्तन कर सकती हैं।
क्या कजरी तीज और हरितालिका तीज अलग-अलग हैं? हाँ, दोनों अलग-अलग त्यौहार हैं। कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया को और हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। कजरी तीज में कजरी गीत गाने की परंपरा है, जबकि हरितालिका में निर्जला व्रत और शिव-पार्वती की पूजा होती है।
सरगी क्या है और कौन भेजता है? सरगी व्रत से पूर्व का भोजन है जो प्रातःकाल सास अपनी बहू को या माँ अपनी बेटी को भेजती हैं। इसमें मिठाई, हलवा, फल, मेवे और सुहाग की सामग्री होती है।
क्या सास को सरगी भेजनी चाहिए या मायके से आनी चाहिए? परंपरा अनुसार दोनों ही शुभ हैं। कुछ क्षेत्रों में सास सरगी भेजती हैं तो कुछ क्षेत्रों में बहू मायके से मँगवाती है। कहीं-कहीं दोनों ओर से सरगी आती है — यह पारिवारिक प्रेम का सबसे सुंदर रूप है।
क्या कजरी तीज के दिन मायके जाना शुभ है? कजरी तीज के एक-दो दिन बाद मायके जाने की परंपरा है — इसे "कजरिया-भात" या "मायके-भोज" कहते हैं। यह विशेष रूप से नवविवाहिता स्त्रियों के लिए शुभ माना जाता है।
क्या पूजा के दौरान कजरी गीत गा सकते हैं? हाँ, पूजा के बाद कजरी गीत गाना इस त्यौहार की मुख्य परंपरा है। सखियों के साथ मिलकर कजरी गीत गाए जाते हैं। यह पूजा का ही हिस्सा माना जाता है।
कजरी तीज केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि भारतीय नारी के हृदय की सबसे मधुर अभिव्यक्ति है। यह त्यौहार हमें सिखाता है कि सच्चे सुहाग में सेवा, समर्पण, धैर्य और प्रेम — चारों आवश्यक हैं। कजरी गीतों के माध्यम से भारतीय संस्कृति ने स्त्री-भावनाओं को सदियों तक सहेजकर रखा है। इस व्रत को विधिपूर्वक और पूर्ण श्रद्धा से रखने से निश्चित ही वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और सद्भावना की प्राप्ति होती है।
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Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.