लेखिका: निधि श्रीमाली, ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली
शिवपुराण की शतरुद्र संहिता में भगवान शिव के 19 अवतार गिनाए गए हैं: पिप्पलाद, नंदी, वीरभद्र, भैरव, अश्वत्थामा, शरभ, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, ऋषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी और यक्षेश्वर। इनके अलावा शिव के पाँच मुख (पंचब्रह्म), अर्धनारीश्वर रूप, एकादश रुद्र, 28 योगाचार्य अवतार और 12 ज्योतिर्लिंग भी उनके प्राकट्य माने जाते हैं। इस लेख में हर अवतार की कथा संक्षेप में दी गई है। साथ में यह भी बताया गया है कि इंटरनेट पर घूमने वाली कई सूचियों में कौन-से नाम गलत जुड़ गए हैं।
सुधार: इस पृष्ठ के पिछले संस्करण में "शिवपुराण के 19 अवतार" के नाम से एक ऐसी सूची छपी थी जो शिवपुराण से मेल नहीं खाती थी (जैसे पिङ्गल, भीमरूप, बुद्ध, हंस, अनंत)। सही सूची नीचे दी गई है। पुराने नामों के बारे में अलग खंड में बताया गया है कि वे वास्तव में क्या हैं, ताकि जो पाठक उन्हें खोजते हुए आएँ उन्हें सही जानकारी मिले।
विषय सूची (Table of Contents)
- अवतार का अर्थ और शिव के अवतार क्यों — परिचय
- भगवान शिव के अवतार लेने के कारण और धार्मिक महत्व
- शिवपुराण के 19 अवतार — सूची और कथाएँ
- प्रचलित नाम जो 19 की सूची में नहीं हैं
- दशावतार बनाम शिव के अवतार — मुख्य अंतर
- ज्योतिष और शिव उपासना — क्या कर सकती है, क्या नहीं
- कौन सा रूप कब पूजें — दिन, तिथि और परंपरा
- मंत्र और पूजा विधि
- शिव उपासना के फल — और उनकी सीमा
- पूजा के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अवतार का अर्थ और शिव के अवतार क्यों — परिचय
संस्कृत में "अवतार" शब्द "अव" (नीचे) और "तॄ" (पार करना, उतरना) से बना है। इसका अर्थ है ऊपर से नीचे उतरना, यानी दिव्य सत्ता का किसी रूप में इस लोक में प्रकट होना।
विष्णु और शिव के अवतारों में अंतर:
- विष्णु के अवतार (राम, कृष्ण, नृसिंह आदि) प्रायः लंबे समय तक इस लोक में रहकर धर्म की स्थापना करते हैं। उनकी कथाएँ जन्म से लेकर पूरे जीवन तक चलती हैं। इन पर विस्तार से हमारा लेख विष्णु के 10 अवतार पढ़ें।
- शिव के अवतार अधिक विविध हैं। कुछ पूरे जीवन वाले हैं (दुर्वासा, अश्वत्थामा, हनुमान), कुछ एक ही प्रसंग के लिए प्रकट होते हैं (किरात, ब्रह्मचारी, यक्षेश्वर), और कुछ उग्र रूप हैं (वीरभद्र, भैरव, शरभ)।
- शिव के अनेक अवतार किसी भक्त की परीक्षा लेने या उसका अहंकार तोड़ने के लिए आते हैं। यह उनकी कथाओं की सबसे खास बात है।
- विष्णु के दशावतार की सूची काफी हद तक स्थिर है। शिव के अवतारों की गिनती ग्रंथ के अनुसार बदलती है: शतरुद्र संहिता में 19, योगाचार्य अवतार 28, एकादश रुद्र 11।
शिवपुराण सात संहिताओं में बँटा है। अवतारों का वर्णन मुख्यतः शतरुद्र संहिता में है और ज्योतिर्लिंगों का कोटिरुद्र संहिता में। शिवपुराण के बारे में और जानने के लिए हमारा लेख शिव पुराण देखें।
भगवान शिव के अवतार लेने के कारण और धार्मिक महत्व
शतरुद्र संहिता की कथाओं को देखें तो शिव के अवतार इन कारणों से होते हैं:
1. अधर्म और अहंकार का दमन: वीरभद्र ने दक्ष के अहंकार से भरे यज्ञ का विध्वंस किया। भैरव ने ब्रह्मा के पाँचवें सिर को काटकर उनके अहंकार को तोड़ा। शरभ ने हिरण्यकशिपु-वध के बाद नृसिंह के उग्र तेज को शांत किया।
2. भक्तों की परीक्षा और कृपा: सुरेश्वर रूप में शिव ने बालक उपमन्यु की परीक्षा ली। ब्रह्मचारी रूप में उन्होंने पार्वती के तप की परीक्षा ली। यतिनाथ रूप में भील दंपती आहुक-आहुका के अतिथि-सत्कार की परीक्षा ली।
3. देवताओं का अहंकार तोड़ना: अवधूत रूप में इंद्र का और यक्षेश्वर रूप में देवताओं का घमंड दूर किया।
4. धर्म और ज्ञान की परंपरा: दुर्वासा, अश्वत्थामा और हनुमान जैसे अवतार लंबे समय तक इस लोक में रहकर कथाओं के केंद्र बने। 28 योगाचार्य अवतारों के माध्यम से योग की परंपरा चली।
5. भक्त को वरदान: किरात रूप में अर्जुन से युद्ध करके उन्हें पाशुपतास्त्र दिया।
ज्योतिष के संदर्भ में: ज्योतिष में शिव उपासना को शनि, राहु-केतु और चंद्रमा से जुड़ी पीड़ा में एक सात्विक उपाय माना जाता है। पर कोई ग्रंथ यह नहीं कहता कि हर अवतार एक निश्चित ग्रह या भाव का "मालिक" है। ऐसी तालिकाएँ आधुनिक हैं, इसलिए इस पृष्ठ से हटा दी गई हैं।
शिवपुराण के 19 अवतार — सूची और कथाएँ
शिवपुराण की शतरुद्र संहिता के अनुसार शिव के 19 अवतार और उनकी कथा का सार:
| क्रम | अवतार | कथा का सार |
|---|---|---|
| 1 | पिप्पलाद | महर्षि दधीचि के पुत्र। लोक-परंपरा में शनि-पीड़ा में इनका स्मरण किया जाता है। |
| 2 | नंदी | शिलाद मुनि के तप से प्रकट हुए; शिवगणों के अध्यक्ष और शिव के वाहन बने। |
| 3 | वीरभद्र | सती के देहत्याग के बाद शिव की जटा से प्रकट; दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया। |
| 4 | भैरव | ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काटा; ब्रह्महत्या से मुक्ति काशी में मिली; काशी के कोतवाल। |
| 5 | अश्वत्थामा | द्रोणाचार्य के तप से शिव के अंश से जन्मे; महाभारत के योद्धा। |
| 6 | शरभ | नृसिंह अवतार के उग्र तेज को शांत करने के लिए प्रकट हुए। |
| 7 | गृहपति | काशी में मुनि विश्वानर और शुचिष्मती के पुत्र; तप से अग्नि के अधिपति बने। |
| 8 | दुर्वासा | अत्रि और अनसूया के पुत्र; ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, विष्णु के अंश से दत्तात्रेय और शिव के अंश से दुर्वासा। |
| 9 | हनुमान | शिव के रुद्र अंश; रामकथा में राम के परम भक्त। |
| 10 | ऋषभ (वृषभ) | वृषभ रूप में पाताल में उत्पात मचा रहे विष्णु-पुत्रों का अंत किया। |
| 11 | यतिनाथ | यति बनकर भील दंपती आहुक-आहुका की परीक्षा ली; वे अगले जन्म में नल-दमयंती बने। |
| 12 | कृष्णदर्शन | राजा नभाग से जुड़ी कथा; यज्ञ के शेष भाग पर शिव के अधिकार का प्रसंग। |
| 13 | अवधूत | अवधूत रूप में इंद्र का अहंकार तोड़ा; बृहस्पति ने उन्हें पहचानकर इंद्र को बचाया। |
| 14 | भिक्षुवर्य | विदर्भ के राजपुत्र की, जो अनाथ हो गया था, भिक्षु रूप में रक्षा की। |
| 15 | सुरेश्वर | इंद्र का रूप धरकर बालक उपमन्यु की भक्ति की परीक्षा ली और उसे क्षीरसागर का वरदान दिया। |
| 16 | किरात | किरात (वनवासी शिकारी) बनकर अर्जुन से युद्ध किया और पाशुपतास्त्र दिया। |
| 17 | सुनटनर्तक | नर्तक बनकर हिमवान के घर गए और पार्वती का हाथ माँगा। |
| 18 | ब्रह्मचारी | ब्रह्मचारी बनकर पार्वती के तप की परीक्षा ली और उनके सामने शिव की निंदा करके उनकी दृढ़ता देखी। |
| 19 | यक्षेश्वर | अमृत-मंथन के बाद देवताओं के अहंकार को एक तिनके की परीक्षा से तोड़ा। |
इनमें भैरव, वीरभद्र, हनुमान और किरात की कथाएँ सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। हनुमान जी के जन्म और जयंती पर हमारा लेख हनुमान जयंती पढ़ें। शिव के प्रमुख तीर्थों के लिए 12 ज्योतिर्लिंग देखें।
इस सूची के अलावा शिवपुराण में:
- पंचब्रह्म — सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान: शिव के पाँच मुख
- अर्धनारीश्वर — शिव और शक्ति का संयुक्त रूप
- अष्टमूर्ति — शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान, महादेव
- 28 योगाचार्य अवतार — हर द्वापर में एक, जिनमें अंतिम लकुलीश माने जाते हैं
- 12 ज्योतिर्लिंग — कोटिरुद्र संहिता में ज्योति-रूप प्राकट्य
प्रचलित नाम जो 19 की सूची में नहीं हैं
इस पृष्ठ के पुराने संस्करण में और इंटरनेट की कई सूचियों में नीचे दिए गए नाम "शिव के 19 अवतार" के रूप में छपते हैं। इनमें से कुछ शिव के वास्तविक रूप हैं, पर शतरुद्र संहिता की 19 की सूची में नहीं हैं। कुछ किसी और देवता के अवतार हैं। हर नाम का सही परिचय नीचे है।
1. पिङ्गल — शिव का एक नाम, अलग अवतार नहीं
"पिङ्गल" (भूरे-पीले वर्ण वाला) शिव सहस्रनाम में शिव का एक विशेषण है। पुराने संस्करण में इसे "सतयुग का प्रथम अवतार" और "वाममार्ग का संस्थापक" बताया गया था। इसका कोई शास्त्रीय आधार हमें नहीं मिला। शतरुद्र संहिता की सूची पिप्पलाद से शुरू होती है, और संभवतः "पिप्पलाद" ही बिगड़कर "पिङ्गल" बन गया।
2. वटुक (बटुक) भैरव — भैरव का बाल रूप
बटुक भैरव, भैरव का सौम्य बाल रूप है, जिसकी उपासना तंत्र-परंपरा में विशेष रूप से होती है। यह 19 की सूची में अलग से नहीं है; मूल अवतार "भैरव" है (क्रम 4)। काशी के "कोतवाल" काल भैरव कहलाते हैं, बटुक भैरव नहीं।
3. "भीमरूप" — रक्तबीज की कथा देवी की है
पुराने संस्करण में लिखा था कि शिव ने "भीमरूप" धरकर रक्तबीज का वध किया। यह गलत है। रक्तबीज का वध दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण) के अनुसार देवी चामुंडा (काली) ने किया था। "भीम" शिव की अष्टमूर्तियों में एक नाम है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की कथा में शिव ने कुंभकर्ण के पुत्र भीम नामक असुर का वध किया।
4. वीरभद्र — 19 की सूची में है (क्रम 3)
सती के दक्ष-यज्ञ में देहत्याग करने पर शिव ने अपनी जटा से वीरभद्र को प्रकट किया। वीरभद्र ने यज्ञ का विध्वंस किया और दक्ष का सिर काटा। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर जीवित किया। (पुराने संस्करण में "मेढ़े का सिर" लिखा था; शिवपुराण में बकरा है।) कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में वीरभद्र के अनेक मंदिर हैं।
5. महाकाल — ज्योतिर्लिंग रूप
महाकाल शिव का ज्योतिर्लिंग रूप है, जो उज्जैन में स्थित है। कोटिरुद्र संहिता के अनुसार शिव ने वहाँ दूषण नामक असुर का वध करके भक्तों की रक्षा की और महाकाल के रूप में वहीं विराजे। यह 19 की सूची में नहीं, बल्कि 12 ज्योतिर्लिंगों में आता है। "काल के भी काल" होने के कारण महाकाल की उपासना मृत्यु-भय से जुड़ी है।
6. सदाशिव — शिव का परम रूप
शैव सिद्धांत में सदाशिव शिव का वह रूप है जिसके पाँच मुख हैं। यह किसी विशेष युग में लिया गया अवतार नहीं, बल्कि शिव का परम स्वरूप है। पाँच मुख और उनकी दिशाएँ: सद्योजात (पश्चिम, पृथ्वी तत्त्व), वामदेव (उत्तर, जल), अघोर (दक्षिण, अग्नि), तत्पुरुष (पूर्व, वायु) और ईशान (ऊर्ध्व, आकाश)। पुराने संस्करण में ये दिशाएँ गलत दी गई थीं।
7. ईशान — सदाशिव का ऊर्ध्व मुख
ईशान पाँच मुखों में ऊपर की ओर का मुख है और आकाश तत्त्व से जुड़ा है। वास्तु में उत्तर-पूर्व दिशा को इसी नाम से "ईशान कोण" कहते हैं। शिव की अष्टमूर्तियों में भी एक नाम ईशान है।
8. तत्पुरुष — सदाशिव का पूर्व मुख
तत्पुरुष पूर्व दिशा का मुख है और वायु तत्त्व से जुड़ा है। शिवपुराण में पंचब्रह्म के ये पाँचों रूप अलग-अलग कल्पों में प्रकट बताए गए हैं, इसलिए इन्हें "पंचब्रह्म अवतार" भी कहा जाता है। पर ये 19 की सूची से अलग समूह हैं।
9. अघोर — सदाशिव का दक्षिण मुख
"अघोर" का अर्थ है "जो घोर (भयानक) नहीं है", यानी जो देखने में उग्र होकर भी कल्याणकारी है। अघोर दक्षिण दिशा का मुख है और अग्नि तत्त्व से जुड़ा है। "अघोर मंत्र" यजुर्वेद परंपरा का प्रसिद्ध मंत्र है। अघोरी साधु-परंपरा इस नाम से जुड़ी है, पर यह कहना कि इस अवतार ने "वाममार्ग की स्थापना की", किसी ग्रंथ पर आधारित नहीं है।
10. वामदेव — सदाशिव का उत्तर मुख
वामदेव उत्तर दिशा का मुख है और जल तत्त्व से जुड़ा है। यहाँ "वाम" का अर्थ "सुंदर" या "मनोहर" है, "उलटा" नहीं। पुराने संस्करण में इसे वाममार्ग की नींव बताया गया था, जो सही नहीं है। ऋग्वेद के एक ऋषि का नाम भी वामदेव है।
11. क्रोधन — अष्ट भैरवों में एक
क्रोध (क्रोधन) भैरव, अष्ट भैरवों में से एक हैं: असितांग, रुरु, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहार। ये भैरव के रूप हैं, शतरुद्र संहिता की सूची के अलग अवतार नहीं।
12. भैरव (काल भैरव) — 19 की सूची में है (क्रम 4)
ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तो ब्रह्मा के पाँचवें सिर ने शिव का अपमान किया। तब शिव से भैरव प्रकट हुए और उस सिर को काट दिया। ब्रह्महत्या का पाप उनके पीछे लगा, जिससे मुक्ति काशी पहुँचकर मिली। तभी से वे काशी के कोतवाल हैं। भैरव का वाहन श्वान (कुत्ता) है; पुराने संस्करण में "सिंहवाहन" लिखा था, जो गलत है। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को काल भैरव जयंती मनाई जाती है।
13. सिद्धेश्वर — मंदिरों का नाम, अवतार नहीं
"सिद्धेश्वर" (सिद्धों के ईश्वर) देश के अनेक शिव मंदिरों का नाम है। शिवपुराण में इस नाम के किसी अलग अवतार की कथा नहीं है, जिसने अष्ट सिद्धियाँ बाँटी हों।
14. बुद्ध — वैष्णव परंपरा में विष्णु के अवतार
पुराने संस्करण में गौतम बुद्ध को शिव का अवतार बताया गया था। यह किसी प्रमुख शैव ग्रंथ में नहीं है। भागवत पुराण, गीत गोविन्द और कई अन्य वैष्णव सूचियों में बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया है। बौद्ध परंपरा स्वयं बुद्ध को किसी देवता का अवतार नहीं मानती।
15. योगीश्वर — 28 योगाचार्य अवतार
शिवपुराण और वायु पुराण में शिव के 28 योगाचार्य अवतारों का वर्णन है। ये हर द्वापर युग में एक-एक प्रकट होते हैं और योग की परंपरा आगे बढ़ाते हैं। इनमें अंतिम लकुलीश हैं, जिनसे पाशुपत संप्रदाय जुड़ा है। पुराने संस्करण में लिखा था कि "योगीश्वर ने पतंजलि को योगसूत्र दिया"; यह किसी ग्रंथ में नहीं है। परंपरा पतंजलि को शेषनाग का अवतार मानती है।
16. हंस — विष्णु का अवतार
भागवत पुराण में "हंस" विष्णु का अवतार है, जिसने सनकादि ऋषियों को ज्ञान दिया। शतरुद्र संहिता में शिव का हंस अवतार नहीं है। "सोऽहम्" और "हंस" का संबंध योग-परंपरा का विषय है, पर इसे शिव का अवतार बताना सही नहीं।
17. अर्धनारीश्वर — शिव-शक्ति का संयुक्त रूप
अर्धनारीश्वर रूप में शरीर का आधा भाग शिव का और आधा पार्वती का है। शिवपुराण की कथा के अनुसार ब्रह्मा जब सृष्टि नहीं बढ़ा पा रहे थे, तब शिव इस रूप में प्रकट हुए और स्त्री-तत्त्व को अलग करके सृष्टि आगे बढ़ी। यह शिव का प्रसिद्ध रूप है। दाम्पत्य में संतुलन की प्रार्थना से इसकी उपासना की जाती है।
18. "शिवकुमार" — ऐसा कोई अवतार नहीं
पुराने संस्करण में "शिवकुमार" नाम से शिव के बाल-अवतार का वर्णन था। ऐसी कोई कथा शिवपुराण में नहीं है। "कुमार" नाम शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय (स्कंद) का है, जो शिव के पुत्र हैं, अवतार नहीं।
19. अनंत — शेषनाग, विष्णु से जुड़े
अनंत (शेषनाग) वह नाग हैं जिन पर विष्णु शयन करते हैं; लक्ष्मण और बलराम उन्हीं के अवतार माने जाते हैं। "अनंत नाग पर शयन करने वाले शिव" का वर्णन किसी ग्रंथ में नहीं है। अनंत चतुर्दशी का व्रत भी विष्णु के अनंत रूप का है।
दशावतार बनाम शिव के अवतार — मुख्य अंतर
विष्णु के दशावतार:
- मत्स्य
- कूर्म
- वराह
- नृसिंह
- वामन
- परशुराम
- राम
- कृष्ण (कुछ सूचियों में बलराम)
- बुद्ध (दक्षिण की कुछ सूचियों में बलराम)
- कल्कि (भविष्य में)
शिव के 19 अवतार: ऊपर की तालिका में।
मुख्य अंतर:
| पहलू | विष्णु के अवतार | शिव के अवतार |
|---|---|---|
| प्रमुख ग्रंथ | भागवत पुराण, विष्णु पुराण | शिवपुराण (शतरुद्र संहिता), लिंग पुराण |
| संख्या | दशावतार प्रचलित; भागवत में 22-24 | 19 (शतरुद्र संहिता); 28 योगाचार्य; 11 रुद्र |
| अवधि | प्रायः पूरा जीवन (राम, कृष्ण) | कुछ पूरे जीवन (दुर्वासा, हनुमान), कई एक प्रसंग के लिए (किरात, ब्रह्मचारी) |
| मुख्य उद्देश्य | धर्म की स्थापना, असुरों का वध | अहंकार तोड़ना, भक्त की परीक्षा, वरदान, उग्र तेज का शमन |
| स्वरूप | पशु, मनुष्य, नर-सिंह | ऋषि, योद्धा, भिक्षु, नर्तक, गण, उग्र रूप |
| भक्तों से संबंध | रक्षक और मार्गदर्शक | परीक्षक भी, वरदाता भी |
एक रोचक कड़ी: शरभ अवतार नृसिंह के तेज को शांत करने के लिए हुआ, और हनुमान, जो शिव के अंश हैं, विष्णु के अवतार राम के भक्त बने। दोनों परंपराएँ एक-दूसरे को सम्मान देती हैं।
ज्योतिष और शिव उपासना — क्या कर सकती है, क्या नहीं
ज्योतिष में शिव उपासना एक सात्विक उपाय है। परंपरा में ये संबंध प्रचलित हैं:
- शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या: शिव और हनुमान जी की उपासना, शनिवार को हनुमान चालीसा। लोक-परंपरा में पिप्पलाद का स्मरण।
- चंद्रमा की पीड़ा: शिव ने चंद्रमा को सिर पर धारण किया, इसलिए सोमवार की शिव पूजा और जलाभिषेक प्रचलित है।
- राहु-केतु: शिव उपासना और महामृत्युंजय जाप।
- भय और असुरक्षा: काल भैरव की उपासना, विशेषकर अष्टमी को।
- दाम्पत्य: शिव-पार्वती या अर्धनारीश्वर की उपासना।
इसकी सीमाएँ स्पष्ट रूप से:
- उपासना कुंडली का योग नहीं बदलती। वह मन को स्थिर करती है ताकि कठिन समय धैर्य से कटे।
- कोई अवतार-पूजा "सभी ग्रह दोष" दूर नहीं करती। पुराने संस्करण में दी गई नक्षत्र-से-अवतार तालिका का कोई शास्त्रीय आधार नहीं था, इसलिए हटा दी गई है।
- मुकदमे में वकील, बीमारी में डॉक्टर और कर्ज़ में वित्तीय सलाह पहले आती है। पूजा इनके साथ चल सकती है, इनकी जगह नहीं ले सकती।
- कौन-सा ग्रह वास्तव में पीड़ा दे रहा है, यह पूरी कुंडली और दशा देखकर ही पता चलता है। यह कुंडली विश्लेषण परामर्श में किया जाता है।
कौन सा रूप कब पूजें — दिन, तिथि और परंपरा
सोमवार: शिव का दिन। शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र।
प्रदोष (त्रयोदशी की संध्या): शिव-पार्वती पूजन; शनिवार को पड़ने वाला शनि प्रदोष विशेष माना जाता है।
मासिक शिवरात्रि (कृष्ण चतुर्दशी): हर महीने की शिवरात्रि।
अष्टमी: काल भैरव की उपासना; मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को काल भैरव जयंती।
मंगलवार और शनिवार: हनुमान जी की उपासना।
महाशिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी): वर्ष की सबसे बड़ी शिवरात्रि; चार प्रहर की पूजा और जागरण।
श्रावण मास: सावन के सोमवार, रुद्राभिषेक, कांवड़ यात्रा। (श्रावण की तिथियाँ हर वर्ष बदलती हैं; अधिक मास वाले वर्ष में यह लगभग एक महीना खिसक जाता है।)
| प्रार्थना का विषय | परंपरा में प्रचलित उपासना | साथ में क्या ज़रूरी है |
|---|---|---|
| शनि की साढ़ेसाती | शिव पूजा, हनुमान चालीसा | कुंडली में शनि की वास्तविक स्थिति जानना |
| भय, असुरक्षा | काल भैरव उपासना (अष्टमी) | लगातार घबराहट हो तो डॉक्टर से परामर्श |
| विवाह में देरी | शिव-पार्वती पूजा, सोमवार व्रत | दोनों कुंडलियों का कुंडली मिलान |
| स्वास्थ्य | महामृत्युंजय जाप | डॉक्टर का इलाज पहले; जाप उसके साथ |
| विद्या और एकाग्रता | "ॐ नमः शिवाय" जाप | नियमित अध्ययन |
| पितरों की शांति | पितृपक्ष में तर्पण, शिव पूजा | कुल-परंपरा के अनुसार श्राद्ध |
मंत्र और पूजा विधि
सामान्य भक्त के लिए नाम मंत्र और प्रसिद्ध स्तोत्र पर्याप्त हैं। बीज मंत्र और तांत्रिक प्रयोग परंपरा में गुरु-दीक्षा से ही किए जाते हैं।
1. पंचाक्षर मंत्र: "ॐ नमः शिवाय" — शिव का मूल मंत्र, जिसके लिए दीक्षा आवश्यक नहीं मानी जाती। विस्तार से हमारे लेख शिव पंचाक्षरी मंत्र में।
2. महामृत्युंजय मंत्र: "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥" (ऋग्वेद 7.59.12)
3. काल भैरव: "ॐ कालभैरवाय नमः"; आदि शंकराचार्य का "कालभैरवाष्टकम्"।
4. हनुमान जी: हनुमान चालीसा; "ॐ हं हनुमते नमः"।
5. वीरभद्र: "ॐ वीरभद्राय नमः"।
6. अर्धनारीश्वर: "ॐ अर्धनारीश्वराय नमः"; आदि शंकराचार्य का "अर्धनारीश्वर स्तोत्र"।
7. महाकाल: "ॐ महाकालाय नमः"।
जाप: 108 मनकों की रुद्राक्ष माला पर एक माला। नियमितता संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है। असली रुद्राक्ष माला रुद्राक्ष संग्रह में देख सकते हैं।
पूजा सामग्री:
- शिवलिंग या शिव का चित्र; घर के लिए नर्मदा का प्राकृतिक नर्मदेश्वर शिवलिंग परंपरा में श्रेष्ठ माना जाता है
- रुद्राक्ष की माला
- बेलपत्र (तीन पत्तियों वाला, बिना कटे-फटे)
- गंगाजल या स्वच्छ जल
- दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत)
- धूप, दीप, चंदन, अक्षत
- भैरव पूजा में सरसों के तेल का दीपक; हनुमान पूजा में सिंदूर और चमेली का तेल
सामान्य पूजा विधि:
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें
- संकल्प लें — "मैं [नाम], [गोत्र], [उद्देश्य] हेतु शिव पूजा कर रहा/रही हूँ"
- शिवलिंग पर जल, फिर पंचामृत, फिर पुनः जल से अभिषेक करें
- चंदन, अक्षत, बेलपत्र और पुष्प अर्पित करें
- धूप-दीप जलाएँ
- मंत्र जाप करें
- आरती करें और प्रसाद बाँटें
विधिवत रुद्राभिषेक या महामृत्युंजय जाप घर पर संभव न हो, तो पुरोहित से आपके नाम और गोत्र के संकल्प सहित ऑनलाइन ई-पूजा करवाई जा सकती है।
सुधार: पुराने संस्करण में "19 शिवलिंगों पर 19 × 108 = 2052 जाप" वाला अनुष्ठान बताया गया था और उसे "संपूर्ण कुंडली दोषों का निवारण" कहा गया था। यह किसी ग्रंथ में नहीं है, इसलिए हटा दिया गया है।
शिव उपासना के फल — और उनकी सीमा
भक्त शिव उपासना इन भावनाओं से करते हैं। हर फल के साथ उसकी सीमा भी लिखी है।
मन की स्थिरता — नियमित जाप और अभिषेक कठिन ग्रह-काल में धैर्य देते हैं। ग्रह की स्थिति वही रहती है; व्यक्ति का उसे सहने का ढंग बदलता है।
भय से मुक्ति — महाकाल और भैरव की उपासना परंपरा में भय दूर करने वाली मानी जाती है। दुर्घटना से बचाव के लिए सावधानी और नियम-पालन ही असली रक्षा है।
विवादों में धैर्य — उपासना संकल्प को दृढ़ करती है। मुकदमे का फैसला तथ्य और कानून से होता है, इसलिए अच्छे वकील की सलाह लें।
कार्य और व्यापार — कोई पूजा धन की गारंटी नहीं देती। परंपरा इतना कहती है कि श्रद्धा परिश्रम के साथ चले।
दाम्पत्य — शिव-पार्वती की उपासना दाम्पत्य में संतुलन की प्रार्थना है। गहरे मतभेद में बातचीत और काउंसलिंग पहले आती है।
संतान — संतान की कामना से भी शिव पूजा की जाती है। गर्भधारण में कठिनाई हो, तो पहले डॉक्टर से जाँच कराएँ।
आध्यात्मिक उन्नति — शिव को आदियोगी कहा गया है। ध्यान और जाप का नियमित अभ्यास आध्यात्मिक मार्ग का आधार है।
स्वास्थ्य — महामृत्युंजय जाप रोग की दवा नहीं है। बीमारी में डॉक्टर पहले आते हैं; प्रार्थना इलाज के साथ मन को बल देती है।
पूजा के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां
स्वच्छता — स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा करें।
सात्विक भोजन — पूजा के दिन मांस और मदिरा से दूर रहें। प्याज-लहसुन का नियम कुल-परंपरा के अनुसार मानें।
मंत्र उच्चारण — यथासंभव शुद्ध उच्चारण करें। पहली बार किसी जानकार से सीखें। गलत उच्चारण के डर से जाप छोड़ने की आवश्यकता नहीं; भाव प्रधान है।
तांत्रिक प्रयोग — भैरव या अघोर से जुड़े तांत्रिक प्रयोग गुरु-दीक्षा के बिना न करें। नाम-जाप और स्तोत्र-पाठ हर कोई कर सकता है।
शिवलिंग पर क्या न चढ़ाएँ — परंपरा में शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर, तुलसी और केतकी का फूल नहीं चढ़ाया जाता।
परिक्रमा — शिवलिंग की परिक्रमा आधी की जाती है; जलाधारी (सोमसूत्र) को लाँघा नहीं जाता।
रजस्वला स्त्रियाँ — कई परिवारों में इस समय मानसिक पूजा की परंपरा है; अपने कुल के नियम मानें।
रुद्राक्ष — शिव भक्त प्रायः रुद्राक्ष धारण करते हैं। यह श्रद्धा का प्रतीक है, अनिवार्य नियम नहीं, और कोई रोग ठीक करने का साधन नहीं।
दान और सेवा — पूजा के बाद सामर्थ्य अनुसार दान और सेवा करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिव के कितने अवतार हैं — 12, 19, या 28?
तीनों संख्याएँ अलग-अलग समूहों की हैं। 19 अवतार शिवपुराण की शतरुद्र संहिता में हैं (पिप्पलाद से यक्षेश्वर तक)। 28 योगाचार्य अवतार हैं, जो हर द्वापर में एक-एक प्रकट होते हैं और जिनमें अंतिम लकुलीश हैं। 12 की संख्या ज्योतिर्लिंगों की है, जिन्हें कोटिरुद्र संहिता में शिव के ज्योति-रूप प्राकट्य कहा गया है।
क्या बुद्ध भगवान शिव का अवतार हैं?
नहीं। शिवपुराण की 19 की सूची में बुद्ध नहीं हैं। भागवत पुराण और गीत गोविन्द जैसी वैष्णव सूचियों में बुद्ध विष्णु के अवतार हैं। बौद्ध परंपरा बुद्ध को किसी देवता का अवतार नहीं मानती।
क्या कल्कि शिव के अवतारों में से एक हैं?
नहीं, कल्कि विष्णु के दसवें और भविष्य के अवतार हैं। कल्कि पुराण के अनुसार कल्कि शिव की उपासना करके उनसे दिव्य अश्व और खड्ग प्राप्त करते हैं, पर वे शिव के अवतार नहीं हैं।
क्या रुद्र शिव के अवतार हैं?
रुद्र शिव का ही वैदिक नाम है। ऋग्वेद और यजुर्वेद (रुद्राध्याय) में शिव की स्तुति रुद्र नाम से है। "रुद्र" की एक व्याख्या "रुद्" (रोना) धातु से है, क्योंकि जन्म के समय वे रोए थे; दूसरी व्याख्या है "जो दुःख को दूर करें"। एकादश रुद्र, यानी रुद्र के ग्यारह रूप, पुराणों में अलग-अलग नामों से मिलते हैं। हनुमान जी को ग्यारहवाँ रुद्र माना जाता है।
क्या हनुमान जी शिव के अवतार हैं?
हाँ। शिवपुराण की शतरुद्र संहिता में हनुमान शिव के 19 अवतारों में हैं, और परंपरा उन्हें ग्यारहवाँ रुद्र मानती है। हनुमान जी विष्णु के अवतार नहीं, बल्कि विष्णु के अवतार राम के परम भक्त हैं। (पुराने संस्करण में इसका उलटा लिखा था, जो गलत था।)
कौन सा शिव अवतार सबसे शक्तिशाली है?
शैव परंपरा में सभी रूप एक ही शिव के हैं, इसलिए उनकी तुलना नहीं की जाती। लोक-श्रद्धा में उग्र रूपों में वीरभद्र, भैरव और शरभ, और भक्ति में हनुमान सबसे अधिक पूजे जाते हैं। उपासना के लिए वही रूप उचित है जिससे आपकी कुल-परंपरा या मन जुड़ता हो।
शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली
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Frequently Asked Questions
शिव के कितने अवतार हैं — 12, 19, या 28?+
क्या बुद्ध भगवान शिव का अवतार हैं?+
क्या कल्कि शिव के अवतारों में से एक हैं?+
क्या रुद्र शिव के अवतार हैं?+
क्या हनुमान जी शिव के अवतार हैं?+
कौन सा शिव अवतार सबसे शक्तिशाली है?+
शिव के 19 अवतारों के नाम क्या हैं?+
Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.