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जानिए अधिकमास की अमावस्या का महत्व ,शुभ मुहूर्त एवं उपाय

# जानिए अधिकमास की अमावस्या का महत्व ,शुभ मुहूर्त एवं उपाय - Amavasya of Adhikamas - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **जानिए अधिकमास की अमावस्या का महत्व ,शुभ मुहूर्त एवं उपाय** — यह वि

7 July 2026 11 min read|By Nidhi Shrimali

⚡ संक्षेप में — अधिक मास की अमावस्या

लेखिका: निधि श्रीमाली | वैदिक ज्योतिषी, 18+ वर्षों का अनुभव
अद्यतन: अगस्त 2026 | पढ़ने का समय: 12 मिनट
रेटिंग: ★★★★★ 4.9/5 (1,425+ परामर्श समीक्षाओं से)

अधिक मास वह अतिरिक्त चंद्र मास है जो लगभग हर 32-33 माह में जोड़ा जाता है, और उसकी अमावस्या पितृ कर्म तथा दान के लिए वर्ष की सर्वाधिक फलदायी तिथियों में है। इस मास में शुभ आरंभ वर्जित हैं, परंतु दान, तप, जप और श्राद्ध का फल कई गुना माना गया है।


विषय सूची

  1. अधिक मास क्या है और क्यों आता है
  2. पुरुषोत्तम मास की कथा
  3. इस अमावस्या का विशेष महत्व
  4. क्या करें
  5. क्या वर्जित है
  6. पितृ कर्म और तर्पण
  7. दान का विशेष विधान
  8. मंत्र और पाठ
  9. ज्योतिषीय दृष्टि से
  10. क्षय मास
  11. भ्रांतियाँ

अधिक मास क्या है और क्यों आता है

इसका कारण खगोलीय है और सरल है।

चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है, जबकि सौर वर्ष 365 दिन का। दोनों में लगभग 11 दिन का अंतर प्रतिवर्ष जुड़ता जाता है। यदि इसे ठीक न किया जाए तो कुछ ही वर्षों में होली ग्रीष्म में और दीपावली वर्षा में पड़ने लगेगी।

इस अंतर को संतुलित करने के लिए हिंदू पंचांग में लगभग हर 32 माह 16 दिन के अंतराल पर एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ दिया जाता है। यही अधिक मास है — जिसे मल मास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

गणना का नियम यह है कि जिस चंद्र मास में सूर्य संक्रांति न पड़े — अर्थात् सूर्य राशि न बदले — वह अधिक मास होता है। सामान्यतः प्रत्येक चंद्र मास में एक संक्रांति पड़ती है; जब नहीं पड़ती, तब वह मास अतिरिक्त माना जाता है।

'मल मास' क्यों? क्योंकि आरंभ में इस अतिरिक्त मास को अशुद्ध और शुभ कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना गया — 'मल' अर्थात् मलिन। इसी कारण इसकी एक कथा बनी, जो आगे दी गई है।

पुरुषोत्तम मास की कथा

कथा के अनुसार जब यह अतिरिक्त मास बना, तो उसे कोई देवता स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। सभी मासों के अपने अधिपति देवता थे, परंतु इस मास का कोई स्वामी नहीं था। इसे 'मल मास' कहकर सभी शुभ कार्यों से बहिष्कृत कर दिया गया।

दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास गया और अपनी व्यथा कही — कि उसे कोई स्वीकार नहीं करता, कोई उसमें कोई शुभ कार्य नहीं करता, वह उपेक्षित है।

विष्णु जी ने उसे स्वीकार किया और अपना ही नाम दे दिया — पुरुषोत्तम। उन्होंने वरदान दिया कि इस मास में किया गया दान, जप, तप और उपासना अन्य मासों की तुलना में कई गुना फल देगी, और जो इस मास में उनकी उपासना करेगा उसे विशेष कृपा प्राप्त होगी।

कथा का भाव व्यावहारिक है और मैं इसे जजमानों को अवश्य बताती हूँ: जिसे संसार ने अस्वीकार किया, उसे भगवान ने अपना नाम दे दिया। यह उन सभी के लिए है जो स्वयं को उपेक्षित अनुभव करते हैं — और यही कारण है कि इस मास की उपासना का भाव विनम्रता और शरणागति का है, उपलब्धि का नहीं।

इस अमावस्या का विशेष महत्व

अमावस्या स्वयं में पितृ कर्म और दान की तिथि है। अधिक मास में पड़ने वाली अमावस्या में दो कारक मिल जाते हैं:

  • अमावस्या — पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध की स्वाभाविक तिथि
  • अधिक मास — जिसमें दान और तप का फल कई गुना माना गया है

इसी संयोग के कारण यह तिथि पितृ दोष निवारण के लिए वर्ष की सर्वाधिक प्रभावी तिथियों में मानी जाती है — और यह अवसर हर तीसरे वर्ष ही आता है।

जिन जजमानों की कुंडली में पितृ दोष है — सूर्य की राहु-केतु से युति, नवम भाव में राहु-केतु — उनके लिए यह तिथि विशेष रूप से निर्धारित की जाती है। यदि पितृ पक्ष में श्राद्ध छूट गया हो, तो यह उसकी पूर्ति का अवसर भी है।

क्या करें

  1. प्रातःकाल स्नान — नदी अथवा तीर्थ में उत्तम; घर पर जल में गंगाजल मिलाकर भी मान्य।
  2. संकल्प — नाम, गोत्र और उद्देश्य कहते हुए।
  3. पितरों को तर्पण — दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, काले तिल मिश्रित जल से। विधि हमारी पितृ पक्ष गाइड में विस्तार से है।
  4. विष्णु उपासना — यह पुरुषोत्तम मास है, अतः विष्णु सहस्रनाम अथवा 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप।
  5. पीपल को जल अर्पित करें और नीचे दीपक जलाएँ।
  6. कौओं, गाय और कुत्तों को भोजन दें।
  7. दान करें — नीचे विस्तार से।
  8. किसी भूखे को भोजन कराएँ — इस दिन का सर्वोत्तम कर्म।
  9. सायंकाल दीपदान — जल में अथवा पीपल के नीचे।

जो विधिवत नहीं कर सकते, उनके लिए न्यूनतम यह है — दक्षिण दिशा की ओर जल और काले तिल अर्पित कर दें, और किसी को भोजन करा दें। शास्त्रों में यह पर्याप्त कहा गया है।

क्या वर्जित है

वर्जितअनुकूल
विवाह, सगाईदान और सेवा
गृह प्रवेश, भूमि पूजनजप, तप, उपवास
नया व्यापार, नया कार्य आरंभतीर्थ यात्रा और स्नान
नए वस्त्र, आभूषण, वाहन की खरीदपितृ कर्म और तर्पण
मुंडन, उपनयन और अन्य संस्कारविष्णु उपासना, भागवत पाठ
नामकरण (कुछ परंपराओं में)वेद अध्ययन और शास्त्र श्रवण

यह मास अशुभ नहीं है — यह शुभ आरंभ के लिए अनुपयुक्त है। अंतर महत्वपूर्ण है, और अनेक परिवार इसे न समझकर पूरे मास चिंतित रहते हैं। दान, साधना और सेवा के लिए यह वर्ष का सर्वश्रेष्ठ काल है।

दैनिक जीवन इससे प्रभावित नहीं होता — नौकरी, चालू व्यापार, चिकित्सा, परीक्षा, यात्रा — सब सामान्य रूप से चलते हैं।

पितृ कर्म और तर्पण

अधिक मास की अमावस्या पर पितृ कर्म का विशेष विधान है। संक्षेप में विधि:

  1. स्नान कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  2. जनेऊ धारण करते हों तो दाएँ कंधे पर करें (अपसव्य)।
  3. पात्र में जल लेकर काले तिल और जौ मिलाएँ।
  4. दोनों हथेलियों में जल लेकर अंगूठे और तर्जनी के बीच से गिराएँ — यही पितृ तीर्थ है।
  5. पितरों के नाम लें यदि ज्ञात हों; न हों तो समस्त पितरों के लिए अर्पित करें।
  6. प्रत्येक पितर के लिए तीन बार।
  7. अंत में क्षमा प्रार्थना।

मध्याह्न काल (लगभग 11:30 से 12:30) सर्वोत्तम माना गया है। नदी अथवा बहते जल के किनारे उत्तम; घर पर स्वच्छ जल से भी मान्य।

तर्पण के लिए न पंडित चाहिए, न व्यय — और इसी कारण मैं इसे उन सभी जजमानों को बताती हूँ जो यह सोचकर पितृ कर्म नहीं करते कि उन्हें विधि नहीं आती।

दान का विशेष विधान

अधिक मास में दान का विशेष महत्व है, और परंपरा में कुछ वस्तुएँ विशेष रूप से बताई गई हैं।

दानविशेषता
अन्नसर्वोपरि; भूखे को भोजन कराना
33 वस्तुओं का दानअधिक मास की विशेष परंपरा — 33 अपूप (मालपुए) अथवा 33 प्रकार की वस्तुएँ
दीपदानसंध्या को; इस मास में विशेष फलदायी
वस्त्रआवश्यकतामंद को
काले तिलपितृ कर्म से संबंधित
घी और गुड़पारंपरिक
पुस्तकेंज्ञान दान; गुरु ग्रह हेतु उत्तम

33 की संख्या का कारण यह बताया जाता है कि 33 कोटि देवताओं के प्रतीक रूप में यह दान किया जाता है। जो 33 वस्तुएँ न दे सकें, वे सामर्थ्य के अनुसार दें — शास्त्रों में संख्या से अधिक भाव का महत्व है।

किसे दें — जो लौटा न सके। भूखे, वृद्ध, असहाय, विद्यार्थी। पात्र में डालने से अधिक फल हाथ में देने का माना गया है।

मंत्र और पाठ

विष्णु मंत्र — पुरुषोत्तम मास का मुख्य मंत्र:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

पुरुषोत्तम मास मंत्र:

ॐ पुरुषोत्तमाय नमः

पितृ तर्पण मंत्र:

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
ॐ पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः॥

पाठ हेतु: विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भागवत, गीता का सातवाँ अध्याय, पुरुष सूक्त।

अधिक मास में पूरे मास की एक साधना का संकल्प लेने की परंपरा है — प्रतिदिन एक निश्चित पाठ अथवा जप। यह इस मास का सर्वोत्तम उपयोग माना गया है।

ज्योतिषीय दृष्टि से

स्थितिइस तिथि का उपयोग
पितृ दोष — सूर्य पर राहु/केतु, नवम भाव पीड़िततर्पण, श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन — वर्ष की सर्वोत्तम तिथियों में
कार्य अंतिम चरण में रुकनापितृ दोष का लक्षण; इस दिन उपाय विशेष प्रभावी
संतान बाधापितृ ऋण से संबंध; तर्पण के साथ संतान गोपाल मंत्र
विवाह में विलंबजहाँ पितृ दोष कारण हो
गुरु निर्बलविष्णु उपासना; पुस्तक और अन्न का दान
शनि साढ़े सातीदान और सेवा का फल इस मास में बढ़ा हुआ
चंद्र दोषअमावस्या पर मानसिक अशांति बढ़ सकती है; जप और शांत रहें

आपकी कुंडली में पितृ दोष वास्तव में है या नहीं, और वह सक्रिय है या नहीं — यह कुंडली विश्लेषण से ज्ञात होता है। लक्षणों के आधार पर अनुमान लगाकर उपाय करना प्रायः निष्फल रहता है।

क्षय मास

अधिक मास के विपरीत एक स्थिति और होती है — क्षय मास, जब कोई चंद्र मास छूट जाता है क्योंकि उसमें दो संक्रांतियाँ पड़ जाती हैं।

यह अत्यंत दुर्लभ है — लगभग 140 वर्ष में एक बार — और जब होता है तो उसी वर्ष में दो अधिक मास भी आते हैं ताकि गणना संतुलित रहे।

व्यावहारिक रूप से यह आपकी योजनाओं को प्रभावित करने की संभावना नहीं रखता, परंतु जानने योग्य है क्योंकि पंचांग में इसका उल्लेख मिलता है।

भ्रांतियाँ

  1. "अधिक मास अशुभ होता है।" असत्य। यह शुभ आरंभ के लिए अनुपयुक्त है, अशुभ नहीं। दान, साधना और सेवा के लिए यह वर्ष का श्रेष्ठतम काल है — इसीलिए विष्णु ने इसे अपना नाम दिया।
  2. "इस मास में कुछ भी नहीं करना चाहिए।" असत्य। दैनिक जीवन, नौकरी, चालू व्यापार, चिकित्सा, परीक्षा और यात्रा — सब सामान्य रूप से चलते हैं।
  3. "अधिक मास में जन्मा बच्चा अशुभ होता है।" पूर्णतः असत्य और हानिकारक धारणा। जन्म का शुभत्व कुंडली से देखा जाता है, मास से नहीं।
  4. "33 वस्तुओं का दान अनिवार्य है।" असत्य। सामर्थ्य के अनुसार दान करें; शास्त्रों में भाव का महत्व संख्या से अधिक है।
  5. "अमावस्या को घर से नहीं निकलना चाहिए।" ऐसा कोई शास्त्रीय विधान नहीं है। यह तिथि दान, तर्पण और साधना की है।
  6. "पितृ कर्म के लिए पंडित अनिवार्य है।" असत्य। तर्पण स्वयं किया जा सकता है और शास्त्रों में जल तथा तिल का अर्पण पर्याप्त कहा गया है।

शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली


क्या आपकी कुंडली में पितृ दोष है?

अधिक मास की अमावस्या पितृ कर्म के लिए वर्ष की सर्वोत्तम तिथियों में है, और यह अवसर हर तीसरे वर्ष ही आता है। उपाय तभी प्रभावी होता है जब यह ज्ञात हो कि दोष वास्तव में है और सक्रिय है।

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Frequently Asked Questions

अधिक मास क्या है और क्यों आता है?+
चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का और सौर वर्ष 365 दिन का होता है, अतः प्रतिवर्ष लगभग 11 दिन का अंतर जुड़ता जाता है। इसे संतुलित करने के लिए लगभग हर 32 माह 16 दिन पर एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता है। गणना का नियम यह है कि जिस चंद्र मास में सूर्य संक्रांति न पड़े, वह अधिक मास होता है। इसे मल मास और पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं।
अधिक मास को पुरुषोत्तम मास क्यों कहते हैं?+
कथा के अनुसार इस अतिरिक्त मास को कोई देवता स्वीकार करने को तैयार नहीं था और इसे मल मास कहकर सभी शुभ कार्यों से बहिष्कृत कर दिया गया। दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास गया, और उन्होंने इसे स्वीकार करके अपना ही नाम दे दिया — पुरुषोत्तम — तथा वरदान दिया कि इस मास में किया गया दान, जप और तप कई गुना फल देगा।
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इसमें दो कारक मिल जाते हैं — अमावस्या स्वयं पितरों के तर्पण और श्राद्ध की तिथि है, और अधिक मास में दान तथा तप का फल कई गुना माना गया है। इसी संयोग से यह पितृ दोष निवारण के लिए वर्ष की सर्वाधिक प्रभावी तिथियों में मानी जाती है, और यह अवसर हर तीसरे वर्ष ही आता है।
अधिक मास में क्या नहीं करना चाहिए?+
विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, नया व्यापार, नए वस्त्र-आभूषण-वाहन की खरीद, तथा मुंडन और उपनयन जैसे संस्कार वर्जित हैं। ध्यान रहे कि यह मास अशुभ नहीं है — यह केवल शुभ आरंभ के लिए अनुपयुक्त है। दैनिक जीवन, नौकरी, चालू व्यापार, चिकित्सा, परीक्षा और यात्रा सब सामान्य रूप से चलते हैं।
अधिक मास में 33 वस्तुओं का दान क्यों किया जाता है?+
परंपरा में 33 कोटि देवताओं के प्रतीक रूप में 33 अपूप यानी मालपुए अथवा 33 प्रकार की वस्तुओं का दान किया जाता है। यह अनिवार्य नहीं है — जो 33 वस्तुएँ न दे सकें वे सामर्थ्य के अनुसार दें, क्योंकि शास्त्रों में संख्या से अधिक भाव का महत्व है। सर्वोपरि दान अन्न का है, अर्थात् किसी भूखे को भोजन कराना।
क्या अधिक मास में जन्मा बच्चा अशुभ होता है?+
नहीं, यह पूर्णतः असत्य और हानिकारक धारणा है। जन्म का शुभत्व कुंडली से देखा जाता है, मास से नहीं। इस मास को स्वयं भगवान विष्णु ने अपना नाम दिया है और इसमें की गई उपासना का फल कई गुना माना गया है — इसे अशुभ मानना कथा के भाव के ही विपरीत है।
अधिक मास की अमावस्या पर तर्पण कैसे करें?+
स्नान कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें, जनेऊ हो तो दाएँ कंधे पर करें। पात्र में जल लेकर काले तिल और जौ मिलाएँ, फिर दोनों हथेलियों में जल लेकर अंगूठे और तर्जनी के बीच के भाग यानी पितृ तीर्थ से गिराएँ। पितरों के नाम लें अथवा समस्त पितरों के लिए अर्पित करें, प्रत्येक के लिए तीन बार। मध्याह्न काल सर्वोत्तम है और पंडित की आवश्यकता नहीं।
🧿

Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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