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भगवान् शिव को क्यों चढ़ाये जाते है भांग और धतूरा जानिए इसके

# भगवान् शिव को क्यों चढ़ाये जाते है भांग और धतूरा जानिए इसके पीछे के भाव - Sawan 2023 - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **भगवान् शिव को क्यों चढ़ाये जाते है भांग और धतूरा जानिए इसके पीछे

7 July 2026 13 min read|By Nidhi Shrimali

⚡ संक्षेप में — सावन मास

लेखिका: निधि श्रीमाली | वैदिक ज्योतिषी, 18+ वर्षों का अनुभव
अद्यतन: अगस्त 2026 | पढ़ने का समय: 13 मिनट
रेटिंग: ★★★★★ 4.9/5 (1,425+ परामर्श समीक्षाओं से)

सावन (श्रावण) हिंदू पंचांग का पाँचवाँ मास है और भगवान शिव को समर्पित सर्वाधिक पवित्र काल माना जाता है। इसका कारण समुद्र मंथन है — इसी मास में शिव ने हलाहल विष धारण किया था। सावन के सोमवार, मंगला गौरी व्रत, नाग पंचमी, शिवरात्रि और रक्षाबंधन इसी मास में आते हैं।


विषय सूची

  1. सावन मास क्या है
  2. सावन शिव को क्यों प्रिय है
  3. ज्योतिषीय दृष्टि से सावन
  4. सावन के प्रमुख व्रत और त्योहार
  5. सावन में क्या करें
  6. सावन के नियम — क्या वर्जित है
  7. आहार संबंधी नियम और उनका कारण
  8. शिव अभिषेक — किससे क्या फल
  9. कांवड़ यात्रा
  10. ग्रह दोष के अनुसार सावन उपाय
  11. प्रचलित भ्रांतियाँ

सावन मास क्या है

सावन, जिसे संस्कृत में श्रावण कहा जाता है, हिंदू चंद्र कैलेंडर का पाँचवाँ मास है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह सामान्यतः जुलाई-अगस्त में पड़ता है। इसका नाम श्रवण नक्षत्र से आया है — इस मास की पूर्णिमा श्रवण नक्षत्र में पड़ती है।

उत्तर भारत में सावन पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार गणना होती है, अतः वहाँ यह मास दक्षिण भारत (अमांत पंचांग) से लगभग पंद्रह दिन पहले प्रारंभ हो जाता है। इसीलिए महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और आंध्र में सावन की तिथियाँ उत्तर भारत से भिन्न होती हैं — यह भ्रम नहीं, दो भिन्न पंचांग पद्धतियाँ हैं।

सावन वर्षा ऋतु का मध्य है, और यही इसके अधिकांश नियमों का आधार है। यह मास चातुर्मास — चार मास की उस अवधि — का प्रथम मास है जिसमें परंपरा से संन्यासी एक स्थान पर रहते हैं और गृहस्थ शुभ कार्य स्थगित रखते हैं।

सावन शिव को क्यों प्रिय है

इसका मुख्य कारण समुद्र मंथन की कथा है।

जब देवताओं और असुरों ने अमृत हेतु समुद्र मंथन किया, तो अमृत से पूर्व हलाहल नामक भयंकर विष निकला। उस विष की ऊष्मा से तीनों लोक जलने लगे। किसी में उसे धारण करने का सामर्थ्य नहीं था। तब भगवान शिव ने उस विष को पी लिया और अपने कंठ में रोक लिया — न निगला, न उगला। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, और वे नीलकंठ कहलाए।

विष की ऊष्मा शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया। शास्त्रों के अनुसार यह घटना श्रावण मास में हुई थी — और यही कारण है कि सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाना सर्वाधिक फलदायी माना गया है। जब आप सावन में जलाभिषेक करते हैं, तो आप उसी कार्य की पुनरावृत्ति कर रहे होते हैं जो देवताओं ने किया था।

दूसरा कारण — शास्त्रों के अनुसार श्रावण में शिव अपने ससुराल, अर्थात् पृथ्वी पर, निवास करते हैं। एक अन्य परंपरा के अनुसार देवी पार्वती ने शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए इसी मास में कठोर तपस्या की थी। इसी कारण अविवाहित कन्याएँ सावन में व्रत रखती हैं।

तीसरा कारण व्यावहारिक है, और मैं इसे जजमानों को अवश्य बताती हूँ। वर्षा ऋतु में पाचन शक्ति क्षीण होती है, रोग फैलते हैं और यात्रा कठिन होती है। सावन के नियम — सात्विक आहार, संयम, यात्रा से बचाव, अधिक साधना — केवल धार्मिक विधान नहीं हैं। वे ऋतु के अनुसार जीवनशैली का विधान हैं, जिन्हें परंपरा ने धर्म का रूप देकर सुरक्षित रखा।

ज्योतिषीय दृष्टि से सावन

ज्योतिष में सावन का महत्व केवल परंपरागत नहीं है।

  • सूर्य कर्क राशि में — कर्क चंद्रमा की राशि है और जल तत्व की। सूर्य यहाँ अपनी उग्रता में कोमल होता है, जो साधना के लिए अनुकूल माना गया है।
  • शिव और चंद्रमा का संबंध — शिव मस्तक पर चंद्रमा धारण करते हैं। चंद्रमा मन का कारक है, अतः सावन में शिव उपासना का सीधा संबंध मानसिक शांति से है। जिन जजमानों का चंद्रमा पीड़ित है — अनिद्रा, चिंता, मानसिक अस्थिरता — उनके लिए सावन का सोमवार विशेष रूप से प्रभावी है।
  • सोमवार चंद्रमा का दिन है — और शिव का भी। सावन के सोमवार में दोनों का संयोग होता है, जो इस दिन को वर्ष का सर्वाधिक प्रभावी शिव-दिवस बनाता है।
  • शनि दोष का काल — सावन के शनिवार शनि उपासना के लिए विशेष माने गए हैं, क्योंकि शनि शिव के भक्त हैं और शिव उनके गुरु।
  • चातुर्मास में शुभ कार्य वर्जित — विवाह, गृह प्रवेश और नए व्यापार का आरंभ इस काल में नहीं किया जाता। इसका ज्योतिषीय कारण यह है कि इस अवधि में देवशयन काल माना जाता है।

सावन के प्रमुख व्रत और त्योहार

व्रत / त्योहारतिथिकिसके लिए
सावन सोमवारमास का प्रत्येक सोमवारसभी; विशेषतः अविवाहित कन्याएँ और दांपत्य सुख हेतु
मंगला गौरी व्रतप्रत्येक मंगलवारविवाहित स्त्रियाँ — पति की दीर्घायु; कन्याएँ — शीघ्र विवाह
सावन शनिवारप्रत्येक शनिवारशनि दोष, साढ़े साती से पीड़ित
हरियाली तीजशुक्ल तृतीयाविवाहित स्त्रियाँ; शिव-पार्वती मिलन का पर्व
नाग पंचमीशुक्ल पंचमीसर्प पूजा; काल सर्प और राहु-केतु दोष हेतु
श्रावण शिवरात्रिकृष्ण चतुर्दशीवर्ष की बारह मासिक शिवरात्रियों में सर्वाधिक फलदायी
कामिका एकादशीकृष्ण एकादशीपाप-क्षय हेतु उपवास
पुत्रदा एकादशीशुक्ल एकादशीसंतान प्राप्ति हेतु
रक्षाबंधनश्रावण पूर्णिमाभाई-बहन का पर्व
हिंडोला / झूला उत्सवमासभरवैष्णव परंपरा में कृष्ण का झूला

तिथियाँ प्रत्येक वर्ष बदलती हैं और उत्तर-दक्षिण पंचांग में भिन्न होती हैं। अपने क्षेत्र के पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।

सावन में क्या करें

व्यावहारिकता के क्रम में — जो सर्वाधिक प्रभावी है, वह पहले।

  1. प्रतिदिन शिवलिंग पर जल अर्पित करें। यही सावन का मूल कर्म है। शुद्ध जल, प्रातःकाल, ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए। यदि केवल एक कार्य करें, तो यह करें।
  2. सोमवार का व्रत रखें। सोलह सोमवार का संकल्प उत्तम, परंतु सावन के चार-पाँच सोमवार भी पर्याप्त हैं — यदि पूरे किए जाएँ।
  3. बिल्व पत्र अर्पित करें। तीन पत्तों वाला, चिकनी सतह नीचे की ओर। शिव को बिल्व पत्र अत्यंत प्रिय है, और यह उपाय निःशुल्क है।
  4. महामृत्युंजय मंत्र का जाप — स्वास्थ्य और आयु रक्षा हेतु सर्वोत्तम।
  5. रुद्राभिषेक कराएँ — यदि संभव हो तो श्रावण सोमवार अथवा शिवरात्रि को।
  6. शिव चालीसा या शिव तांडव स्तोत्र का पाठ।
  7. दान करें — अन्न, वस्त्र, छाता; वर्षा ऋतु में यह विशेष पुण्यकारी माना गया है।
  8. पशु-पक्षियों को भोजन दें — विशेषतः गाय को हरा चारा।
  9. ब्रह्मचर्य और संयम — मन, वाणी और आहार तीनों में।

सावन के नियम — क्या वर्जित है

वर्जितकारण
मांस और मदिराचातुर्मास में सात्विक आहार का विधान; पाचन दुर्बल रहता है
बैंगनवर्षा ऋतु में इसमें कीट अधिक होते हैं
हरी पत्तेदार सब्जियाँवर्षा में इन पर सूक्ष्म जीव और कीट पनपते हैं
दूध (कुछ परंपराओं में)वर्षा में गायों का चारा बदलता है; आयुर्वेद में इस काल का दूध भारी माना गया
विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापारचातुर्मास देवशयन काल है; शुभ मुहूर्त उपलब्ध नहीं
बाल और दाढ़ी कटानापरंपरागत संयम का अंग; अनिवार्य नहीं
क्रोध, कटु वचन, विवादयही सर्वाधिक महत्वपूर्ण नियम है और सर्वाधिक उपेक्षित
अनावश्यक यात्रावर्षा में मार्ग असुरक्षित; संन्यासियों के लिए तो पूर्णतः वर्जित

एक बात स्पष्ट कहना आवश्यक है। इन नियमों का पालन सामर्थ्य के अनुसार करें। जो व्यक्ति रोगी है, गर्भवती है, बालक है अथवा जिसे चिकित्सक ने विशेष आहार दिया है — उसके लिए ये नियम शिथिल हैं। शास्त्रों में भी यही विधान है। जो जजमान अपना स्वास्थ्य बिगाड़कर व्रत करते हैं, वे धर्म नहीं कर रहे हैं।

और सबसे महत्वपूर्ण — क्रोध और कटु वचन से बचना उपवास से अधिक फलदायी है। जो व्यक्ति भोजन त्यागकर घर में कलह करे, उसका व्रत निष्फल है।

आहार संबंधी नियम और उनका कारण

सावन के आहार नियम अंधविश्वास नहीं हैं, और उनका कारण जान लेने से पालन सरल हो जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में वात दोष बढ़ता है और अग्नि (पाचन शक्ति) मंद होती है। इसी कारण यह ऋतु रोगों की जननी कही गई है।

  • पत्तेदार सब्जियों का निषेध — वर्षा में नमी के कारण इन पर सूक्ष्म जीव और कीट पनपते हैं। यह स्वच्छता का विधान है।
  • बैंगन का निषेध — इसी कारण से; वर्षा में इसमें कीट अधिक पाए जाते हैं।
  • दूध पर संयम — वर्षा में गायों का चारा बदल जाता है और आयुर्वेद में इस काल का दूध भारी माना गया है। इसीलिए दूध शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है, पिया नहीं जाता — यह भी परंपरा का एक व्यावहारिक पक्ष है।
  • क्या लें — हल्का, गर्म, ताजा पका भोजन। खिचड़ी, दलिया, मूँग दाल, अदरक, हल्दी, काली मिर्च। जल उबालकर पिएँ।
  • क्या न लें — बासी भोजन, अत्यधिक तेल-मसाला, ठंडा पेय, बाहर का खुला भोजन।

शिव अभिषेक — किससे क्या फल

अभिषेक द्रव्य के अनुसार फल भिन्न माना गया है। यह शिव पुराण और रुद्राभिषेक की परंपरा से आता है।

द्रव्यफल
शुद्ध जलसामान्य शांति, ताप-शमन; सर्वाधिक प्रचलित और सबका अधिकार
गंगाजलपाप-क्षय, पितृ शांति
कच्चा दूधमानसिक शांति, संतान सुख, चंद्र दोष
दहीस्वास्थ्य, पुष्टि
घीआरोग्य, रोग निवारण
शहदवाणी में मधुरता, संबंधों में सुधार
गन्ने का रसधन-समृद्धि
पंचामृतसर्व सिद्धि — पाँचों का संयोग
भस्मवैराग्य, मोक्ष
सरसों का तेलशनि दोष शमन

शिव को क्या अर्पित न करें: हल्दी (यह देवी को अर्पित होती है), केतकी का पुष्प (कथानुसार शापित), तुलसी (यह विष्णु को अर्पित होती है), शंख से जल, नारियल का पानी, और टूटे चावल।

क्या अवश्य अर्पित करें: बिल्व पत्र, धतूरा, भाँग, आक (मदार) के पुष्प, सफेद पुष्प, अक्षत, चंदन और भस्म।

कांवड़ यात्रा

सावन की सर्वाधिक दृश्यमान परंपरा कांवड़ यात्रा है। भक्त — कांवड़िए — हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख अथवा सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल चलते हैं और अपने क्षेत्र के शिवालय में जलाभिषेक करते हैं।

परंपरा के अनुसार इसका आरंभ समुद्र मंथन से ही जुड़ा है — विष के ताप से पीड़ित शिव पर जल अर्पित करने की उसी परंपरा का विस्तार। कुछ मान्यताओं में इसे परशुराम अथवा रावण से भी जोड़ा जाता है।

कांवड़ के प्रमुख नियम — यात्रा में कांवड़ भूमि पर नहीं रखी जाती, स्नान के बिना उसे स्पर्श नहीं किया जाता, यात्रा में मांस-मदिरा पूर्णतः वर्जित है, चमड़े की वस्तुएँ नहीं रखी जातीं, और यात्रा नंगे पैर अथवा विशेष पादुका से की जाती है।

एक व्यावहारिक परामर्श, क्योंकि प्रत्येक वर्ष इसकी आवश्यकता पड़ती है: कांवड़ यात्रा शारीरिक रूप से कठिन है। जिन्हें हृदय रोग, मधुमेह अथवा उच्च रक्तचाप है, वे चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें। श्रद्धा का प्रमाण शरीर को कष्ट देना नहीं है — शास्त्रों में भी सामर्थ्य के अनुसार आचरण का विधान है।

ग्रह दोष के अनुसार सावन उपाय

सावन में शिव उपासना का लाभ सर्वाधिक तब होता है जब वह आपके ग्रह दोष के अनुसार हो। ये वे उपाय हैं जो मैं कुंडली देखकर देती हूँ।

दोषसावन में उपाय
चंद्र दोष — अनिद्रा, चिंता, मानसिक अशांतिप्रत्येक सोमवार कच्चे दूध से अभिषेक; चावल और सफेद वस्त्र का दान
शनि दोष — साढ़े साती, अष्टम शनिसावन शनिवार को सरसों के तेल से अभिषेक; हनुमान चालीसा; तिल-लोहे का दान
राहु-केतु / काल सर्पनाग पंचमी को नाग पूजा; महामृत्युंजय जाप; नारियल प्रवाहित करना
मंगल दोष / मांगलिकमंगला गौरी व्रत; लाल मसूर और गुड़ का दान
पितृ दोषश्रावण अमावस्या को तर्पण; पीपल को जल; ब्राह्मण भोजन
विवाह में विलंबसोलह सोमवार व्रत; मंगला गौरी व्रत; गौरी-शंकर पूजन
संतान बाधापुत्रदा एकादशी व्रत; संतान गोपाल मंत्र; रुद्राभिषेक
रोग और आयुमहामृत्युंजय मंत्र जाप; घी से अभिषेक

कौन सा दोष वास्तव में आपकी कुंडली में सक्रिय है — यह कुंडली विश्लेषण से ज्ञात होता है। लक्षणों के आधार पर अनुमान लगाकर उपाय करना प्रायः निष्फल रहता है।

प्रचलित भ्रांतियाँ

  1. "सावन में दूध पीना पाप है।" यह पाप नहीं, ऋतु-अनुसार परहेज है। रोगी, बालक और गर्भवती स्त्रियों के लिए यह लागू नहीं होता।
  2. "व्रत में जल भी नहीं पीना चाहिए।" निर्जला व्रत केवल विशिष्ट तिथियों के लिए है। सावन सोमवार का व्रत फलाहार अथवा एक समय भोजन के साथ भी मान्य है।
  3. "स्त्रियाँ शिवलिंग को स्पर्श नहीं कर सकतीं।" शास्त्रों में ऐसा सर्वमान्य निषेध नहीं है। स्थानीय परंपराएँ भिन्न हैं; अपने कुल और मंदिर की परंपरा का पालन करें।
  4. "सोलह सोमवार बीच में छूट जाए तो सब व्यर्थ।" छूटने पर संकल्प नवीनीकृत किया जा सकता है। शास्त्र इतने कठोर नहीं हैं।
  5. "सावन में कोई शुभ कार्य नहीं हो सकता।" विवाह और गृह प्रवेश वर्जित हैं, परंतु शिव पूजा, रुद्राभिषेक, दान, तीर्थ यात्रा और साधना — ये सर्वाधिक शुभ इसी मास में हैं।
  6. "अधिक कठोर व्रत, अधिक फल।" असत्य। सामर्थ्य से अधिक कठोरता शास्त्र-विरुद्ध है। संयम और सद्भाव का महत्व उपवास से अधिक है।

शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली


सावन में आपके लिए कौन सा उपाय?

सावन में शिव उपासना सभी के लिए है, परंतु सर्वाधिक लाभ तब होता है जब उपाय आपकी कुंडली के सक्रिय दोष के अनुसार हो।

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Frequently Asked Questions

सावन मास शिव को क्यों प्रिय है?+
मुख्य कारण समुद्र मंथन है। इसी मास में भगवान शिव ने हलाहल विष पीकर कंठ में धारण किया, जिससे वे नीलकंठ कहलाए, और देवताओं ने विष का ताप शांत करने के लिए उन पर जल अर्पित किया। इसीलिए सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाना सर्वाधिक फलदायी माना गया है। एक अन्य मान्यता के अनुसार देवी पार्वती ने इसी मास में शिव को पति रूप में पाने हेतु तपस्या की थी।
सावन में क्या नहीं खाना चाहिए और क्यों?+
मांस, मदिरा, बैंगन, हरी पत्तेदार सब्जियाँ और कुछ परंपराओं में दूध वर्जित है। कारण आयुर्वेदिक है — वर्षा ऋतु में वात दोष बढ़ता है और पाचन शक्ति मंद होती है, तथा नमी के कारण पत्तेदार सब्जियों और बैंगन पर सूक्ष्म जीव पनपते हैं। रोगी, बालक और गर्भवती स्त्रियों के लिए ये नियम शिथिल हैं।
सावन में शिवलिंग पर क्या नहीं चढ़ाना चाहिए?+
हल्दी नहीं चढ़ानी चाहिए क्योंकि वह देवी को अर्पित होती है, तुलसी नहीं क्योंकि वह विष्णु को अर्पित होती है, केतकी का पुष्प कथानुसार शापित है, तथा शंख से जल, नारियल का पानी और टूटे चावल भी वर्जित हैं। अर्पित करें — बिल्व पत्र, धतूरा, भाँग, आक के पुष्प, सफेद पुष्प, अक्षत, चंदन और भस्म।
सावन में कौन-कौन से व्रत और त्योहार आते हैं?+
सावन सोमवार, प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत, सावन शनिवार, हरियाली तीज, नाग पंचमी, श्रावण शिवरात्रि, कामिका और पुत्रदा एकादशी, तथा श्रावण पूर्णिमा को रक्षाबंधन। तिथियाँ प्रत्येक वर्ष बदलती हैं और उत्तर-दक्षिण पंचांग में भिन्न होती हैं, अतः अपने क्षेत्र के पंचांग से पुष्टि करें।
क्या सावन में विवाह और गृह प्रवेश किया जा सकता है?+
नहीं। सावन चातुर्मास का प्रथम मास है, जिसे देवशयन काल माना जाता है, अतः विवाह, गृह प्रवेश और नए व्यापार का आरंभ वर्जित है। परंतु शिव पूजा, रुद्राभिषेक, दान, तीर्थ यात्रा और साधना — ये सर्वाधिक शुभ इसी मास में माने गए हैं।
सावन में सबसे प्रभावी उपाय क्या है?+
प्रतिदिन प्रातःकाल शिवलिंग पर शुद्ध जल अर्पित करना, ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए। यदि केवल एक कार्य किया जाए तो यही करें — यह निःशुल्क है और सावन का मूल कर्म है। इसके साथ बिल्व पत्र अर्पित करना और सोमवार का व्रत रखना। सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्रोध और कटु वचन से बचें — यह उपवास से अधिक फलदायी है।
उत्तर और दक्षिण भारत में सावन की तिथियाँ भिन्न क्यों होती हैं?+
क्योंकि दोनों में भिन्न पंचांग पद्धति चलती है। उत्तर भारत में पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार गणना होती है, जिसमें मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है, और दक्षिण भारत में अमांत पंचांग, जिसमें मास अमावस्या पर समाप्त होता है। इसी कारण उत्तर भारत में सावन लगभग पंद्रह दिन पहले प्रारंभ हो जाता है। यह भ्रम नहीं, दो मान्य पद्धतियाँ हैं।
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Written by

Nidhi Shrimali

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