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जानिए कजरी तीज का महत्व , पूजा विधि , लाभ एवं उपाय

# जानिए कजरी तीज का महत्व , पूजा विधि , लाभ एवं उपाय - Kajri Teej - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **जानिए कजरी तीज का महत्व , पूजा विधि , लाभ एवं उपाय** — यह विषय मेरे पास रोजाना सैकड

7 July 2026 19 min read|By Nidhi Shrimali

लेखिका: निधि श्रीमाली, प्रमुख ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली

कजरी तीज (कजली तीज) भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला सुहाग का व्रत है, जो रक्षाबंधन के लगभग तीन दिन बाद आता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में यह कजरी गीतों और झूलों का पर्व है, तो राजस्थान में इसे सातुड़ी तीज या बड़ी तीज कहते हैं, जहाँ सत्तू, नीमड़ी माता की पूजा और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा है। इस लेख में कजरी तीज का अर्थ, हर साल इसकी तिथि जानने का तरीका, कथा, पूजा विधि, क्षेत्र के अनुसार परंपराएँ, कजरी गीत, सोलह श्रृंगार, मंत्र, व्रत के नियम और सीमाएँ दी गई हैं।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. कजरी तीज क्या है — परिचय और पृष्ठभूमि
  2. कजरी तीज 2026 — तिथि और हर साल तिथि कैसे जानें
  3. कजरी तीज का धार्मिक, सांस्कृतिक और ज्योतिषीय महत्व
  4. कजरी तीज की कथा और लोक-परंपरा
  5. उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में कजरी तीज — तुलना
  6. सरगी, सिंजारा और सत्तू — व्रत से पहले की परंपरा
  7. संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
  8. कजरी गीत — विरह की मधुर अभिव्यक्ति
  9. 16 श्रृंगार और मंत्र
  10. व्रत के लाभ — परंपरा और सीमा
  11. सावधानियां, नियम और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कजरी तीज क्या है — परिचय और पृष्ठभूमि

कजरी तीज उत्तर और मध्य भारत का एक लोकप्रिय सुहाग-व्रत है। "कजरी" शब्द को आम तौर पर "कज्जल" यानी काजल से जोड़ा जाता है, और कुछ लोग इसे सावन-भादों के काले बादलों से भी जोड़ते हैं। "तीज" तृतीया तिथि को कहते हैं। राजस्थान में इसे कजली तीज, सातुड़ी तीज और बड़ी तीज भी कहा जाता है, क्योंकि सावन की हरियाली तीज को वहाँ छोटी तीज कहते हैं।

कहाँ मनाई जाती है:

  • पूर्वी उत्तर प्रदेश — मिर्ज़ापुर और बनारस की कजरी गायकी विशेष रूप से प्रसिद्ध है
  • बिहार — भोजपुरी क्षेत्र में कजरी गीतों की समृद्ध परंपरा
  • राजस्थान — सातुड़ी तीज के रूप में बड़े पैमाने पर; बूंदी का कजली तीज मेला प्रसिद्ध है
  • मध्य प्रदेश — विशेषकर उत्तर प्रदेश और राजस्थान से लगे क्षेत्रों में

कौन मनाता है: कजरी तीज मुख्य रूप से सुहागिन और नवविवाहिता स्त्रियाँ मनाती हैं। कई परिवारों में कुंवारी कन्याएँ भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं। पुरुष आम तौर पर व्रत नहीं रखते, पर पूजा, उपहार और मेले में परिवार साथ रहता है।

पृष्ठभूमि: कजरी एक लोक-परंपरा है, जो गाँवों में स्त्रियों के गीतों, झूलों और मेलों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आई है। इसकी शुरुआत की कोई निश्चित तारीख या किसी प्राचीन ग्रंथ में इसका पक्का उल्लेख बताना कठिन है, इसलिए यहाँ ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है। इतना निश्चित है कि कजरी गायन उत्तर प्रदेश और बिहार की लोक और उप-शास्त्रीय संगीत परंपरा का जाना-माना हिस्सा है।

कजरी तीज 2026 — तिथि और हर साल तिथि कैसे जानें

सुधार सूचना: इस पृष्ठ पर पहले कजरी तीज 2026 की तिथि 4 सितम्बर लिखी थी, साथ में मिनट तक के समय भी थे। 2026 में अधिक मास होने से सावन और भादों देर से पड़े, इसलिए वह तिथि और समय भरोसेमंद नहीं थे और हटा दिए गए हैं। कजरी तीज 2026 बीत चुकी है; यह अगस्त के अंत के आसपास, रक्षाबंधन के लगभग तीन दिन बाद पड़ी थी। अगले वर्ष की सही तिथि और समय अपने शहर के पंचांग से देखें, क्योंकि सूर्योदय और तिथि का समय हर शहर में अलग होता है।

हर साल कजरी तीज की तिथि आसानी से पहचानने के लिए यह क्रम याद रखें:

पर्वतिथि (पूर्णिमांत पंचांग)कजरी तीज से संबंध
हरियाली तीजश्रावण शुक्ल तृतीयाकजरी तीज से लगभग 15 दिन पहले
रक्षाबंधनश्रावण पूर्णिमाकजरी तीज से लगभग 3 दिन पहले
कजरी तीजभाद्रपद कृष्ण तृतीयाअमांत पंचांग (गुजरात, महाराष्ट्र आदि) में यही दिन श्रावण कृष्ण तृतीया कहलाता है
हरतालिका तीजभाद्रपद शुक्ल तृतीयाकजरी तीज से लगभग 15 दिन बाद, गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले

तृतीया किस दिन मानें: सामान्य नियम यह है कि जिस दिन सूर्योदय के समय तृतीया हो, उसी दिन व्रत रखा जाता है। राजस्थान की सातुड़ी तीज में चंद्रोदय का समय भी देखा जाता है, क्योंकि व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देकर खुलता है। जिस वर्ष तिथि दो दिनों में बँटी हो, उस वर्ष स्थानीय पंचांग या घर के पुरोहित की बात मानें।

कजरी तीज का धार्मिक, सांस्कृतिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक दृष्टि से:

  • पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना
  • माँ पार्वती (गौरी) और भगवान शिव की उपासना
  • राजस्थान में नीमड़ी माता के रूप में देवी की पूजा
  • परिवार के साथ मिलकर व्रत और पूजा की परंपरा

सांस्कृतिक दृष्टि से:

  • कजरी गीत स्त्रियों की भावनाओं, मायके की याद और वर्षा ऋतु के सौंदर्य को स्वर देते हैं
  • लोक-भाषा, लोक-संगीत और झूलों की परंपरा का संरक्षण
  • मायके और ससुराल के बीच उपहार और मेल-मिलाप का अवसर
  • सखियों और परिवार की स्त्रियों के साथ मिलने-जुलने का दिन

ज्योतिषीय दृष्टि से:

  • तृतीया तिथि की अधिष्ठात्री देवी गौरी मानी जाती हैं, इसीलिए तीनों तीज गौरी-उपासना के दिन हैं
  • सुहाग के व्रतों को परंपरा में शुक्र (दांपत्य) और सप्तम भाव से जोड़ा जाता है
  • कुंडली में विवाह से जुड़ा कोई योग है या नहीं, यह व्रत से नहीं, पूरी कुंडली देखकर तय होता है; इसके लिए कुंडली विश्लेषण उचित रास्ता है
  • व्रत एक भक्ति साधना है, कुंडली के किसी योग का "पक्का इलाज" नहीं

कजरी तीज की कथा और लोक-परंपरा

कजरी तीज से कई लोक-कथाएँ जुड़ी हैं और हर क्षेत्र में कथा थोड़ी अलग सुनाई जाती है। ये लोक-कथाएँ हैं, किसी पुराण से ली गई नहीं।

कजरी की कथा (पूर्वी उत्तर प्रदेश): एक प्रचलित कथा में "कजरी" नाम की युवती का विवाह दूर के गाँव में होता है। सावन-भादों की बारिश में उसे मायके की बहुत याद आती है, और सखियाँ उसका मन बहलाने के लिए गीत गाती हैं। माना जाता है कि ऐसे ही गीत आगे चलकर "कजरी" कहलाए। कथा का भाव यह है कि स्त्री नए घर को अपनाते हुए भी मायके से जुड़ी रहती है, और यह पर्व दोनों रिश्तों का सम्मान करता है।

सातुड़ी तीज की कथा (राजस्थान): राजस्थान में व्रत के दिन स्त्रियाँ नीमड़ी माता की कथा सुनती हैं। कथा के कई रूप हैं, जिनमें सामान्य रूप से एक गरीब ब्राह्मण परिवार की स्त्री की श्रद्धा से सत्तू का भोग लगाने और देवी की कृपा का प्रसंग आता है। अपने परिवार की बड़ी स्त्रियों से जो कथा सुनी हो, वही कहना सबसे उचित है।

लोक-परंपरा: इस दिन स्त्रियाँ एक साथ इकट्ठी होकर कजरी गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं, मेहंदी लगाती हैं और विशेष पकवान बनाती हैं। कई क्षेत्रों में रात भर गीत गाने (रतजगा) की भी परंपरा है।

उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में कजरी तीज — तुलना

एक ही तिथि का पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग ढंग से मनाया जाता है। अगर आप शादी के बाद किसी दूसरे क्षेत्र के परिवार में गई हैं, तो यह तालिका दोनों परंपराओं को समझने में मदद करेगी:

बिंदुपूर्वी उत्तर प्रदेश (मिर्ज़ापुर, बनारस)बिहार (भोजपुरी क्षेत्र)राजस्थान
प्रचलित नामकजरी तीजकजरी तीजकजली तीज, सातुड़ी तीज, बड़ी तीज
मुख्य पहचानकजरी गायन, झूले, स्त्रियों की टोली में गीतकजरी गीत, झूला, सुहाग का व्रतसत्तू, नीमड़ी माता की पूजा, बूंदी का मेला
किसकी पूजागौरी-शिवगौरी-शिवनीमड़ी माता (नीम की डाल के रूप में देवी), गौरी
व्रत कैसे खुलता हैपरिवार की परंपरा अनुसार, कई घरों में अगले दिन पारणपरिवार की परंपरा अनुसाररात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर, सत्तू खाकर
विशेष पकवानघर के पारंपरिक मीठे पकवानघर के पारंपरिक मीठे पकवानचने, गेहूँ या जौ के सत्तू के लड्डू/पिंड

यह तालिका सामान्य चलन बताती है; एक ही राज्य के अलग-अलग ज़िलों और परिवारों में विधि बदल जाती है। अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें। सावन की हरियाली तीज और भादों की हरतालिका तीज से कजरी तीज का अंतर उन दोनों लेखों में विस्तार से है।

सरगी, सिंजारा और सत्तू — व्रत से पहले की परंपरा

व्रत से पहले भोजन और उपहार भेजने की परंपरा अलग-अलग नामों से चलती है। "सरगी" शब्द करवा चौथ से अधिक जुड़ा है, पर कई परिवारों में कजरी तीज पर भी सूर्योदय से पहले हल्का भोजन करने और सास या माँ की ओर से उपहार आने का चलन है। राजस्थान में तीज से एक दिन पहले "सिंजारा" होता है, जिसमें ससुराल या मायके से मेहंदी, चूड़ियाँ, कपड़े और मिठाई आती है।

व्रत से पहले की सामग्री (प्रचलित):

  • हल्के मीठे पकवान और फल
  • मेवे
  • सौंदर्य सामग्री — मेहंदी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियाँ
  • नारियल और मिठाई
  • सुहाग की लाल या हरी चुनरी
  • राजस्थान में सत्तू के लड्डू, जो शाम को पूजा और पारण में काम आते हैं

व्यावहारिक सलाह: अगर आप निर्जला व्रत रखने वाली हैं, तो सूर्योदय से पहले पानी और हल्का, पौष्टिक भोजन लें। बहुत तला या बहुत मीठा खाने से दिन में प्यास अधिक लगती है।

संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन

कजरी तीज की पूजा सरल और भावपूर्ण होती है। नीचे सामान्य विधि है; अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।

चरण 1 — प्रातःकाल:

  1. सूर्योदय से पहले उठें
  2. स्नान करें और साफ़ वस्त्र धारण करें
  3. परंपरा हो तो सूर्योदय से पहले सरगी या हल्का भोजन लें
  4. मन में संकल्प लें: "मैं भगवान शिव-माँ पार्वती की पूजा अपने परिवार के सुख और सुहाग के लिए कर रही हूँ"

चरण 2 — पूजा स्थल की सज्जा:

  1. घर के पूजा-स्थल या आँगन को साफ करें
  2. लाल कपड़ा बिछाएं
  3. गणेश जी की मूर्ति या चित्र रखें
  4. माँ पार्वती और भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर रखें; राजस्थान में मिट्टी या गोबर से छोटा तालाब बनाकर उसके किनारे नीम की डाल लगाई जाती है
  5. दीपक जलाएं

चरण 3 — पूजा सामग्री:

  1. नारियल, सुपारी, लौंग, इलायची
  2. रोली, मौली, चंदन, कुंकुम
  3. लाल और पीले फूल
  4. शिव जी के लिए बेलपत्र और धतूरा
  5. पान के पत्ते
  6. मिठाई, फल, सत्तू या खीर का भोग
  7. अक्षत (चावल), हल्दी, मेहंदी (गौरी जी के लिए)

चरण 4 — गणेश-गौरी पूजा:

  1. सर्वप्रथम गणेश जी का पूजन करें — "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र से
  2. माँ पार्वती (गौरी जी) का आवाहन करें
  3. भगवान शिव का स्मरण करें
  4. कलश स्थापित करें — जल से भरे कलश में सुपारी, सिक्का और आम के पत्ते रखें

चरण 5 — षोडशोपचार पूजा:

  1. आवाहन — गौरी जी का आह्वान
  2. आसन — फूलों का आसन अर्पित करें
  3. पाद्य — चरणों में जल अर्पित करें
  4. अर्घ्य — हाथों में जल दें
  5. आचमन — मुख शुद्धि हेतु जल
  6. स्नान — जल या पंचामृत से
  7. वस्त्र — लाल चुनरी अर्पित करें
  8. सौभाग्य सूत्र — मौली बाँधें
  9. चंदन, कुंकुम, रोली — तिलक लगाएं
  10. फूल-माला — पहनाएं
  11. धूप-दीपक — जलाएं
  12. नैवेद्य — सत्तू, खीर, फल अर्पित करें
  13. आचमन — पुनः जल दें
  14. ताम्बूल — पान, सुपारी
  15. आरती — माँ गौरी की आरती करें
  16. प्रार्थना — हाथ जोड़कर परिवार के सुख की कामना करें

चरण 6 — कथा व कजरी गायन:

  1. कजरी तीज या नीमड़ी माता की कथा सुनें या पढ़ें
  2. सखियों के साथ मिलकर कजरी गीत गाएं
  3. मन में परिवार के सुख की कामना करें

चरण 7 — व्रत पारण:

  1. राजस्थानी परंपरा में रात को चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को जल, रोली और अक्षत से अर्घ्य दें, फिर सत्तू खाकर व्रत खोलें
  2. जिन परिवारों में अगले दिन पारण होता है, वहाँ अगले दिन प्रातः स्नान के बाद गौरी जी की पूजा करके भोजन करें
  3. सास, ननद और परिवार की बड़ी स्त्रियों का आशीर्वाद लें

अगर आप चाहती हैं कि किसी विशेष कामना से पंडित जी आपके नाम और गोत्र से शिव-पार्वती पूजा करें, तो हमारी ई-पूजा सेवा देखें।

कजरी गीत — विरह की मधुर अभिव्यक्ति

कजरी उत्तर प्रदेश और बिहार की लोक-गायन शैली है, जो वर्षा ऋतु में गाई जाती है। मिर्ज़ापुर और बनारस की कजरी विशेष रूप से प्रसिद्ध है, और बनारस घराने के उप-शास्त्रीय गायकों ने भी इसे मंच तक पहुँचाया। गाँवों में यह स्त्रियों की टोली में, ढोलक और झूलों के साथ गाई जाती है। कजरी गीतों के मुख्य विषय ये हैं:

1. मायके की याद: सावन-भादों में बेटी को मायके बुलाने की प्रतीक्षा, भाई के आने की राह देखना।

2. परदेस गए पति का विरह: बादल, बिजली और बारिश के बीच पति के लौटने की आस।

3. प्रकृति का सौंदर्य: काले बादल, हरियाली, मोर और कोयल की बोली।

4. राधा-कृष्ण और शिव-पार्वती: कई कजरी गीतों में राधा-कृष्ण की लीला और गौरी-शिव का प्रसंग आता है।

5. झूला और सखियाँ: सखियों के साथ झूला झूलने, मेहंदी लगाने और हँसी-ठिठोली के गीत।

6. घर-परिवार के रिश्ते: सास-ननद के साथ मीठी नोक-झोंक और नए घर में अपनापन।

पहले यहाँ कुछ गीत-पंक्तियाँ "कजरी" के रूप में दी गई थीं, जिनका किसी पारंपरिक कजरी से मिलान नहीं हो सका, इसलिए उन्हें हटा दिया गया है। असली कजरी सुनने का सबसे अच्छा तरीका है अपने परिवार की बड़ी स्त्रियों से सीखना, या मिर्ज़ापुर-बनारस की कजरी की प्रकाशित रिकॉर्डिंग सुनना।

कजरी गीतों का सांस्कृतिक महत्व: कजरी ने भारतीय लोक-साहित्य और संगीत को समृद्ध किया है। ये गीत स्त्री-मन की भावनाओं, प्रकृति-प्रेम और रिश्तों की मिठास को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजते आए हैं।

16 श्रृंगार और मंत्र — सुहाग का प्रतीक

कजरी तीज पर सोलह श्रृंगार का चलन है। सोलह श्रृंगार की सूची अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़ी बदलती है; यह एक प्रचलित सूची है:

  1. स्नान — शुद्धता
  2. वस्त्र — लाल या हरी साड़ी, लहरिया (राजस्थान)
  3. सिंदूर — माँग में
  4. कुंकुम — माथे पर
  5. मेहंदी — हाथ-पैर पर
  6. बिंदी — माथे पर
  7. काजल — आँखों में
  8. महावर/आलता — पैरों में
  9. नथ — नाक में
  10. कर्णफूल — कान में
  11. चूड़ियाँ — हाथों में (लाल या हरी)
  12. कंगन — कलाई पर
  13. पायल/बिछिया — पैरों में
  14. बाजूबंद — भुजाओं पर
  15. हार/मंगलसूत्र — गले में
  16. इत्र — सुगंध

प्रचलित मंत्र:

  • ॐ गं गणपतये नमः (पूजा के आरंभ में गणेश जी का मंत्र)
  • ॐ उमायै नमः
  • ॐ पार्वत्यै नमः
  • ॐ नमः शिवाय
  • गौरी प्रार्थना: हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकरप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्॥ (हे शंकर की अर्धांगिनी गौरी, जैसे आप शंकर को प्रिय हैं, वैसे ही हे कल्याणी, मुझे भी मेरे पति की प्रिय बनाइए)

जाप विधि:

  • "ॐ उमायै नमः" या "ॐ पार्वत्यै नमः" का 108 बार जाप; माला न हो तो 11 या 21 बार
  • सुबह पूजा के समय जाप सबसे सुविधाजनक
  • शाम को दीपक जलाकर गौरी प्रार्थना का पाठ
  • कुछ दंपती शिव-पार्वती के प्रतीक के रूप में गौरी शंकर रुद्राक्ष पूजा में रखते हैं; यह आस्था का विषय है, किसी परिणाम की गारंटी नहीं

व्रत के लाभ — परंपरा और सीमा

नीचे वे लाभ हैं जो परंपरा बताती है। हर लाभ के साथ उसकी सीमा भी लिखी है, क्योंकि कोई भी व्रत किसी परिणाम की गारंटी नहीं देता।

  1. सुहाग के लिए प्रार्थना — व्रत पति की दीर्घायु और परिवार के सुख की प्रार्थना है। किसी की आयु या स्वास्थ्य व्रत से तय नहीं होता; स्वास्थ्य की चिंता हो तो डॉक्टर से मिलें।
  2. दांपत्य में अपनापन — साथ में पूजा और त्योहार मनाना रिश्ते को समय और ध्यान देता है। रिश्ते की गहरी समस्याएँ बातचीत और ज़रूरत हो तो परामर्श से सुलझती हैं।
  3. संतान की कामना — बहुत से परिवार इस कामना से गौरी की पूजा करते हैं। संतान से जुड़ी किसी कठिनाई में डॉक्टर की सलाह पहले है।
  4. विवाह की कामना — कुंवारी कन्याएँ अच्छे जीवनसाथी की कामना से व्रत रखती हैं। रिश्ता तय करते समय दोनों की कुंडली देखने के लिए कुंडली मिलान अलग विषय है।
  5. मानसिक शांति — संयम, पूजा और गीतों से कई लोगों का मन हल्का होता है।
  6. मायके से जुड़ाव — सिंजारा, सरगी और मायके आने-जाने की परंपरा रिश्तों को जोड़े रखती है।
  7. लोक-संस्कृति का संरक्षण — कजरी गाना-सुनना एक जीवित परंपरा को आगे बढ़ाता है।
  8. अनुशासन — एक दिन का संयम अपने आप में साधना है, बशर्ते स्वास्थ्य इसकी अनुमति दे।

सावधानियां, नियम और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

व्रत के नियम:

  • कई परिवारों में निर्जला व्रत रखा जाता है; राजस्थान में व्रत चंद्र-अर्घ्य के बाद सत्तू से खुलता है
  • स्वास्थ्य कारण से निर्जला संभव न हो तो फलाहार या जल के साथ व्रत रखें; यह भी पूरी तरह मान्य है
  • दिनभर मन में शिव-पार्वती का स्मरण रखें
  • क्रोध, असत्य और निंदा से बचें
  • पारण में सात्विक भोजन लें

स्वास्थ्य संबंधी सावधानी:

  • गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, मधुमेह, रक्तचाप या किडनी की समस्या वाली महिलाएँ निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें
  • चक्कर, बहुत कमज़ोरी या बेहोशी जैसा लगे तो तुरंत पानी और भोजन लें; व्रत का भाव स्वास्थ्य से ऊपर नहीं है
  • भादों की उमस में दिन भर बिना पानी रहने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है

परंपरागत नियम (परिवार अनुसार):

  • कई परिवारों में यह सुहागिन स्त्रियों का व्रत माना जाता है। विधवा स्त्रियों के व्रत रखने के बारे में परिवारों में अलग-अलग मत हैं; गौरी की पूजा और भजन हर कोई कर सकता है
  • मासिक धर्म के दौरान कई परिवारों में पूजा स्थान पर न बैठने की परंपरा है, जबकि व्रत और मन में स्मरण जारी रहता है; अपने परिवार की परंपरा का पालन करें
  • मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज़

ज्योतिषीय सलाह:

  • व्रत भक्ति है; यह कुंडली देखने की शर्त पर निर्भर नहीं है
  • अगर विवाह में देरी या दांपत्य में तनाव का प्रश्न है, तो वह पूरी कुंडली देखकर समझा जाता है, किसी एक ग्रह या एक दोष से नहीं
  • मंगल दोष जैसी बातें सुनकर डरने से पहले जाँच लें कि कुंडली में वह है भी या नहीं, और कोई निरस्तीकरण तो नहीं; इसके लिए कुंडली मिलान परामर्श या कुंडली विश्लेषण देखें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या विधवा महिलाएं कजरी तीज का व्रत रख सकती हैं? कई परिवारों में कजरी तीज को सुहागिन स्त्रियों का व्रत माना जाता है, इसलिए विधवा स्त्रियाँ व्रत नहीं रखतीं, जबकि कुछ परिवार इसे अनिवार्य नियम नहीं मानते। माँ पार्वती की पूजा, कथा और भजन-कीर्तन हर कोई कर सकता है। अपने परिवार की परंपरा का पालन करें।

क्या कजरी तीज और हरितालिका तीज अलग-अलग हैं? हाँ। कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया को और हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है, यानी लगभग 15 दिन बाद। कजरी तीज में कजरी गीत और राजस्थान में सत्तू व नीमड़ी माता की परंपरा है, जबकि हरितालिका में शिव-पार्वती की बालू या मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा होती है। विस्तार के लिए हरतालिका तीज वाला लेख देखें।

सरगी क्या है और कौन भेजता है? सरगी व्रत से पहले का भोजन और उपहार है, जो कई परिवारों में सास बहू को या माँ बेटी को भेजती है। राजस्थान में इसी तरह की परंपरा तीज से एक दिन पहले "सिंजारा" के रूप में होती है।

क्या सास को सरगी भेजनी चाहिए या मायके से आनी चाहिए? परंपरा अनुसार दोनों ही शुभ हैं। कुछ क्षेत्रों में सास सरगी भेजती हैं तो कुछ क्षेत्रों में मायके से आती है। कहीं-कहीं दोनों ओर से आती है।

क्या कजरी तीज के दिन मायके जाना शुभ है? सावन-भादों में नवविवाहिता बेटी को मायके बुलाने की परंपरा कई क्षेत्रों में है, और कजरी गीतों का बड़ा विषय यही है। कब जाना है, यह परिवार की परंपरा पर निर्भर है।

क्या पूजा के दौरान कजरी गीत गा सकते हैं? हाँ, पूजा के बाद सखियों के साथ कजरी गीत गाना इस पर्व की मुख्य परंपरा है और इसे उत्सव का ही हिस्सा माना जाता है।


कजरी तीज एक धार्मिक व्रत होने के साथ-साथ स्त्रियों के गीतों, रिश्तों और वर्षा ऋतु का उत्सव भी है। इसे अपनी परंपरा के अनुसार, स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए और श्रद्धा से मनाएँ। माँ गौरी और भोलेनाथ की कृपा आपके परिवार पर बनी रहे।

शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
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इस लेख में बताए गए उपाय सामान्य मार्गदर्शन हैं। आपकी कुंडली के अनुसार उपाय जानने के लिए निधि श्रीमाली जी से व्यक्तिगत परामर्श बुक करें।

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अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक और सांस्कृतिक जानकारी के लिए है। बताए गए लाभ पारंपरिक मान्यताएँ हैं, निश्चित परिणाम नहीं। व्रत से पहले स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में डॉक्टर से सलाह लें।

[ { "question": "क्या विधवा महिलाएं कजरी तीज का व्रत रख सकती हैं?", "answer": "कई परिवारों में कजरी तीज को सुहागिन स्त्रियों का व्रत माना जाता है, जबकि कुछ परिवार इसे अनिवार्य नियम नहीं मानते। माँ पार्वती की पूजा, कथा और भजन-कीर्तन हर कोई कर सकता है; अपने परिवार की परंपरा का पालन करें।" }, { "question": "कजरी तीज और हरितालिका तीज में क्या अंतर है?", "answer": "कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया को और हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को, लगभग 15 दिन बाद, मनाई जाती है। कजरी तीज में कजरी गीत और राजस्थान में सत्तू व नीमड़ी माता की परंपरा है, जबकि हरितालिका में शिव-पार्वती की बालू या मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा होती है।" }, { "question": "सरगी क्या है और कौन भेजता है?", "answer": "सरगी व्रत से पहले का भोजन और उपहार है, जो कई परिवारों में सास बहू को या माँ बेटी को भेजती है। राजस्थान में इसी तरह की परंपरा तीज से एक दिन पहले सिंजारा के रूप में होती है।" }, { "question": "क्या सास को सरगी भेजनी चाहिए या मायके से आनी चाहिए?", "answer": "परंपरा अनुसार दोनों ही शुभ हैं। कुछ क्षेत्रों में सास सरगी भेजती हैं तो कहीं मायके से आती है। कई परिवारों में दोनों ओर से आती है।" }, { "question": "क्या कजरी तीज के दिन मायके जाना शुभ है?", "answer": "सावन-भादों में नवविवाहिता बेटी को मायके बुलाने की परंपरा कई क्षेत्रों में है और कजरी गीतों का बड़ा विषय यही है। कब जाना है, यह परिवार की परंपरा पर निर्भर है।" }, { "question": "क्या पूजा के दौरान कजरी गीत गा सकते हैं?", "answer": "हाँ, पूजा के बाद सखियों के साथ कजरी गीत गाना इस पर्व की मुख्य परंपरा है और इसे उत्सव का ही हिस्सा माना जाता है।" }, { "question": "सातुड़ी तीज और कजरी तीज क्या एक ही हैं?", "answer": "हाँ, दोनों भाद्रपद कृष्ण तृतीया का ही पर्व हैं। राजस्थान में इसे सातुड़ी तीज, कजली तीज या बड़ी तीज कहते हैं; वहाँ सत्तू के लड्डू, नीमड़ी माता की पूजा और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा है, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में कजरी गायन और झूले मुख्य पहचान हैं।" } ]

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Frequently Asked Questions

क्या विधवा महिलाएं कजरी तीज का व्रत रख सकती हैं?+
कई परिवारों में कजरी तीज को सुहागिन स्त्रियों का व्रत माना जाता है, जबकि कुछ परिवार इसे अनिवार्य नियम नहीं मानते। माँ पार्वती की पूजा, कथा और भजन-कीर्तन हर कोई कर सकता है; अपने परिवार की परंपरा का पालन करें।
कजरी तीज और हरितालिका तीज में क्या अंतर है?+
कजरी तीज भाद्रपद कृष्ण तृतीया को और हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को, लगभग 15 दिन बाद, मनाई जाती है। कजरी तीज में कजरी गीत और राजस्थान में सत्तू व नीमड़ी माता की परंपरा है, जबकि हरितालिका में शिव-पार्वती की बालू या मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा होती है।
सरगी क्या है और कौन भेजता है?+
सरगी व्रत से पहले का भोजन और उपहार है, जो कई परिवारों में सास बहू को या माँ बेटी को भेजती है। राजस्थान में इसी तरह की परंपरा तीज से एक दिन पहले सिंजारा के रूप में होती है।
क्या सास को सरगी भेजनी चाहिए या मायके से आनी चाहिए?+
परंपरा अनुसार दोनों ही शुभ हैं। कुछ क्षेत्रों में सास सरगी भेजती हैं तो कहीं मायके से आती है। कई परिवारों में दोनों ओर से आती है।
क्या कजरी तीज के दिन मायके जाना शुभ है?+
सावन-भादों में नवविवाहिता बेटी को मायके बुलाने की परंपरा कई क्षेत्रों में है और कजरी गीतों का बड़ा विषय यही है। कब जाना है, यह परिवार की परंपरा पर निर्भर है।
क्या पूजा के दौरान कजरी गीत गा सकते हैं?+
हाँ, पूजा के बाद सखियों के साथ कजरी गीत गाना इस पर्व की मुख्य परंपरा है और इसे उत्सव का ही हिस्सा माना जाता है।
सातुड़ी तीज और कजरी तीज क्या एक ही हैं?+
हाँ, दोनों भाद्रपद कृष्ण तृतीया का ही पर्व हैं। राजस्थान में इसे सातुड़ी तीज, कजली तीज या बड़ी तीज कहते हैं; वहाँ सत्तू के लड्डू, नीमड़ी माता की पूजा और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा है, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में कजरी गायन और झूले मुख्य पहचान हैं।
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Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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