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Shani Amavasya 2026: शनि अमावस्या 2026: पितृ दोष शांति के

# Shani Amavasya 2026: शनि अमावस्या 2026: पितृ दोष शांति के उपाय **Shani Amavasya 2026** — यह विषय मेरे पास रोजाना सैकड़ों लोग पूछते हैं। जब किसी की कुंडली में ग्रह कमजोर होता है, तो जीवन में कई समस्

7 July 2026 21 min read|By Nidhi Shrimali

लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।

शनि अमावस्या हिन्दू पंचांग का एक अत्यंत शक्तिशाली संयोग है — जब अमावस्या (नई चाँद) की तिथि शनिवार के दिन पड़ती है। यह दिन एक साथ दो बड़े प्रभावों का वाहक होता है — शनिदेव की साधना का विशेष फल और पितरों के प्रति कृतज्ञता का अवसर। जिन लोगों की कुंडली में शनि दोष, पितृ दोष, कालसर्प दोष या साढ़ेसाती का प्रभाव है, उनके लिए यह दिन राहत और शांति का द्वार खोलता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम 2026 की आने वाली शनि अमावस्या की तिथियों, पूजा विधि, मंत्र, दान, कथा और ज्योतिषीय महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. शनि अमावस्या क्या है — परिचय
  2. 2026 की शनिवार को पड़ने वाली अमावस्याएं
  3. शनि अमावस्या का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
  4. शनि देव की पौराणिक कथा
  5. पितृ दोष कैसे बनता है — कारण और लक्षण
  6. शनि अमावस्या की पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
  7. तर्पण विधि और शनि-पितृ मंत्र
  8. शनिवार व्रत विधि
  9. शनि अमावस्या के विशेष दान
  10. प्रमुख शनि मंदिर और उनका महत्व
  11. फायदे, सावधानियां और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शनि अमावस्या क्या है — परिचय

हिन्दू पंचांग में प्रत्येक माह अमावस्या आती है, लेकिन जब यही अमावस्या शनिवार के दिन पड़ती है तब इसे शनि अमावस्या कहा जाता है। शनिवार शनिदेव का दिन है और अमावस्या तमस, पितर और तर्पण का दिन। जब ये दोनों एक साथ आते हैं तो यह संयोग अत्यंत बलवान हो जाता है।

शनि अमावस्या को "शनैश्चरी अमावस्या" या "मंदोदरी अमावस्या" के नाम से भी जाना जाता है। कुछ पंचांगों में इसे "पितृ शनि अमावस्या" भी कहते हैं क्योंकि इस दिन पितरों के प्रति कृतज्ञता और शनिदेव के प्रति समर्पण दोनों का विधान है।

शनि अमावस्या का मूल सिद्धांत:

  • शनिवार = शनिदेव का दिन (शनैश्चर)
  • अमावस्या = पितरों का दिन, तमस का प्रभाव
  • नई चाँद = नई शुरुआत, नए संकल्प का अवसर
  • संयोग = दोहरा फल — एक ही दिन में शनि और पितर दोनों की शांति

शनि अमावस्या पर किए गए उपाय, तर्पण, दान और मंत्र जप की अपार शक्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन किया गया एक उपाय सामान्य दिनों के 1000 उपायों के बराबर फल देता है।

2026 की शनिवार को पड़ने वाली अमावस्याएं

वर्ष 2026 में कुल 12 अमावस्याएं हैं, लेकिन इनमें से जो शनिवार को पड़ेंगी वे शनि अमावस्या कहलाएंगी। प्रमुख शनि अमावस्या 2026 की तिथियाँ इस प्रकार हैं:

दिनांक (2026) वार अमावस्या का नाम विशेष महत्व
24 जनवरी 2026 शनिवार माघ कृष्ण अमावस्या शनि-पितृ दोष निवारण
21 फरवरी 2026 शनिवार फाल्गुन कृष्ण अमावस्या होली से पूर्व शनि शांति
21 मार्च 2026 शनिवार चैत्र कृष्ण अमावस्या नव वर्षारंभ शनि पूजा
18 अप्रैल 2026 शनिवार वैशाख कृष्ण अमावस्या हनुमान जयंती के निकट
16 मई 2026 शनिवार ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या शनि-शिव संयुक्त फल
20 जून 2026 शनिवार आषाढ़ कृष्ण अमावस्या वर्षा ऋतु पितृ तर्पण
18 जुलाई 2026 शनिवार सावन से पूर्व अमावस्या शनि अमावस्या — सर्वाधिक प्रभावी
15 अगस्त 2026 शनिवार श्रावण कृष्ण अमावस्या रक्षाबंधन के निकट शनि पूजा
12 सितम्बर 2026 शनिवार भाद्रपद कृष्ण अमावस्या पितृपक्ष की पूर्व तैयारी
11 अक्टूबर 2026 रविवार आश्विन कृष्ण अमावस्या (सर्वपित्री) रविवार — शनि अमावस्या नहीं
8 नवम्बर 2026 रविवार कार्तिक कृष्ण अमावस्या रविवार — शनि अमावस्या नहीं
6 दिसम्बर 2026 रविवार मार्गशीर्ष कृष्ण अमावस्या रविवार — शनि अमावस्या नहीं

नोट: 2026 में कुल 8 शनि अमावस्याएं पड़ रही हैं (जनवरी से सितम्बर तक)। इनमें सबसे प्रभावी 18 जुलाई 2026 की शनि अमावस्या मानी जा रही है क्योंकि यह सावन माह के करीब है और सावन में शनिवार का विशेष फल होता है।

शनि अमावस्या पर दो मुख्य तिथियां महत्वपूर्ण:

  • मुख्य तिथि — अमावस्या का दिन (जब चाँद दिखाई न दे)
  • सिद्ध तिथि — अमावस्या के अगले दिन प्रातःकाल, जब तर्पण सर्वोत्तम माना जाता है

पंचांग के अनुसार जिस स्थान पर सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि हो वही दिन शनि अमावस्या माना जाता है। अतः कुछ स्थानों पर यह तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

शनि अमावस्या का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व

शनि अमावस्या का महत्व केवल एकांगी नहीं है। यह तीन दृष्टिकोणों से देखा जाना चाहिए:

धार्मिक महत्व:

  • शनिदेव की पूजा से कुंडली के शनि दोष का शमन
  • पितरों के तर्पण से पितृ ऋण से मुक्ति
  • हनुमान जी की उपासना से शनि का प्रकोप शांत
  • काले तिल, सरसों तेल, लोहे के दान से पाप नाश

आध्यात्मिक महत्व:

  • नई चाँद का अर्थ है — पुराने कर्मों का अंत और नई ऊर्जा का आरंभ
  • तमस का प्रभाव अधिक होने से आंतरिक साधना का गहन फल
  • मन की शुद्धि और ध्यान के लिए उत्तम समय
  • शनि की कठोरता को कोमल करने का अवसर
  • कर्म-फल के सिद्धांत की प्रत्यक्ष अनुभूति

ज्योतिषीय महत्व:

  • जन्म कुंडली में शनि की स्थिति (कुम्भ राशि या मकर राशि) के अनुसार विशेष प्रभाव
  • शनि की दशा या अंतर्दशा चल रही हो तो राहत का समय
  • साढ़ेसाती, ढैय्या या कालसर्प दोष हो तो अत्यंत लाभकारी
  • पितृ दोष हो तो स्थायी निवारण
  • शनि और राहु-केतु के अशुभ योग में राहत
  • मंगल के साथ शनि का संबंध (अंगारक योग) टूटने का अवसर

पौराणिक आधार: स्कंद पुराण के अनुसार शनिवार को अमावस्या हो तो वह दिन "महादोष नाशक" कहा जाता है। पद्म पुराण में भी इस दिन के पितृ-शनि संयुक्त उपाय का वर्णन मिलता है।

शनि देव की पौराणिक कथा

शनि अमावस्या के महत्व को समझने के लिए शनिदेव की कथा जानना आवश्यक है।

शनि का जन्म: पौराणिक मान्यता के अनुसार शनिदेव सूर्य देव और छाया (छाया देवी / संज्ञा) के पुत्र हैं। सूर्य की दो पत्नियां थीं — संज्ञा और छाया। संज्ञा अपनी छाया के साथ पृथ्वी पर अपने पिता के घर चली गईं। सूर्य ने अपनी छाया को ही संज्ञा समझकर उनसे संतान प्राप्ति की। इसी छाया से शनिदेव का जन्म हुआ। शनि का रंग काला था — जो उनकी कठोर तपस्या और तमस का प्रतीक है।

शनि की दृष्टि: कथा के अनुसार जब शनिदेव बालक रूप में सूर्य के पास गए, तो सूर्य ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। इस अपमान से क्रुद्ध शनि ने सूर्य को अपनी क्रोध दृष्टि से देखा, जिससे सूर्य का तेज क्षीण हो गया। तभी से सूर्य का तेज ग्रहण (Surya Grahan) लगता है। यही कारण है कि क्रोध में आकर शनि की दृष्टि किसी भी ग्रह या भाव पर बहुत भारी पड़ती है।

शनि का रथ: शनिदेव का रथ काला है, जिसे एक कौआ या गिद्ध खींचते हैं। शनि के पास एक तलवार, एक धनुष-बाण और एक कुंडल (जो समय का प्रतीक है) है। उनका वस्त्र नीला या काला होता है। ये सब प्रतीक शनि की कठोरता, न्याय और समय की शक्ति को दर्शाते हैं।

शनि और पितृ संबंध: शनिदेव को पितरों का कारक ग्रह माना जाता है। जब कुंडली में पितृ दोष होता है तो शनि उस दोष को और प्रकट करता है। शनिवार और अमावस्या — दोनों पितरों से जुड़े हैं, अतः शनि अमावस्या पर पितरों का तर्पण करने से शनि का प्रकोप शांत होता है।

कथा का संदेश: जो कर्म हम करते हैं, वही हमें मिलता है — यही शनि का सिद्धांत है। अतः शनि अमावस्या पर सत्कर्म, दान और तर्पण कर हम अपने कर्मों को शुद्ध कर सकते हैं।

पितृ दोष कैसे बनता है — कारण और लक्षण

शनि अमावस्या का सबसे बड़ा लाभ पितृ दोष से मुक्ति है। आइए समझें कि पितृ दोष कैसे बनता है:

पितृ दोष के कारण:

  1. जन्म कुंडली में सूर्य और शनि का संबंध: यदि कुंडली में सूर्य और शनि पाप ग्रहों से पीड़ित हों, या एक-दूसरे से अनिष्ट योग बनाएं
  2. राहु-केतु का पितृ भाव (नवम भाव) से संबंध: नवम भाव पिता और पितृ दोनों का कारक है
  3. शनि की ढैय्या या साढ़ेसाती के साथ नवम भाव का पीड़ित होना
  4. कुंडली में पितृकारक ग्रहों (सूर्य, शनि, राहु) का अस्त होना
  5. पूर्वजों द्वारा किए गए कर्मों का प्रभाव — जैसे किसी ने अपने पिता की हत्या की हो, छल-कपट किया हो, अन्नदान रोका हो
  6. श्राद्ध और तर्पण न करना — यदि परिवार में पीढ़ियों से श्राद्ध नहीं हो रहा तो पितृ ऋण बढ़ता जाता है
  7. पिता की मृत्यु तिथि को भुला देना और श्राद्ध न करना

पितृ दोष के लक्षण:

  1. संतान सुख में बाधा — बच्चा न होना, बच्चों को रोग
  2. शिक्षा में अनावश्यक रुकावट, परीक्षा में बार-बार असफलता
  3. व्यापार या नौकरी में अचानक हानि, नौकरी छूटना
  4. परिवार में कलह, विवाद, तलाक
  5. कर्ज़ में लगातार वृद्धि, धन का अभाव
  6. अचानक बीमारी, दुर्घटना, मृत्यु
  7. अकारण भय, चिंता, अवसाद
  8. नींद में बुरे सपने, भूत-प्रेत का अनुभव
  9. बार-बार नौकरी या व्यापार बदलना
  10. कानूनी मुकदमे, पुलिस केस में फंसना

यदि आपको ऊपर के 3-4 लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो संभवतः आपकी कुंडली में पितृ दोष है। शनि अमावस्या पर तर्पण और शनि पूजा से इस दोष का स्थायी निवारण संभव है।

शनि अमावस्या की पूजा विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन

शनि अमावस्या की पूजा विधि बहुत शुद्ध और नियमबद्ध होनी चाहिए। यहां संपूर्ण प्रक्रिया दी जा रही है:

पूजा सामग्री (एक दिन पूर्व तैयार करें):

  • शनि देव की मूर्ति या तस्वीर (काले रंग की)
  • काले तिल, सरसों तेल, जौ
  • काले कपड़े का टुकड़ा, काला सूत
  • लोहे की छोटी वस्तु (लोहे की कड़ा, चूड़ी या कील)
  • सरसों के तेल का दीपक
  • कुश, अश्वगंधा, हल्दी
  • काले फूल, धूप-अगरबत्ती
  • शुद्ध जल, कलश, काँसे का लोटा
  • शनि यंत्र (यदि हो)
  • फल, मिठाई, पंचामृत
  • ब्राह्मण के लिए भोजन सामग्री

शनि अमावस्या की सुबह की विधि:

  1. ब्रह्म मुहूर्त में उठें (सूर्योदय से 1.5 घंटे पूर्व)
  2. स्नान करें — जल में काले तिल मिलाकर स्नान करना शुभ
  3. काले वस्त्र धारण करें (या गहरे नीले रंग के)
  4. पूजा स्थान पर कुश के आसन पर बैठें, मुख पश्चिम या दक्षिण दिशा में रखें
  5. संकल्प लें — "मैं शनि अमावस्या के पावन अवसर पर शनिदेव की पूजा और पितरों के तर्पण का संकल्प लेता/लेती हूँ"
  6. कलश स्थापित करें — जल से भरे कलश पर कुश, आम के पत्ते और काले तिल रखें
  7. शनि देव का आवाहन — "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र से आवाहन करें
  8. पंचामृत स्नान कराएं शनि की मूर्ति को — दूध, दही, घी, शहद, शर्करा
  9. अभिषेक — सरसों तेल या काले तिल के तेल से शनि देव का अभिषेक करें
  10. वस्त्र और आभूषण — काले वस्त्र, काले फूल, लोहे की कड़ा चढ़ाएं

शनि पूजा की विशेष विधि:

  • शनि देव को काले तिल, सरसों तेल, लोहे की वस्तु, काले कपड़े, सरसों, हल्दी चढ़ाएं
  • सरसों के तेल का दीपक जलाएं
  • धूप-अगरबत्ती और काले फूल अर्पित करें
  • "ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें
  • हनुमान चालीसा का पाठ करें (शनि हनुमान जी के परम भक्त हैं)
  • शनि स्तोत्र या शनि अष्टक का पाठ करें
  • शनि मंदिर जाकर शनिदेव के दर्शन और पूजा करें
  • शनि देव के मंदिर में सरसों का तेल, काले तिल, सरसों, लोहे की कड़ा चढ़ाएं

पितृ पूजा:

  1. पितरों की तस्वीर या नाम लिखकर स्थापित करें
  2. जल, तिल, जौ, पुष्प अर्पित करें
  3. "ॐ पितृभ्यो नमः" मंत्र से पितरों का आवाहन
  4. गाय, कौए, कुत्ते को भोजन दें
  5. ब्राह्मण को भोजन कराएं और दक्षिणा दें
  6. पीपल के वृक्ष में जल और तिल अर्पित करें

संध्या समय:

  • शनि मंदिर में जाकर शनिदेव की परिक्रमा करें
  • 7 बार परिक्रमा करते हुए "ॐ शं शनैश्चराय नमः" बोलें
  • शनि मंदिर में सरसों तेल का दीपक और काले तिल चढ़ाएं
  • पीपल वृक्ष पर जल दें और दीपक जलाएं

तर्पण विधि और शनि-पितृ मंत्र

तर्पण शनि अमावस्या का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। यह जल के माध्यम से पितरों को तृप्त करने की विधि है।

शनि अमावस्या के प्रमुख मंत्र:

1. शनि बीज मंत्र (सबसे शक्तिशाली):

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः

2. शनि सप्ताक्षरी मंत्र (7 अक्षर):

ॐ शं शनैश्चराय नमः

3. शनि गायत्री मंत्र:

ॐ कृष्णप्रियाय विद्महे, रौद्राय धीमहि, तन्नो मन्दः प्रचोदयात्

4. शनि अष्टोत्तर नाम मंत्र (108 नाम):

ॐ शनैश्चराय नमः, ॐ सौराय नमः, ॐ पिंगलाय नमः, ॐ बभ्रुकाय नमः...

5. पितृ तर्पण मंत्र:

ॐ पितृभ्यो नमः, स्वधा पितृभ्यो नमः ॐ पितामहेभ्यो नमः ॐ अक्षरभ्यो नमः

6. पितृ गायत्री मंत्र:

ॐ देवताभ्यो नमः, ॐ पितृभ्यो नमः, ॐ देवपितृभ्यो नमः

7. हनुमान मंत्र (शनि शांति के लिए):

ॐ हं हनुमते नमः

8. शनि शांति मंत्र:

ॐ शम शनैश्चराय नमः, शान्तिः शनैश्चराय नमः

तर्पण विधि (विस्तार से):

  1. प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें
  2. नदी, तालाब या घर के स्नानागार में जाएं
  3. दाहिने हाथ में जौ, काले तिल, कुश और जल लें
  4. मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें
  5. "ॐ पितृभ्यो नमः" बोलकर जल बहने दें
  6. पिता, दादा, परदादा के नाम से अलग-अलग तर्पण करें
  7. "स्वधा" बोलते हुए जल अर्पित करें
  8. कुल 3 बार जल अर्पित करें

जाप संख्या:

  • शनि मंत्र — 108 बार या 1100 बार (शनिवार को)
  • पितृ मंत्र — 108 बार
  • हनुमान चालीसा — 1 बार पूर्ण पाठ
  • शनि अष्टक स्तोत्र — 1 बार

शनिवार व्रत विधि

शनि अमावस्या पर शनिवार व्रत रखना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।

व्रत की तैयारी:

  • व्रत से एक दिन पहले सात्विक भोजन करें
  • लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा का त्याग करें
  • व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें

व्रत के नियम:

  1. एकाहार व्रत — केवल एक समय भोजन करें (दोपहर या सायंकाल)
  2. निराहार व्रत — पूर्ण दिन उपवास (केवल जल ग्रहण)
  3. फलाहार व्रत — केवल फल, दूध, मेवा लें

भोजन में क्या खाएं:

  • काले तिल से बनी वस्तुएं (तिल के लड्डू, तिल की बर्फी)
  • सरसों का साग, सरसों दाना
  • काले चने, काली दाल
  • हल्दी से बनी सब्जी
  • जौ, गेहूं की रोटी
  • कुट्टू के आटे की रोटी
  • काला नमक

भोजन में क्या न खाएं:

  • मांस, मछली, अंडा
  • लहसुन, प्याज
  • शराब, तम्बाकू, गुटखा
  • बासी भोजन
  • नमक (कुछ व्रत में)

व्रत के दौरान करें:

  • प्रातःकाल सरसों तेल से शनि देव का अभिषेक
  • शनि मंदिर में दर्शन
  • शनि मंत्र का जाप (108 बार)
  • हनुमान जी की पूजा
  • काले तिल, सरसों तेल, लोहे की वस्तु का दान
  • पीपल वृक्ष में जल देना
  • सात्विक भोजन ब्राह्मण को दान

व्रत का पारण:

  • व्रत का पारण सायंकाल शनि मंदिर में करें
  • या शनि होरा में (प्रातः 8 बजे से 9:30 बजे तक)
  • पारण में काले तिल, गुड़, रोटी लें
  • काले वस्त्र पहनकर ही पारण करें

व्रत कितने शनिवार तक:

  • न्यूनतम 7 शनिवार (1 माह)
  • मध्यम 19 शनिवार (4-5 माह)
  • पूर्ण 40 शनिवार (10 माह)
  • विशेष 108 शनिवार (2 वर्ष)

शनि अमावस्या पर व्रत रखने से वर्ष भर का फल एक दिन में मिल जाता है।

शनि अमावस्या के विशेष दान

शनि अमावस्या पर दान का विशेष महत्व है। शनि को काले रंग की वस्तुएं, तिल, सरसों तेल, लोहे की वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं।

दान की वस्तुएं (प्राथमिकता के क्रम में):

  1. काले तिल — शनि का सबसे प्रिय दान। पीपल वृक्ष में चढ़ाना सर्वोत्तम
  2. सरसों तेल — शनि मंदिर में दीपक जलाने और अभिषेक के लिए
  3. लोहे की वस्तुएं — कड़ा, चूड़ी, कील, चाकू, हल (कृषि उपकरण)
  4. काले कपड़े — गरीबों को काले कपड़े दान करें
  5. काले चने, काली दाल, काला गुड़ — भोजन के रूप में दान
  6. सरसों दाना — अनाज के रूप में दान
  7. हल्दी पाउडर — महिलाओं को हल्दी दान करें
  8. लहसुन — शनि के लिए विशेष दान (शाकाहारी भोजन में)
  9. शनि यंत्र — ब्राह्मण को दान करें
  10. चमड़े की वस्तुएं — जूते, बेल्ट, पर्स

दान किसे करें:

  • शनिवार को जन्मे व्यक्ति को
  • काले रंग के वस्त्र पहनने वाले को
  • लोहार, कुम्हार, मोची (शनि-संबंधित कर्म)
  • गरीब ब्राह्मण
  • वृद्ध जन, विधवा, अनाथ
  • शनि मंदिर में

दान की विधि:

  • प्रातःकाल स्नान करके दान करें
  • दान देते समय शनि मंत्र बोलें
  • "ॐ शं शनैश्चराय नमः" बोलकर दान दें
  • दान में श्रद्धा और सम्मान का भाव रखें
  • दक्षिणा के रूप में सिक्के या नोट भी दें
  • दान के बाद ब्राह्मण से आशीर्वाद लें

दान का समय:

  • शनि अमावस्या को प्रातः 6 बजे से 10 बजे तक
  • शनि होरा में (शनिवार को सुबह 8-9:30)
  • सायंकाल शनि मंदिर में

प्रमुख शनि मंदिर और उनका महत्व

शनि अमावस्या पर शनि मंदिर में दर्शन और पूजा अत्यंत फलदायी है। भारत के प्रमुख शनि मंदिर:

1. शनि शिंगणापुर, महाराष्ट्र (सबसे प्रसिद्ध):

  • यह भारत का सबसे प्रसिद्ध शनि मंदिर है
  • कहा जाता है कि यहां शनिदेव स्वयं प्रकट हुए थे
  • यहां शनिदेव की स्वयंभू मूर्ति है जो जमीन से निकली है
  • 36 फीट गहरे गड्ढे में शनिदेव विराजमान हैं
  • यहां सरसों तेल से अभिषेक होता है
  • शनिवार और अमावस्या को विशेष भीड़ होती है

2. तिंगलूर शनि मंदिर, केरल:

  • भारत का दूसरा सबसे प्रसिद्ध शनि मंदिर
  • भगवान विष्णु के अवतार के रूप में शनि की पूजा
  • "शनि महाराज" के नाम से प्रसिद्ध
  • यहां शनिवार को बड़ी संख्या में भक्त आते हैं

3. कुंडली शनि मंदिर, गुजरात:

  • यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां शनिदेव की पूजा काले पत्थर से होती है
  • शनिदेव की मूर्ति 5 फीट ऊंची है

4. शनि धाम, दिल्ली (प्राचीन):

  • यह प्राचीन मंदिर है जहां शनिवार को विशेष पूजा होती है

5. हनुमान मंदिर, सलासर (राजस्थान):

  • यहां हनुमान जी और शनिदेव दोनों की पूजा एक साथ होती है

6. मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (राजस्थान):

  • प्रेत-शनि दोष निवारण के लिए प्रसिद्ध

मंदिर में क्या करें:

  • शनि देव के दर्शन करें
  • सरसों तेल का दीपक जलाएं
  • काले तिल, सरसों, लोहे की कड़ा चढ़ाएं
  • शनि मंत्र का जाप करें
  • मंदिर की 7 परिक्रमा करें
  • पुजारी से शनि यंत्र या कलावा प्राप्त करें

शनि अमावस्या के 8 प्रमुख फायदे

शनि अमावस्या पर विधिपूर्वक पूजा, तर्पण और दान करने से निम्नलिखित विशेष लाभ मिलते हैं:

  1. कुंडली के शनि दोष का निवारण — शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, कालसर्प दोष से मुक्ति
  2. पितृ दोष का स्थायी समाधान — पितरों की कृपा से पितृ ऋण से मुक्ति
  3. आर्थिक समस्याओं का अंत — कर्ज़ से मुक्ति, धन की आमद बढ़ती है
  4. संतान सुख की प्राप्ति — संतान रोग, शिक्षा, विवाह में बाधा दूर होती है
  5. नौकरी और व्यापार में स्थिरता — नौकरी पक्की होती है, व्यापार में उन्नति
  6. विवाह में आ रही बाधा का अंत — कुंडली मिलान की समस्या दूर
  7. मानसिक शांति और स्वास्थ्य — अवसाद, चिंता, भय से मुक्ति
  8. शनि की क्रोध दृष्टि से बचाव — शनि अशुभ फल देने से पहले शांत हो जाते हैं
  9. अचानक दुर्घटना, रोग, मृत्यु से रक्षा — शनि कृपा से सुरक्षा
  10. सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान — समाज में मान-सम्मान बढ़ता है

सावधानियां — शनि अमावस्या पर क्या न करें

शनि अमावस्या पर कुछ विशेष सावधानियां रखनी चाहिए:

  1. शनिवार को मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज का सेवन न करें
  2. नए काम, व्यापार, यात्रा की शुरुआत न करें
  3. विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य न करें
  4. क्रोध, असत्य, चुगली से बचें
  5. बड़े-बुज़ुर्गों का अपमान न करें
  6. शनि के विरुद्ध बोलना या शनि की आलोचना न करें
  7. रात्रि को अकेले यात्रा न करें
  8. काले वस्त्र पहनकर अशुभ कार्य न करें — काले वस्त्र शनि पूजा के लिए हैं, अशुभ कार्य के लिए नहीं
  9. ऋण न दें और न लें — शनिवार को ऋण का लेन-देन अशुभ
  10. शव या श्मशान के पास न जाएं — अमावस्या पर यह अशुभ हो सकता है
  11. बालों में तेल न लगाएं (कुछ पंचांगों के अनुसार)
  12. नाखून न काटें शनिवार को — शनि का निवास नाखूनों में माना जाता है

विशेष सावधानी: गर्भवती महिलाओं को शनि अमावस्या पर तेल, मसाले और काले तिल से बचना चाहिए। अति सात्विक भोजन लें और शांत वातावरण में रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या हर अमावस्या जो शनिवार को आती है वह शनि अमावस्या है?

हाँ, पंचांग के अनुसार जो अमावस्या शनिवार के दिन पड़ती है वह शनि अमावस्या कहलाती है। 2026 में कुल 8 शनि अमावस्याएं हैं (जनवरी से सितम्बर तक)।

क्या शनि अमावस्या पर काले कपड़े पहनना अनिवार्य है?

अनिवार्य नहीं, लेकिन शनि पूजा के समय काले या गहरे नीले वस्त्र शुभ माने जाते हैं। नीले या गहरे रंग के वस्त्र भी पहने जा सकते हैं।

क्या शनिवार को सरसों तेल का दान अवश्य करना चाहिए?

शनि अमावस्या पर सरसों तेल का दान अत्यंत शुभ है, लेकिन अनिवार्य नहीं। यदि संभव हो तो सरसों तेल, काले तिल और लोहे की कोई वस्तु अवश्य दान करें।

क्या पितृ दोष और शनि दोष अलग-अलग हैं?

जी हाँ, दोनों अलग हैं लेकिन एक-दूसरे से जुड़े हैं। पितृ दोष पितरों के असंतोष से बनता है जबकि शनि दोष कर्मों और ग्रह स्थिति से। शनि अमावस्या पर दोनों का एक साथ उपचार हो जाता है।

क्या शनि मंदिर में पुजारी के पैर छूना चाहिए?

शनि मंदिर में शनि देव की मूर्ति को प्रणाम करें। पुजारी के पैर छूना आवश्यक नहीं है, बल्कि शनि मंदिर में शनि देव का आशीर्वाद लेना ही पर्याप्त है। कुछ मंदिरों में यह प्रथा है, कुछ में नहीं।

क्या शनि अमावस्या का उपाय 7 वर्ष तक करना चाहिए?

शनि अमावस्या पर किया गया एक बार का विधिपूर्वक उपाय दीर्घकालिक फल देता है। यदि शनि दोष गंभीर हो तो लगातार 7 शनि अमावस्या तक उपाय करना शुभ है। शनिवार व्रत भी 7, 19, 40 या 108 शनिवार तक रखा जा सकता है।

क्या शनि अमावस्या पर शनि मंदिर जाना अनिवार्य है?

अनिवार्य नहीं है, लेकिन शनि मंदिर में दर्शन-पूजा का अपार फल है। यदि शनि मंदिर दूर हो तो घर पर ही शनि देव की मूर्ति स्थापित कर पूजा कर सकते हैं।

क्या स्त्रियां भी शनिवार का व्रत रख सकती हैं?

जी हाँ, स्त्रियां भी शनिवार का व्रत और शनि अमावस्या की पूजा कर सकती हैं। मासिक धर्म के दौरान व्रत स्थगित करना चाहिए।

क्या शनि अमावस्या पर शाम को तेल का दीपक जलाना चाहिए?

हाँ, शनि अमावस्या की शाम को शनि मंदिर में या घर के पूजा स्थान पर सरसों तेल का दीपक जलाना अत्यंत शुभ है। दीपक संध्या काल (सूर्यास्त के बाद) जलाएं।

क्या एक ही दिन में शनि पूजा और पितृ तर्पण दोनों हो सकता है?

हाँ, शनि अमावस्या पर दोनों एक साथ होते हैं। प्रातःकाल शनि पूजा और तर्पण, तथा सायंकाल शनि मंदिर में दर्शन — यही क्रम है।

निष्कर्ष

शनि अमावस्या हिन्दू पंचांग का एक अत्यंत शक्तिशाली और पावन दिन है जो शनिदेव की उपासना और पितरों के तर्पण का दोहरा अवसर प्रदान करता है। 2026 में आठ शनि अमावस्याएं आ रही हैं, जिनमें प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है। विधिपूर्वक पूजा, तर्पण, मंत्र जाप और दान कर हम कुंडली के शनि दोष और पितृ दोष दोनों से मुक्ति पा सकते हैं।

मेरी सलाह:

  1. 2026 की किसी एक शनि अमावस्या (विशेषकर 18 जुलाई) को अवश्य पूजा-तर्पण करें
  2. शनिवार व्रत कम से कम 7 शनिवार तक नियमित रखें
  3. शनि मंत्र का 108 बार प्रतिदिन जाप करें
  4. काले तिल, सरसों तेल, लोहे की वस्तु का दान करें
  5. पितरों का नाम लेकर तर्पण करें और ब्राह्मण भोजन कराएं
  6. शनि मंदिर में दर्शन अवश्य करें
  7. यदि गंभीर शनि या पितृ दोष हो तो व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें

शुभकामनाएँ सहित, गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली 📞 संपर्क: www.panditnmshrimali.com


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Frequently Asked Questions

2026 में कुल कितनी शनि अमावस्याएं हैं?+
2026 में कुल 8 शनि अमावस्याएं हैं — जनवरी (24), फरवरी (21), मार्च (21), अप्रैल (18), मई (16), जून (20), जुलाई (18) और सितम्बर (12)। इनमें 18 जुलाई 2026 सबसे प्रभावी मानी जा रही है।
शनि अमावस्या और सामान्य अमावस्या में क्या अंतर है?+
शनि अमावस्या वह अमावस्या है जो शनिवार के दिन पड़ती है। शनिवार शनिदेव का दिन है और अमावस्या पितरों की — दोनों का संयोग होने से यह दिन शनि दोष और पितृ दोष दोनों के निवारण के लिए अत्यंत प्रभावी हो जाता है।
शनि अमावस्या पर कौन सा मंत्र सबसे शक्तिशाली है?+
शनि बीज मंत्र 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः' सबसे शक्तिशाली माना जाता है। इसे 108 बार जपने से शनि दोष का शमन होता है। शनि गायत्री और हनुमान मंत्र भी उतने ही प्रभावी हैं।
क्या शनि अमावस्या पर शनि मंदिर जाना जरूरी है?+
शनि मंदिर जाना अनिवार्य नहीं लेकिन अत्यंत शुभ है। यदि मंदिर दूर हो तो घर पर शनि यंत्र या शनि देव की मूर्ति स्थापित कर पूजा कर सकते हैं। शनिवार को शनि मंदिर में सरसों तेल का दीपक जलाना विशेष फलदायी है।
शनिवार व्रत कितने समय तक रखना चाहिए?+
शनिवार व्रत न्यूनतम 7 शनिवार (करीब 2 माह) रखना चाहिए। गंभीर शनि दोष हो तो 19 या 40 शनिवार तक नियमित रखें। अति गंभीर दोष में 108 शनिवार (2 वर्ष) का व्रत सर्वोत्तम माना जाता है।
क्या पितृ दोष और शनि दोष एक ही हैं?+
नहीं, दोनों अलग हैं। पितृ दोष पूर्वजों के असंतोष या अपर्याप्त श्राद्ध से बनता है जबकि शनि दोष कर्म और ग्रह स्थिति से। शनि अमावस्या विशेष है क्योंकि इस दिन दोनों दोषों का एक साथ उपचार संभव होता है।
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Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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