⚡ संक्षेप में — ऋषि पंचमी
लेखिका: निधि श्रीमाली | वैदिक ज्योतिषी, 18+ वर्षों का अनुभव
अद्यतन: अगस्त 2026 | पढ़ने का समय: 12 मिनट
रेटिंग: ★★★★★ 4.9/5 (1,425+ परामर्श समीक्षाओं से)
ऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है और सप्तऋषियों को समर्पित है। यह गणेश चतुर्थी के अगले दिन आती है। परंपरा में यह व्रत स्त्रियाँ रजस्वला काल में अनजाने हुए दोष के प्रायश्चित हेतु रखती हैं — परंतु इसका मूल भाव ऋषि ऋण का स्मरण है, अर्थात् ज्ञान परंपरा के प्रति कृतज्ञता।
विषय सूची
- ऋषि पंचमी क्या है
- सप्तऋषि कौन हैं
- ऋषि ऋण — मूल भाव
- व्रत कथा
- प्रायश्चित वाला पक्ष — एक स्पष्ट दृष्टि
- व्रत विधि
- आहार के नियम
- मंत्र और संकल्प
- कौन रख सकता है
- आज के समय में इसका अर्थ
ऋषि पंचमी क्या है
ऋषि पंचमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला व्रत है, जो सप्तऋषियों को समर्पित है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह सामान्यतः अगस्त-सितंबर में पड़ता है, गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन।
यह व्रत भारत के अनेक भागों में प्रचलित है — विशेषतः महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल में। नेपाल में यह ऋषि पंचमी के नाम से एक प्रमुख पर्व है और तीज के तीन दिवसीय क्रम का समापन दिवस है।
इस व्रत के दो पक्ष हैं, और दोनों को समझना आवश्यक है — एक प्रायश्चित का पक्ष जो अधिक प्रचारित है, और दूसरा कृतज्ञता का पक्ष जो अधिक मूलभूत है। मैं दोनों पर स्पष्ट रूप से लिखूँगी।
सप्तऋषि कौन हैं
सप्तऋषि वे सात महर्षि हैं जिन्हें वैदिक ज्ञान का मूल स्रोत और संरक्षक माना जाता है। उन्हें आकाश में सप्तर्षि मंडल के रूप में देखा जाता है।
| ऋषि | विशेष योगदान |
|---|---|
| कश्यप | अनेक प्रजातियों के आदि पिता; अधिकांश गोत्रों के मूल |
| अत्रि | अनसूया के पति; दत्तात्रेय के पिता |
| भरद्वाज | आयुर्वेद और अनेक शास्त्रों के प्रवर्तक |
| विश्वामित्र | गायत्री मंत्र के द्रष्टा; राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने |
| गौतम | न्याय दर्शन; अहिल्या के पति |
| जमदग्नि | परशुराम के पिता |
| वशिष्ठ | राजा दशरथ और श्रीराम के कुलगुरु |
कुछ परंपराओं में यह सूची भिन्न होती है और अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह अथवा क्रतु सम्मिलित किए जाते हैं। साथ ही अरुंधती — वशिष्ठ की पत्नी — का पूजन भी इस व्रत में होता है, और वे सप्तर्षि मंडल के निकट तारे के रूप में देखी जाती हैं।
ऋषि ऋण — मूल भाव
यह वह पक्ष है जो प्रायः छूट जाता है, और मेरी दृष्टि में यही इस व्रत का वास्तविक आधार है।
हिंदू परंपरा में तीन ऋण बताए गए हैं जिनके साथ मनुष्य जन्म लेता है:
- देव ऋण — यज्ञ और उपासना से चुकाया जाता है
- पितृ ऋण — संतान और श्राद्ध से
- ऋषि ऋण — अध्ययन, ज्ञान के संरक्षण और उसे आगे बढ़ाने से
ऋषि पंचमी वह दिन है जो तीसरे ऋण को समर्पित है। जो भी ज्ञान आज हमारे पास है — वेद, आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, दर्शन — वह किसी ने संरक्षित किया, किसी ने आगे बढ़ाया, और वह भी बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के।
इसी कारण इस दिन अपने गुरुओं और शिक्षकों का स्मरण करने का विधान है, और किसी की शिक्षा में सहयोग करना इस व्रत का सर्वाधिक उपयुक्त दान माना गया है।
ज्योतिषीय दृष्टि से ऋषि ऋण का संबंध गुरु ग्रह से है। जिनकी कुंडली में गुरु निर्बल है — शिक्षा में बाधा, विवेक की कमी, आर्थिक ठहराव — उनके लिए यह व्रत विशेष उपयुक्त है।
व्रत कथा
कथा विदर्भ देश के एक ब्राह्मण उत्तंक और उनकी पत्नी सुशीला की है।
उनके पुत्र और पुत्री थे। पुत्री विवाह के पश्चात विधवा हो गई और पिता के घर लौट आई। एक रात्रि माता ने देखा कि पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गए हैं और वह अत्यंत कष्ट में है।
चिंतित माता-पिता ने ऋषि से कारण पूछा। ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से बताया कि पूर्वजन्म में यह कन्या ब्राह्मण कुल में थी और उसने रजस्वला काल में पूजा-पात्रों और रसोई को स्पर्श किया था, तथा उस दोष का प्रायश्चित नहीं किया। उसी कारण यह कष्ट प्राप्त हुआ।
ऋषि ने उपाय बताया — ऋषि पंचमी का व्रत। कन्या ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और रोग से मुक्त होकर सद्गति प्राप्त की।
कथा का जो अंश महत्वपूर्ण है वह यह है कि ऋषि ने दंड नहीं दिया, उपाय बताया। परंपरा में यह व्रत निषेध नहीं, प्रायश्चित की व्यवस्था है — और प्रायश्चित का अर्थ ही यह है कि मार्ग खुला रहे।
प्रायश्चित वाला पक्ष — एक स्पष्ट दृष्टि
यह भाग मैं जानबूझकर विस्तार से लिख रही हूँ, क्योंकि इस विषय पर स्त्रियों को अनावश्यक अपराध-बोध दिया जाता है और वह उचित नहीं है।
परंपरा क्या कहती है: रजस्वला काल में पूजा, रसोई और कुछ कार्यों से दूरी की व्यवस्था रही है, और ऋषि पंचमी उस अवधि में अनजाने हुए किसी चूक के प्रायश्चित का दिन माना गया है।
अब कुछ बातें स्पष्ट रूप से:
- रजस्वला होना पाप नहीं है। यह एक शारीरिक प्रक्रिया है। परंपरागत नियमों का मूल आधार विश्राम था — उस काल में स्त्री को गृहकार्य से छूट देने की व्यवस्था, जो बाद में निषेध के रूप में समझी जाने लगी।
- यह व्रत अनिवार्य नहीं है। जो रखना चाहें रखें; जो न रखें उन पर कोई दोष नहीं आता। मैं यह स्पष्ट कहती हूँ क्योंकि अनेक स्त्रियाँ भय से यह व्रत रखती हैं, और भय से किया गया व्रत शास्त्र सम्मत नहीं है।
- स्वास्थ्य पहले है। इस व्रत में हल के बिना उपजा अन्न खाने का विधान है, जो व्यावहारिक रूप से कठिन है। रोगी, गर्भवती, मधुमेह से पीड़ित और वृद्ध स्त्रियाँ सामान्य सात्विक आहार लेकर व्रत रख सकती हैं — यह पूर्णतः मान्य है।
- अपराध-बोध व्रत का उद्देश्य नहीं है। कथा में भी ऋषि ने उपाय दिया, दोषारोपण नहीं किया। जो व्रत भय और आत्म-निंदा से किया जाए, वह अपने उद्देश्य से ही विपरीत है।
मेरे पास आने वाली अनेक स्त्रियाँ इस विषय में चिंतित रहती हैं। मैं उन्हें यही कहती हूँ — इस व्रत को कृतज्ञता के रूप में रखें, प्रायश्चित के रूप में नहीं। ऋषियों का स्मरण, गुरुओं के प्रति आदर, और किसी की शिक्षा में सहयोग — यही इसका सार है और यह किसी के लिए भी लाभकारी है।
व्रत विधि
- प्रातःकाल स्नान — परंपरा में इस दिन विशेष स्नान का विधान है, जिसमें अपामार्ग (चिरचिटा) की दातुन और मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। जहाँ उपलब्ध न हो वहाँ सामान्य स्नान पर्याप्त है।
- स्वच्छ वस्त्र धारण करें — श्वेत अथवा पीले।
- संकल्प लें — नाम, गोत्र और उद्देश्य कहते हुए।
- पूजा स्थल तैयार करें — चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर सप्तऋषियों की स्थापना करें। प्रतिमा न हो तो सात सुपारी अथवा कुश की सात आकृतियाँ बनाकर स्थापित की जाती हैं।
- अरुंधती सहित पूजन — सप्तऋषियों के साथ अरुंधती का स्थान भी रखें।
- अर्पित करें — जल, अक्षत, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य।
- ऋषि पंचमी कथा का श्रवण अथवा पाठ।
- मंत्र जाप — नीचे दिए गए।
- आरती और प्रसाद वितरण।
- दान — ब्राह्मण अथवा किसी विद्यार्थी को भोजन, वस्त्र और दक्षिणा। पुस्तक अथवा शिक्षा सामग्री का दान इस दिन विशेष उपयुक्त है।
- सायंकाल पूजन के पश्चात व्रत का पारण।
आहार के नियम
इस व्रत की सबसे विशिष्ट बात इसका आहार नियम है, और उसका कारण जानने योग्य है।
परंपरा में इस दिन हल से जोती गई भूमि का अन्न नहीं खाया जाता। कारण यह बताया जाता है कि हल चलाने से भूमि के असंख्य सूक्ष्म जीव मरते हैं और बैल को कष्ट होता है — अर्थात् यह अहिंसा का विधान है, न कि केवल कर्मकांड।
इस दिन जो खाया जाता है:
- साँवा (सामक) चावल — बिना जोते उपजने वाला अन्न
- मोरधन, कुट्टू और सिंघाड़े का आटा
- दही, दूध, घी
- फल और सूखे मेवे
- वे सब्जियाँ जो स्वतः उगती हैं — विशेषतः कुछ क्षेत्रों में परवल
- सेंधा नमक
जो नहीं खाया जाता: गेहूँ, चावल (साधारण), दालें, साधारण नमक, प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा।
व्यावहारिक छूट — यह नियम आज व्यावहारिक रूप से कठिन है, विशेषतः नगरों में। जो पालन कर सकें करें; जो न कर सकें वे सामान्य सात्विक फलाहार लें। रोगी, मधुमेह से पीड़ित, गर्भवती और वृद्ध जन अपने स्वास्थ्य के अनुसार आहार लें — शास्त्रों में सामर्थ्य के अनुसार आचरण का ही विधान है, और इस व्रत में भी वही लागू होता है।
मंत्र और संकल्प
सप्तऋषि मंत्र:
कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
अरुंधती सहित वंदना:
ॐ सप्तऋषिभ्यो नमः
ॐ अरुन्धत्यै नमः
गुरु मंत्र — ऋषि ऋण गुरु ग्रह से संबंधित है:
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
गायत्री मंत्र — विश्वामित्र ऋषि द्वारा दृष्ट, इस दिन विशेष:
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
108 बार जाप करें, अथवा जितना संभव हो।
कौन रख सकता है
परंपरा में यह व्रत मुख्यतः स्त्रियों द्वारा रखा जाता है, परंतु पुरुष भी रख सकते हैं — और ऋषि ऋण के भाव से देखें तो यह सबके लिए है।
विशेष रूप से उपयुक्त:
- विद्यार्थी और शिक्षक — ज्ञान परंपरा से प्रत्यक्ष संबंध
- जिनकी कुंडली में गुरु निर्बल हो — शिक्षा में बाधा, विवेक की कमी
- जिन्हें अपने गुरु अथवा शिक्षक से मतभेद रहा हो — गुरु का अनादर गुरु ग्रह को दुर्बल करता है
- जो ज्ञान अथवा शोध के क्षेत्र में हैं
- वे स्त्रियाँ जो परंपरागत रूप से यह व्रत रखती आई हैं — कुल परंपरा के अनुसार
यदि आपकी कुंडली में गुरु की वास्तविक स्थिति क्या है, यह जानना हो तो कुंडली विश्लेषण से स्पष्ट होता है — और उसी के अनुसार यह व्रत उपयुक्त है या गुरुवार व्रत अधिक उपयुक्त होगा।
आज के समय में इसका अर्थ
यह व्रत उन कुछ पर्वों में है जिनका मूल भाव आज भी उतना ही प्रासंगिक है, बशर्ते उसे ठीक से समझा जाए।
पहला — ज्ञान निःशुल्क आया है। जो भी हम जानते हैं, वह किसी ने बिना प्रतिफल की अपेक्षा के आगे बढ़ाया। ऋषि पंचमी उस श्रृंखला का स्मरण है। इस दिन का सर्वोत्तम कर्म किसी बालक की शिक्षा में सहयोग करना है — पुस्तक देना, फीस भरना, पढ़ाना। यह दान इस व्रत के भाव से पूर्णतः मेल खाता है।
दूसरा — अहिंसा का विचार। हल से जोते अन्न का निषेध एक दिन के लिए यह स्मरण कराता है कि हमारा भोजन भी किसी के श्रम और किसी जीव की हानि से आता है। वर्ष में एक दिन यह चेतना रखना छोटी बात नहीं है।
तीसरा — गुरु के प्रति आदर। ज्योतिष में गुरु ग्रह को दुर्बल करने वाला सबसे बड़ा आचरण शिक्षक का अनादर बताया गया है। यह उपदेश नहीं, प्रत्यक्ष उपाय है। जिन जजमानों का गुरु निर्बल है, उन्हें मैं यही कहती हूँ — अपने किसी पुराने शिक्षक को इस दिन प्रणाम कर आएँ, अथवा संदेश ही भेज दें। इसका प्रभाव किसी भी अनुष्ठान से कम नहीं।
और अंत में — इस व्रत को अपराध-बोध से मुक्त करके देखें। इसकी कथा में ऋषि ने दंड नहीं, उपाय दिया था। जो परंपरा प्रायश्चित का मार्ग खुला रखती है, वह भय फैलाने के लिए नहीं बनी थी।
शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली
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Frequently Asked Questions
ऋषि पंचमी कब और क्यों मनाई जाती है?+
ऋषि पंचमी व्रत में क्या खाया जाता है?+
क्या ऋषि पंचमी व्रत रखना अनिवार्य है?+
सप्तऋषि कौन-कौन हैं?+
क्या पुरुष ऋषि पंचमी का व्रत रख सकते हैं?+
रोगी या गर्भवती स्त्री यह व्रत कैसे रखे?+
ऋषि पंचमी पर सबसे उपयुक्त दान क्या है?+
Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.