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जानिए कैसे पड़ा भगवान् शिव का नाम नीलकंठ ,एवं किस प्रकार

# जानिए कैसे पड़ा भगवान् शिव का नाम नीलकंठ ,एवं किस प्रकार भगवान् शिव के विष के प्रभाव को काम किया गया - Neelkanth Mahadev - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **जानिए कैसे पड़ा भगवान् शिव क

7 July 2026 12 min read|By Nidhi Shrimali

⚡ संक्षेप में — नीलकंठ महादेव

लेखिका: निधि श्रीमाली | वैदिक ज्योतिषी, 18+ वर्षों का अनुभव
अद्यतन: अगस्त 2026 | पढ़ने का समय: 12 मिनट
रेटिंग: ★★★★★ 4.9/5 (1,425+ परामर्श समीक्षाओं से)

'नीलकंठ' अर्थात् नीले कंठ वाले — यह नाम शिव को समुद्र मंथन के हलाहल विष को कंठ में धारण करने से मिला। उन्होंने विष न निगला, न उगला, अपितु कंठ में रोक लिया। यही इस स्वरूप का सार है और यही कारण है कि नीलकंठ रूप की उपासना विष-तुल्य परिस्थितियों — कष्ट, अपमान और संकट — को सहने की शक्ति के लिए की जाती है।


विषय सूची

  1. समुद्र मंथन की कथा
  2. नीलकंठ स्वरूप का अर्थ
  3. सावन से संबंध
  4. प्रमुख नीलकंठ मंदिर
  5. उपासना किसके लिए
  6. पूजा विधि
  7. मंत्र और स्तोत्र
  8. नीलकंठ पक्षी का दर्शन
  9. ज्योतिषीय दृष्टि से
  10. कथा से व्यावहारिक शिक्षा

समुद्र मंथन की कथा

कथा पुराणों में विस्तार से आती है और इस स्वरूप को समझने के लिए इसे जानना आवश्यक है।

देवता और असुर अमृत प्राप्ति हेतु क्षीरसागर का मंथन कर रहे थे। मंदराचल पर्वत मथानी बना और वासुकि नाग रस्सी। भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लेकर पर्वत को आधार दिया।

मंथन से क्रमशः चौदह रत्न निकले — कामधेनु, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, लक्ष्मी, वारुणी, चंद्रमा, पारिजात, पांचजन्य शंख, धन्वंतरि और अंततः अमृत।

परंतु अमृत से पूर्व जो निकला, वह हलाहल था — इतना भयंकर विष कि उसकी ऊष्मा मात्र से तीनों लोक जलने लगे। देवता और असुर — दोनों भाग खड़े हुए। किसी में उसे धारण करने का सामर्थ्य नहीं था।

तब सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव आगे आए। उन्होंने हलाहल को अपनी हथेली पर लिया और पी गए। देवी पार्वती ने भयभीत होकर उनका कंठ दबा दिया, जिससे विष न तो नीचे उतरा और न बाहर आया — वह कंठ में ही स्थिर हो गया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया।

तभी से वे नीलकंठ कहलाए। देवताओं ने विष की ऊष्मा शांत करने के लिए उन पर निरंतर जल अर्पित किया — और यही परंपरा आज जलाभिषेक के रूप में चली आ रही है।

नीलकंठ स्वरूप का अर्थ

इस कथा का दार्शनिक अर्थ ही इस स्वरूप की उपासना का आधार है, और मैं इसे जजमानों को अवश्य समझाती हूँ।

शिव ने विष न निगला, न उगला — उसे कंठ में रोक लिया। यह तीन बातें कहता है:

  • निगल लेते तो स्वयं नष्ट होते। जो कष्ट को भीतर तक उतार लेता है, वह उससे नष्ट हो जाता है।
  • उगल देते तो संसार नष्ट होता। जो अपना कष्ट दूसरों पर फेंक देता है, वह चारों ओर विष फैलाता है — क्रोध, दोषारोपण, कटु वचन।
  • कंठ में रोकना — अर्थात् सहना, बिना स्वयं नष्ट हुए और बिना दूसरों को हानि पहुँचाए। यही नीलकंठ का सार है।

कंठ का चयन भी अकारण नहीं है। कंठ विशुद्ध चक्र का स्थान है — वाणी और अभिव्यक्ति का केंद्र। इसका संकेत स्पष्ट है: विष प्रायः वाणी से फैलता है, और उसे रोकना भी वहीं होता है।

इसी कारण नीलकंठ स्वरूप की उपासना उन जजमानों को दी जाती है जो अपमान, विश्वासघात, अन्याय अथवा दीर्घकालिक कष्ट से गुजर रहे हैं — जहाँ प्रश्न परिस्थिति बदलने का नहीं, उसे सहने की शक्ति का है।

सावन से संबंध

शास्त्रों के अनुसार विषपान की यह घटना श्रावण मास में हुई थी। यही इस पूरे मास की पवित्रता का मूल कारण है।

इससे तीन परंपराएँ निकलीं:

  • सावन में जलाभिषेक — देवताओं द्वारा किए गए जल अर्पण की पुनरावृत्ति। इसीलिए सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाना वर्ष के किसी अन्य समय से अधिक फलदायी माना गया है।
  • कांवड़ यात्रा — गंगाजल लाकर अभिषेक करने की परंपरा, जिसका चरम श्रावण शिवरात्रि है।
  • सावन में शीतल पदार्थों का अर्पण — दूध, दही, भाँग, धतूरा। ये सभी ताप शांत करने वाले माने गए हैं।

ध्यान देने योग्य बात — धतूरा और भाँग स्वयं विषैले पदार्थ हैं, और वही शिव को अर्पित किए जाते हैं। परंपरा में इसका अर्थ यह है कि जो संसार के लिए विष है, वह नीलकंठ के लिए अर्पण है। सावन मास और नीलकंठ स्वरूप की जानकारी के लिए हमारी सावन गाइड देखें।

प्रमुख नीलकंठ मंदिर

मंदिरस्थानविशेषता
नीलकंठ महादेवऋषिकेश, उत्तराखंडवह स्थान जहाँ परंपरा के अनुसार शिव ने विषपान किया; सर्वप्रमुख
नीलकंठ महादेवकालिंजर, उत्तर प्रदेशप्राचीन दुर्ग के भीतर; चंदेल कालीन
नीलकंठेश्वरउदयपुर, मध्य प्रदेशपरमार कालीन स्थापत्य
नीलकंठ महादेवअलवर, राजस्थानदसवीं शताब्दी का मंदिर समूह
श्रीकंठेश्वरकर्नाटकदक्षिण भारत का प्रमुख नीलकंठ स्थल

ऋषिकेश का नीलकंठ महादेव मंदिर सर्वाधिक प्रसिद्ध है और सावन में वहाँ लाखों कांवड़िए पहुँचते हैं। यह मंदिर पहाड़ी पर स्थित है और वहाँ तक चढ़ाई करनी पड़ती है — वृद्ध, हृदय रोगी और उच्च रक्तचाप वाले जन सावधानी रखें और सावन की भीड़ से बचकर जाएँ।

एक व्यावहारिक बात जो मैं कहती हूँ — तीर्थ यात्रा अनिवार्य नहीं है। घर पर नर्मदेश्वर शिवलिंग पर किया गया अभिषेक शास्त्रों में समान फलदायी माना गया है। श्रद्धा का प्रमाण दूरी नहीं है।

उपासना किसके लिए

नीलकंठ स्वरूप की उपासना विशेष रूप से इन स्थितियों में निर्धारित है:

  • दीर्घकालिक कष्ट जहाँ परिस्थिति तुरंत बदलने वाली न हो — साढ़े साती, लंबी बीमारी, पारिवारिक विवाद
  • अपमान अथवा विश्वासघात सहना पड़ रहा हो
  • क्रोध पर नियंत्रण की आवश्यकता हो — यह इस स्वरूप का प्रत्यक्ष उपयोग है
  • वाणी दोष — कटु वचन, कहकर पछताना, कंठ संबंधी रोग
  • विष अथवा नकारात्मकता से रक्षा — शारीरिक और सामाजिक दोनों अर्थों में
  • दूसरों का भार उठाने वाले — चिकित्सक, परिचारक, शिक्षक, वे जो परिवार का बोझ अकेले उठाते हैं
  • व्यसन मुक्ति — विष को धारण कर उससे अप्रभावित रहने का प्रतीक

अठारह वर्षों में जिन जजमानों को इस स्वरूप से सर्वाधिक लाभ होते देखा, वे वही थे जो किसी और के लिए कष्ट सह रहे थे — बीमार माता-पिता की सेवा करने वाले, कठिन विवाह निभाने वाले, परिवार का ऋण अकेले चुकाने वाले। यह उनका स्वरूप है।

पूजा विधि

  1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. संकल्प लें — नाम, गोत्र और उद्देश्य स्पष्ट कहें।
  4. जलाभिषेक — ताँबे के लोटे से शुद्ध जल की धार, ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए। नीलकंठ स्वरूप में जल का विशेष महत्व है, क्योंकि कथा में जल ही ताप शांत करता है।
  5. कच्चे दूध से अभिषेक, फिर पुनः जल।
  6. अर्पित करें — बिल्व पत्र, धतूरा, भाँग, आक के पुष्प, सफेद पुष्प, चंदन, भस्म।
  7. नीले पुष्प अर्पित करें यदि उपलब्ध हों — इस स्वरूप के लिए विशेष।
  8. घी का दीपक और धूप जलाएँ।
  9. मंत्र जाप — नीचे दिए गए मंत्र।
  10. आरती और प्रसाद वितरण।

सर्वोत्तम समय: सावन के सोमवार, महाशिवरात्रि, श्रावण शिवरात्रि, प्रदोष काल, और प्रत्येक सोमवार।

शिव को अर्पित न करें: हल्दी, तुलसी, केतकी का पुष्प, शंख से जल, नारियल का पानी और टूटे चावल।

मंत्र और स्तोत्र

नीलकंठ मंत्र:

ॐ नीलकंठाय नमः

विस्तृत रूप:

ॐ नमो भगवते नीलकंठाय महादेवाय नमः

पंचाक्षरी मंत्र — नित्य जाप हेतु:

ॐ नमः शिवाय

महामृत्युंजय मंत्र — विष, रोग और संकट से रक्षा हेतु:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

पाठ हेतु: शिव चालीसा, रुद्राष्टकम्, शिव तांडव स्तोत्र, लिंगाष्टकम्।

जाप 108 बार, सोमवार अथवा प्रदोष काल में। 40 दिन का संकल्प लेकर करें।

नीलकंठ पक्षी का दर्शन

यह प्रसंग सम्मिलित करना आवश्यक है क्योंकि इसका इस स्वरूप से नाम-साम्य है और लोग प्रायः भ्रमित होते हैं।

नीलकंठ पक्षी (Indian Roller) को शिव का प्रिय पक्षी माना जाता है और दशहरा के दिन इसका दर्शन अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि रावण वध के पश्चात ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति हेतु भगवान राम ने शिव की उपासना की थी, और शिव नीलकंठ पक्षी के रूप में प्रकट हुए।

विजयादशमी पर इस पक्षी के दर्शन को वर्षभर की शुभता का संकेत माना जाता है, विशेषतः उत्तर भारत में।

एक आवश्यक बात कहनी है। कुछ स्थानों पर दशहरे पर इस पक्षी को पकड़कर दिखाने और छोड़ने की प्रथा रही है। यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अवैध है और पक्षी के लिए हानिकारक — पकड़े गए पक्षी प्रायः घायल होते हैं। परंपरा का भाव पक्षी के दर्शन का है, बंदी बनाने का नहीं। जो शिव विष धारण कर सृष्टि की रक्षा करते हैं, उनके नाम पर किसी जीव को कष्ट देना उस भाव के विरुद्ध है।

ज्योतिषीय दृष्टि से

स्थितिक्यों उपयुक्त
शनि की साढ़े साती अथवा ढैयादीर्घकालिक कष्ट सहने की शक्ति; शनि शिव के भक्त हैं
अष्टम भाव अथवा आयु स्थान पीड़ितमहामृत्युंजय मंत्र के साथ; विष और संकट से रक्षा
मंगल दोष अथवा उग्र मंगलक्रोध नियंत्रण — नीलकंठ का प्रत्यक्ष उपयोग
बुध पीड़ित / वाणी दोषकंठ विशुद्ध चक्र का स्थान है
राहु — व्यसन, भयविष धारण कर अप्रभावित रहने का प्रतीक
काल सर्प दोषवासुकि नाग कथा के केंद्र में हैं; शिव नागों के स्वामी
चंद्र दोषचंद्रमा भी मंथन से निकला और शिव ने मस्तक पर धारण किया

आपकी कुंडली में कौन सी स्थिति सक्रिय है — यह कुंडली विश्लेषण से ज्ञात होता है, और उसी के अनुसार अभिषेक द्रव्य तथा मंत्र चुने जाते हैं।

कथा से व्यावहारिक शिक्षा

यह भाग अंत में है परंतु मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस कथा का उपयोग केवल अनुष्ठान तक सीमित नहीं है।

पहली शिक्षा — मंथन से पहले विष निकलता है, अमृत बाद में। कथा में हलाहल अमृत से पूर्व आता है। किसी भी गहन प्रयास में कठिनाई पहले आती है और फल बाद में। जो लोग आरंभिक कठिनाई देखकर मंथन छोड़ देते हैं, वे अमृत तक नहीं पहुँचते।

दूसरी शिक्षा — विष सामूहिक प्रयास से निकला, पर उसे धारण एक ने किया। देवता और असुर दोनों अमृत चाहते थे; विष के समय दोनों भागे। परिवारों और संस्थाओं में यही होता है — लाभ सब चाहते हैं, भार कोई एक उठाता है। जो उठाता है, वह नीलकंठ है, और यह स्वरूप विशेषतः उसी के लिए है।

तीसरी शिक्षा — शिव ने विष रोका, पचाया नहीं। यह सूक्ष्म परंतु महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह ढोंग नहीं किया कि विष का कोई प्रभाव नहीं — उनका कंठ नीला पड़ा, और वह चिह्न सदा रहा। कष्ट का प्रभाव स्वीकार करना दुर्बलता नहीं है। नीलकंठ का नीलापन उनका अपमान नहीं, उनकी पहचान बना।

चौथी शिक्षा — पार्वती ने कंठ दबाया। शिव अकेले नहीं थे। सहने वाले को भी किसी का साथ चाहिए, और वह साथ ही निर्णायक होता है। जो परिवार किसी एक सदस्य पर सब छोड़ देते हैं, वे कथा का यह भाग भूल जाते हैं।

यही कारण है कि मैं यह उपासना उन जजमानों को देती हूँ जो थके हुए हैं — इसलिए नहीं कि पूजा से परिस्थिति तुरंत बदल जाएगी, अपितु इसलिए कि यह स्वरूप उन्हें यह बताता है कि सहना स्वयं एक सामर्थ्य है, विवशता नहीं।


शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली


आपके लिए कौन सा शिव उपाय उपयुक्त है?

नीलकंठ स्वरूप दीर्घकालिक कष्ट, क्रोध और वाणी दोष के लिए है। यदि आपकी कुंडली में कारक ग्रह भिन्न है तो उपाय भी भिन्न होगा।

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Frequently Asked Questions

शिव को नीलकंठ क्यों कहा जाता है?+
समुद्र मंथन में अमृत से पूर्व हलाहल विष निकला, जिसकी ऊष्मा से तीनों लोक जलने लगे और कोई उसे धारण करने में समर्थ नहीं था। भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा हेतु वह विष पी लिया, और देवी पार्वती ने उनका कंठ दबा दिया जिससे विष कंठ में ही स्थिर हो गया। विष के प्रभाव से कंठ नीला पड़ गया, और तभी से वे नीलकंठ कहलाए।
नीलकंठ स्वरूप की उपासना किसे करनी चाहिए?+
जो दीर्घकालिक कष्ट से गुजर रहे हों जहाँ परिस्थिति तुरंत बदलने वाली न हो — साढ़े साती, लंबी बीमारी, पारिवारिक विवाद। इसके अतिरिक्त अपमान या विश्वासघात सहने वाले, क्रोध पर नियंत्रण चाहने वाले, वाणी दोष वाले, व्यसन मुक्ति चाहने वाले, और वे जो दूसरों का भार उठाते हैं — चिकित्सक, परिचारक, परिवार का बोझ अकेले उठाने वाले।
नीलकंठ महादेव का प्रमुख मंदिर कहाँ है?+
ऋषिकेश, उत्तराखंड में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर सर्वप्रमुख है — परंपरा के अनुसार यही वह स्थान है जहाँ शिव ने विषपान किया था। सावन में वहाँ लाखों कांवड़िए पहुँचते हैं। मंदिर पहाड़ी पर है और चढ़ाई करनी पड़ती है, अतः वृद्ध और हृदय रोगी सावधानी रखें। ध्यान रहे कि तीर्थ यात्रा अनिवार्य नहीं — घर पर किया गया अभिषेक भी समान फलदायी है।
सावन में जलाभिषेक का नीलकंठ कथा से क्या संबंध है?+
शास्त्रों के अनुसार विषपान की घटना श्रावण मास में हुई थी, और देवताओं ने विष की ऊष्मा शांत करने के लिए शिव पर निरंतर जल अर्पित किया। सावन का जलाभिषेक उसी सेवा की पुनरावृत्ति है, और यही इस पूरे मास की पवित्रता का मूल कारण है। कांवड़ यात्रा भी इसी परंपरा से निकली है।
नीलकंठ का मंत्र क्या है?+
ॐ नीलकंठाय नमः मुख्य मंत्र है, और विस्तृत रूप ॐ नमो भगवते नीलकंठाय महादेवाय नमः। नित्य जाप के लिए पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय पर्याप्त है। विष, रोग और संकट से रक्षा हेतु महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाता है। 108 बार, सोमवार अथवा प्रदोष काल में, 40 दिन का संकल्प लेकर।
दशहरे पर नीलकंठ पक्षी का दर्शन क्यों शुभ माना जाता है?+
मान्यता है कि रावण वध के पश्चात ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति हेतु भगवान राम ने शिव की उपासना की और शिव नीलकंठ पक्षी के रूप में प्रकट हुए। विजयादशमी पर इसका दर्शन वर्षभर की शुभता का संकेत माना जाता है। परंतु ध्यान रहे — पक्षी को पकड़कर दिखाना वन्यजीव अधिनियम के अंतर्गत अवैध और हानिकारक है; परंपरा का भाव दर्शन का है, बंदी बनाने का नहीं।
नीलकंठ कथा से क्या व्यावहारिक शिक्षा मिलती है?+
चार बातें। पहली, मंथन में विष अमृत से पहले निकलता है — कठिनाई पहले आती है, फल बाद में। दूसरी, विष सामूहिक प्रयास से निकला पर धारण एक ने किया — लाभ सब चाहते हैं, भार कोई एक उठाता है। तीसरी, शिव ने विष रोका पर उसका प्रभाव छिपाया नहीं; कंठ नीला पड़ा और वही पहचान बनी। चौथी, पार्वती ने कंठ दबाया — सहने वाले को भी किसी का साथ चाहिए।
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Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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