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Pitru Paksha 2025: तिथि, महत्व, श्राद्ध विधि और उपाय

# Pitru Paksha 2025: तिथि, महत्व, श्राद्ध विधि और उपाय - Nidhi Shrimali **Pitru Paksha 2025** — यह विषय मेरे पास रोजाना सैकड़ों लोग पूछते हैं। जब किसी की कुंडली में ग्रह कमजोर होता है, तो जीवन में कई

7 July 2026 11 min read|By Nidhi Shrimali

✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित NM श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।

पितृपक्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक चलने वाला 16 दिनों का पावन कालखंड है, जिसे हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस काल में हम अपने पूर्वजों — पिता, दादा, परदादा और जिन पूर्वजों का नाम हमें याद नहीं — सभी का स्मरण करते हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। पितृपक्ष को "महालय" या "पितृगया" के नाम से भी जाना जाता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम पितृपक्ष 2025 की तिथि, धार्मिक महत्व, संपूर्ण श्राद्ध विधि, तर्पण मंत्र, कथा और सावधानियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. पितृपक्ष 2025 — तिथि और मुख्य दिन
  2. पितृपक्ष का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व
  3. पितृपक्ष की पौराणिक कथा
  4. श्राद्ध विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
  5. तर्पण विधि और मंत्र
  6. पिंडदान — विधि और महत्व
  7. पितृपक्ष में क्या करें और क्या न करें
  8. सर्वपित्री अमावस्या — सबसे पावन दिन
  9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
  10. निष्कर्ष

पितृपक्ष 2025 — तिथि और मुख्य दिन

पितृपक्ष 2025 की अवधि: 7 सितम्बर 2025 (रविवार) से 21 सितम्बर 2025 (रविवार) तक — कुल 16 दिन

दिनांक (2025) दिन विशेष महत्व
7 सितम्बर रविवार पितृपक्ष आरंभ (पूर्णिमा श्राद्ध)
8 सितम्बर सोमवार प्रतिपदा श्राद्ध
9 सितम्बर मंगलवार द्वितीया श्राद्ध
10 सितम्बर बुधवार तृतीया श्राद्ध
11 सितम्बर गुरुवार चतुर्थी श्राद्ध
12 सितम्बर शुक्रवार पंचमी श्राद्ध (महालक्ष्मी पूजा संग)
13 सितम्बर शनिवार षष्ठी श्राद्ध
14 सितम्बर रविवार सप्तमी श्राद्ध
15 सितम्बर सोमवार अष्टमी श्राद्ध
16 सितम्बर मंगलवार नवमी श्राद्ध
17 सितम्बर बुधवार दशमी श्राद्ध
18 सितम्बर गुरुवार एकादशी श्राद्ध
19 सितम्बर शुक्रवार द्वादशी श्राद्ध
20 सितम्बर शनिवार त्रयोदशी श्राद्ध
21 सितम्बर रविवार सर्वपित्री अमावस्या (सबसे पावन)

महत्वपूर्ण नोट: पितृपक्ष की प्रत्येक तिथि अपने-अपने नाम से विशेष है। जिस दिन पिता का देहांत हुआ हो, उस तिथि को विशेष रूप से श्राद्ध करना चाहिए। यदि तिथि याद न हो, तो सर्वपित्री अमावस्या को अवश्य तर्पण करें।

पितृपक्ष का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

पितृपक्ष का व्रत-त्यौहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान की अभिव्यक्ति है। इसके पीछे कई गहन विश्वास और शास्त्रीय आधार हैं:

धार्मिक महत्व:

  • पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति
  • पितृ ऋण से मुक्ति — महर्षि पराशर के अनुसार हर मनुष्य तीन ऋणों (देव, ऋषि, पितृ) से बंधा है
  • परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और संतान की रक्षा
  • कुंडली में पितृ दोष के निवारण का सर्वोत्तम अवसर

आध्यात्मिक महत्व:

  • मोक्ष की प्राप्ति हेतु पितरों की सहायता का सिद्धांत
  • कर्म और पुनर्जन्म की अवधारणा का व्यावहारिक पालन
  • मृत्यु के बाद के जीवन के प्रति सम्मान की भावना
  • आत्मा की अमरता का स्मरण

ज्योतिषीय दृष्टिकोण:

  • पितृपक्ष में सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है
  • चंद्रमा कृष्ण पक्ष में रहता है — तमस की प्रधानता
  • पिता के कुंडली में सूर्य, शनि और दशम भाव की स्थिति प्रभावी
  • पितृ दोष हो तो पितृपक्ष में विशेष उपाय अनिवार्य

वास्तु और कर्म दोष:

  • यदि घर में बार-बार अशुभ घटनाएं हो रही हों
  • संतान को रोग, शिक्षा में बाधा
  • आर्थिक संकट, व्यापार में हानि
  • कलह, विवाद और पारिवारिक कलेश

पितृपक्ष की पौराणिक कथा

पितृपक्ष के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। सबसे प्रचलित कथा इस प्रकार है:

कथा: प्राचीन काल में महर्षि पराशर ने अपने पिता महर्षि शक्ति के श्राद्ध का आयोजन किया। उन्होंने यमराज से निवेदन किया कि पितरों को एक विशेष समय दिया जाए जब वे अपने वंशजों के माध्यम से तृप्त हो सकें। यमराज ने स्वीकार किया और भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक का समय निर्धारित किया। इस अवधि में पितर अपने परिवार के सदस्यों के पास आते हैं और उनके द्वारा किए गए श्राद्ध-तर्पण से तृप्त होकर मुक्ति प्राप्त करते हैं।

अन्य कथा: एक अन्य मान्यता के अनुसार, कार्तिकेय ने अपने पिता शिव का श्राद्ध भाद्रपद पूर्णिमा को किया था। तभी से यह परंपरा प्रारंभ हुई। कुछ ग्रंथों में माना जाता है कि भीष्म पितामह को अपनी देह-त्याग की तिथि प्रतीक्षा करनी पड़ी थी — वे पितृपक्ष में ही मुक्ति पाए थे।

कथा का संदेश: मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक संक्रमण है। हमारे पूर्वज हमारे कर्मों से जुड़े रहते हैं और उचित श्राद्ध से उन्हें मुक्ति मिलती है। यह हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखने की प्रेरणा देता है।

श्राद्ध विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन

श्राद्ध विधि अत्यंत शुद्ध और विधिपूर्वक करनी चाहिए। यहां संपूर्ण प्रक्रिया दी जा रही है:

सामग्री तैयार करना (एक दिन पूर्व):

  • काले तिल, जौ, कुश, जल
  • चावल, गुड़, शहद, घी
  • फल, मिठाई, पंचामृत
  • सफेद वस्त्र, दक्षिणा
  • शुद्ध घी का दीपक
  • अगर-धूप, कपूर

श्राद्ध के दिन की विधि:

प्रातःकाल (5-7 बजे):

  1. ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करें
  2. पीतांबर (पीले वस्त्र) धारण करें
  3. शुद्ध जगह पर कुश के आसन पर बैठें
  4. पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें
  5. संकल्प लें: "मैं [पिता/दादा/परदादा का नाम] के श्राद्ध हेतु यह विधि कर रहा हूँ"

पितरों का आवाहन:

  1. जल से भरा कलश स्थापित करें
  2. कलश पर कुश, फूल और आम के पत्ते रखें
  3. दीपक जलाएं और "ॐ पितृभ्यो नमः" मंत्र बोलें
  4. पितरों का स्मरण करें और आह्वान करें

ब्राह्मण भोजन:

  1. एक या दो ब्राह्मणों को आमंत्रित करें
  2. उन्हें शुद्ध भोजन कराएं — खीर, पूरी, सब्जी, दाल, रोटी
  3. काले तिल, जौ और शहद का भोग लगाएं
  4. ब्राह्मणों को दक्षिणा अवश्य दें
  5. ब्राह्मणों से पितरों के मोक्ष की प्रार्थना कराएं

तर्पण (जल अर्पण):

  1. दाहिने हाथ में जौ, कुश और तिल लें
  2. "ॐ पितृभ्यो नमः, ॐ पितामहेभ्यो नमः, ॐ अक्षरभ्यो नमः" मंत्र बोलें
  3. जल को धीरे-धीरे बहने दें
  4. पितरों का नाम ले-लेकर तर्पण करें

पिंडदान:

  1. चावल के आटे से पिंड (गोल आकार) बनाएं
  2. कुश, तिल और फूल चढ़ाएं
  3. पितरों के नाम का उच्चारण करें
  4. गाय, कुत्ते, कौए को भोजन दें (तीनों को क्रमशः भोजन देना अनिवार्य)

शाम को:

  • गाय को हरा चारा खिलाएं
  • कौए को भोजन दें
  • कुत्ते को रोटी खिलाएं
  • ब्राह्मण को भोजन कराएं
  • दीपक जलाकर प्रार्थना करें

तर्पण विधि और मंत्र

तर्पण जल के माध्यम से पितरों को अर्पित किया जाता है। यह पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।

तर्पण के मुख्य मंत्र:

1. सामान्य तर्पण मंत्र:

ॐ पितृभ्यो नमः, स्वधा पितृभ्यो नमः

2. तीन पीढ़ी का तर्पण:

ॐ पितृभ्यो नमः ॐ पितामहेभ्यो नमः ॐ अक्षरभ्यो नमः

3. दशम तर्पण मंत्र:

ॐ पितृभ्यो नमः, स्वधा नमः, देवताभ्यो नमः

4. विशेष मंत्र (पिता के नाम से):

ॐ [पिता का नाम] अर्घ्यं पात्रं स्वधा नमः

तर्पण विधि:

  1. स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें
  2. नदी, तालाब या घर के स्नानागार में जाएं
  3. दाहिने हाथ में जौ, तिल और जल लें
  4. तीन बार मंत्र बोलकर जल बहने दें
  5. पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें
  6. सूर्योदय के समय तर्पण सर्वोत्तम

पिंडदान

पिंडदान का अर्थ है पितरों के नाम पर चावल या आटे से बने पिंड का दान। यह पितरों की भूख-प्यास मिटाने का प्रतीक है।

पिंडदान की विधि:

  1. शुद्ध चावल का आटा गूंथकर पिंड बनाएं
  2. पिंड पर कुश, तिल, जौ रखें
  3. पिता-पितामह के नाम से संकल्प लें
  4. पिंड को विधिपूर्वक जल में विसर्जित करें या गाय को खिलाएं
  5. पिंडदान गया, वाराणसी, प्रयागराज या नदी तट पर करना सर्वोत्तम

पिंडदान के प्रकार:

  • वार्षिक पिंडदान — प्रत्येक वर्ष पिता की मृत्यु तिथि पर
  • सर्वपितृ पिंडदान — सर्वपित्री अमावस्या को
  • मासिक पिंडदान — प्रत्येक माह अमावस्या को
  • विशेष पिंडदान — गया, प्रयागराज, काशी जाकर

ज्योतिषीय महत्व:

  • पितृ दोष हो तो पिंडदान से राहत
  • संतान सुख की प्राप्ति
  • कुंडली में सूर्य, चंद्र, शनि के दोषों का निवारण
  • अचानक मृत्यु, दुर्घटना से बचाव

पितृपक्ष में क्या करें और क्या न करें

अवश्य करें:

  • प्रतिदिन पितरों का स्मरण करें
  • तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान नियमित रूप से करें
  • ब्राह्मण भोजन और दान करें
  • गाय को हरा चारा खिलाएं
  • कौए, कुत्ते, चींटी को भोजन दें
  • संयम और सात्विक जीवन जिएं
  • क्षमा, दान, सेवा करें
  • पितरों के नाम पर यज्ञ, हवन करवाएं

इन कार्यों से बचें:

  • नए काम, व्यापार, यात्रा की शुरुआत
  • विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य
  • नए वस्त्र, आभूषण की खरीदारी
  • क्रोध, असत्य, चुगली
  • मांस, मदिरा, तामसिक भोजन
  • शेविंग, नाखून काटना (कुछ पंचांगों के अनुसार)
  • किसी का अपमान या अनादर

पितृपक्ष के विशेष लाभ:

  • ब्रह्मचर्य का पालन करने से अनंत फल
  • गया में पिंडदान करने से पितरों को सीधे मोक्ष
  • 16 दिन तक प्रतिदिन श्राद्ध करने से 1000 यज्ञों का फल

सर्वपित्री अमावस्या — सबसे पावन दिन

सर्वपित्री अमावस्या पितृपक्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन उन सभी पूर्वजों के लिए तर्पण और श्राद्ध किया जाता है जिनका नाम हमें याद नहीं है, जो अनेक पीढ़ियों पहले गुजर चुके हैं।

सर्वपित्री अमावस्या 2025: 21 सितम्बर 2025, रविवार

विशेष विधि:

  • सवेरे ब्रह्म मुहूर्त में उठें
  • पितृगया, गया, काशी या अपने घर पर पिंडदान करें
  • "ॐ पितृभ्यो नमः" का 108 बार जाप करें
  • गाय, कुत्ते, कौए को भोजन अवश्य दें
  • पीपल के वृक्ष में जल दें और दीपक जलाएं
  • सवा लाख तर्पण का संकल्प लें

सर्वपित्री अमावस्या के 10 विशेष लाभ:

  1. उन पितरों का मोक्ष जिनका कोई वंशज नहीं
  2. परिवार की 7 पीढ़ियों का उद्धार
  3. कुंडली के पितृ दोष का स्थायी निवारण
  4. अचानक धन-लाभ और अवसर
  5. संतान सुख की वृद्धि
  6. विवाह में आ रही बाधा का अंत
  7. व्यापार में नई उन्नति
  8. नौकरी या करियर में सफलता
  9. रोग और शोक से मुक्ति
  10. पितरों का सदैव आशीर्वाद प्राप्त रहना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पितृपक्ष 2025 कब से कब तक है?

7 सितम्बर 2025 से 21 सितम्बर 2025 तक, कुल 16 दिन।

क्या पितृपक्ष में विवाह हो सकता है?

नहीं, पितृपक्ष में कोई भी मांगलिक कार्य अत्यंत वर्जित माना जाता है। इस समय विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नई नौकरी आदि कार्य नहीं करने चाहिए।

पितृपक्ष में तर्पण किस समय करें?

सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूर्त में) तर्पण सर्वोत्तम है। यदि संभव न हो तो प्रातः 6 से 10 बजे के बीच कर सकते हैं।

क्या पितृपक्ष में मांसाहार कर सकते हैं?

नहीं, पितृपक्ष में पूर्ण सात्विक जीवन जीना चाहिए। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का सेवन वर्जित है।

क्या पितृपक्ष में पूजा-पाठ कर सकते हैं?

हाँ, पितृपक्ष में विशेष रूप से पितरों की पूजा और तर्पण का विधान है। भगवान विष्णु की पूजा भी की जा सकती है। शिवलिंग पर जल चढ़ाना भी लाभकारी है।

क्या हर पीढ़ी का अलग-अलग श्राद्ध करना जरूरी है?

यदि पिता की मृत्यु की तिथि याद हो तो उस दिन अलग श्राद्ध करें। अन्यथा पितृपक्ष के किसी भी दिन या सर्वपित्री अमावस्या को श्राद्ध कर सकते हैं।

क्या स्त्रियां पितृपक्ष में श्राद्ध कर सकती हैं?

शास्त्रों के अनुसार पुरुष श्राद्ध के अधिकारी हैं, लेकिन आजकल स्त्रियां भी विधिपूर्वक श्राद्ध कर सकती हैं। विशेषकर विधवा स्त्रियों के लिए यह अनिवार्य है।

क्या पितृपक्ष में बाल मुंडन करा सकते हैं?

नहीं, पितृपक्ष में मुंडन वर्जित है। मुंडन के लिए नवरात्रि या अन्य शुभ काल उचित है।

पितृपक्ष में दान किसे करें?

शुद्ध आचरण वाले ब्राह्मण, गरीब, अनाथ, विद्यार्थी, वृद्धजन — इन सभी को दान करना उचित है। काले तिल, जौ, वस्त्र, अनाज, जल के बर्तन विशेष फलदायी दान हैं।

सर्वपित्री अमावस्या का विशेष महत्व क्यों है?

इस दिन उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनका कोई वंशज नहीं है या जिनका स्मरण नहीं रहा। यह सबसे पावन और व्यापक श्राद्ध माना जाता है।

निष्कर्ष

पितृपक्ष हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए समर्पित 16 दिवसीय पावन काल है। इस अवधि में विधिपूर्वक तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों का आशीर्वाद सदैव बना रहता है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

मेरी सलाह:

  1. पितृपक्ष की प्रत्येक तिथि पर या न्यूनतम सर्वपित्री अमावस्या को अवश्य तर्पण करें
  2. ब्राह्मण भोजन और गाय-कौए-कुत्ते को भोजन अवश्य दें
  3. पितृपक्ष में कोई नया शुभ कार्य प्रारंभ न करें
  4. संयम और सात्विक जीवन जिएं
  5. क्षमा, दान और सेवा करें

शुभकामनाएँ सहित, गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली 📞 संपर्क: www.panditnmshrimali.com


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Frequently Asked Questions

पितृपक्ष 2025 कब से कब तक है?+
7 सितम्बर 2025 से 21 सितम्बर 2025 तक, कुल 16 दिन।
क्या पितृपक्ष में विवाह हो सकता है?+
नहीं, पितृपक्ष में कोई मांगलिक कार्य वर्जित है — विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नई नौकरी सब टालें।
पितृपक्ष में तर्पण किस समय करें?+
सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में तर्पण सर्वोत्तम है। यदि संभव न हो तो प्रातः 6 से 10 बजे के बीच करें।
क्या पितृपक्ष में मांसाहार कर सकते हैं?+
नहीं, पितृपक्ष में पूर्ण सात्विक जीवन जीना चाहिए। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज वर्जित।
क्या स्त्रियां पितृपक्ष में श्राद्ध कर सकती हैं?+
आजकल स्त्रियां भी विधिपूर्वक श्राद्ध कर सकती हैं। विशेषकर विधवा स्त्रियों के लिए यह अनिवार्य है।
सर्वपित्री अमावस्या का विशेष महत्व क्यों है?+
इस दिन उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनका कोई वंशज नहीं है या जिनका स्मरण नहीं रहा।
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Written by

Nidhi Shrimali

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Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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