लेखिका: निधि श्रीमाली, वैदिक ज्योतिषी | अपडेट: अक्टूबर 2026
सीधा उत्तर: शिव पूजा में शंख से शिवलिंग पर जल या दूध नहीं चढ़ाया जाता, और शंख को शिवलिंग पर नहीं रखा जाता। इसका मुख्य कारण शिव पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण की शंखचूड़ कथा है: भगवान शिव ने असुर शंखचूड़ का वध किया था, और कथा के अनुसार उसी की अस्थियों से शंख बने। शंख विष्णु और लक्ष्मी की पूजा का अंग है, शिव के अभिषेक का नहीं।
शंख की आवाज़ से जहाँ विष्णु के धाम में देवता जागते हैं, वहीं शिवलिंग के अभिषेक में शंख का प्रयोग नहीं होता। कई भक्त सोचते हैं कि शंख तो शुभ है, तो शिव पूजा में क्यों नहीं? इस लेख में इसी प्रश्न का उत्तर है: शंख किसका प्रतीक है, शंखचूड़ की कथा क्या है, इंटरनेट पर फैले कौन से कारण गलत हैं, शिव मंदिर में शंखनाद का क्या नियम है, और शिव पूजा में शंख की जगह क्या प्रयोग करें।
विषय सूची (Table of Contents)
- शंख क्या है और उसका धार्मिक स्थान
- शंख का धार्मिक महत्व: विष्णु, लक्ष्मी और दुर्गा से संबंध
- शिव पूजा में शंख क्यों वर्जित है: असली कारण और प्रचलित भ्रांतियाँ
- समुद्र मंथन, पांचजन्य और शंखचूड़: तीन अलग कथाएँ
- शंख और डमरू: "संवाद" की कथा और वास्तविक परंपरा
- शिव मंदिर में शंख बजाने का प्रश्न
- शिव पूजा में क्या प्रयोग करें: तुलना तालिका सहित
- शंख के प्रकार और उनका प्रयोग
- क्या शिवलिंग पर शंख रख सकते हैं: स्पष्ट उत्तर
- नियम का अर्थ, सावधानियाँ और प्रश्न
शंख क्या है और उसका धार्मिक स्थान
पूजा में प्रयोग होने वाला शंख समुद्र में रहने वाले एक बड़े घोंघे (sea snail) का खोल है। भारत में पूजा का शंख मुख्यतः दक्षिण भारत और श्रीलंका के समुद्र तट से आता है। इसकी बनावट सर्पिल (घुमावदार) होती है और भीतर से खोखली होने के कारण इसमें फूँक मारने पर गहरी ध्वनि निकलती है। सफ़ेद, चिकना और चमकदार होने से इसे शुभ्रता और पवित्रता का प्रतीक माना गया है।
हिन्दू परंपरा में शंख का प्रयोग अनेक अवसरों पर होता है: पूजा और आरती के आरम्भ और अंत में शंखनाद, विष्णु और लक्ष्मी को शंख में जल भरकर अर्घ्य, विवाह और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों में शंखध्वनि, और बंगाल-ओडिशा में संध्या के समय घर-घर शंख बजाना। शंखनाद को अशुभता दूर करने वाली ध्वनि माना जाता है।
शंख के प्रचलित प्रकार हैं: वामावर्ती शंख (सबसे सामान्य, पूजा और शंखनाद में प्रयुक्त), दक्षिणावर्ती शंख (नाम का अर्थ "दाहिनी ओर घूमा हुआ"; दुर्लभ, लक्ष्मी पूजा में रखा जाता है), और बाज़ार में बिकने वाले गणेश शंख, गोमुखी शंख और पंचमुखी शंख जैसे आकार-आधारित नाम। इन सबका विस्तार आगे "शंख के प्रकार" वाले भाग में है।
शंख का धार्मिक महत्व: विष्णु, लक्ष्मी और दुर्गा से संबंध
विष्णु: भगवान विष्णु चार आयुध धारण करते हैं: शंख, चक्र, गदा और पद्म। इसी से उनका एक नाम "शंख-चक्र-गदा-पद्म-धारी" है। उनके शंख का नाम पांचजन्य है। विष्णु पूजा में शंख से जल अर्पित करना और शंखनाद करना, दोनों का विधान है, और शालिग्राम का अभिषेक शंख से करने की परंपरा है।
लक्ष्मी: समुद्र मंथन से निकले रत्नों की प्रचलित सूचियों में शंख भी है, और लक्ष्मी भी समुद्र मंथन से प्रकट हुईं। इसलिए शंख को "लक्ष्मी का सहोदर" (भाई) कहा जाता है, और दीपावली की लक्ष्मी पूजा में शंख रखने की परंपरा है। यह एक धार्मिक मान्यता है; शंख रखने से धन की कमी दूर होने की कोई गारंटी नहीं है, और आर्थिक निर्णय के लिए ठोस योजना और सलाह ही काम आती है।
दुर्गा: देवी के अष्टभुजा और दशभुजा रूपों में शंख उनके आयुधों में दिखता है। दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में देवताओं द्वारा देवी को अपने-अपने आयुध देने का वर्णन है, जिसमें वरुण देवी को शंख देते हैं। बंगाल की दुर्गा पूजा में शंखनाद पूजा का अभिन्न अंग है।
पंचमुखी शंख के बारे में यह मान्यता प्रचलित है कि यह पाँच तत्वों का प्रतीक है। यह लोक-मान्यता है, किसी प्रमुख ग्रंथ का विधान नहीं, इसलिए इसके लिए विशेष दाम देने से पहले सोच-विचार करें।
शिव पूजा में शंख क्यों वर्जित है: असली कारण और प्रचलित भ्रांतियाँ
इंटरनेट पर इस प्रश्न के कई "कारण" मिलते हैं, पर उन सबका आधार एक जैसा नहीं है। नीचे पाँच बातें हैं: पहली, दूसरी और चौथी परंपरा से जुड़ी हैं, तीसरी एक भ्रांति है, और पाँचवीं, शंखचूड़ की कथा, असली और मुख्य कारण है।
1. शंख विष्णु का आयुध है
शंख विष्णु के चार आयुधों में से एक है। शिव के अपने प्रतीक अलग हैं: त्रिशूल, डमरू, पिनाक धनुष, जटा में गंगा, मस्तक पर चंद्र और गले में सर्प। इसलिए हर देवता की पूजा में उसी की सामग्री का प्रयोग स्वाभाविक है। पर केवल इतना कारण पर्याप्त नहीं है, क्योंकि अनेक वस्तुएँ (जैसे घंटा, दीप, पुष्प) सभी देवताओं की पूजा में चलती हैं। शंख के साथ विशेष निषेध का कारण पाँचवीं बात, यानी शंखचूड़ कथा, से आता है।
2. पांचजन्य शंख और उसका सही इतिहास
विष्णु और उनके अवतार श्रीकृष्ण का शंख पांचजन्य कहलाता है। भागवत पुराण की कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने अपने गुरु सांदीपनि के पुत्र को खोजते समय समुद्र में रहने वाले पंचजन नामक असुर का वध किया, और उसी से प्राप्त शंख पांचजन्य कहलाया। भगवद्गीता (1.15) में बताया गया है कि कुरुक्षेत्र में युद्ध के आरम्भ में श्रीकृष्ण ने पांचजन्य और अर्जुन ने देवदत्त शंख बजाया था।
यह कथा शंख को विष्णु-कृष्ण से जोड़ती है, पर शिव पूजा में शंख के निषेध का सीधा कारण नहीं बताती। इसे इसी रूप में समझें: एक संबंध, निषेध का आधार नहीं।
3. भ्रांति: "शंख सात्विक है और शिव तामसिक, इसलिए मेल नहीं"
कुछ लेखों में लिखा मिलता है कि शिव की पूजा तामसिक है और शंख सात्विक होने से "विरोधी" है। यह बात परंपरा के अनुरूप नहीं है। शिव की उपासना घर-घर में पूरी तरह सात्विक विधि से होती है: जल, दूध, बिल्व पत्र, भस्म और पंचाक्षर मंत्र। शिव को "शुद्ध स्फटिक संकाश" (स्फटिक जैसे निर्मल) कहा गया है। अघोर या तांत्रिक परंपराएँ शिव उपासना की कुछ धाराएँ हैं, पूरी शिव पूजा नहीं। इसलिए इस तर्क पर भरोसा न करें; शंख का निषेध एक कथा से आता है, गुणों के टकराव से नहीं।
4. समुद्र मंथन: शंख, लक्ष्मी और विष्णु का संबंध
समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों की प्रचलित सूचियों में शंख का नाम आता है। लक्ष्मी भी मंथन से प्रकट होकर विष्णु को वरण करती हैं। इस तरह शंख विष्णु-लक्ष्मी परिवार की वस्तु माना गया। ध्यान दें कि यही मंथन शिव से भी जुड़ा है: हलाहल विष शिव ने पिया और नीलकंठ कहलाए। इसलिए मंथन की कथा अपने आप में शिव पूजा से शंख को बाहर नहीं करती; यह केवल बताती है कि शंख विष्णु-लक्ष्मी की पूजा में क्यों प्रमुख है।
5. मुख्य कारण: शंखचूड़ वध की कथा
शिव पुराण (रुद्र संहिता, युद्ध खंड) और ब्रह्मवैवर्त पुराण में शंखचूड़ नामक दानव की कथा है। वह अत्यंत बलशाली था, उसने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने उससे युद्ध किया और अपने त्रिशूल से उसका वध किया। कथा के अनुसार शंखचूड़ की अस्थियाँ समुद्र में गिरीं और उन्हीं से शंख उत्पन्न हुए।
इसी कारण शंख में भरा जल शिव को अर्पित नहीं किया जाता, क्योंकि शंख उस असुर का अवशेष माना गया जिसका संहार स्वयं शिव ने किया। वहीं विष्णु के लिए शंख-जल पवित्र माना गया। यही वह कारण है जो ग्रंथों में मिलता है, और "शंख से शिवलिंग पर जल न चढ़ाएँ" वाले नियम का सीधा आधार है।
समुद्र मंथन, पांचजन्य और शंखचूड़: तीन अलग कथाएँ
इस विषय पर सबसे अधिक भ्रम इसलिए होता है क्योंकि तीन अलग कथाएँ आपस में मिला दी जाती हैं। इन्हें अलग-अलग समझना ज़रूरी है:
- समुद्र मंथन शंख को लक्ष्मी और विष्णु से जोड़ता है। मंथन में पहले हलाहल निकला, जिसे शिव ने कंठ में धारण किया; फिर कामधेनु, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, लक्ष्मी और अंत में अमृत। रत्नों की सूची अलग-अलग ग्रंथों में थोड़ी भिन्न है, पर अमृत सबसे अंत में निकला, यह सभी में समान है।
- पांचजन्य की कथा पंचजन असुर से जुड़ी है, मंथन से नहीं। इसे श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र युद्ध के आरम्भ में बजाया था।
- शंखचूड़ की कथा ही शिव पूजा में शंख के निषेध का कारण बताती है।
शंखचूड़ की कथा का एक और हिस्सा है जो शिव पूजा के एक दूसरे नियम को भी समझाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण और शिव पुराण के अनुसार शंखचूड़ की पत्नी तुलसी थीं, जो अत्यंत पतिव्रता थीं। वरदान के अनुसार जब तक तुलसी का पतिव्रत अखंड था, शंखचूड़ को मारा नहीं जा सकता था। कथा के अनुसार विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण कर उनका व्रत भंग किया, तब शिव शंखचूड़ का वध कर सके। तुलसी ने विष्णु को पत्थर होने का शाप दिया, जिससे शालिग्राम की परंपरा जुड़ती है, और स्वयं तुलसी पौधे के रूप में पूजनीय हुईं। इसी कथा के कारण तुलसी भी शिव को नहीं चढ़ाई जाती, जबकि विष्णु पूजा में वह अनिवार्य मानी जाती है।
दोनों पुराणों में कथा के विवरण (जैसे शंखचूड़ का पूर्वजन्म और वरदान का स्वरूप) अलग-अलग हैं। मूल बात दोनों में एक है: शंखचूड़ का वध शिव ने किया, और शंख और तुलसी दोनों इसी कथा से शिव पूजा से अलग रखे गए।
शंख और डमरू: "संवाद" की कथा और वास्तविक परंपरा
सोशल मीडिया और कुछ वेबसाइटों पर एक कथा घूमती है कि देवताओं में शंख और डमरू की ध्वनि को लेकर विवाद हुआ, और शिव के डमरू ने विष्णु के शंखनाद को "शांत" कर दिया। इस कथा का किसी प्रमुख पुराण में कोई स्रोत हमें नहीं मिलता। शिव और विष्णु को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी दिखाने वाली ऐसी कहानियाँ परंपरा की भावना के भी विरुद्ध हैं, क्योंकि शैव और वैष्णव, दोनों परंपराएँ हरि और हर को एक मानती हैं।
वास्तविक परंपरा यह है कि डमरू शिव का अपना वाद्य है। नटराज के तांडव में डमरू सृष्टि की लय का प्रतीक है, और व्याकरण परंपरा में माना जाता है कि पाणिनि के चौदह माहेश्वर सूत्र शिव के डमरू की चौदह ध्वनियों से निकले। इसलिए शिव पूजा में डमरू बजाना स्वाभाविक है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि शंख और डमरू में कोई "प्रतिस्पर्धा" है; दोनों अपने-अपने देवता की परंपरा का हिस्सा हैं।
शिव मंदिर में शंख बजाने का प्रश्न: क्या शंख बज सकता है?
यहाँ दो अलग बातों को अलग रखना ज़रूरी है: शंख से जल अर्पण और शंखनाद।
- शंख से शिवलिंग पर जल, दूध या पंचामृत चढ़ाना: इस पर परंपरा लगभग एकमत है कि यह नहीं करना चाहिए। अभिषेक तांबे, पीतल या चाँदी के लोटे से, या जलधारी से करें।
- शंखनाद (शंख बजाना): यहाँ क्षेत्रीय परंपराएँ अलग हैं। अनेक शिव मंदिरों में आरती के समय शंख, घंटा और डमरू साथ बजते हैं। कुछ स्थानों और परिवारों में गर्भगृह के भीतर शंख नहीं बजाया जाता। जिस मंदिर में जाएँ, वहाँ के पुजारी जी की परंपरा का पालन करें।
घर की पूजा के लिए सरल नियम: आरती के समय शंख बजाना हो तो बजा सकते हैं, पर शिवलिंग के अभिषेक में शंख का प्रयोग न करें और शंख को शिवलिंग पर न रखें। जिनके घर में शिवलिंग स्थापित है, वे बारह ज्योतिर्लिंगों की परंपरा और वहाँ की पूजा-विधि के बारे में भी पढ़ सकते हैं, जहाँ यह भेद स्पष्ट दिखता है।
शिव पूजा में क्या प्रयोग करें: डमरू, त्रिशूल, बिल्व और गंगाजल
नीचे की तालिका एक नज़र में बताती है कि विष्णु-लक्ष्मी पूजा और शिव पूजा में कौन सी सामग्री कहाँ चलती है, और क्यों:
| सामग्री | विष्णु / लक्ष्मी पूजा | शिव पूजा | कारण |
|---|---|---|---|
| शंख से जल-अर्पण | हाँ, विधान है | नहीं | शंखचूड़ कथा |
| शंखनाद | हाँ | आरती में अनेक मंदिरों में होता है; स्थानीय परंपरा मानें | क्षेत्रीय परंपरा |
| तुलसी | हाँ, अनिवार्य मानी जाती है | नहीं | तुलसी शंखचूड़ की पत्नी थीं (वही कथा) |
| बिल्व पत्र | सामान्यतः नहीं | हाँ, सबसे प्रिय | शिव पुराण में बिल्व की महिमा |
| केतकी का फूल | चल सकता है | नहीं | लिंगोद्भव कथा में केतकी ने ब्रह्मा के पक्ष में झूठी गवाही दी |
| हल्दी, कुमकुम | हाँ | सामान्यतः शिवलिंग पर नहीं | प्रचलित मान्यता; परंपराएँ भिन्न हैं |
शंख के स्थान पर शिव पूजा में ये वस्तुएँ प्रयोग होती हैं:
तांबे का लोटा या जलधारी: अभिषेक के लिए। यह शंख का सीधा विकल्प है।
डमरू और घंटा: डमरू शिव का अपना वाद्य है। आरती में घंटा बजाना सभी देवताओं की पूजा में चलता है।
त्रिशूल: शिव का आयुध, जिसे सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणों का प्रतीक भी माना जाता है। पूजा-स्थान पर छोटा त्रिशूल रखने की परंपरा कई घरों में है।
बिल्व पत्र: शिव को सबसे प्रिय। तीन पत्तियों वाला साबुत, बिना कटा-फटा बिल्व पत्र चिकनी सतह शिवलिंग की ओर रखकर चढ़ाया जाता है। इसकी विधि और नियम हमारे बिल्व पत्र वाले लेख में विस्तार से हैं।
गंगाजल और शुद्ध जल: शिवलिंग पर अभिषेक के लिए। गंगाजल में तुलसी न डालें।
दूध, दही, घी, शहद: पंचामृत अभिषेक के लिए। कुछ लोग दूध में केसर मिलाते हैं।
काले तिल: सावन और शनिवार को शिवलिंग पर काले तिल चढ़ाने की परंपरा है; इसके नियम शिवलिंग पर काले तिल चढ़ाने वाले लेख में हैं।
धतूरा, आक और कनेर: शिव को प्रिय फूल-फल।
चंदन और भस्म: शिवलिंग पर चंदन का लेप और भस्म (विभूति) लगाना शुभ माना जाता है।
पूजा के साथ पंचाक्षरी मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का जाप सबसे सरल और सबसे पूर्ण उपासना मानी जाती है।
शंख के प्रकार: शिव के अभिषेक में कोई नहीं, अन्य देवताओं की पूजा में कौन सा
शिवलिंग के अभिषेक के लिए कोई भी शंख प्रयोग नहीं होता, चाहे उसका प्रकार कुछ भी हो। अन्य देवताओं की पूजा में शंखों का प्रयोग इस प्रकार प्रचलित है:
- वामावर्ती शंख: सबसे सामान्य शंख। शंखनाद, आरती और विष्णु-लक्ष्मी पूजा में जल-अर्पण के लिए।
- दक्षिणावर्ती शंख: दुर्लभ, इसलिए महँगा। लक्ष्मी पूजा में इसे लाल वस्त्र पर स्थापित करने की परंपरा है। यह बजाने के लिए नहीं, पूजा में रखने के लिए होता है। दुर्लभ होने के कारण बाज़ार में नकली या घिसकर बदले गए शंख भी बिकते हैं, इसलिए विश्वसनीय स्रोत से ही लें। हमारे विशेष पूजा सामग्री संग्रह में दक्षिणावर्ती शंख और वामावर्ती शंख दोनों हैं।
- गणेश शंख: गणेश जी की आकृति जैसा दिखने वाला शंख, गणेश पूजा में रखा जाता है।
- पंचमुखी और गोमुखी शंख: आकार-आधारित नाम। इनकी विशेष महिमा अधिकतर लोक-मान्यता पर आधारित है।
कोई भी शंख घर में सुख-समृद्धि की गारंटी नहीं देता। शंख पूजा का एक अंग है; उसका महत्व श्रद्धा और नियमित पूजा से है, शंख की कीमत से नहीं।
क्या शिवलिंग पर शंख रख सकते हैं: स्पष्ट उत्तर
स्पष्ट उत्तर: नहीं। शंख को शिवलिंग के ऊपर नहीं रखना चाहिए और शंख से शिवलिंग पर जल, दूध या कोई भी द्रव नहीं चढ़ाना चाहिए। यह नियम शंखचूड़ कथा से आता है और लगभग सभी परंपराएँ इसे मानती हैं।
पर इसका अर्थ यह नहीं कि घर में शंख और शिवलिंग एक साथ नहीं रह सकते। अधिकांश घरों के पूजा-स्थान में शिव, विष्णु, लक्ष्मी और गणेश सब साथ विराजते हैं। अलग कमरे या दीवार की कोई शास्त्रीय शर्त नहीं है। व्यावहारिक नियम यह है:
- शंख को अपने स्टैंड (शंख-पात्र) पर विष्णु या लक्ष्मी की ओर रखें, शिवलिंग के ऊपर या उसकी जलधारी में नहीं।
- शिवलिंग के अभिषेक के लिए अलग लोटा रखें।
- घर के लिए शिवलिंग चुनना हो तो नर्मदा नदी से मिलने वाला नर्मदेश्वर शिवलिंग परंपरा में स्वयंभू माना जाता है और उसे प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं मानी जाती।
यदि घर के वास्तु के अनुसार पूजा-स्थान की दिशा तय करनी हो, तो सामान्यतः ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को पूजा के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। आपके घर का नक्शा देखकर सही स्थान के लिए वास्तु परामर्श लिया जा सकता है।
शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली
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नियम का अर्थ, सावधानियाँ और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस नियम को समझकर पालन करने का अर्थ
- पूजा परंपरा के अनुरूप होती है: शिव और विष्णु, दोनों की अपनी-अपनी पूजा-विधि का सम्मान होता है।
- कथा याद रहती है: शंख और तुलसी, दोनों का शिव पूजा से अलग रहना एक ही कथा से समझ आ जाता है।
- भ्रांतियों से बचाव: "शंख सात्विक, शिव तामसिक" या "शंख-डमरू विवाद" जैसी बिना आधार की बातों से मुक्ति मिलती है।
- डर नहीं, समझ: यह नियम श्रद्धा का विषय है, दंड का नहीं। भूल से शंख से जल चढ़ गया हो तो किसी अनिष्ट का डर न रखें; अगली बार सही विधि अपनाएँ।
- घर में व्यवस्था: एक ही पूजा-स्थान में शंख और शिवलिंग दोनों सही ढंग से रखे जा सकते हैं।
- बच्चों को सही जानकारी: अगली पीढ़ी को नियम के साथ उसका कारण भी मिलता है।
यह नियम किसी इच्छा की पूर्ति की गारंटी नहीं देता। पूजा का फल भाव और नियमितता से जुड़ा माना गया है, किसी एक वस्तु के प्रयोग या निषेध से नहीं।
ध्यान रखने योग्य 7 सावधानियां
- शंख को शिवलिंग पर न रखें: शंख अपने स्टैंड पर विष्णु-लक्ष्मी की ओर रहे।
- शंख-जल शिवलिंग पर न चढ़ाएँ: अभिषेक में लोटा या जलधारी प्रयोग करें।
- मंदिर की परंपरा मानें: शंखनाद के बारे में हर मंदिर का अपना नियम है; पुजारी जी से पूछ लें।
- तुलसी भी शिव को न चढ़ाएँ: यह उसी कथा से जुड़ा नियम है।
- शंख को साफ़ रखें: पूजा के बाद शंख का जल खाली कर, धोकर सुखाएँ ताकि उसमें गंदगी न जमे।
- ज़ोर से शंख बजाते समय सावधानी: साँस या फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग या हाल में हुई सर्जरी हो तो ज़ोर लगाकर शंख न बजाएँ; डॉक्टर की सलाह पहले लें।
- दक्षिणावर्ती शंख विश्वसनीय स्रोत से लें: दुर्लभ होने के कारण इसके नकली रूप बहुत बिकते हैं।
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क्या शिवालय में शंख बजाया जा सकता है?+
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क्या शिव पूजा में डमरू जरूरी है?+
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Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.