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Ekadashi Fast Guide Hindi अपरा एकादशी 2026: पापों से मुक्ति

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7 July 2026 17 min read|By Nidhi Shrimali

✨ लेखिका परिचय: यह लेख गुरुमूर्ति निधि श्रीमाली जी द्वारा 15 वर्षों के व्यावहारिक ज्योतिष अनुभव के आधार पर लिखा गया है। इनके पास 50,000+ सफल केस स्टडीज हैं और पंडित एनएम श्रीमाली की मुख्य ज्योतिषी हैं।

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास में दो एकादशियाँ आती हैं — शुक्ल पक्ष में एक और कृष्ण पक्ष में एक — इस प्रकार पूरे वर्ष में कुल 24 एकादशियाँ होती हैं। भगवान विष्णु की उपासना का यह सबसे सरल और प्रभावी मार्ग है। हर एकादशी का अपना विशेष नाम, अपना पौराणिक कारण और अपना अलग फल है। इस संपूर्ण मार्गदर्शिका में हम 24 एकादशियों की पूरी सूची, व्रत के नियम, पाँच प्रकार, आठ प्रमुख लाभ, पाँच सावधानियाँ और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. एकादशी व्रत क्या है — परिचय
  2. एकादशी की पौराणिक कथा — सुधर्मा, वृद्ध और मधु-कैटभ वध
  3. धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
  4. 24 एकादशियों की संपूर्ण सूची (माह, पक्ष और नाम)
  5. व्रत के 12 नियम
  6. व्रत के 5 प्रकार — निर्जला, फलाहार, एकाहार, अनशन और नक्त
  7. एकादशी व्रत के 8 प्रमुख लाभ
  8. व्रत की 5 प्रमुख सावधानियाँ
  9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एकादशी व्रत क्या है — परिचय

"एकादशी" संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है — "एकादश" अर्थात् ग्यारहवीं और "व्रत" अर्थात् विशेष उपवास/नियम। प्रत्येक हिंदू मास की ग्यारहवीं तिथि को भगवान विष्णु की पूजा का अत्यंत पवित्र दिन माना गया है। अमावस्या से पूर्णिमा तक जो पहला पखवाड़ा होता है उसे शुक्ल पक्ष (गायत्री पक्ष) कहते हैं और पूर्णिमा से अमावस्या तक के पखवाड़े को कृष्ण पक्ष कहते हैं। दोनों पक्षों में ग्यारहवीं तिथि अलग-अलग एकादशी होती है।

भगवान विष्णु ने स्वयं पद्मपुराण में कहा है — "एकादशी व्रत मुझे सर्वप्रिय है, मैं प्रत्येक एकादशी को अपने भक्तों के पास उपस्थित रहकर उनका कल्याण करता हूँ।" इसीलिए एकादशी को "हरि-वासर" अर्थात् भगवान विष्णु का दिन भी कहा जाता है।

एकादशी व्रत केवल उपवास नहीं है, बल्कि यह दश इंद्रियों पर संयम, मन की शुद्धि, और आत्मा का परमात्मा से मिलन है। प्रत्येक एकादशी का नाम उसके पौराणिक कारण, मास और पक्ष के अनुसार निर्धारित होता है। उदाहरण के लिए — पापमोचनी एकादशी पापों को मिटाती है, निर्जला एकादशी बिना जल के रखी जाती है, प्रबोधिनी एकादशी भगवान विष्णु की नींद से जागने का प्रतीक है, और मोक्षदा एकादशी मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है।

भारत के प्रत्येक क्षेत्र में एकादशी का विधान अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार होता है। उत्तर भारत में व्रत-कथा का विशेष महत्व है, दक्षिण भारत में विष्णु मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है, गुजरात में "एकादशी का व्रत" कहकर महिलाएँ विशेष रूप से पूजा करती हैं, और महाराष्ट्र में "एकादशीचा व्रत" अत्यधिक प्रचलित है।

एकादशी की पौराणिक कथा — सुधर्मा, वृद्ध और मधु-कैटभ वध

एकादशी व्रत की उत्पत्ति की कथा पद्मपुराण, भविष्योत्तर पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तार से वर्णित है। यह कथा तीन प्रमुख चरणों में बँटी है:

पहला चरण — राक्षसों का अत्याचार

अत्यंत प्राचीन काल की बात है। सतयुग में दो अत्यंत शक्तिशाली असुर थे — मधु और कैटभ। ये दोनों भगवान ब्रह्मा की तपस्या से अजेय वरदान प्राप्त कर चुके थे। वे सतयुग के अंत में प्रकट हुए और देवताओं पर इतना अत्याचार करने लगे कि देवता स्वयं भगवान विष्णु की शरण में गए। इंद्र, अग्नि, वायु सभी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की।

दूसरा चरण — भगवान विष्णु का योग-निद्रा में जाना

भगवान विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे उचित समय पर मधु-कैटभ का वध करेंगे। इसके पश्चात भगवान विष्णु श्रीराम नवमी (चैत्र शुक्ल नवमी) को क्षीर सागर में योग-निद्रा में लीन हो गए। चार मास तक वे सोए रहे — यह अवधि चातुर्मास कहलाती है। इसी बीच मधु-कैटभ का बल बढ़ता गया।

तीसरा चरण — मधु-कैटभ का वध और एकादशी की उत्पत्ति

कार्तिक शुक्ल एकादशी (जिसे प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं) को भगवान विष्णु ने योग-निद्रा से जागकर मधु और कैटभ का वध किया। इसी दिन से एकादशी व्रत की शुरुआत मानी जाती है। तब से प्रत्येक मास की एकादशी को भगवान विष्णु की पूजा का दिन माना जाता है।

सुधर्मा और वृद्ध की कथा

एक अन्य कथा के अनुसार मंदाराचल पर्वत पर सुधर्मा नाम के एक पक्षीराज ने वृद्ध नाम के अपने मित्र के साथ रहकर निरंतर भगवान विष्णु की आराधना की। सुधर्मा ने अपने पंखों पर तुलसी के पत्ते रखकर प्रतिदिन विष्णु-पूजा की। जब भगवान विष्णु प्रकट हुए तो सुधर्मा ने प्रार्थना की कि "जो व्यक्ति एकादशी का व्रत रखे, उसे मैं किसी भी रूप में भोजन के लिए प्राप्त हो जाऊँ"। तभी से एकादशी व्रत रखने वालों के घर में अन्न की कमी नहीं होती।

धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक दृष्टि से

  • पाप-क्षय का सर्वोत्तम साधन — प्रत्येक एकादशी का व्रत विशेष पापों को नष्ट करता है (पापमोचनी एकादशी तो समस्त पापों को मिटाने वाली है)
  • मोक्ष-प्राप्ति का सीधा मार्ग — मोक्षदा एकादशी, वैकुंठ एकादशी, उत्पन्ना एकादशी आदि विशेष रूप से मोक्ष देने वाली मानी गई हैं
  • संतान-प्राप्ति — पुत्रदा एकादशी, शुक्ला एकादशी, कामिका एकादशी संतान प्राप्ति का सर्वोत्तम समय हैं
  • दाम्पत्य-सुख — रमा एकादशी, पद्मिनी एकादशी वैवाहिक सुख में वृद्धि करती हैं
  • धन-वृद्धि — धनदा एकादशी, सफला एकादशी, कामदा एकादशी धन-समृद्धि का कारक हैं

आध्यात्मिक दृष्टि से

  • मन की शुद्धि — उपवास, सात्विक आचरण और जाप से मन के विकारों का शमन
  • इंद्रिय-संयम — जीभ, काम, क्रोध, लोभ पर नियंत्रण का अभ्यास
  • चेतना का विस्तार — भगवान विष्णु के ध्यान से आत्मिक चेतना का विकास
  • विष्णु-भक्ति में दृढ़ता — 24 एकादशियों के नियमित व्रत से भक्ति-मार्ग पर अग्रसरता
  • कर्म-बंधन से मुक्ति — कर्मों के फल को भगवान को समर्पित करने की भावना
  • तमस और रजस का शमन — सात्विकता की वृद्धि

ज्योतिषीय दृष्टि से

  • एकादशी तिथि बुध ग्रह से संबंधित है — बुध की कृपा से विद्या, बुद्धि और वाणी में सुधार
  • एकादशी का अधिपति ग्रह भी बुध ही है — बुध को बलवान बनाने के लिए यह व्रत उत्तम है
  • कुंडली में बुध कमजोर होने पर एकादशी व्रत विशेष लाभदायी
  • लग्न से एकादशी भाव की स्थिति अनुसार विभिन्न जीवन-क्षेत्रों में लाभ
  • वृषभ राशि के जातकों के लिए एकादशी विशेष शुभ है (एकादशी भाव = धन भाव)
  • कन्या राशि के जातकों के लिए धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ती है
  • ग्रह-दशा-अंतर्दशा के दौरान एकादशी व्रत से पितृ-दोष, काल-सर्प-दोष आदि में लाभ

24 एकादशियों की संपूर्ण सूची

वर्ष में आने वाली 24 एकादशियों की पूरी सूची इस प्रकार है। प्रत्येक एकादशी का माह, पक्ष, नाम और विशेष फल अलग-अलग है:

क्र. माह पक्ष एकादशी का नाम विशेष फल
1 चैत्र शुक्ल पापमोचनी समस्त पापों का नाश
2 वैशाख शुक्ल कामदा सभी मनोकामनाओं की पूर्ति
3 ज्येष्ठ कृष्ण अपरा पापों से मुक्ति, अक्षय फल
4 ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला बिना जल व्रत, मोक्ष-प्राप्ति
5 आषाढ़ कृष्ण योगिनी योग-सिद्धि, मनोकामना पूर्ति
6 आषाढ़ शुक्ल देवशयनी / हरिशयनी चातुर्मास का आरंभ
7 श्रावण कृष्ण कामिका संतान-प्राप्ति, सुख-शांति
8 श्रावण शुक्ल श्रवणा / पुत्रदा संतान की प्राप्ति
9 भाद्रपद कृष्ण अजा / हलधारी अजन्मा स्वरूप की आराधना, पाप-क्षय
10 भाद्रपद शुक्ल परिवर्तिनी / वामन पारण के रूप में, ब्राह्मण-भोजन
11 आश्विन कृष्ण इंदिरा इंद्रियों पर संयम, मोक्ष-सुलभ
12 आश्विन शुक्ल पद्मिनी / रमा माँ लक्ष्मी की कृपा, धन-संपत्ति
13 कार्तिक कृष्ण रमा माँ लक्ष्मी की पूजा, गृह-सुख
14 कार्तिक शुक्ल प्रबोधिनी / उत्थान भगवान विष्णु का जागरण, मधु-कैटभ वध की स्मृति
15 मार्गशीर्ष कृष्ण उत्पन्ना मोक्ष-प्राप्ति, भगवान के ध्यान
16 मार्गशीर्ष शुक्ल मोक्षदा सभी पापों का नाश, वैकुंठ-प्राप्ति
17 पौष कृष्ण सफला कार्य-सिद्धि, धन-वृद्धि
18 पौष शुक्ल पुत्रदा संतान-प्राप्ति, गो-दान से अक्षय फल
19 माघ कृष्ण षट्तिला तिल-दान का महत्व, पितृ-तृप्ति
20 माघ शुक्ल भीमा / जया विजय और साहस की प्राप्ति
21 फाल्गुन कृष्ण विजया सभी कार्यों में विजय
22 फाल्गुन शुक्ल आमलकी आँवला पूजा, आरोग्य और धन-वृद्धि

विशेष बात: कुछ पंचांगों में 24 के स्थान पर 26 एकादशियाँ भी मानी जाती हैं — अतिरिक्त दो अधिक मास (मलमास) में आती हैं, जिन्हें पुरुषोत्तम एकादशी और भद्रा एकादशी कहते हैं। इनका भी अपना विशेष महत्व है।

प्रमुख एकादशियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी

पापमोचनी एकादशी: वर्ष की सबसे प्रसिद्ध एकादशी। चैत्र शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं को रखी जाती है। कहा जाता है कि इसके प्रभाव से ब्रह्महत्या जैसे महापातक भी नष्ट हो जाते हैं।

निर्जला एकादशी: ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में आती है। इसमें 24 घंटे बिना जल और बिना भोजन के व्रत रखा जाता है। यह सबसे कठिन एकादशी व्रत माना जाता है।

देवशयनी एकादशी: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी। इसी दिन से भगवान विष्णु योग-निद्रा में जाते हैं और चातुर्मास प्रारंभ होता है। अगले चार मास तक अनेक शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं।

प्रबोधिनी एकादशी: कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी। भगवान विष्णु इस दिन योग-निद्रा से जागते हैं और मधु-कैटभ का वध करते हैं। चातुर्मास का समापन इसी दिन होता है।

मोक्षदा एकादशी: मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी। कहा जाता है कि गीता का उपदेश भी इसी दिन अर्जुन को दिया गया था। यह मोक्ष प्रदान करने वाली सर्वश्रेष्ठ एकादशी मानी जाती है।

व्रत के 12 नियम

एकादशी व्रत के 12 प्रमुख नियम हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य है:

  1. दशमी से सात्विक भोजन — दशमी तिथि से ही एक बार सात्विक भोजन करें, प्याज-लहसुन-मांस-मदिरा का त्याग करें
  2. एकादशी को उपवास — एकादशी को निर्जला, फलाहार, एकाहार या अनशन में से किसी एक का पालन करें
  3. ब्रह्मचर्य का पालन — व्रत के दिन संयम रखना अनिवार्य है
  4. तुलसी का अर्चन — भगवान विष्णु को तुलसी-दल अर्पित करना अनिवार्य है
  5. विष्णु-पूजा और जाप — भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करें
  6. सत्य बोलना — व्रत के दिन असत्य, क्रोध, चुगली से बचें
  7. बाल-नख न काटें — व्रत के दिन बाल-नख काटना वर्जित
  8. दातून क्रिया न करें — दाँतों से दाँत बजाना (पीसना) वर्जित
  9. सिलाई-कढ़ाई न करें — ये कार्य व्रत में अशुभ माने जाते हैं
  10. ब्राह्मण-भोजन और दान — ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और दान करें
  11. रात्रि जागरण या भजन — रात्रि को जागकर भजन-कीर्तन करना श्रेष्ठ
  12. द्वादशी को पारण — अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण करें

व्रत के 5 प्रकार — निर्जला, फलाहार, एकाहार, अनशन और नक्त

एकादशी व्रत मुख्य रूप से 5 प्रकार के होते हैं। प्रत्येक का अपना विधान और अपना फल है:

1. निर्जला व्रत

  • विधि: 24 घंटे बिना जल और बिना भोजन के रहना
  • कठिनाई: सर्वाधिक
  • फल: सबसे अधिक — ब्रह्महत्या, गोहत्या जैसे महापातकों का नाश
  • किसके लिए: जो स्वस्थ हों और कठोर व्रत करने में सक्षम हों
  • विशेष एकादशी: निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल)

2. फलाहार व्रत

  • विधि: केवल फल, दूध, मेवे, जल आदि सात्विक पदार्थों का सेवन
  • कठिनाई: मध्यम
  • फल: समस्त पापों का क्षय, स्वास्थ्य लाभ
  • किसके लिए: जो निर्जला व्रत नहीं रख सकते, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग
  • विशेष एकादशी: सभी एकादशी पर श्रेष्ठ

3. एकाहार व्रत

  • विधि: दिन में केवल एक समय भोजन
  • कठिनाई: सरल
  • फल: पाप-क्षय, सात्विक जीवन की ओर अग्रसरता
  • किसके लिए: बच्चे, बीमार, वृद्ध, जो कठोर व्रत नहीं रख सकते
  • विशेष एकादशी: सभी एकादशी पर

4. अनशन व्रत

  • विधि: केवल जल पीना, भोजन नहीं
  • कठिनाई: कठिन
  • फल: उत्तम — मन की शुद्धि, ध्यान-सिद्धि
  • किसके लिए: जो एक-दो दिन का व्रत कर सकते हों
  • विशेष एकादशी: सभी एकादशी पर

5. नक्त व्रत

  • विधि: केवल रात्रि में एक बार भोजन
  • कठिनाई: सबसे सरल
  • फल: मध्यम — फिर भी पाप-क्षय
  • किसके लिए: जो पूर्ण उपवास नहीं रख सकते
  • विशेष एकादशी: सभी एकादशी पर

ज्योतिषीय सुझाव: वर्ष में कम से कम 12 एकादशियों का व्रत अवश्य करना चाहिए। सबसे सरल व्रत नक्त व्रत है जिसे हर व्यक्ति रख सकता है। संभव हो तो मास की दोनों एकादशी (शुक्ल और कृष्ण) का व्रत रखना सर्वश्रेष्ठ है।

एकादशी व्रत के 8 प्रमुख लाभ

एकादशी व्रत के शास्त्रों में अनेक लाभ बताए गए हैं। यहाँ 8 प्रमुख लाभों का वर्णन है:

1. समस्त पापों का क्षय

एकादशी व्रत का सबसे बड़ा लाभ पापों से मुक्ति है। पापमोचनी एकादशी विशेष रूप से पापों को नष्ट करने वाली है। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार नियमित एकादशी व्रत से ब्रह्महत्या, गोहत्या, मद्यपान, परस्त्री-गमन जैसे महापातक भी नष्ट हो जाते हैं।

2. मोक्ष-प्राप्ति

मोक्षदा एकादशी, उत्पन्ना एकादशी, वैकुंठ एकादशी आदि विशेष रूप से मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। एकादशी व्रत से अंततः भगवान विष्णु के धाम (वैकुंठ) की प्राप्ति होती है।

3. संतान-प्राप्ति और संतान-सुख

पुत्रदा एकादशी, श्रवणा एकादशी, कामिका एकादशी संतान-प्राप्ति और संतान के सुख-स्वास्थ्य के लिए अत्यंत शुभ हैं। जिन दंपतियों को संतान नहीं हो रही, उन्हें इन एकादशियों पर विशेष व्रत करना चाहिए।

4. धन-समृद्धि और सुख

कामदा एकादशी, सफला एकादशी, पद्मिनी/रमा एकादशी धन और समृद्धि बढ़ाने वाली हैं। माँ लक्ष्मी की कृपा से घर में धन-धान्य की कमी नहीं रहती।

5. रोग-मुक्ति और आरोग्य

नियमित एकादशी व्रत से शरीर में विष-तत्वों का शमन होता है। उपवास से शरीर को आराम मिलता है, पाचन-तंत्र मजबूत होता है और अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है।

6. मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा

एकादशी व्रत से मन की चंचलता कम होती है, ध्यान-शक्ति बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। क्रोध, काम, लोभ, मोह, अहंकार जैसे विकारों पर नियंत्रण आता है।

7. कुंडली के दोषों का शमन

बुध कमजोर होने पर एकादशी व्रत अत्यंत लाभदायी है। काल-सर्प-दोष, पितृ-दोष, नाग-दोष आदि में भी एकादशी व्रत से लाभ होता है।

8. परिवार में सुख-शांति

एकादशी व्रत से पारिवारिक कलह, झगड़े, कलेश दूर होते हैं। घर में सुख-शांति, आपसी प्रेम और सद्भावना बढ़ती है। माता-पिता की सेवा और संतान के प्रति कर्तव्य-बोध जागता है।

व्रत की 5 प्रमुख सावधानियाँ

एकादशी व्रत रखते समय निम्नलिखित 5 सावधानियों का ध्यान रखना अनिवार्य है:

1. शारीरिक स्थिति का ध्यान

  • गर्भवती महिलाएं, दुग्धपान कराने वाली माताएं, अत्यंत वृद्ध और बीमार व्यक्ति निर्जला व्रत न रखें — वे फलाहार या एकाहार कर सकते हैं
  • मधुमेह, रक्तचाप, हृदय-रोग से पीड़ित व्यक्ति चिकित्सक से परामर्श लेकर ही व्रत करें
  • 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को व्रत नहीं करवाना चाहिए — उन्हें केवल कथा सुनाएँ और दीपक जलवाएँ
  • मासिक धर्म के दौरान महिलाएं व्रत से मुक्त रह सकती हैं

2. वर्जित पदार्थों का त्याग

  • चावल, मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन, मशाला का सेवन वर्जित
  • बासी भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए
  • तामसिक भोजन (बैंगन, मूली, उड़द, सरसों का साग) से परहेज
  • तंबाकू, गुटखा, शराब का सेवन वर्जित

3. क्रिया-वर्जन

  • बाल-नख काटना वर्जित
  • सिलाई-कढ़ाई, चमड़े का कार्य वर्जित
  • दातून क्रिया (दाँतों से दाँत बजाना) वर्जित
  • मैथुन, क्रोध, असत्य, चुगली वर्जित
  • पशुओं को कष्ट नहीं देना चाहिए

4. पारण की विधि का पालन

  • पारण सूर्योदय के बाद ही करें
  • सूर्यास्त के बाद पारण वर्जित है
  • पारण से पहले ब्राह्मण-भोजन कराएँ
  • पारण में तिल मिला भोजन श्रेष्ठ है
  • सात्विक भोजन ही ग्रहण करें

5. कथा और जाप की उपेक्षा न करें

  • व्रत के दिन विष्णु-कथा का श्रवण अवश्य करें
  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
  • 108 माला पर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करें
  • तुलसी-मंत्र का स्मरण करें
  • कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वर्ष में कुल कितनी एकादशियाँ आती हैं?

वर्ष में कुल 24 एकादशियाँ आती हैं — प्रत्येक मास की शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में एक-एक। यदि अधिक मास (मलमास) हो तो 26 भी हो सकती हैं, जिनमें पुरुषोत्तम एकादशी और भद्रा एकादशी अतिरिक्त मानी जाती हैं।

क्या सभी 24 एकादशियों का व्रत रखना अनिवार्य है?

शास्त्रानुसार वर्ष की सभी 24 एकादशियों का व्रत रखना सर्वश्रेष्ठ है, परंतु यह संभव न हो तो कम से कम 12 एकादशियाँ (मास की एक) अवश्य रखें। सबसे अधिक महत्वपूर्ण एकादशियाँ हैं — पापमोचनी, निर्जला, प्रबोधिनी और मोक्षदा।

क्या महिलाएं मासिक धर्म के दौरान एकादशी व्रत रख सकती हैं?

शास्त्रानुसार मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों को उपवास और पूजा-अर्चना से मुक्ति मिलती है। ऐसी स्थिति में वे विष्णु-स्मरण, मंत्र-जाप, और दान कर सकती हैं। जब शारीरिक स्थिति सामान्य हो जाए तो अगली एकादशी पर व्रत कर सकती हैं।

क्या एकादशी व्रत में जल पी सकते हैं?

शास्त्रानुसार निर्जला व्रत में जल भी नहीं पीना चाहिए। परंतु कुछ विद्वान एक समय पानी पीने की अनुमति देते हैं, विशेषकर गर्भवती, बीमार, वृद्ध व्यक्तियों के लिए। फलाहार व्रत में फलों के रस और दूध पी सकते हैं।

एकादशी व्रत का सबसे अधिक फल किसे मिलता है?

भविष्योत्तर पुराण के अनुसार पूर्ण विधि-विधान और श्रद्धा से किया गया व्रत सबसे अधिक फलदायी होता है। यदि किसी कारणवश पूर्ण व्रत न हो सके तो जो व्रत रखा जाए उसे पूर्ण मनोयोग से रखें। अधूरा व्रत भी संकल्प-शक्ति के अनुसार फल देता है।

क्या दशमी को पापमोचनी एकादशी का संकल्प लेना चाहिए?

हाँ, अवश्य। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार जो व्यक्ति दशमी तिथि से ही एक बार भोजन और सात्विक आहार आरंभ कर देता है, उसका व्रत दोगुना फलदायी होता है। दशमी को ही व्रत का संकल्प लेना शुभ माना गया है।

क्या कामकाजी व्यक्ति रोज़ाना जाप कर सकते हैं?

अवश्य। कामकाजी व्यक्ति कम से कम 11 या 23 माला "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप कर सकते हैं। प्रातःकाल स्नान के बाद और शाम को कार्यालय से आकर जाप करना श्रेष्ठ है। समय न मिलने पर केवल 108 बार जाप पर्याप्त है।

क्या अधिक मास (मलमास) की एकादशी का विशेष महत्व है?

हाँ। अधिक मास में आने वाली पुरुषोत्तम एकादशी का अत्यंत विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस एकादशी पर किया गया व्रत भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम नाम के समान फल देता है। इस दिन तुलसी-दल का दान और गो-सेवा विशेष फलदायी है।

क्या व्रत के दिन तुलसी के बिना पूजा हो सकती है?

नहीं। एकादशी व्रत में तुलसी-दल का विशेष महत्व है। तुलसी के बिना विष्णु-पूजा अधूरी मानी जाती है। यदि तुलसी का पौधा न हो तो तुलसी-मंत्र "ॐ तुलस्यै नमः" का स्मरण करते हुए तुलसी के बीज या सूखे पत्ते का उपयोग कर सकते हैं।

क्या अनंत चतुर्दशी का एकादशी से कोई संबंध है?

हाँ, गहरा संबंध है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी कहते हैं, जो भाद्रपद शुक्ल एकादशी (अजा/पद्मिनी) के तीन दिन बाद आती है। दोनों मिलकर भाद्रपद शुक्ल पक्ष के पवित्र दिन बनाते हैं। अनंत चतुर्दशी अनंत विष्णु की पूजा का दिन है और अजा एकादशी पाप-क्षय का दिन।

क्या विदेश में रहने वाले भारतीय भी व्रत रख सकते हैं?

अवश्य। भारतीय समय के अनुसार ही व्रत रखा जाता है। विदेश में रहने वाले भारतीय भारतीय पंचांग के अनुसार तिथि देखकर व्रत रख सकते हैं। यदि स्थानीय समय के अनुसार तिथि में अंतर हो तो भारतीय समय को प्राथमिकता देना उचित है।

क्या एकादशी व्रत से पितृ-दोष दूर होता है?

हाँ। एकादशी व्रत से पितृ-दोष, काल-सर्प-दोष, नाग-दोष आदि में लाभ होता है। विशेष रूप से पितृ-एकादशी (कुंभ संक्रांति से पहले आने वाली) पितरों की तृप्ति के लिए अत्यंत शुभ है। इस दिन तिल-जल तर्पण अवश्य करना चाहिए।

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Frequently Asked Questions

वर्ष में कुल कितनी एकादशियाँ आती हैं?+
वर्ष में कुल 24 एकादशियाँ आती हैं — प्रत्येक मास की शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में एक-एक। अधिक मास (मलमास) होने पर 26 भी हो सकती हैं, जिनमें पुरुषोत्तम और भद्रा एकादशी अतिरिक्त होती हैं।
क्या महिलाएं मासिक धर्म के दौरान एकादशी व्रत रख सकती हैं?+
मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों को उपवास और पूजा-अर्चना से मुक्ति मिलती है। वे विष्णु-स्मरण, मंत्र-जाप और दान कर सकती हैं। अगली एकादशी पर व्रत कर सकती हैं।
क्या एकादशी व्रत में जल पी सकते हैं?+
निर्जला व्रत में जल भी नहीं पीना चाहिए। गर्भवती, बीमार और वृद्ध व्यक्ति एक समय पानी पी सकते हैं या फलाहार कर सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण एकादशियाँ कौन सी हैं?+
सबसे अधिक महत्वपूर्ण एकादशियाँ हैं — पापमोचनी एकादशी (चैत्र), निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ), प्रबोधिनी एकादशी (कार्तिक), और मोक्षदा एकादशी (मार्गशीर्ष)।
क्या कामकाजी व्यक्ति एकादशी व्रत रख सकते हैं?+
हाँ, कामकाजी व्यक्ति कम से कम 11 या 23 माला 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप और फलाहार व्रत रख सकते हैं। नक्त व्रत (केवल रात्रि भोजन) भी एक विकल्प है।
क्या एकादशी व्रत से पितृ-दोष दूर होता है?+
हाँ, एकादशी व्रत से पितृ-दोष, काल-सर्प-दोष और नाग-दोष में लाभ होता है। विशेष रूप से पितृ-एकादशी और अनंत चतुर्दशी पर तिल-जल तर्पण पितरों की तृप्ति के लिए अत्यंत शुभ है।
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Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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