✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।
बहुला चौथ (बहुला चतुर्थी) भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाने वाला एक अत्यंत पावन व्रत है, जो विशेष रूप से संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुख-शांति की कामना से मनाया जाता है। मांएं अपने बच्चों की रक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए यह व्रत रखती हैं, और गर्भवती स्त्रियां सुखपूर्वक प्रसव तथा गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा के लिए इसका अनुष्ठान करती हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम बहुला चौथ की तिथि, कथा, संपूर्ण पूजा विधि, मंत्र, दान, फायदे और सावधानियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
विषय सूची (Table of Contents)
- बहुला चौथ का परिचय
- 2025 और 2026 — तिथि और शुभ मुहूर्त
- बहुला चौथ का धार्मिक महत्व
- बहुला चौथ की पौराणिक कथा
- किनके लिए है बहुला चौथ का व्रत
- संपूर्ण व्रत विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
- बहुला चौथ के शुभ मंत्र
- दान विधि और उसका महत्व
- व्रत के फायदे और लाभ
- सावधानियां और नियम
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बहुला चौथ का परिचय
बहुला चौथ, जिसे बहुला चतुर्थी अथवा बहुला व्रत के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संस्कृति के प्राचीनतम व्रत-पर्वतों में से एक है। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। "बहुला" शब्द का अर्थ है — बहुल अर्थात् अधिक, प्रचुर या दीर्घ। इस व्रत का मूल उद्देश्य संतान की दीर्घायु, उसके स्वास्थ्य की रक्षा और परिवार में सुख-शांति की वृद्धि है।
व्रत का संबंध सीधे तौर पर मातृत्व से है। प्राचीन काल से ही भारतीय माताएं अपने बच्चों के कल्याण के लिए विभिन्न व्रत-उपवास करती आई हैं, और बहुला चौथ उनमें से सबसे प्रभावी माना जाता है। इस दिन माँ अपने संतान की रक्षा के लिए व्रत रखती है, कथा सुनती है, विधिपूर्वक पूजन करती है और संतान के स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की कामना करती है।
बहुला चौथ मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और महाराष्ट्र के कुछ भागों में बहुत लोकप्रिय है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह व्रत आज भी उतनी ही श्रद्धा से रखा जाता है जितना सदियों पहले रखा जाता था।
2025 और 2026 — तिथि और शुभ मुहूर्त
बहुला चौथ प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आता है। आगामी दो वर्षों की तिथियां इस प्रकार हैं:
2025 की तिथि
- तिथि: भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्थी — 14 सितम्बर 2025 (रविवार)
- चतुर्थी तिथि आरंभ: 13 सितम्बर 2025, रात्रि 9:14 बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्ति: 14 सितम्बर 2025, रात्रि 10:26 बजे
- पूजा मुहूर्त: 14 सितम्बर को प्रातः 6:00 से 8:30 बजे तक (अभिजित मुहूर्त)
- व्रत पारण: अगले दिन (15 सितम्बर) प्रातःकाल
2026 की तिथि
- तिथि: भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्थी — 4 सितम्बर 2026 (शुक्रवार)
- चतुर्थी तिथि आरंभ: 3 सितम्बर 2026, प्रातः 6:28 बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्ति: 4 सितम्बर 2026, प्रातः 8:50 बजे
- पूजा मुहूर्त: 4 सितम्बर को प्रातः 6:00 से 8:30 बजे तक
- व्रत पारण: 5 सितम्बर (शनिवार) प्रातःकाल
विशेष बात: 2026 में तिथि का अधिकांश भाग 4 सितम्बर को ही है, अतः इसी दिन पूजा-विधि सर्वोत्तम रहेगी। पंचांग के अनुसार स्थानीय समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।
बहुला चौथ का धार्मिक महत्व
बहुला चौथ का व्रत तीन प्रमुख दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है:
धार्मिक दृष्टि से:
- संतान की आयु, स्वास्थ्य और सुख में वृद्धि
- बालक के कुंडली में ग्रह-दोषों का शमन
- मातृ-ऋण से मुक्ति और मां के प्रति समर्पण की भावना
- परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति
आध्यात्मिक दृष्टि से:
- माँ की ममता और त्याग का प्रतीक
- संतान के प्रति माता-पिता के कर्तव्यों का स्मरण
- व्रत-उपवास के माध्यम से मन की शुद्धि
- इच्छा शक्ति और आत्म-नियंत्रण का विकास
ज्योतिषीय दृष्टि से:
- भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष — चंद्रमा कन्या या तुला राशि में, मन को कोमल और संवेदनशील बनाता है
- चतुर्थी तिथि का स्वामी भगवान गणेश — विघ्न-हर्ता और संतान की रक्षक
- कुंडली के पंचम भाव (संतान भाव) के दोषों के लिए यह व्रत विशेष लाभकारी
- गर्भ-संबंधी समस्याओं और बार-बार गर्भपात की आशंका होने पर यह व्रत रामबाण उपाय
बहुला चौथ की पौराणिक कथा
बहुला चौथ की कथा अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद है। इस कथा के दो प्रमुख संस्करण प्रचलित हैं:
प्रथम कथा — माँ पार्वती का प्रसंग
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय माँ पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए कौन-सा व्रत करें जिससे बालक दीर्घायु और सुखी हो। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर बहुला व्रत की विधि बताई और कहा कि जो माता भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को यह व्रत रखेगी, उसकी संतान निश्चय ही दीर्घायु होगी।
द्वितीय कथा — बहुला और बहुलिका
एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार, प्राचीन काल में दो सगी बहनें थीं — बहुला और बहुलिका। दोनों ने मिलकर भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी के दिन संतान की दीर्घायु के लिए व्रत रखा। उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान ने प्रकट होकर आशीर्वाद दिया और कहा कि आज से यह व्रत "बहुला चौथ" के नाम से प्रसिद्ध होगा।
तृतीय कथा — दुर्भाग्यशाली स्त्री की कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, एक निर्धन गृहस्थ की पत्नी थी, जिसके अनेक संतानें होकर भी जीवित नहीं रहती थीं। दुखी होकर वह वन में विचरने लगी, जहाँ उसे एक ऋषि मिले। ऋषि ने उसके पूर्वजन्म के कर्मों का वर्णन करते हुए उसे भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को व्रत रखने और कथा सुनने की विधि बताई। उस स्त्री ने नियमपूर्वक व्रत किया और उसके बाद जो संतान हुई वह स्वस्थ और दीर्घायु रही।
कथा का संदेश: मातृ-प्रेम संसार का सबसे पवित्र बंधन है। जब माँ पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा से अपनी संतान के कल्याण के लिए व्रत रखती है, तो ईश्वर अवश्य प्रसन्न होते हैं।
किनके लिए है बहुला चौथ का व्रत
बहुला चौथ का व्रत मुख्य रूप से निम्नलिखित स्त्रियों के लिए विशेष फलदायी माना जाता है:
- माताएं — जिनकी संतान छोटी हो या जिन्हें अपने बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता हो
- गर्भवती स्त्रियां — गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा और सुखपूर्वक प्रसव के लिए
- संतान प्राप्ति की कामना वाली स्त्रियां — जिन्हें संतान न हो रही हो
- ऐसी माताएं जिनकी संतान बार-बार बीमार होती हो — रोग-निवारण हेतु
- कुंडली में पंचम भाव दोष — संतान संबंधी कुंडली-दोष होने पर
- बार-बार गर्भपात की शिकायत होने पर
- बालक की कुंडली में अशुभ योग — ज्योतिषी से कुंडली दिखाकर व्रत करने की सलाह दी जाती है
महत्वपूर्ण: कुछ संप्रदायों में यह व्रत माता-पिता दोनों संयुक्त रूप से भी रखते हैं, ताकि पिता भी संतान के प्रति अपने कर्तव्यों का स्मरण करे।
संपूर्ण व्रत विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
बहुला चौथ की संपूर्ण विधि सवेरे से लेकर अगले दिन प्रातः तक चलती है। नीचे चरणबद्ध विधि दी जा रही है:
पूर्व-तैयारी (एक दिन पूर्व)
- भाद्रपद कृष्ण तृतीया की रात्रि को ही मन में संकल्प लें
- सात्विक भोजन ग्रहण करें
- पति और परिवार से व्रत की अनुमति लें
प्रातःकाल (व्रत दिवस — स्नान और संकल्प)
- ब्रह्म मुहूर्त (4-5 बजे) में उठें, स्नान करें, शुद्ध वस्त्र धारण करें
- माथे पर कुंकुम-तिलक लगाएं
- चौकी पर भगवान गणेश, माँ पार्वती और बाल गोपाल की मूर्ति स्थापित करें
- संकल्प लें: "मैं अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुख-शांति हेतु बहुला चौथ का व्रत रख रही हूँ"
- संकल्प में बालक का नाम, माता-पिता का नाम और गोत्र का उच्चारण करें
पूजा-विधि (प्रातः 6:00 से 8:30)
- चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं, कलश स्थापित करें — कलश में जल, सुपारी, सिक्का, आम के पत्ते और नारियल रखें
- गणेश जी, माँ पार्वती और बाल गोपाल की मूर्ति स्थापित कर सिंदूर, चंदन, फूल, अक्षत अर्पित करें
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शर्करा) से अभिषेक करें
- धूप-दीपक जलाएं, फूल और माला अर्पित करें
- भोग लगाएं — खीर, पुए, फल, मेवे
- आरती करें और फलों का भोग लगाएं
कथा श्रवण (मुख्य अनुष्ठान)
- पहले भगवान गणेश की वंदना करें
- बहुला चौथ की कथा सुनें या स्वयं पढ़ें
- कथा समाप्ति पर "कथा सुना/सुनी, व्रत धरा/धराया, सत्य हो वचन मेरा" का उच्चारण करें
- परिवार की सभी महिलाओं के साथ मिलकर कथा सुनें — इसका विशेष महत्व है
दोपहर (एक समय भोजन — फलाहार)
- व्रत में एक समय फलाहार (फल, दूध, मेवे) ग्रहण कर सकती हैं
- कुछ विद्वान निर्जला व्रत को श्रेष्ठ मानते हैं
- सात्विक भोजन ही करें — मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज वर्जित
संध्या-पूजा और अगले दिन पारण
- दीपक जलाएं, संतान गोपाल मंत्र का 108 बार जाप करें
- पुनः कथा सुनें/पढ़ें, भगवान की आरती करें, बाल गोपाल को माखन-मिश्री का भोग लगाएं
- रात्रि को शांत रहें, भजन-कीर्तन करें, क्रोध, असत्य, निंदा का त्याग करें
- अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान कर पूजा-स्थल पर जाकर गणेश जी, माँ पार्वती और बाल गोपाल की पूजा करें
- व्रत पारण करें — सात्विक भोजन (खीर-पुए) ग्रहण करें
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं अथवा गरीब बालकों को भोजन कराएं, दान करें
बहुला चौथ के शुभ मंत्र
बहुला चौथ के दिन निम्न मंत्रों का जाप विशेष फलदायी माना जाता है:
संतान गोपाल मंत्र (मुख्य मंत्र)
ॐ सन्तानं गोपालं देवकी परमानन्दं श्रीकृष्णं गोविन्दं गोपीजनवल्लभं प्रसन्नं कुरु कुरु स्वाहा
- जाप संख्या: 108 माला अथवा कम से कम 11 माला
- जाप समय: प्रातः 6:00 से 8:00 बजे तक
- विशेषता: संतान की रक्षा, आयु वृद्धि और सुख-शांति
अन्य शुभ मंत्र
- बाल गोपाल मंत्र — ॐ क्लीं कृष्णाय नमः (बालक के स्वास्थ्य और विकास के लिए 108 बार)
- गणेश मंत्र — ॐ गं गणपतये नमः (विघ्न-निवारण हेतु 108 बार)
- पार्वती मंत्र — ॐ ह्रीं पार्वत्यै नमः (मातृत्व की रक्षा और गर्भ-सुरक्षा के लिए 108 बार)
- संतान प्राप्ति मंत्र — ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते, देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः (जिन्हें संतान न हो रही हो, उनके लिए 108 बार)
जाप विधि
- आसन: ऊनी या कुश का आसन
- दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके
- माला: रुद्राक्ष या तुलसी की माला
- समय: ब्रह्म मुहूर्त अथवा प्रदोष काल सर्वोत्तम
- जाप से पहले आचमन, प्राणायाम और संकल्प लें
दान विधि और उसका महत्व
बहुला चौथ के दिन दान का विशेष महत्व है। निम्नलिखित दान-सामग्री से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है:
1. बालकों को भोजन कराना — छोटे बच्चों को मिष्ठान्न, फल अथवा पूर्ण भोजन कराना अत्यंत शुभ।
2. दूध और दुग्ध-उत्पादों का दान — गरीब बालकों को दूध, दही, घी का दान करें।
3. वस्त्र दान — बच्चों के नए वस्त्र अथवा गर्म कपड़ों का दान करें।
4. अन्न दान — अनाथालय अथवा बाल-आश्रम में अन्न-दान विशेष फलदायी।
5. तिल और गुड़ का दान — भाद्रपद मास में तिल-गुड़ का दान विशेष शुभ।
दान का समय: पूजा के पश्चात अथवा व्रत पारण के दिन दान करना श्रेष्ठ माना जाता है। दान करते समय "ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः" का उच्चारण करें।
व्रत के फायदे और लाभ
बहुला चौथ का व्रत अनेक विशिष्ट लाभों से भरा हुआ है:
1. संतान की दीर्घायु — इस व्रत का मुख्य फल संतान की आयु, स्वास्थ्य और सुख-शांति है। नियमित रूप से व्रत रखने वाली माताओं की संतानें दीर्घायु होती हैं।
2. गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा — गर्भवती महिलाओं के लिए यह व्रत विशेष रूप से लाभकारी है। गर्भस्थ शिशु की रक्षा होती है और सुखपूर्वक प्रसव होता है।
3. बालक रोग-निवारण — जो बालक बार-बार बीमार होते हैं, उनके लिए यह व्रत रामबाण है। माता के व्रत से बालक के रोग दूर होते हैं।
4. कुंडली के पंचम भाव दोष का निवारण — ज्योतिषीय दृष्टि से कुंडली के पंचम भाव (संतान भाव) के दोषों को दूर करने में यह व्रत सहायक है।
5. बार-बार गर्भपात की समस्या का समाधान — जिन स्त्रियों को बार-बार गर्भपात की समस्या होती है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
6. संतान-प्राप्ति — जिन दंपतियों को संतान नहीं हो रही, उनके लिए भी यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है (पति-पत्नी दोनों को करना चाहिए)।
7. मातृ-ऋण से मुक्ति — यह व्रत माता-पिता के प्रति कर्तव्यों का स्मरण कराता है और मातृ-ऋण से मुक्ति दिलाता है।
8. परिवार में सुख-शांति — नियमित रूप से व्रत रखने वाली महिलाओं के परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
सावधानियां और नियम
बहुला चौथ का व्रत रखते समय निम्नलिखित सावधानियों का पालन अवश्य करें:
1. स्वास्थ्य-सावधानी — गर्भवती महिलाएं निर्जला व्रत न रखें। चिकित्सक से परामर्श लेकर एक समय फलाहार अवश्य लें। शुगर, बीपी की समस्या हो तो विशेष ध्यान रखें।
2. रजस्वला स्त्रियां — मासिक धर्म के दौरान पूजा-विधि स्थगित करें। कथा-श्रवण सदैव कर सकती हैं।
3. सात्विक आहार — व्रत के दिन सात्विक भोजन ही ग्रहण करें। मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का सेवन वर्जित है।
4. मन-वचन-कर्म की शुद्धता — व्रत के दिन क्रोध, असत्य, निंदा, चुगली से बचें।
5. सिलाई-कढ़ाई वर्जित — व्रत के दिन सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि कार्य वर्जित माने जाते हैं।
6. कुंडली जांच — व्रत रखने से पहले किसी विद्वान ज्योतिषी से कुंडली दिखाकर पंचम भाव की स्थिति जांच लें।
7. व्रत-भंग — यदि किसी कारणवश व्रत भंग हो जाए तो प्रायश्चित्त के रूप में अगले वर्ष दो व्रत रखें अथवा ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
8. कथा-श्रवण अनिवार्य — व्रत के बिना कथा-श्रवण के अधूरा माना जाता है। पूजा के पश्चात कथा अवश्य सुनें या पढ़ें।
9. पति-पत्नी की सहमति — गृहस्थ स्त्रियां व्रत पति की अनुमति से ही रखें। अविवाहित कन्याएं माता-पिता की अनुमति से रख सकती हैं।
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Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.