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जानिए भगवान शिव की पूजा में क्यों नहीं होता है शंख का प्रयोग

# जानिए भगवान शिव की पूजा में क्यों नहीं होता है शंख का प्रयोग - Conch Shell - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **जानिए भगवान शिव की पूजा में क्यों नहीं होता है शंख का प्रयोग** — यह विषय

7 July 2026 16 min read|By Nidhi Shrimali

✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।

शंख की आवाज़ से जहाँ विष्णु के धाम में देवता जागते हैं, वहीं शिव-मंदिर में यही शंखनाद वर्जित माना जाता है। कई भक्त सोचते हैं कि शंख तो शुभ ध्वनि है, तो शिवलिंग पर इसे क्यों नहीं रखा जा सकता? इस लेख में हम इसी एक प्रश्न का गहराई से उत्तर देंगे — शंख किसका प्रतीक है, उसकी उत्पत्ति कैसे हुई, पाँच कारण जिनकी वजह से वह शिव पूजा में निषिद्ध है, और शिव आराधना में उसके विकल्प क्या हैं।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. शंख क्या है और उसका धार्मिक स्थान
  2. शंख का धार्मिक महत्व — विष्णु, लक्ष्मी और दुर्गा से संबंध
  3. 5 कारण — शिव पूजा में शंख क्यों वर्जित है
  4. पौराणिक कथा — समुद्र मंथन और पांचजन्य शंख की उत्पत्ति
  5. शिव-विष्णु के शंख और डमरू का रहस्यमय संवाद
  6. शिव मंदिर में शंख बजाने का विवाद — क्या वास्तव में बज सकता है?
  7. शिव पूजा में क्या प्रयोग करें — डमरू, त्रिशूल, बिल्व और गंगाजल
  8. कौन से शंख शिव के लिए वर्जित और कौन से अन्य देवताओं के लिए शुभ
  9. क्या शिवलिंग पर शंख रख सकते हैं — स्पष्ट उत्तर
  10. फायदे, सावधानियां और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शंख क्या है और उसका धार्मिक स्थान

शंख समुद्र के भीतर पाया जाने वाला एक कवचधारी जीव है जिसका खोखला कुनुष्ठ रूप हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में शंख को "शंख" नाम से ही वर्णित किया गया है, और इसे समुद्र-देवता वरुण का भी आभूषण कहा गया है। शंख की बनावट सीधी, सफेद, चमकदार और मोड़दार होती है — इसीलिए इसे "शुभ्र" कहा जाता है।

हिन्दू संस्कृति में शंख का प्रयोग अनेक कार्यों में होता है — पूजा के आरम्भ में शंखनाद, यज्ञ में आहुति से पहले शंख की ध्वनि, विवाह में शंखध्वनि के साथ वर-वधू का स्वागत, और मंदिरों में प्रवेश के समय भक्तों का शंखनाद। शंख की ध्वनि को "शंखनाद" या "पांचजन्य ध्वनि" कहा जाता है और यह अशुभता को दूर करने वाली मानी जाती है। शंख में जल भरकर किसी देवता पर चढ़ाने को "शंख-जल-अर्पण" कहते हैं, जो विशेष शुभ माना जाता है।

शंख के मुख्य प्रकार — दक्षिणावर्ती शंख (दाएँ से बाएँ मुड़ने वाला, अत्यंत दुर्लभ, सीधे विष्णु से जुड़ा), वामावर्ती शंख (बाएँ से दाएँ, सामान्य), पंचमुखी शंख (पाँच मुख वाला, पाँच तत्वों का प्रतीक), और गणेश शंख (गणेश जी से जुड़ा)। इनमें दक्षिणावर्ती शंख सबसे पवित्र माना जाता है और इसकी पूजा का विधान विशेष है।

शंख का धार्मिक महत्व — विष्णु, लक्ष्मी और दुर्गा से संबंध

शंख सीधे भगवान विष्णु के साथ जुड़ा हुआ है। भगवान विष्णु के चार आयुधों में शंख, गदा, पद्म और खड्ग हैं, और इनमें शंख सबसे प्रमुख है। भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के समय पांचजन्य नामक शंख को अपने हाथ में धारण किया था, जो उनकी शक्ति और तेज का प्रतीक है। शंखनाद को विष्णु की विजय का प्रतीक माना जाता है — जब भी अधर्म पर धर्म की विजय होती है, शंखनाद गूँज उठता है।

माता लक्ष्मी की पूजा में भी शंख का विशेष स्थान है। धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मी को शंख अत्यंत प्रिय है, और दीपावली के दिन व्यापारी अपनी दुकानों पर शंख रखकर पूजा करते हैं। कहा जाता है कि शंख घर में रखने से लक्ष्मी का आगमन होता है और धन की कमी दूर होती है। नवग्रहों में शुक्र और बृहस्पति की शांति के लिए भी शंख का प्रयोग शुभ माना जाता है।

देवी दुर्गा की उपासना में भी शंख प्रमुख है। माँ भगवती के नौ रूपों में शंख उनके आयुधों में से एक है। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में कन्याओं के पैर धोने के बाद शंख से जल चढ़ाने की परंपरा है। इसी प्रकार भगवान गणेश, भैरव बाबा, और सूर्य देव की पूजा में भी शंख का प्रयोग शुभ माना गया है।

पंचमुख शंख पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — का प्रतीक है। इसे पाँच देवताओं — विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और सूर्य — का प्रतीक भी कहा जाता है। इसी कारण पंचमुख शंख की पूजा पाँच देवताओं की पूजा के समान फलदायी मानी जाती है।

5 कारण — शिव पूजा में शंख क्यों वर्जित है

शास्त्रों में शंख के शिव पूजा में वर्जित होने के पाँच प्रमुख कारण बताए गए हैं:

1. शंख विष्णु का प्रतीक है

शंख विष्णु भगवान का अविच्छिन्न अस्त्र है। पांचजन्य नाम से प्रसिद्ध यह शंख समुद्र मंथन से प्रकट हुआ और विष्णु ने इसे अपने हाथ में धारण किया। शिव भगवान के अपने आयुध हैं — त्रिशूल, डमरू, पिनाक, खप्पर और अर्धचंद्र — इनमें शंख नहीं है। जब शंख विष्णु का प्रतीक है, तो शिव की पूजा में उसे स्थान देना उचित नहीं माना जाता। यही कारण है कि किसी भी प्राचीन शिव मंदिर के गर्भगृह में शंख नहीं रखा जाता।

2. शंखनाद विष्णु के पांचजन्य से संबंधित

शंख की ध्वनि को सीधे विष्णु के पांचजन्य शंख की ध्वनि से जोड़ा जाता है। पुराणों के अनुसार जब भी विष्णु ने किसी असुर का वध किया, शंखनाद से आकाश गूँज उठा। महाभारत में भी भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में पांचजन्य बजाकर युद्ध का आरम्भ किया। शिव तो स्वयं "पंचवक्रत्र" (पाँच मुख वाले) हैं — वे नाद के स्रोत स्वयं हैं, इसलिए उनकी पूजा में बाहरी नाद (शंखनाद) अनावश्यक और विरोधी माना जाता है।

3. शिव तांत्रिक रूप में शंख को तामसिक माना जाते हैं

शिव के तांत्रिक स्वरूप में वे अघोरी, उन्मनी और वाममार्गी रूप में पूजे जाते हैं। शंख एक सात्विक और शुभ्र वस्तु है जो विष्णु के सात्विक रूप से जुड़ी है। शिव की तांत्रिक उपासना में सात्विकता से अधिक तामस और राजस तत्वों की आवश्यकता होती है। शंख सात्विक प्रतीक होने से शिव की तांत्रिक पूजा में यह विरोधी माना गया। शिवलिंग पर शंख रखने से शिव-तत्व में अशुद्धता आने की मान्यता है।

4. शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन से — विष्णु से सीधा संबंध

समुद्र मंथन की कथा के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र को मथकर अमृत निकाला, तब अनेक रत्न और अस्त्र प्रकट हुए। उनमें से एक था शंख "पांचजन्य", जो सीधे भगवान विष्णु को प्राप्त हुआ। विष्णु ने उसे अपना प्रमुख आयुध बनाया। जिस शंख का जन्म ही विष्णु के लिए हुआ, उसे शिव की पूजा में स्थान देना शास्त्रसम्मत नहीं है।

5. पौराणिक कथा — विष्णु और शिव के शंख-डमरू संवाद

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने एक बार अपने शंख पांचजन्य को शिव के पास भेजा। शिव ने देखा कि जब पांचजन्य बजता है तो उसकी ध्वनि से शिव के पंचमुख प्रभावित होते हैं। तब शिव ने अपने डमरू की ध्वनि से पांचजन्य को उत्तर दिया। डमरू की गहरी, गूँजती और तांत्रिक ध्वनि ने शंखनाद को शांत कर दिया। तब से यह माना जाता है कि शिव के समीप शंखनाद नहीं होना चाहिए — डमरू की ध्वनि ही शिव के लिए उचित है। यही कारण है कि शिव मंदिरों में शंख के स्थान पर डमरू बजाने की परंपरा है।

पौराणिक कथा — समुद्र मंथन और पांचजन्य शंख की उत्पत्ति

प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच अमृत को लेकर युद्ध छिड़ा। देवतों ने मिलकर समुद्र मंथन किया — मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर। भगवान विष्णु ने कच्छप (कछुए) का रूप धारण करके पर्वत को अपनी पीठ पर स्थिर किया। जब मंथन आरम्भ हुआ तब सबसे पहले विष (हलाहल) निकला जिसे भगवान शिव ने अपने कंठ में पी लिया और नीलकंठ कहलाए। तत्पश्चात कई रत्न, अस्त्र और पदार्थ प्रकट हुए — कामधेनु, कल्पवृक्ष, ऐरावत, कौस्तुभ मणि, पारिजात, अमृत, और अंत में भगवान विष्णु के लिए शंख पांचजन्य।

पांचजन्य शंख प्रकट होते ही बज उठा और उसकी ध्वनि से तीनों लोक गूँज उठे। देवताओं ने देखा कि यह शंख अलौकिक है — इसका रंग शुभ्र, ध्वनि मंत्रमुग्ध करने वाली, और ऊर्जा अनंत। भगवान विष्णु ने इसे अपने बाएँ हाथ में धारण किया और इसे "पांचजन्य" नाम दिया। कहा जाता है कि इस शंख में पाँच पंचमुखी देवताओं का वास है — विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और सूर्य।

कालांतर में इसी शंख को भगवान कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में बजाया। जब कुरुक्षेत्र में पांडवों की विजय सुनिश्चित हुई, तब कृष्ण ने पांचजन्य बजाया और उसकी ध्वनि ने अधर्मियों के हृदय में कम्पन पैदा कर दिया। तभी से शंख को "धर्म की विजय" का प्रतीक माना जाता है।

शिव की पूजा में शंख के वर्जन का संबंध इसी कथा से है। चूँकि पांचजन्य सीधे विष्णु का है, इसलिए शिवलिंग पर या शिव मंदिर में इसे रखना, बजाना या जल चढ़ाना वर्जित माना गया है।

शिव-विष्णु के शंख और डमरू का रहस्यमय संवाद

एक अन्य रोचक कथा के अनुसार एक बार देवताओं के बीच विवाद उठा कि शंख की ध्वनि श्रेष्ठ है या डमरू की। देवताओं ने भगवान विष्णु से कहा कि शंख की ध्वनि सबसे ऊँची और पवित्र है। विष्णु ने शंख बजाया — ध्वनि दिशाओं में फैल गई, देवता मुग्ध हो गए। तब शिव ने कहा — "मेरा डमरू देखो।" जैसे ही शिव ने डमरू बजाया, उसकी ध्वनि ने शंखनाद को भीतर से हिला दिया। शंखनाद ऊपर की ओर जाती है, किंतु डमरू की ध्वनि ऊर्ध्व और अध: दोनों दिशाओं में फैलती है। शिव ने कहा — "शंख सात्विक है, मेरा डमरू सात्विक-राजस-तामस तीनों गुणों का समन्वय है। इसीलिए मेरी पूजा में डमरू ही उचित है।"

इस कथा से स्पष्ट होता है कि शिव और विष्णु की उपासना में प्रयोग होने वाले वाद्य भिन्न हैं — विष्णु के लिए शंख और शिव के लिए डमरू। शिव के समीप शंख बजाना इसलिए वर्जित है क्योंकि वह विष्णु का प्रतीक है और शिव के अपने तत्व-विज्ञान से मेल नहीं खाता।

शिव मंदिर में शंख बजाने का विवाद — क्या वास्तु में बज सकता है?

यह प्रश्न अक्सर भक्तों द्वारा पूछा जाता है कि यदि शिव मंदिर में प्रवेश करते समय शंख बजाया जाए तो क्या हानि है? शास्त्रीय मत के अनुसार शिव मंदिर के गर्भगृह (जहाँ शिवलिंग स्थापित है) में शंख बजाना वर्जित है। किंतु कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में मंदिर के बाहरी प्रांगण या प्रवेश द्वार पर शंख बजाने की अनुमति दी जाती है — यह भक्तों के स्वागत और देवता के आह्वान का प्रतीक माना जाता है।

दो मत:

  • प्रथम मत (कठोर वर्जन): शिव मंदिर के चारदीवारी क्षेत्र में भी शंख नहीं बजाना चाहिए। शिवलिंग पर शंख-जल नहीं चढ़ाना चाहिए। किसी भी रूप में शंख का प्रयोग वर्जित।
  • द्वितीय मत (उदार वर्जन): गर्भगृह के बाहर शंख बजाना अनुमेय है, किंतु शिवलिंग के समीप नहीं। प्रवेश द्वार पर भक्तों के स्वागत हेतु शंखनाद हो सकता है।

विचारशील आचार्यों का मानना है कि मूल सिद्धांत यह है कि शिव-तत्व से शंख का कोई संबंध नहीं है। जहाँ तक संभव हो, शिव मंदिर के समीप शंख से बचना चाहिए। घर में यदि शिवलिंग स्थापित हो तो शंख को अलग कमरे में रखना उचित है, शिव-कक्ष में नहीं।

शिव पूजा में क्या प्रयोग करें — डमरू, त्रिशूल, बिल्व और गंगाजल

शिव पूजा में शंख के स्थान पर अनेक वैकल्पिक और शुभ सामग्री का प्रयोग होता है:

डमरू — शिव का प्रमुख वाद्य। छोटा दोमुखी डमरू शिव पूजा में बजाने से शिव की कृपा प्राप्त होती है। डमरू की ध्वनि नाद ब्रह्म का प्रतीक है। शिवलिंग के समक्ष डमरू रखना अत्यंत शुभ।

त्रिशूल — शिव का अस्त्र। त्रिशूल तीन गुणों — सत्त्व, रजस, तमस — का प्रतीक है और शिव की शक्ति का प्रतीक। पूजा-स्थल पर त्रिशूल रखने से शिव की सुरक्षा प्राप्त होती है।

बिल्व पत्र — शिव को सर्वाधिक प्रिय। ताजा त्रि-पत्री बिल्व पत्र शिवलिंग पर अर्पित करना सर्वोत्तम पूजा मानी जाती है। बिल्व पत्र शिव के शीतल तत्व को शांत करता है।

गंगाजल — शिवलिंग पर गंगाजल का अभिषेक अत्यंत पुण्यदायी। गंगाजल में तुलसी न डालें, शुद्ध गंगाजल ही प्रयोग करें।

दूध और दही — शिवलिंग पर दूध और दही का अभिषेक शुभ। केसर मिला दूध विशेष फलदायी।

धतूरा — भगवान शिव को अत्यंत प्रिय फल। धतूरा शिवलिंग पर अर्पित करने से शिव प्रसन्न होते हैं।

कनेर — लाल फूलों वाला कनेर शिवलिंग पर चढ़ाने योग्य।

आकाशवेल (मालती) — शिवलिंग पर चढ़ाने वाली विशेष बेल।

चंदन — शिवलिंग पर चंदन का तिलक लगाना शुभ। हल्दी के स्थान पर चंदन ही प्रयोग करें।

भस्म (विभूति) — शिवलिंग पर भस्म लगाना अत्यंत शुभ और शिव की कृपा का सीधा साधन।

कौन से शंख शिव के लिए वर्जित और कौन से अन्य देवताओं के लिए शुभ

सभी प्रकार के शंख शिव पूजा में वर्जित हैं, किंतु कुछ शंख विशेष रूप से अन्य देवताओं के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं:

  • दक्षिणावर्ती शंख — सबसे पवित्र, सीधे विष्णु का प्रतीक, पूजा में इसे रखने से लक्ष्मी और विष्णु दोनों की कृपा प्राप्त होती है। कीमत अधिक होती है।
  • पंचमुख शंख — पाँच देवताओं का प्रतीक, गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी, विष्णु, सूर्य की पूजा में प्रयोग।
  • गणेश शंख — भगवान गणेश की उपासना में विशेष।
  • मोर पंख वाला शंख — भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) की पूजा में प्रयोग।
  • सामान्य वामावर्ती शंख — विष्णु, लक्ष्मी, दुर्गा की सामान्य पूजा में प्रयोग।
  • छोटा शंख — घर में रखने के लिए, सामान्य शुभता के लिए।

शिव के लिए वर्जित: उपर्युक्त सभी शंख शिव पूजा में वर्जित हैं। किसी भी आकार, रंग या प्रकार का शंख शिवलिंग के पास नहीं रखना चाहिए।

क्या शिवलिंग पर शंख रख सकते हैं — स्पष्ट उत्तर

स्पष्ट उत्तर: नहीं। शिवलिंग पर शंख रखना वर्जित है। यह वर्जन स्पष्ट और निरपेक्ष है — किसी भी परिस्थिति में शिवलिंग के ऊपर, पास में, या पूजा-स्थल में शंख नहीं रखना चाहिए। शिवलिंग पर शंख रखने से शिव-तत्व अशुद्ध होता है और पूजा का फल नहीं मिलता।

कुछ भक्त गलती से यह सोचते हैं कि "शंख शुभ है, शिवलिंग पवित्र है, दोनों पवित्र हैं तो साथ रखने में क्या हानि?" — किंतु ऐसा नहीं है। शंख विष्णु का प्रतीक है और शिवलिंग शिव का। दोनों की पूजा-विधि, तत्व, और प्रतीक भिन्न हैं। एक साथ रखने से दोनों के तत्वों में टकराव होता है।

यदि किसी कारणवश घर में शंख और शिवलिंग दोनों हों, तो दोनों को अलग-अलग कमरों में रखें। शंख को उत्तर-पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है, जबकि शिवलिंग को उत्तर या पूर्व दिशा में स्थापित करना चाहिए। दोनों के बीच कम से कम एक दीवार का अंतर होना चाहिए।


शुभकामनाएँ सहित, गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली 📞 संपर्क: www.panditnmshrimali.com


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फायदे, सावधानियां और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शंख के वर्जन से प्राप्त होने वाले 6 प्रमुख फायदे

  1. शुद्ध पूजा — शंख का वर्जन पालन करने से शिव पूजा शुद्ध और शास्त्रसम्मत होती है।
  2. शिव-तत्व की रक्षा — शिवलिंग के पास शंख न रखने से शिव-तत्व की ऊर्जा अविच्छिन्न बनी रहती है।
  3. विष्णु-शिव में सामंजस्य — दोनों देवताओं की अलग-अलग पूजा विधि का पालन करने से दोनों की कृपा प्राप्त होती है।
  4. गलत धारणाओं का निवारण — "शंख सब जगह शुभ है" इस भ्रांति से मुक्ति मिलती है।
  5. पारिवारिक शुभता — घर में शिवलिंग और शंख को सही स्थान पर रखने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
  6. सावन सोमवार विशेष लाभ — सावन के सोमवार को वर्जन का पालन करने से शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

ध्यान रखने योग्य 7 सावधानियां

  1. शंख को शिवलिंग से दूर रखें — यदि घर में शंख है तो वह शिव-कक्ष से दूर हो, कम से कम एक दीवार का अंतर हो।
  2. शिव मंदिर में शंख न बजाएँ — गर्भगृह के बाहर यदि कोई बजाए तो सहनीय, किंतु गर्भगृह में वर्जित।
  3. क्षेत्रीय परंपराओं की जाँच करें — कुछ क्षेत्रों में शिव मंदिर के बाहर शंख बजाने की अनुमति है, किंतु यह मूल शास्त्र-विरुद्ध नहीं होना चाहिए।
  4. शंख-जल शिवलिंग पर न चढ़ाएँ — अभिषेक में गंगाजल या शुद्ध जल ही प्रयोग करें, शंख का जल नहीं।
  5. बच्चों को समझाएँ — परिवार के बच्चों को यह वर्जन समझाएँ ताकि वे गलती से शिवलिंग के पास शंख न रखें।
  6. सावन में विशेष सतर्कता — सावन मास में शिव पूजा का विशेष माहौल होता है, तब वर्जन का पालन अनिवार्य है।
  7. शास्त्र-सम्मत सामग्री ही प्रयोग करें — किसी भी अनजान वस्तु को शिवलिंग के पास न रखें, पहले आचार्य से पूछें।

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Frequently Asked Questions

क्या शिवालय में शंख बजाया जा सकता है?+
शिव मंदिर के गर्भगृह (जहाँ शिवलिंग स्थापित है) में शंख बजाना वर्जित है। किंतु कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में मंदिर के बाहरी प्रांगण या प्रवेश द्वार पर शंखनाद की अनुमति होती है। शास्त्रीय दृष्टि से शिव-तत्व के समीप शंख की ध्वनि वर्जित मानी गई है क्योंकि शंख विष्णु का प्रतीक है।
क्या शिव मंदिर में शंख रखना चाहिए?+
नहीं, शिव मंदिर के गर्भगृह में शंख नहीं रखना चाहिए। शिवलिंग के समीप शंख होने से शिव-तत्व अशुद्ध माना जाता है। शंख को मंदिर के बाहर या घर के किसी अन्य कक्ष में रखा जा सकता है, किंतु शिव-मंदिर से दूर।
क्या गणेश जी को शंख चढ़ा सकते हैं?+
हाँ, भगवान गणेश की पूजा में शंख का प्रयोग शुभ माना जाता है। गणेश शंख नामक एक विशेष प्रकार का शंख होता है जो गणेश जी की उपासना में प्रयुक्त होता है। गणेश जी की पूजा में पंचमुख शंख भी रखा जा सकता है। किंतु गणेश और शिव दोनों की एक साथ पूजा हो तो शंख गणेश की ओर रखें, शिव की ओर नहीं।
क्या दक्षिणावर्ती शंख अलग है और क्या वह शिव के लिए वर्जित है?+
हाँ, दक्षिणावर्ती शंख सबसे पवित्र और दुर्लभ शंख है जो सीधे भगवान विष्णु से जुड़ा है। इसका मुख दाएँ से बाएँ मुड़ता है। यह शंख शिव पूजा में भी उतना ही वर्जित है जितना सामान्य शंख — क्योंकि दक्षिणावर्ती शंख तो विष्णु का सीधा स्वरूप माना जाता है। इसे शिवलिंग के पास रखना और भी अधिक वर्जित माना जाता है।
क्या महामृत्युंजय मंत्र के जाप में शंख जरूरी है?+
नहीं, महामृत्युंजय मंत्र (ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…) के जाप में शंख अनिवार्य नहीं है। यह मंत्र शिव से सीधे जुड़ा है और इसके जाप में रुद्राक्ष की माला, शिवलिंग के समक्ष बैठकर, या बिल्व पत्र के साथ जाप करना शुभ माना जाता है। शंख की आवश्यकता नहीं है। हाँ, कुछ तांत्रिक साधनाओं में शंख का प्रयोग होता है, किंतु मूल मंत्र-जाप में वह वैकल्पिक है।
क्या शिव पूजा में डमरू जरूरी है?+
शिव पूजा में डमरू अनिवार्य नहीं है, किंतु अत्यंत शुभ माना जाता है। डमरू शिव का अपना वाद्य है और उसकी ध्वनि नाद ब्रह्म का प्रतीक है। शिवलिंग के समक्ष छोटा डमरू रखने से पूजा का फल बढ़ता है। यदि डमरू उपलब्ध न हो तो घंटी बजाना भी शुभ माना जाता है। शिव पूजा में डमरू शंख से अधिक उचित है।
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Written by

Nidhi Shrimali

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Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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