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भगवान कार्तिकेय की जन्म की कथा एवं जानिए क्यों नहीं होती

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7 July 2026 11 min read|By Nidhi Shrimali

⚡ संक्षेप में — भगवान कार्तिकेय

लेखिका: निधि श्रीमाली | वैदिक ज्योतिषी, 18+ वर्षों का अनुभव
अद्यतन: अगस्त 2026 | पढ़ने का समय: 12 मिनट
रेटिंग: ★★★★★ 4.9/5 (1,425+ परामर्श समीक्षाओं से)

कार्तिकेय शिव-पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र और देवताओं के सेनापति हैं, जिनका जन्म तारकासुर के वध हेतु हुआ। उत्तर भारत में कुछ मंदिरों में स्त्रियों के प्रवेश की परंपरागत रोक है, जबकि दक्षिण भारत में वे मुरुगन के रूप में सर्वाधिक पूजित हैं और वहाँ ऐसी कोई रोक नहीं। ज्योतिष में वे मंगल से संबंधित हैं।


विषय सूची

  1. जन्म की कथा
  2. छह नाम, छह मुख
  3. तारकासुर वध
  4. गणेश जी से प्रतिस्पर्धा की कथा
  5. स्त्रियों के प्रवेश का प्रश्न
  6. दक्षिण भारत में मुरुगन
  7. ज्योतिष में कार्तिकेय
  8. उपासना किसके लिए
  9. पूजा विधि
  10. मंत्र
  11. प्रमुख तिथियाँ और त्योहार

जन्म की कथा

कार्तिकेय का जन्म साधारण नहीं था, और कथा के प्रत्येक अंश का अर्थ है।

तारकासुर नामक असुर ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल शिव के पुत्र के हाथों हो सकेगा। यह वरदान उसने चतुराई से माँगा था — क्योंकि सती के देहत्याग के पश्चात शिव गहन समाधि में थे और उनके पुत्र होने की कोई संभावना नहीं दिखती थी।

देवताओं ने शिव की समाधि भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। शिव ने क्रोध में तृतीय नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया, परंतु समाधि भंग हो चुकी थी। तत्पश्चात पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उनसे विवाह किया।

शिव के तेज को धारण करने का सामर्थ्य किसी में नहीं था। वह तेज अग्नि देव को सौंपा गया, अग्नि से गंगा को, और गंगा ने उसे शर-वन — सरकंडों के वन — में रखा। वहाँ छह शिशुओं का जन्म हुआ, जिनका पालन कृत्तिका नक्षत्र की छह देवियों ने किया।

जब पार्वती जी वहाँ पहुँचीं और उन्होंने छहों शिशुओं को एक साथ आलिंगन में लिया, तो वे एक हो गए — छह मुख और एक शरीर। इसी कारण वे षडानन कहलाए।

छह नाम, छह मुख

कार्तिकेय के अनेक नाम हैं और प्रत्येक कथा के किसी अंश से निकला है।

नामअर्थ
कार्तिकेयकृत्तिका नक्षत्र की छह देवियों द्वारा पालित
स्कंदशिव के तेज से उत्पन्न
षडानन / षण्मुखछह मुख वाले
सुब्रह्मण्यदक्षिण भारत में प्रचलित नाम
मुरुगनतमिल — 'सुंदर', 'युवा'
शरवणशर-वन में जन्म लेने वाले
महासेन / देवसेनापतिदेवताओं के सेनापति
कुमारनित्य युवा

छह मुखों का प्रतीकात्मक अर्थ भी बताया जाता है — पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और मन, अर्थात् वह जो छहों दिशाओं और छहों इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है। उनका वाहन मयूर है और अस्त्र वेल (शक्ति) — जो देवी पार्वती ने उन्हें प्रदान किया।

तारकासुर वध

छह दिन की आयु में ही कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति बनाया गया — यह स्वयं में उनके स्वरूप का संकेत है। उन्होंने तारकासुर से युद्ध किया और वेल से उसका वध किया।

कथा का भाव यह है कि तारकासुर का वरदान अभेद्य प्रतीत होता था, परंतु उसमें ही उसका अंत छिपा था। शिव जो समाधि में थे, उन्हीं से वह शक्ति उत्पन्न हुई जो उसका अंत बनी।

दक्षिण भारत की परंपरा में सूरपद्मन के वध की कथा अधिक प्रचलित है — जिसमें मुरुगन ने असुर को दो भागों में विभक्त किया, और असुर ने क्षमा माँगने पर एक भाग मयूर बना जो उनका वाहन हुआ और दूसरा मुर्गा जो उनकी ध्वजा पर स्थान पाया। यह क्षमा का प्रतीक है — शत्रु का नाश नहीं, उसका रूपांतरण।

गणेश जी से प्रतिस्पर्धा की कथा

यह कथा भारतीय घरों में सर्वाधिक सुनाई जाती है और इसका अर्थ व्यावहारिक है।

एक बार शिव-पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों के मध्य प्रतियोगिता रखी — जो पहले संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा कर लौटेगा, उसे विशेष फल मिलेगा।

कार्तिकेय तुरंत अपने मयूर पर आरूढ़ होकर निकल पड़े। गणेश जी, जिनका वाहन मूषक है, जानते थे कि वे गति में नहीं जीत सकते। उन्होंने अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा की और कहा — "मेरे लिए संपूर्ण संसार आप ही हैं।"

गणेश जी विजयी घोषित हुए। कार्तिकेय लौटे तो उन्हें यह अन्यायपूर्ण लगा और वे रुष्ट होकर क्रौंच पर्वत चले गए — जिसे दक्षिण भारत की परंपरा में पलनी अथवा कुमार पर्वत से जोड़ा जाता है।

कथा का सार यह है कि बुद्धि और भक्ति गति से श्रेष्ठ हैं, और यही भाव गणेश जी को प्रथम पूज्य बनाता है। परंतु कार्तिकेय का रुष्ट होना भी उपेक्षित नहीं है — यह उस पीड़ा को स्वीकार करता है जो योग्य होकर भी अनदेखा रह जाने से होती है।

स्त्रियों के प्रवेश का प्रश्न

यह प्रश्न मुझसे बार-बार पूछा जाता है, और इसका उत्तर स्पष्ट रूप से देना आवश्यक है क्योंकि इसमें बहुत भ्रम है।

यह रोक सार्वभौमिक नहीं है — यह कुछ विशिष्ट मंदिरों की स्थानीय परंपरा है, संपूर्ण हिंदू विधान नहीं।

उत्तर भारत के कुछ कार्तिकेय मंदिरों में — विशेषतः हरियाणा के पेहोवा और कुछ अन्य स्थानों पर — यह परंपरा रही है। इसके पीछे दो कारण बताए जाते हैं:

  • ब्रह्मचर्य स्वरूप — उत्तर भारत की परंपरा में कार्तिकेय नित्य ब्रह्मचारी माने जाते हैं, अतः स्त्रियों की उपस्थिति से दूरी की परंपरा बनी।
  • शाप की कथा — एक स्थानीय कथा के अनुसार कार्तिकेय ने रुष्ट होकर यह विधान किया। यह कथा शास्त्रीय ग्रंथों में नहीं, स्थानीय परंपरा में मिलती है।

इसके विपरीत तथ्य भी उतने ही स्पष्ट हैं:

  • दक्षिण भारत में ऐसी कोई रोक नहीं है। पलनी, तिरुचेंदूर, स्वामीमलाई और अन्य अरुपडै वीडु मंदिरों में स्त्रियाँ स्वतंत्र रूप से दर्शन करती हैं। मुरुगन दक्षिण के सर्वाधिक लोकप्रिय देवता हैं और उनकी उपासिकाएँ करोड़ों में हैं।
  • दक्षिण की परंपरा में कार्तिकेय विवाहित हैं — देवसेना और वल्ली उनकी पत्नियाँ हैं, और मंदिरों में उनके साथ ही विराजमान हैं।
  • शास्त्रों में कोई सार्वभौमिक निषेध नहीं मिलता।

मेरा परामर्श स्पष्ट है — जिस मंदिर में जो परंपरा है, वहाँ उसका सम्मान करें। परंतु यह मानना कि स्त्रियाँ कार्तिकेय की उपासना ही नहीं कर सकतीं, तथ्यतः गलत है। घर पर उपासना, मंत्र जाप और व्रत — इनमें कोई निषेध नहीं है, और दक्षिण भारत का संपूर्ण मुरुगन भक्ति परंपरा इसका प्रमाण है।

दक्षिण भारत में मुरुगन

दक्षिण भारत में — विशेषतः तमिलनाडु में — कार्तिकेय की उपासना उत्तर भारत से कहीं अधिक व्यापक है। वहाँ वे मुरुगन अथवा सुब्रह्मण्य कहलाते हैं और तमिल देवता माने जाते हैं।

अरुपडै वीडु — मुरुगन के छह प्रमुख धाम:

धामविशेषता
पलनीगणेश प्रसंग के बाद रुष्ट होकर आए; सर्वाधिक प्रसिद्ध
तिरुचेंदूरसमुद्र तट पर; सूरपद्मन वध का स्थान
स्वामीमलाईजहाँ उन्होंने पिता शिव को प्रणव का अर्थ बताया
तिरुपरनकुंड्रमदेवसेना से विवाह का स्थान
पषमुदिरचोलैवन में स्थित
तिरुत्तनीवल्ली से विवाह के पश्चात निवास

कुक्के सुब्रह्मण्य (कर्नाटक) विशेष उल्लेखनीय है — यह काल सर्प दोष और सर्प दोष निवारण का प्रमुख केंद्र है, क्योंकि सुब्रह्मण्य को नाग रूप में भी पूजा जाता है। नाग पंचमी पर वहाँ विशेष अनुष्ठान होते हैं।

ज्योतिष में कार्तिकेय

कार्तिकेय का संबंध मुख्यतः मंगल ग्रह से है — दोनों सेनापति, दोनों युद्ध और साहस के अधिष्ठाता, दोनों का रंग लाल।

स्थितिक्यों उपयुक्त
मंगल दोष / मांगलिकमंगल के अधिष्ठाता देवता; हनुमान के साथ उपासना
मंगल निर्बल — साहस की कमीप्रत्यक्ष उपाय
मंगल उग्र — क्रोध, विवादशांत रूप में उपासना; वेल का प्रतीक संयमित शक्ति है
काल सर्प दोषसुब्रह्मण्य नाग रूप में पूजित; कुक्के सुब्रह्मण्य प्रमुख केंद्र
कृत्तिका नक्षत्र में जन्मकार्तिकेय इसी नक्षत्र से पालित हैं
संतान बाधादक्षिण भारत में संतान हेतु मुरुगन उपासना प्रचलित
शत्रु बाधा, प्रतियोगितादेवसेनापति स्वरूप; षष्ठ भाव संबंधी

आपकी कुंडली में मंगल की वास्तविक स्थिति क्या है — निर्बल है या उग्र — यह कुंडली विश्लेषण से ज्ञात होता है, और उपाय उसी के अनुसार भिन्न होता है।

उपासना किसके लिए

  • साहस और आत्मविश्वास की कमी
  • प्रतियोगी परीक्षा, सैन्य अथवा पुलिस सेवा की तैयारी — सेनापति स्वरूप
  • शत्रु बाधा और न्यायालय के मामले
  • मंगल दोष अथवा मांगलिक स्थिति
  • संतान प्राप्ति — विशेषतः दक्षिण भारतीय परंपरा में
  • काल सर्प और सर्प दोष
  • क्रोध पर नियंत्रण — वेल संयमित शक्ति का प्रतीक है
  • त्वचा रोग — परंपरा में सुब्रह्मण्य उपासना का संबंध

पूजा विधि

  1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें — लाल अथवा नारंगी उपयुक्त।
  2. पूर्व अथवा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. संकल्प लें — नाम, गोत्र और उद्देश्य कहें।
  4. गणेश पूजन प्रथम — यह विधान है, और कार्तिकेय-गणेश कथा के बाद भी।
  5. अभिषेक — जल, पंचामृत, चंदन मिश्रित जल से।
  6. अर्पित करें — लाल पुष्प, विशेषतः कनेर और गुड़हल; अक्षत, चंदन।
  7. नैवेद्य — पंचामृत, फल, मोदक अथवा दक्षिण परंपरा में पंचामृतम्।
  8. दीप और धूप — घी का दीपक।
  9. मंत्र जाप 108 बार।
  10. स्कंद षष्ठी कवचम् अथवा सुब्रह्मण्य भुजंगम् का पाठ।
  11. आरती और प्रसाद वितरण।

सर्वोत्तम दिन: मंगलवार, और प्रत्येक मास की षष्ठी तिथि — जो कार्तिकेय की तिथि है।

मंत्र

मूल मंत्र:

ॐ शरवणभवाय नमः

यह छह अक्षरों का मंत्र है — 'श-र-व-ण-भ-व' — जो उनके छह मुखों से संबंधित माना जाता है। दक्षिण भारत में यह सर्वाधिक प्रचलित है।

अन्य मंत्र:

ॐ सुब्रह्मण्याय नमः
ॐ कार्तिकेयाय नमः
ॐ स्कंदाय नमः

गायत्री मंत्र:

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि।
तन्नो षण्मुखः प्रचोदयात्॥

पाठ हेतु: स्कंद षष्ठी कवचम्, सुब्रह्मण्य भुजंगम् (आदि शंकराचार्य रचित), कंद षष्ठी कवचम्।

108 बार जाप, मंगलवार अथवा षष्ठी को। 40 दिन का संकल्प लेकर करें।

प्रमुख तिथियाँ और त्योहार

तिथिविवरण
स्कंद षष्ठीप्रत्येक मास की शुक्ल षष्ठी; मासिक उपासना
कंद षष्ठीकार्तिक मास में छह दिन का व्रत; सूरपद्मन वध का स्मरण
थाईपूसमथै मास की पूसम नक्षत्र तिथि; तमिल परंपरा का प्रमुख पर्व
वैकासी विशाखम्कार्तिकेय का जन्म दिवस माना जाता है
पंगुनी उत्तिरमदेवसेना से विवाह का स्मरण
मंगलवारसाप्ताहिक उपासना

स्कंद षष्ठी व्रत सबसे सुलभ है — प्रत्येक मास की शुक्ल षष्ठी को उपवास, मंत्र जाप और सायंकाल पूजन। जिन्हें मंगल दोष अथवा साहस संबंधी कठिनाई है, उनके लिए यह उत्तम नियमित अभ्यास है।


शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
प्रमुख ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली


आपकी कुंडली में मंगल की स्थिति क्या है?

कार्तिकेय उपासना मंगल से संबंधित है — परंतु निर्बल मंगल और उग्र मंगल के उपाय भिन्न हैं। यह जान लेना उपाय की दिशा तय करता है।

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Frequently Asked Questions

भगवान कार्तिकेय का जन्म कैसे हुआ?+
तारकासुर को वरदान था कि उसका वध केवल शिव के पुत्र के हाथों होगा। शिव के तेज को धारण करने का सामर्थ्य किसी में नहीं था, अतः वह अग्नि देव को, फिर गंगा को सौंपा गया, और गंगा ने उसे शर-वन में रखा जहाँ छह शिशुओं का जन्म हुआ। कृत्तिका नक्षत्र की छह देवियों ने उनका पालन किया, और पार्वती जी के आलिंगन से वे एक हो गए — छह मुख और एक शरीर।
क्या स्त्रियाँ कार्तिकेय मंदिर में नहीं जा सकतीं?+
यह रोक सार्वभौमिक नहीं है, यह कुछ विशिष्ट उत्तर भारतीय मंदिरों की स्थानीय परंपरा है। दक्षिण भारत में ऐसी कोई रोक नहीं — पलनी, तिरुचेंदूर और अन्य अरुपडै वीडु मंदिरों में स्त्रियाँ स्वतंत्र रूप से दर्शन करती हैं, और वहाँ कार्तिकेय विवाहित माने जाते हैं। शास्त्रों में कोई सार्वभौमिक निषेध नहीं है। घर पर उपासना, मंत्र और व्रत में कोई रोक नहीं।
कार्तिकेय गणेश जी से क्यों रुष्ट हुए थे?+
शिव-पार्वती ने प्रतियोगिता रखी कि जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा कर लौटेगा उसे विशेष फल मिलेगा। कार्तिकेय मयूर पर निकल पड़े, जबकि गणेश जी ने माता-पिता की सात परिक्रमा कर कहा कि उनके लिए संपूर्ण संसार वही हैं — और विजयी घोषित हुए। कार्तिकेय को यह अन्यायपूर्ण लगा और वे क्रौंच पर्वत चले गए। कथा का सार यह है कि बुद्धि और भक्ति गति से श्रेष्ठ हैं।
ज्योतिष में कार्तिकेय का संबंध किस ग्रह से है?+
मंगल से — दोनों सेनापति हैं, दोनों साहस और युद्ध के अधिष्ठाता, दोनों का रंग लाल। इसीलिए मंगल दोष, मांगलिक स्थिति, साहस की कमी और क्रोध की अधिकता में कार्तिकेय उपासना निर्धारित की जाती है। सुब्रह्मण्य नाग रूप में भी पूजित हैं, अतः काल सर्प दोष में भी उनकी उपासना होती है — कुक्के सुब्रह्मण्य इसका प्रमुख केंद्र है।
कार्तिकेय का मूल मंत्र क्या है?+
ॐ शरवणभवाय नमः — यह छह अक्षरों का मंत्र है जो उनके छह मुखों से संबंधित माना जाता है और दक्षिण भारत में सर्वाधिक प्रचलित है। इसके अतिरिक्त ॐ सुब्रह्मण्याय नमः और ॐ स्कंदाय नमः भी जपे जाते हैं। पाठ हेतु स्कंद षष्ठी कवचम् और सुब्रह्मण्य भुजंगम् प्रचलित हैं। मंगलवार अथवा षष्ठी को 108 बार जाप करें।
कार्तिकेय की पूजा कब करनी चाहिए?+
मंगलवार और प्रत्येक मास की षष्ठी तिथि, जो कार्तिकेय की तिथि है। प्रमुख पर्व हैं — स्कंद षष्ठी जो मासिक है, कार्तिक मास की कंद षष्ठी जो छह दिन का व्रत है, थाईपूसम, वैकासी विशाखम् जो उनका जन्म दिवस माना जाता है, और पंगुनी उत्तिरम। मासिक स्कंद षष्ठी व्रत सबसे सुलभ नियमित अभ्यास है।
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तमिलनाडु में मुरुगन के छह प्रमुख धाम — पलनी जहाँ वे गणेश प्रसंग के बाद आए, तिरुचेंदूर जो सूरपद्मन वध का स्थान है, स्वामीमलाई जहाँ उन्होंने पिता शिव को प्रणव का अर्थ बताया, तिरुपरनकुंड्रम जहाँ देवसेना से विवाह हुआ, पषमुदिरचोलै, और तिरुत्तनी। इनके अतिरिक्त कर्नाटक का कुक्के सुब्रह्मण्य काल सर्प दोष निवारण का प्रमुख केंद्र है।
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Written by

Nidhi Shrimali

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Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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