✨ लेखिका: निधि श्रीमाली, मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली (जोधपुर)।
पार्थिव शिवलिंग शुद्ध मिट्टी से अपने हाथों बनाया गया शिवलिंग है, जिसकी पूजा के बाद उसे जल में विसर्जित कर दिया जाता है। सावन, सोमवार, प्रदोष और महाशिवरात्रि पर इसकी पूजा सबसे प्रचलित है। इसका सबसे बड़ा गुण यह है कि इसके लिए न धन चाहिए, न कोई खरीदी हुई वस्तु: थोड़ी साफ़ मिट्टी, जल और श्रद्धा पर्याप्त है। इस लेख में पार्थिव शिवलिंग का अर्थ, कथा, मिट्टी का चुनाव, बनाने की विधि, शिव पुराण में बताए आठ नामों वाली पूजा, विसर्जन, सावधानियाँ और स्थायी शिवलिंगों से तुलना दी गई है।
इस लेख में सुधार: पुराने संस्करण में सावन 2026 की तारीखें, "राजा भगीरथ" और "प्रह्लाद" के नाम से दो कथाएँ, "7 पवित्र भूमि" और "16 मृत्तिका" की सूचियाँ (जिनमें श्मशान की मिट्टी भी थी) और "108 नामों" की एक सूची थी जिसमें पाप, अधर्म, क्रोधी जैसे शब्द थे। ये किसी शास्त्र या प्रचलित परंपरा पर आधारित नहीं थे, इसलिए हटाकर सही जानकारी दी गई है।
विषय सूची (Table of Contents)
- पार्थिव शिवलिंग का परिचय — पृथ्वी से शिव तक
- पार्थिव शिवलिंग का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
- पार्थिव शिवलिंग से जुड़ी कथाएँ
- पार्थिव पूजा कब करें — सावन और अन्य शुभ दिन
- मिट्टी और जल कैसे चुनें
- शिवलिंग बनाने की विधि
- शिव पुराण की पार्थिव पूजा — आठ चरण, आठ नाम
- स्थापना विधि — कलश, संकल्प और नाम-जप
- पार्थिव शिवलिंग की पूजा विधि — 16 उपचार और अभिषेक
- कितने दिन रखें और विसर्जन कैसे करें
- 16 सोमवार व्रत और 12 ज्योतिर्लिंगों का स्मरण
- पार्थिव पूजा से जुड़ी मान्यताएँ और उनकी सीमा
- सावधानियाँ और नियम
- पार्थिव के बाद स्थायी शिवलिंग: पारद शिवलिंग की कीमत
- परामर्श बुक करें
पार्थिव शिवलिंग का परिचय — पृथ्वी से शिव तक
"पार्थिव" शब्द संस्कृत के "पृथिवी" (पृथ्वी) से बना है, और इसका अर्थ है पृथ्वी से बना या मिट्टी का। पार्थिव शिवलिंग वह शिवलिंग है जिसे साधक स्वयं मिट्टी से बनाता है, उसकी पूजा करता है और पूजा पूरी होने पर उसे जल में विसर्जित कर देता है। शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में पार्थिव लिंग की पूजा का विस्तार से वर्णन है, और कलियुग में इसे शिव पूजा का सरल और श्रेष्ठ साधन बताया गया है।
पार्थिव शिवलिंग की सबसे सुंदर बात यह है कि यह सबके लिए सुलभ है। जिसके पास पत्थर, धातु या रत्न का शिवलिंग नहीं है, वह भी मिट्टी से शिवलिंग बनाकर पूरी विधि से पूजा कर सकता है। इसमें श्रद्धा और विधि की शुद्धता प्रमुख है, सामग्री की महँगाई नहीं।
सावन (श्रावण) मास को शिव का प्रिय मास माना जाता है, इसलिए बहुत से परिवार पूरे सावन या सावन के सोमवारों पर पार्थिव पूजा करते हैं। बहुत से साधक "सवा लाख" या "एक करोड़" पार्थिव लिंगों के संकल्प के साथ सामूहिक अनुष्ठान भी करते हैं, जिसे कोटि-रुद्र या पार्थिवेश्वर अनुष्ठान कहा जाता है।
पार्थिव शिवलिंग का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
धार्मिक दृष्टि से: शिव पुराण पार्थिव पूजा को सब वर्णों और स्त्री-पुरुष, सबके लिए खुली पूजा बताता है। पुराणों की फल-श्रुति में इसके बड़े पुण्य बताए गए हैं; उन्हें भक्ति की भाषा के रूप में पढ़ें, किसी गणित के रूप में नहीं। गरीब से गरीब व्यक्ति भी पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूरी पूजा कर सकता है, यही इस विधि की सबसे बड़ी धार्मिक विशेषता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से: पार्थिव पूजा का भाव यह है कि शिव किसी महँगी मूर्ति में बँधे नहीं हैं; साधारण मिट्टी भी श्रद्धा से शिव का रूप बन जाती है, और पूजा के बाद फिर मिट्टी में लौट जाती है। बनाने से विसर्जन तक का यह चक्र अनासक्ति की शिक्षा देता है। अपने हाथ से शिवलिंग गढ़ते समय जो एकाग्रता बनती है, वह साधना का ही हिस्सा है।
ज्योतिषीय दृष्टि से: ज्योतिष में शिव पूजा को चंद्रमा से जोड़ा जाता है, क्योंकि शिव चंद्रशेखर हैं और सोमवार शिव का दिन है। इसलिए जिनकी कुंडली में चंद्र कमजोर हो, उन्हें शिव पूजा का सामान्य सुझाव दिया जाता है। पर पार्थिव पूजा को मंगल दोष, कालसर्प या पितृ दोष का निश्चित उपाय बताना सही नहीं है। किसी दोष के लिए कौन सी पूजा उचित है, यह कुंडली विश्लेषण से तय होता है।
पार्थिव शिवलिंग से जुड़ी कथाएँ
श्रीराम और रामेश्वरम: सबसे प्रसिद्ध कथा रामेश्वरम की है। लंका जाने से पहले समुद्र तट पर भगवान राम ने शिव की पूजा करनी चाही। प्रचलित कथा के अनुसार शिवलिंग लाने में देर होने पर बालू (रेत) से शिवलिंग बनाकर पूजा की गई; कई कथाओं में यह शिवलिंग माता सीता ने बनाया था। वही शिवलिंग रामनाथस्वामी मंदिर में "रामलिंगम" के रूप में पूजा जाता है, और हनुमान जी द्वारा कैलाश से लाया गया शिवलिंग "विश्वलिंगम" कहलाता है। यह कथा बताती है कि सामग्री से अधिक भाव महत्वपूर्ण है।
माता पार्वती और हरतालिका तीज: हरतालिका तीज की कथा में माता पार्वती शिव को पति रूप में पाने के लिए वन में तप करती हैं, और भाद्रपद शुक्ल तृतीया को बालू या मिट्टी से शिवलिंग बनाकर पूजा करती हैं। इसी परंपरा में आज भी हरतालिका तीज पर स्त्रियाँ मिट्टी या बालू के शिव-पार्वती बनाकर पूजा करती हैं।
पुराने संस्करण की दो कथाएँ: यहाँ पहले "चंद्रवंशी राजा भगीरथ" के पार्थिव शिवलिंग बनाने की कथा थी। भगीरथ सूर्यवंशी (इक्ष्वाकु वंश) के थे, और उनकी कथा गंगा को पृथ्वी पर लाने और शिव द्वारा गंगा को जटाओं में धारण करने की है, पार्थिव लिंग की नहीं। "प्रह्लाद को नरसिंह के प्रकोप से बचाने" वाली कथा भी गलत थी: नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद की रक्षा की थी। ये दोनों कथाएँ हटा दी गई हैं।
पार्थिव पूजा कब करें — सावन और अन्य शुभ दिन
तारीखों पर सुधार: पुराने संस्करण में सावन 2026 को 16 जुलाई से 14 अगस्त बताया गया था। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास था, इसलिए उसके बाद के महीने लगभग एक मास आगे खिसक गए, और उत्तर भारत का पूर्णिमांत सावन जुलाई के अंत से अगस्त के अंत तक रहा। 2026 का सावन बीत चुका है, इसलिए अगली बार के लिए अपने शहर का पंचांग देखें। यह भी ध्यान रखें कि उत्तर भारत (पूर्णिमांत) और महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत (अमांत) में सावन लगभग पंद्रह दिन के अंतर से शुरू होता है।
| अवसर | कब | पार्थिव पूजा का प्रचलित रूप |
|---|---|---|
| सावन मास | श्रावण का पूरा महीना | रोज़ या हर सोमवार नया शिवलिंग; या पूरे मास एक संकल्प |
| सावन सोमवार | सावन के हर सोमवार | सुबह बनाकर पूजा, उसी दिन या अगली सुबह विसर्जन |
| प्रदोष | हर पक्ष की त्रयोदशी, सूर्यास्त के आसपास | प्रदोष काल में पूजा |
| मासिक शिवरात्रि | हर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी | रात्रि में पूजा |
| महाशिवरात्रि | फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (अमांत में माघ) | चार प्रहर की पूजा, अगली सुबह विसर्जन |
| हरतालिका तीज | भाद्रपद शुक्ल तृतीया | बालू या मिट्टी के शिव-पार्वती |
दिन का समय: सामान्य पार्थिव पूजा सुबह स्नान के बाद की जाती है। प्रदोष और शिवरात्रि की पूजा परंपरा से संध्या और रात्रि में होती है, इसलिए यह कहना सही नहीं कि शाम के बाद पार्थिव पूजा वर्जित है। पंचांग के मिनट-स्तर के मुहूर्त हर शहर के सूर्योदय के अनुसार बदलते हैं।
मिट्टी और जल कैसे चुनें
पुराने संस्करण में "7 पवित्र भूमियों" की मिट्टी अलग-अलग लाने की बात थी, और हर भूमि की मिट्टी को किसी दोष का उपाय बताया गया था। ऐसा कोई शास्त्रीय नियम नहीं है। शिव पुराण में शुद्ध स्थान की मिट्टी लेने को कहा गया है, जैसे नदी का किनारा, तालाब, पर्वत या किसी पवित्र स्थान की मिट्टी। व्यवहार में यह ध्यान रखें:
- साफ़ मिट्टी: बगीचे, खेत या किसी नदी-तालाब के किनारे की साफ़ मिट्टी लें। उसमें से कंकड़, जड़ें और कूड़ा निकाल दें।
- कहाँ की मिट्टी न लें: श्मशान, सड़क किनारे, नाली के पास या किसी प्रदूषित स्थान की मिट्टी न लें।
- चिकनी मिट्टी: ऐसी मिट्टी जो गूँधने पर दरके नहीं, सबसे अच्छी है। बहुत रेतीली हो तो थोड़ी चिकनी मिट्टी मिला लें।
- तीर्थ की मिट्टी: किसी तीर्थ या शिवालय की थोड़ी मिट्टी परिवार के पास हो, तो उसे भी मिला सकते हैं। यह श्रद्धा की बात है, अनिवार्य नियम नहीं।
- बाज़ार की मूर्ति-मिट्टी: शहर में मिट्टी न मिले तो कुम्हार या पूजा-सामग्री की दुकान से साफ़ चिकनी मिट्टी ले सकते हैं, पर प्लास्टर ऑफ पेरिस या रंग मिली मिट्टी नहीं।
जल: मिट्टी गूँधने के लिए साफ़ जल में थोड़ा गंगाजल मिला लें। गंगाजल न हो तो साफ़ जल ही पर्याप्त है। कुछ परिवार मिट्टी में थोड़ा गाय का गोबर या भस्म भी मिलाते हैं; यह कुल की रीति पर निर्भर है।
शिवलिंग बनाने की विधि
पुराने संस्करण में "16 मृत्तिका" यानी 16 तरह की मिट्टी की सूची थी, जिसमें श्मशान भूमि की मिट्टी भी शामिल थी। ऐसी कोई अनिवार्य सूची नहीं है; एक शुद्ध स्थान की मिट्टी पर्याप्त है। बनाने का सरल क्रम यह है:
- स्नान और स्थान: स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें। पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें। सामने एक थाली या पत्तल रखें।
- मिट्टी लेना: "ॐ हराय नमः" कहकर मिट्टी लें।
- गूँधना: "ॐ महेश्वराय नमः" कहकर मिट्टी में जल मिलाकर अच्छी तरह गूँधें, जब तक वह चिकनी न हो जाए।
- आकार देना: "ॐ शम्भवे नमः" कहकर शिवलिंग का आकार बनाएँ। नीचे जलाधारी (योनि-पीठ) और ऊपर गोल-लंबा लिंग।
- आकार: घर की पूजा के लिए अंगूठे के आकार से लेकर लगभग 3-5 अंगुल (6-10 सेमी) तक का शिवलिंग पर्याप्त है। कई परिवार साथ में एक छोटा गणेश और नंदी भी बनाते हैं।
- चिकनाई: गीले हाथ से सतह चिकनी कर दें, ताकि दरार न रहे।
पूरे समय मन में "ॐ नमः शिवाय" का जप करते रहें। बनाते समय कोई टुकड़ा टूट जाए तो उसे फिर से गूँधकर ठीक कर लें; पूजा शुरू होने से पहले शिवलिंग को ठीक करना वर्जित नहीं है।
शिव पुराण की पार्थिव पूजा — आठ चरण, आठ नाम
शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में पार्थिव पूजा के हर चरण के लिए शिव का एक नाम बताया गया है। मंत्र-विधि न जानने वाला साधक भी इन आठ नामों से पूरी पूजा कर सकता है। ऊपर बनाने की विधि में पहले तीन नाम आ चुके हैं; पूरा क्रम यह है:
| चरण | क्या करें | नाम मंत्र |
|---|---|---|
| 1. मिट्टी लेना | शुद्ध स्थान से मिट्टी लें | ॐ हराय नमः |
| 2. गूँधना | जल मिलाकर मिट्टी गूँधें | ॐ महेश्वराय नमः |
| 3. आकार देना | लिंग और पीठ बनाएँ | ॐ शम्भवे नमः |
| 4. प्रतिष्ठा | शिवलिंग को थाली या पीठ पर स्थापित करें | ॐ शूलपाणये नमः |
| 5. आवाहन | शिव का आवाहन करें | ॐ पिनाकधृषे नमः |
| 6. स्नान | जल और पंचामृत से अभिषेक | ॐ शिवाय नमः |
| 7. पूजन | बिल्वपत्र, पुष्प, धूप-दीप, नैवेद्य | ॐ पशुपतये नमः |
| 8. विसर्जन | क्षमा-प्रार्थना के बाद विसर्जन | ॐ महादेवाय नमः |
अलग-अलग प्रकाशनों में नामों के क्रम में थोड़ा अंतर मिल सकता है, पर आठ नामों से पूजा का भाव एक ही है: हर चरण शिव के नाम से हो।
स्थापना विधि — कलश, संकल्प और नाम-जप
आवश्यक सामग्री:
- बना हुआ पार्थिव शिवलिंग
- कलश (तांबा या मिट्टी)
- गंगाजल
- बिल्वपत्र, धतूरा, आक या सफ़ेद फूल
- सुपारी, सिक्का, अक्षत
- लाल कलावा (मौली)
- चंदन, भस्म (हल्दी और कुमकुम शिवलिंग पर नहीं, केवल गणेश-पार्वती के लिए)
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- धूप, दीपक, कपूर
- रुद्राक्ष की माला
- चौकी पर बिछाने के लिए साफ़ वस्त्र
- फल और मिठाई (भोग के लिए)
कलश स्थापना: पूजा स्थान में, संभव हो तो ईशान कोण में, चौकी पर वस्त्र बिछाएँ और उस पर थाली में पार्थिव शिवलिंग रखें। कलश में जल भरें, उसमें सुपारी, सिक्का, अक्षत और आम के पत्ते डालें, ऊपर नारियल रखें और कलावा बाँधें। कलश शिवलिंग के पास रखें और एक दीपक जलाएँ।
संकल्प विधि: दाहिने हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर संकल्प बोलें — "ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य श्रावण मासे, शुभ तिथौ, श्री शिव प्रीत्यर्थं पार्थिव शिवलिंग पूजनं करिष्ये।" इसके बाद अपना नाम और गोत्र लें। संस्कृत न आती हो तो अपनी भाषा में संकल्प लें; भाव वही रहता है।
नाम-जप: पुराने संस्करण में "108 नामों" की जो सूची थी, वह शिव का अष्टोत्तर शतनाम नहीं थी, और उसमें पाप, अधर्म, क्रोधी, अशांत जैसे शब्द और बुद्ध, जिन, राम, कृष्ण जैसे नाम थे। उसे हटा दिया गया है। शिव के 108 नाम चढ़ाने हों, तो किसी प्रकाशित "शिव अष्टोत्तर शतनामावली" पुस्तिका से पढ़ें, जो "ॐ शिवाय नमः, ॐ महेश्वराय नमः, ॐ शंभवे नमः, ॐ पिनाकिने नमः…" से शुरू होती है। पुस्तिका न हो तो "ॐ नमः शिवाय" का 108 बार जप करते हुए हर बार या हर ग्यारहवीं बार एक बिल्वपत्र चढ़ाएँ। यह भी पूरी पूजा है। पंचाक्षर मंत्र के अर्थ और जप की विधि के लिए शिव पंचाक्षरी मंत्र पर हमारा लेख देखें।
पार्थिव शिवलिंग की पूजा विधि — 16 उपचार और अभिषेक
16 उपचार पूजा (षोडशोपचार) देव-पूजा का पूर्ण क्रम है। समय कम हो तो पंचोपचार (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) भी पर्याप्त है।
- आवाहन — शिव का आह्वान: "ॐ शिवाय नमः, आवाहयामि"
- आसन — आसन देना: "आसनं समर्पयामि"
- पाद्य — चरणों में जल: "पाद्यं समर्पयामि"
- अर्घ्य — अर्घ्य का जल: "अर्घ्यं समर्पयामि"
- आचमन — आचमन का जल: "आचमनीयं समर्पयामि"
- स्नान — जल और पंचामृत से अभिषेक
- वस्त्र — वस्त्र या कलावा अर्पित करना
- यज्ञोपवीत — जनेऊ अर्पित करना
- गंध — चंदन या भस्म लगाना
- पुष्प — बिल्वपत्र, धतूरा, आक और सफ़ेद फूल अर्पित करना
- धूप — धूप दिखाना
- दीप — दीपक दिखाना
- नैवेद्य — भोग लगाना (फल, मिठाई)
- ताम्बूल — पान, सुपारी, लौंग अर्पित करना
- प्रदक्षिणा — परिक्रमा (शिवलिंग की आधी परिक्रमा की परंपरा है, जलाधारी की धारा लाँघी नहीं जाती)
- नमस्कार और क्षमा-प्रार्थना — प्रणाम करना
अभिषेक विधि: मिट्टी का शिवलिंग तेज़ धार से घुल सकता है, इसलिए अभिषेक धीरे-धीरे, पतली धार से करें। पहले थोड़ा जल, फिर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर, और अंत में फिर शुद्ध जल। "ॐ नमः शिवाय" का जप करते रहें। अभिषेक के बाद बिल्वपत्र और फूलों से सजाएँ, धूप-दीप जलाएँ और आरती करें। यदि शिवलिंग नरम होकर बैठने लगे, तो अभिषेक केवल कुछ बूँदों से करें; पूजा का भाव उतना ही पूरा है।
अभिषेक के मंत्र: "ॐ नमः शिवाय" सबसे सरल है। रुद्र गायत्री "ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्" का भी जप किया जाता है। स्वास्थ्य की चिंता में बहुत से भक्त महामृत्युंजय मंत्र का जप करते हैं; यह प्रार्थना है, इलाज नहीं, इसलिए डॉक्टर से उपचार पहले कराएँ। विधिवत रुद्राभिषेक पंडित से करवाना हो तो हमारी ई-पूजा सेवा देखें।
कितने दिन रखें और विसर्जन कैसे करें
पार्थिव शिवलिंग की पूजा अस्थायी पूजा है। सबसे प्रचलित नियम यह है कि उसी दिन, या रात्रि-पूजा हो तो अगली सुबह, उसका विसर्जन कर दिया जाए।
एक दिन की पूजा (सबसे प्रचलित): सोमवार, प्रदोष या शिवरात्रि को शिवलिंग बनाएँ, पूजा करें और उसी दिन संध्या तक या अगली सुबह विसर्जन करें। नए साधकों के लिए यही सबसे सरल और शास्त्रसम्मत तरीका है।
पूरे सावन का संकल्प: दो तरह से किया जाता है। पहला, हर दिन या हर सोमवार नया शिवलिंग बनाकर उसी दिन विसर्जन करना। दूसरा, कुछ परिवारों में एक ही शिवलिंग को मास भर पूजा में रखा जाता है। दूसरे तरीके में मिट्टी का शिवलिंग रोज़ के अभिषेक से घुलता या फफूँद लगता है, इसलिए अभिषेक केवल कुछ बूँदों से करें और उसे सूखा, हवादार रखें। शिवलिंग में दरार आए या फफूँद लगे तो तुरंत विसर्जन कर दें।
वर्ष भर: पुराने संस्करण में एक ही पार्थिव शिवलिंग को वर्ष भर रखने की सलाह थी। मिट्टी के शिवलिंग के लिए यह व्यावहारिक नहीं है। रोज़ पूजा के लिए स्थायी शिवलिंग चाहिए, तो नीचे दी गई तुलना देखें।
विसर्जन विधि: अंतिम पूजा के बाद "ॐ महादेवाय नमः" कहकर क्षमा-प्रार्थना करें। फिर शिवलिंग को आदर से उठाकर विसर्जित करें। सबसे अच्छा तरीका घर में एक साफ़ बाल्टी या पात्र में जल भरकर उसमें विसर्जन करना है। मिट्टी घुल जाए तो वह जल और मिट्टी किसी पेड़ या गमले में डाल दें। नदी या तालाब पास हो और परिवार की परंपरा हो, तो वहाँ भी विसर्जन कर सकते हैं, पर फूल-मालाएँ, कलावा, प्लास्टिक और थाली अलग कर लें, ताकि जल दूषित न हो। गहरे पानी में न उतरें।
विशेष सावधानी: विसर्जन के बाद शिवलिंग के अवशेष को कूड़ेदान में न फेंकें। घुली मिट्टी पौधों में डालें; वह फिर पृथ्वी में मिल जाती है, और पार्थिव पूजा का भाव भी यही है।
16 सोमवार व्रत और 12 ज्योतिर्लिंगों का स्मरण
16 सोमवार व्रत में लगातार सोलह सोमवार व्रत रखा जाता है, और सत्रहवें सोमवार को उद्यापन किया जाता है। यह व्रत सावन से या किसी भी शुभ मास के पहले सोमवार से शुरू किया जा सकता है। पुराने संस्करण में इसे "सावन के चार सोमवारों से अगले वर्ष सावन तक" बताया गया था, जो ठीक नहीं था। इस व्रत में हर सोमवार पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करना और उसी दिन विसर्जन करना प्रचलित है।
12 ज्योतिर्लिंगों का स्मरण: पार्थिव शिवलिंग पर अभिषेक करते समय बहुत से भक्त बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेते हैं। इसके लिए सबसे प्रचलित पाठ "द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र" है, जो "सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्…" से शुरू होता है। सरल रूप में हर नाम के साथ "नमः" लगाकर स्मरण किया जा सकता है:
- सोमनाथ (गुजरात): "ॐ सोमनाथाय नमः"
- मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश): "ॐ मल्लिकार्जुनाय नमः"
- महाकालेश्वर (उज्जैन): "ॐ महाकालेश्वराय नमः"
- ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश): "ॐ ओंकारेश्वराय नमः"
- वैद्यनाथ (झारखंड; कुछ परंपराओं में परली, महाराष्ट्र): "ॐ वैद्यनाथाय नमः"
- भीमाशंकर (महाराष्ट्र): "ॐ भीमाशंकराय नमः"
- रामेश्वरम (तमिलनाडु): "ॐ रामेश्वराय नमः"
- नागेश्वर (गुजरात): "ॐ नागेश्वराय नमः"
- विश्वनाथ (काशी): "ॐ विश्वनाथाय नमः"
- त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र): "ॐ त्र्यंबकेश्वराय नमः"
- केदारनाथ (उत्तराखंड): "ॐ केदारनाथाय नमः"
- घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र): "ॐ घृष्णेश्वराय नमः"
हर ज्योतिर्लिंग की कथा और स्थान के बारे में 12 ज्योतिर्लिंगों पर हमारा लेख पढ़ें। जप के लिए रुद्राक्ष की माला प्रचलित है; हमारे रुद्राक्ष संग्रह में माला और दाने उपलब्ध हैं।
पार्थिव पूजा से जुड़ी मान्यताएँ और उनकी सीमा
पुराने संस्करण में इस भाग में मंगल दोष, कालसर्प और पितृ दोष के शमन, मनचाहे वर, संतान, व्यापार में वृद्धि और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने जैसे पक्के वादे थे। पार्थिव पूजा इनमें से किसी की गारंटी नहीं है। नीचे परंपरा की मान्यताएँ और उनकी सीमा दी गई हैं।
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सबके लिए सुलभ पूजा: बिना खर्च, बिना किसी खरीदी हुई मूर्ति के पूरी शिव पूजा। यह इसकी सबसे बड़ी और सबसे पक्की विशेषता है।
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विवाह की प्रार्थना: हरतालिका तीज और सावन सोमवार की परंपरा में कुंवारी कन्याएँ अच्छे जीवनसाथी की प्रार्थना से पार्थिव पूजा करती हैं। यह प्रार्थना है; विवाह से जुड़े प्रश्न कुंडली देखकर ही सुलझते हैं, और मिलान के लिए कुंडली मिलान देखें।
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संतान की कामना: बहुत से दंपती इस भाव से पूजा करते हैं। गर्भधारण में देरी हो तो पहले किसी योग्य डॉक्टर से जाँच कराएँ; पूजा उसके साथ श्रद्धा के रूप में करें।
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आर्थिक कठिनाई: पूजा मन को स्थिर रख सकती है, पर आय या व्यापार की गारंटी नहीं देती। आर्थिक निर्णय किसी योग्य वित्तीय सलाहकार के साथ लें।
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मन की शांति: अपने हाथ से कुछ बनाना, जप और नियमित पूजा मन को स्थिर करने में सहायक होते हैं। लंबी उदासी, चिंता या नींद की समस्या हो तो डॉक्टर या परामर्शदाता से मिलें; पूजा उसके साथ करें।
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पितरों का स्मरण: पितृ पक्ष के श्राद्ध और तर्पण की अपनी विधि है, जो पितृ पक्ष वाले लेख में दी गई है। पार्थिव पूजा उसका विकल्प नहीं है।
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अनासक्ति की शिक्षा: बनाना, पूजना और फिर विसर्जित करना यह याद दिलाता है कि हर आकार अस्थायी है। आध्यात्मिक दृष्टि से यही पार्थिव पूजा का सार है।
सावधानियाँ और नियम
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शुद्धता का ध्यान: स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर और साफ़ स्थान पर ही शिवलिंग बनाएँ। बनाते समय चप्पल-जूते उतार दें।
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मासिक धर्म के समय: कई परिवारों में इस समय स्त्रियाँ स्वयं पूजा नहीं करतीं और कोई और सदस्य पूजा करता है। यह पारिवारिक रीति का विषय है; जो रीति आपके घर में है, वही मानें।
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शिवलिंग को सीधे ज़मीन पर न रखें: पार्थिव शिवलिंग को थाली, पत्तल या चौकी पर रखें।
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अभिषेक का जल पिएँ नहीं: मिट्टी के शिवलिंग पर चढ़ा जल मिट्टी, दूध और शहद से मिला होता है और पीने योग्य नहीं रहता। उसे किसी पेड़ या गमले में डाल दें। पुराने संस्करण में इसे प्रसाद के रूप में बाँटने की बात थी, जो स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं।
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रात्रि पूजा वर्जित नहीं: महाशिवरात्रि की चार प्रहर की पूजा और प्रदोष की संध्या-पूजा परंपरा का अंग है। रात भर पूजा न करनी हो, तो शिवलिंग को साफ़ कपड़े से ढककर रखें और अगली सुबह विसर्जन करें।
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हल्दी, कुमकुम और तुलसी: परंपरा में शिवलिंग पर हल्दी, कुमकुम और तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। बिल्वपत्र, धतूरा, आक, सफ़ेद फूल, चंदन और भस्म चढ़ाएँ। केतकी (केवड़ा) का फूल भी शिव पूजा में नहीं चढ़ता।
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विसर्जन आवश्यक: पार्थिव शिवलिंग पूजा के बाद विसर्जित किया जाता है। यही पार्थिव और स्थायी शिवलिंग का मुख्य अंतर है। दरार, फफूँद या टूटने पर तुरंत विसर्जन करें।
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बाल-नाखून: कई परिवारों में सावन सोमवार को बाल और नाखून नहीं काटे जाते। यह लोक-रीति है।
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सात्विक भोजन: पूजा के दिन सात्विक भोजन करें। मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन से बचें।
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नकारात्मक विचारों से बचें: पूजा के समय क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और असत्य का त्याग करें।
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उपवास और स्वास्थ्य: गर्भावस्था, मधुमेह, रक्तचाप या नियमित दवा हो तो सोमवार उपवास का रूप अपने डॉक्टर से पूछकर तय करें। मिट्टी गूँधने और पूजा करने में कोई रोक नहीं है।
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बच्चों को शामिल करें: बच्चों को शिवलिंग बनाने में साथ लें। मिट्टी से कुछ बनाना उन्हें अच्छा लगता है और पूजा का अर्थ भी समझ आता है। बाद में उनके हाथ धुलवा दें।
पार्थिव के बाद स्थायी शिवलिंग: पारद शिवलिंग की कीमत किन बातों पर तय होती है
पार्थिव शिवलिंग पूजा के बाद विसर्जित हो जाता है। सावन के बाद बहुत से भक्त घर के मंदिर में एक स्थायी शिवलिंग रखना चाहते हैं, और तब सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न होता है — पारद शिवलिंग की कीमत कितनी है? सीधा उत्तर यह है कि पारद शिवलिंग का मूल्य तीन बातों से तय होता है: उसका वज़न, उसमें पारे का अनुपात (शुद्धता) और उसका स्वरूप। एक ही आकार के दो शिवलिंगों के दाम में बड़ा अंतर अक्सर इन्हीं कारणों से होता है। वर्तमान वज़न, शुद्धता के विकल्प और मूल्य आप हमारे पारद संग्रह में देख सकते हैं।
मूल्य के चार मुख्य आधार
- वज़न: पारद शिवलिंग ग्राम के हिसाब से बनते और बिकते हैं। उदाहरण के लिए हमारा पारद शिवलिंग छोटे (35–40 ग्राम), मध्यम (75–85 ग्राम) और बड़े (100–110 ग्राम) आकार में आता है। वज़न बढ़ने के साथ उसमें लगने वाली धातु और मूल्य दोनों बढ़ते हैं।
- पारे का प्रतिशत: पारा सामान्य तापमान पर तरल धातु है। उसे ठोस आकार देने के लिए अन्य धातुओं के साथ बाँधा जाता है। जिस शिवलिंग में पारे का अनुपात अधिक होता है, उसकी लागत भी अधिक होती है। इसलिए खरीदते समय शुद्धता का प्रतिशत अवश्य पूछें।
- स्वरूप और संयोजन: साधारण शिवलिंग की तुलना में पंचमुखी शिवलिंग या श्रीयंत्र और जलधारी के साथ बने संयोजन में अधिक धातु और अधिक कारीगरी लगती है, इसलिए उनका मूल्य अधिक होता है।
- अभिमंत्रण: कुछ शिवलिंग अभिमंत्रित करके दिए जाते हैं। यह पूछ लेना उचित है कि अभिमंत्रण किस विधि से किया गया है।
खरीदने से पहले क्या जाँचें
- पारा बहुत भारी धातु है, इसलिए पारद शिवलिंग अपने आकार की तुलना में हाथ में स्पष्ट रूप से भारी लगता है। यदि वह पीतल या एल्युमिनियम जितना हल्का लगे तो उसमें पारे का अंश कम होने की संभावना है।
- बहुत कम दाम में बड़ा शिवलिंग मिल रहा हो तो सावधान रहें। पारे की लागत कम नहीं होती, इसलिए असामान्य रूप से सस्ता शिवलिंग अक्सर किसी दूसरी धातु का होता है।
- वज़न और शुद्धता का प्रतिशत बिल या उत्पाद विवरण में लिखा हुआ माँगें, केवल मौखिक आश्वासन पर न जाएँ।
पारद शिवलिंग कैसे बनता है और दुकान पर कौन सी जाँच सुरक्षित है, इसकी विस्तृत चर्चा पारद शिवलिंग कैसे बनता है वाले भाग में है।
सुरक्षा और सीमाएँ
पारा एक विषैली धातु है। ठोस पारद शिवलिंग छूने और पूजा में रखने के लिए बनाया जाता है, पर उस पर चढ़ाया गया जल या दूध पीने के लिए नहीं है। अभिषेक का जल किसी गमले या पेड़ की जड़ में डाल दें, पूजा के बाद हाथ धो लें और शिवलिंग को छोटे बच्चों व पालतू जानवरों की पहुँच से दूर रखें। पारद शिवलिंग श्रद्धा और साधना का माध्यम है — यह किसी रोग का उपचार नहीं है और न ही धन, विवाह या स्वास्थ्य की गारंटी देता है। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या में पहले डॉक्टर से परामर्श लें।
पार्थिव, पारद और नर्मदेश्वर शिवलिंग की तुलना
| आधार | पार्थिव शिवलिंग | पारद शिवलिंग | नर्मदेश्वर शिवलिंग |
|---|---|---|---|
| सामग्री | शुद्ध मिट्टी और जल | पारा और अन्य धातुओं का ठोस मिश्रण | नर्मदा नदी का प्राकृतिक पत्थर |
| अवधि | पूजा के बाद विसर्जन अनिवार्य | स्थायी, घर के मंदिर में रखा जाता है | स्थायी, घर के मंदिर में रखा जाता है |
| लागत | लगभग नहीं, स्वयं बनाया जाता है | वज़न और पारे के प्रतिशत पर निर्भर | आकार और पत्थर की गुणवत्ता पर निर्भर |
| अभिषेक का जल | पीएँ नहीं; मिट्टी मिला जल पौधों में डालें | पीएँ नहीं, पौधे में डालें | परंपरा अनुसार चरणामृत रूप में लिया जाता है |
| किसके लिए उपयुक्त | सावन, सोमवार, शिवरात्रि और विशेष संकल्प | नियमित घरेलू पूजा | नियमित घरेलू पूजा और अभिषेक |
यदि आप रोज़ अभिषेक करना चाहते हैं तो नर्मदेश्वर शिवलिंग भी एक अच्छा विकल्प है। यह भी याद रखें कि घर में पारद या नर्मदेश्वर शिवलिंग रखने से पार्थिव शिवलिंग की साधना का स्थान नहीं भरता — सावन में मिट्टी का शिवलिंग बनाकर पूजा करना अपनी जगह एक अलग परंपरा है। ज्योतिर्लिंगों का महत्व विस्तार से जानने के लिए 12 ज्योतिर्लिंगों पर हमारा लेख पढ़ें, और शिवलिंग पर तिल चढ़ाने की विधि के लिए शिवलिंग पर काले तिल चढ़ाने का महत्व देखें। आपकी कुंडली के अनुसार कौन सा उपाय उपयुक्त है, यह जानना हो तो कुंडली विश्लेषण परामर्श बुक कर सकते हैं।
शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली, जोधपुर
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[ { "question": "क्या सावन के अलावा अन्य महीनों में भी पार्थिव शिवलिंग बनाया जा सकता है?", "answer": "हाँ। सावन सबसे प्रचलित समय है, पर हर सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और हरतालिका तीज पर भी पार्थिव पूजा की जाती है। कोई भी दिन जब आप स्नान के बाद शांत मन से पूजा कर सकें, पार्थिव पूजा के लिए ठीक है।" }, { "question": "क्या 7 पवित्र भूमियों की मिट्टी हर जगह आसानी से मिल जाती है?", "answer": "ज़रूरत ही नहीं है। 7 पवित्र भूमियों की मिट्टी अलग-अलग लाने का कोई शास्त्रीय नियम नहीं है। नदी-तालाब के किनारे, बगीचे या किसी शुद्ध स्थान की साफ़, चिकनी मिट्टी पर्याप्त है। श्मशान, सड़क किनारे या प्रदूषित जगह की मिट्टी न लें।" }, { "question": "क्या पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन अनिवार्य है और बिना विसर्जन के रखने पर क्या होता है?", "answer": "हाँ, पार्थिव शिवलिंग पूजा के बाद विसर्जित किया जाता है, प्रायः उसी दिन या अगली सुबह। लंबे समय रखने पर मिट्टी घुलती, दरकती या फफूँद पकड़ती है। सबसे अच्छा है घर में बाल्टी में विसर्जन करके वह जल और मिट्टी पेड़ या गमले में डाल दें।" }, { "question": "क्या परिवार के किसी सदस्य ने शिवलिंग बनाया तो वह चलता है या स्वयं बनाना जरूरी है?", "answer": "स्वयं बनाना आदर्श है, क्योंकि बनाना भी साधना का हिस्सा है। पर बीमारी, वृद्धावस्था या किसी असमर्थता में परिवार का कोई सदस्य बना सकता है, और फिर सब मिलकर पूजा कर सकते हैं।" }, { "question": "क्या 108 नामों का क्रम याद न हो तो भी पूजा पूर्ण मानी जाती है?", "answer": "हाँ। 108 नाम किसी प्रकाशित शिव अष्टोत्तर शतनामावली से पढ़े जा सकते हैं; न हों तो 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जप भी पूरी पूजा है। शिव पुराण के आठ नामों (हर, महेश्वर, शंभु, शूलपाणि, पिनाकधृक्, शिव, पशुपति, महादेव) से हर चरण करना भी पर्याप्त है।" }, { "question": "क्या स्त्रियां पार्थिव शिवलिंग बना सकती हैं और पूजा कर सकती हैं?", "answer": "हाँ, बिल्कुल। हरतालिका तीज की कथा में माता पार्वती ने स्वयं बालू या मिट्टी से शिवलिंग बनाकर पूजा की थी, और आज भी स्त्रियाँ सावन और तीज पर पार्थिव पूजा करती हैं। मासिक धर्म के समय की रीति परिवार के अनुसार होती है।" }, { "question": "पारद शिवलिंग की कीमत किस आधार पर तय होती है?", "answer": "पारद शिवलिंग का मूल्य मुख्य रूप से उसके वज़न (ग्राम), उसमें पारे के प्रतिशत यानी शुद्धता, और उसके स्वरूप (साधारण, पंचमुखी या जलधारी/श्रीयंत्र संयोजन) पर निर्भर करता है। खरीदते समय वज़न और शुद्धता का प्रतिशत लिखित में माँगें। असामान्य रूप से सस्ता बड़ा शिवलिंग अक्सर किसी दूसरी धातु का होता है। पारद शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल पीना नहीं चाहिए, क्योंकि पारा विषैली धातु है।" } ]
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Frequently Asked Questions
क्या सावन के अलावा अन्य महीनों में भी पार्थिव शिवलिंग बनाया जा सकता है?+
क्या 7 पवित्र भूमियों की मिट्टी हर जगह आसानी से मिल जाती है?+
क्या पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन अनिवार्य है और बिना विसर्जन के रखने पर क्या होता है?+
क्या परिवार के किसी सदस्य ने शिवलिंग बनाया तो वह चलता है या स्वयं बनाना जरूरी है?+
क्या 108 नामों का क्रम याद न हो तो भी पूजा पूर्ण मानी जाती है?+
क्या स्त्रियां पार्थिव शिवलिंग बना सकती हैं और पूजा कर सकती हैं?+
पारद शिवलिंग की कीमत किस आधार पर तय होती है?+
Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.