✨ लेखिका: निधि श्रीमाली, मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली (जोधपुर)।
भाद्रपद पूर्णिमा भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि है। इस दिन सत्यनारायण व्रत-कथा, उमा-महेश्वर व्रत, पूर्णिमा का स्नान-दान और पितरों के लिए पूर्णिमा श्राद्ध किया जाता है, और इसके अगले दिन से पितृपक्ष शुरू होता है। गुजरात में अंबाजी का "भादरवी पूनम" मेला इसी दिन लगता है। यह पूर्णिमा गणेशोत्सव (अनंत चतुर्दशी) और वामन द्वादशी के ठीक बाद आती है, इसलिए इन पर्वों को अक्सर इसी दिन से जोड़ दिया जाता है। इस लेख में तिथि ढूँढने का तरीका, इन सब पर्वों का सही क्रम, व्रत-विधि, सत्यनारायण कथा का सार, मंत्र, लाभ और सावधानियाँ दी गई हैं।
विषय सूची (Table of Contents)
- भाद्रपद पूर्णिमा की तिथि और मुहूर्त कैसे देखें
- भाद्रपद पूर्णिमा के आसपास के पर्व: कौन सा कब
- भाद्रपद पूर्णिमा का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
- वामन जयंती: सही तिथि और पौराणिक कथा
- भाद्रपद पूर्णिमा व्रत विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
- सत्यनारायण भगवान की कथा — पाँच अध्याय संक्षेप में
- गणेश विसर्जन की विधि — अनंत चतुर्दशी
- शुभ मंत्र और जाप विधि
- व्रत के 7 प्रमुख फायदे
- सावधानियाँ और नियम
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भाद्रपद पूर्णिमा की तिथि और मुहूर्त कैसे देखें
सुधार: इस लेख के पुराने संस्करण में भाद्रपद पूर्णिमा 2026 की तारीख 30 अगस्त और उसके साथ समय-सारणी दी गई थी। वह गलत थी। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास था, इसलिए उसके बाद के सभी महीने लगभग एक महीना आगे खिसक गए। अगस्त के अंत में श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) थी, और भाद्रपद पूर्णिमा सितंबर के अंतिम सप्ताह में आई। गलत समय-सारणी हटा दी गई है।
किसी भी वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा की सही तारीख ऐसे देखें:
- अपने शहर का पंचांग खोलें और भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा ढूँढें।
- देखें कि पूर्णिमा तिथि किस दिन सूर्योदय के समय है। व्रत और स्नान-दान प्रायः उसी दिन होते हैं।
- यदि पूर्णिमा तिथि दो दिनों में बँटी हो, तो पंचांग अक्सर दो दिन लिखता है: एक "व्रत की पूर्णिमा" (जिस शाम चंद्रोदय के समय पूर्णिमा हो) और एक "स्नान-दान की पूर्णिमा" (जिस सुबह सूर्योदय के समय पूर्णिमा हो)। सत्यनारायण कथा पहले वाले दिन, स्नान-दान दूसरे दिन।
- पूर्णिमा श्राद्ध की तारीख भी पंचांग में अलग से लिखी होती है; वही पितृपक्ष का पहला दिन माना जाता है।
मुहूर्त के लिए सामान्य नियम यह है कि सत्यनारायण पूजा संध्या या प्रदोष काल में और चंद्र-अर्घ्य चंद्रोदय के बाद होता है। स्नान-दान सूर्योदय के आसपास। मिनट तक के समय अपने शहर के पंचांग से लें, क्योंकि सूर्योदय और चंद्रोदय हर शहर में अलग हैं।
भाद्रपद पूर्णिमा के आसपास के पर्व: कौन सा कब
भाद्रपद के शुक्ल पक्ष के अंतिम दिनों में कई पर्व एक के बाद एक आते हैं, इसलिए वे अक्सर एक-दूसरे में मिला दिए जाते हैं। यह तालिका उन्हें अलग करती है:
| पर्व | तिथि | किसकी पूजा | भाद्रपद पूर्णिमा से संबंध |
|---|---|---|---|
| गणेश चतुर्थी | भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी | गणेश जी की स्थापना | पूर्णिमा से 11 दिन पहले |
| परिवर्तिनी (पद्मा) एकादशी | भाद्रपद शुक्ल एकादशी | विष्णु, जो योगनिद्रा में करवट बदलते हैं | पूर्णिमा से चार दिन पहले |
| वामन जयंती (वामन द्वादशी) | भाद्रपद शुक्ल द्वादशी | भगवान वामन | पूर्णिमा से तीन दिन पहले; पूर्णिमा पर नहीं |
| अनंत चतुर्दशी | भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी | अनंत (विष्णु); गणेश विसर्जन | पूर्णिमा से एक दिन पहले |
| भाद्रपद पूर्णिमा | भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा | सत्यनारायण, उमा-महेश्वर, चंद्रमा; पूर्णिमा श्राद्ध | स्वयं यह दिन |
| पितृपक्ष आरंभ | अगले दिन की प्रतिपदा से अमावस्या तक | पितर | पूर्णिमा के अगले दिन से |
केरल का ओणम भी राजा बलि और वामन से जुड़ा है, पर वह मलयालम सौर मास चिंगम के तिरुवोणम (श्रवण) नक्षत्र से तय होता है, भाद्रपद पूर्णिमा से नहीं। गणेश स्थापना और विसर्जन का विस्तार गणेश चतुर्थी वाले लेख में है, और पितृपक्ष की तिथियाँ और तर्पण-विधि पितृपक्ष वाले लेख में।
भाद्रपद पूर्णिमा का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
भाद्रपद पूर्णिमा का महत्व तीन स्तरों पर समझा जाता है। नीचे की बातें परंपरा की मान्यताएँ हैं।
धार्मिक दृष्टि से:
- हर पूर्णिमा की तरह इस दिन सत्यनारायण व्रत-कथा का प्रचलन है
- कई क्षेत्रों में इस दिन उमा-महेश्वर व्रत रखा जाता है, जिसमें शिव-पार्वती का संयुक्त पूजन होता है
- पितृपक्ष से ठीक पहले का दिन होने के कारण जिन पितरों का देहांत पूर्णिमा तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है
- पवित्र नदी में स्नान और अन्न-वस्त्र दान की परंपरा
- गुजरात में अंबाजी मंदिर का भादरवी पूनम मेला, जिसमें दूर-दूर से पैदल यात्री पहुँचते हैं
आध्यात्मिक दृष्टि से:
- सत्यनारायण कथा का केंद्र "सत्य" और दिया हुआ वचन निभाना है
- पितृपक्ष की पूर्व संध्या होने से यह दिन पूर्वजों को याद करने का भी है
- पूर्णिमा की रात ध्यान और जप के लिए परंपरा में उत्तम मानी जाती है
ज्योतिषीय दृष्टि से:
- पूर्णिमा को चंद्रमा सूर्य से ठीक सामने (180 अंश) होता है और पूर्ण प्रकाशित दिखता है
- चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए कुंडली में चंद्रमा पीड़ित हो तो पूर्णिमा का चंद्र-अर्घ्य और व्रत परंपरा में सुझाए जाते हैं
- भाद्रपद नाम पूर्वा और उत्तरा भाद्रपद नक्षत्रों से आया है; इसी कारण इस पूर्णिमा को प्राचीन नाम "प्रोष्ठपदी" से भी जाना जाता है
ये परंपरागत व्याख्याएँ हैं। चंद्रमा से जुड़ी आपकी अपनी स्थिति क्या है, यह कुंडली विश्लेषण से ही पता चलता है।
वामन जयंती: सही तिथि और पौराणिक कथा
वामन जयंती भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को मनाई जाती है, जो भाद्रपद पूर्णिमा से तीन दिन पहले पड़ती है। इस लेख के पुराने संस्करण में इसे पूर्णिमा पर बताया गया था, जो सही नहीं है। फिर भी यह कथा इसी पखवाड़े की है, इसलिए यहाँ दी जा रही है।
वामन भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों में पाँचवें हैं और त्रेता युग के पहले अवतार माने जाते हैं। प्रह्लाद के पौत्र, असुर राजा बलि ने यज्ञों और पराक्रम से स्वर्ग सहित तीनों लोक जीत लिए। देवताओं की माता अदिति की प्रार्थना पर विष्णु ने अदिति और कश्यप के पुत्र के रूप में वामन (बौने ब्राह्मण बालक) का अवतार लिया।
बलि नर्मदा के तट पर यज्ञ कर रहे थे। वामन वहाँ पहुँचे और तीन पग भूमि माँगी। गुरु शुक्राचार्य ने बलि को चेताया कि यह स्वयं विष्णु हैं, पर बलि ने दिया हुआ वचन नहीं तोड़ा। संकल्प का जल छूते ही वामन विराट होकर त्रिविक्रम बन गए। पहले पग में पृथ्वी, दूसरे में आकाश और स्वर्ग नाप लिए। तीसरे पग के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
बलि को वर: बलि की दानशीलता और वचन-पालन से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें सुतल लोक का राज्य दिया और स्वयं उनके द्वारपाल बनकर रहने का वचन दिया। केरल की मान्यता है कि बलि (महाबली) हर वर्ष ओणम पर अपनी प्रजा को देखने आते हैं।
कथा का संदेश:
- दिया हुआ वचन निभाना, चाहे उसकी कीमत बड़ी हो
- अहंकार का अंत, और विनम्रता से उसका सामना
- छोटे रूप में भी असीम सामर्थ्य छिपा हो सकता है
भाद्रपद पूर्णिमा व्रत विधि — चरणबद्ध मार्गदर्शन
पूर्णिमा व्रत सूर्योदय से रखा जाता है और शाम की पूजा तथा चंद्र-अर्घ्य के बाद, या अपनी परंपरा के अनुसार अगले दिन, खोला जाता है। स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या एक समय भोजन चुनें।
प्रातःकाल:
- सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। संभव हो तो पवित्र नदी में, नहीं तो जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर।
- साफ वस्त्र पहनें। पीला रंग विष्णु पूजा में प्रिय माना जाता है।
- संकल्प लें: "मैं [नाम, गोत्र] भाद्रपद पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन परिवार के कल्याण के लिए कर रहा/रही हूँ।"
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या जल का दान करें।
पितरों के लिए (यदि पूर्णिमा श्राद्ध करना हो):
- जिन पितरों का देहांत पूर्णिमा तिथि को हुआ था, उनका श्राद्ध इसी दिन दोपहर (कुतप काल) में किया जाता है।
- तर्पण में जल, काले तिल और कुशा का प्रयोग होता है। विस्तृत विधि पितृपक्ष वाले लेख में है।
सायंकाल (मुख्य सत्यनारायण पूजा):
- स्नान कर साफ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान पर केले के पत्तों या खंभों से मंडप सजाने की परंपरा है।
- चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर सत्यनारायण (विष्णु) की मूर्ति या चित्र रखें। पहले गणेश, फिर कलश और नवग्रह का स्मरण करें।
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराकर षोडशोपचार पूजन करें, यानी सोलह उपचारों वाली पूजा (आवाहन, आसन, पाद्य से लेकर नैवेद्य, आरती तक)। यह "सोलह श्रृंगार" से अलग चीज़ है।
- तुलसी दल अवश्य चढ़ाएँ; विष्णु पूजा में तुलसी के बिना भोग अधूरा माना जाता है।
- प्रसाद बनाएँ। परंपरा में गेहूँ का आटा या सूजी, घी, शक्कर, दूध और केला "सवाया" मात्रा में (जैसे सवा किलो या सवा पाव) लेकर शीरा या पंजीरी बनाई जाती है।
- सत्यनारायण कथा के पाँचों अध्याय सुनें या पढ़ें।
- आरती करें, प्रसाद सबको बाँटें और स्वयं भी लें। कथा में प्रसाद का अनादर न करने पर विशेष ज़ोर है।
पूजा-सामग्री एक साथ चाहिए तो सत्यनारायण पूजा किट देख सकते हैं। पुरोहित से आपके नाम-गोत्र के संकल्प के साथ कथा करवानी हो, तो हमारी ई-पूजा सेवाएँ उपलब्ध हैं।
रात्रि (चंद्र-अर्घ्य):
- चंद्रोदय के बाद लोटे में जल, थोड़ा कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल लेकर चंद्रमा को अर्घ्य दें।
- "ॐ सों सोमाय नमः" का 11 बार जप करें।
- इसके बाद, या अपनी परंपरा के अनुसार अगली सुबह, व्रत खोलें।
सत्यनारायण भगवान की कथा — पाँच अध्याय संक्षेप में
सुधार: इस लेख के पुराने संस्करण में "श्रवण" नाम के युवक, उसके अंधे माता-पिता और पत्थर की नाव वाले "राजा श्रीधामन" की कथा को सत्यनारायण कथा बताया गया था। वह सत्यनारायण कथा नहीं है; उसमें श्रवण कुमार की कथा का अंश गलत ढंग से जुड़ गया था। उसे हटाकर प्रचलित सत्यनारायण कथा का सार दिया गया है। यह कथा स्कंद पुराण के रेवा खंड से जोड़ी जाती है और पाँच अध्यायों में सुनाई जाती है:
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पहला अध्याय — नारद और विष्णु: नैमिषारण्य में सूत जी शौनक आदि ऋषियों को कथा सुनाते हैं। नारद मुनि पृथ्वी पर लोगों का दुःख देखकर विष्णु से पूछते हैं कि कलियुग में सरल उपाय क्या है। विष्णु सत्यनारायण व्रत बताते हैं: श्रद्धा से पूजन, कथा-श्रवण और प्रसाद का वितरण।
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दूसरा अध्याय — निर्धन ब्राह्मण और लकड़हारा: काशी के एक निर्धन ब्राह्मण (शतानंद) को वृद्ध ब्राह्मण के रूप में भगवान यह व्रत बताते हैं। वह व्रत करता है और उसकी दरिद्रता दूर होती है। उसे देखकर एक लकड़हारा भी व्रत करता है।
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तीसरा अध्याय — राजा उल्कामुख और साधु वैश्य: राजा उल्कामुख को व्रत करते देख साधु नाम का व्यापारी संतान होने पर व्रत करने का वचन देता है। पुत्री कलावती के जन्म और फिर विवाह पर भी वह वचन टाल देता है। व्यापार यात्रा में वह एक दंडी स्वामी (भगवान) से झूठ बोलता है कि नाव में केवल "लता-पत्र" हैं, और उसका धन सचमुच लता-पत्र बन जाता है। आगे वह और उसका दामाद चोरी के झूठे आरोप में राजा चंद्रकेतु के कारागार में डाल दिए जाते हैं।
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चौथा अध्याय — कलावती और प्रसाद: घर पर पत्नी लीलावती और कलावती व्रत करती हैं, और दोनों मुक्त होकर लौटते हैं। पिता और पति के आने का समाचार सुनकर कलावती प्रसाद लिए बिना दौड़ पड़ती है, तो पति नाव सहित जल में अदृश्य हो जाता है। वह लौटकर प्रसाद ग्रहण करती है और सब ठीक हो जाता है।
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पाँचवाँ अध्याय — राजा तुंगध्वज: राजा तुंगध्वज ग्वालों द्वारा की जा रही सत्यनारायण पूजा का प्रसाद अहंकार में ठुकरा देता है और कष्ट पाता है। भूल मानकर पूजा करने पर उसका कल्याण होता है।
कथा का संदेश:
- दिया हुआ वचन टालना और झूठ बोलना, दोनों कथा में दुःख का कारण बनते हैं
- प्रसाद का आदर, यानी ईश्वर के प्रति विनम्रता, चाहे पूजा कोई भी करे
- व्रत कोई भी कर सकता है: ब्राह्मण, लकड़हारा, व्यापारी, राजा या ग्वाले
गणेश विसर्जन की विधि — अनंत चतुर्दशी
दस दिन के गणेशोत्सव का विसर्जन भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी, यानी अनंत चतुर्दशी को होता है, जो भाद्रपद पूर्णिमा से एक दिन पहले है। इस लेख के पुराने संस्करण में पूर्णिमा को विसर्जन का मुख्य दिन बताया गया था, वह सही नहीं है। कई परिवार अपनी परंपरा के अनुसार डेढ़, तीन, पाँच या सात दिन बाद भी विसर्जन करते हैं।
विसर्जन से पूर्व की तैयारी:
- गणेश जी की उत्तर-पूजा करें: गंध, अक्षत, फूल, दूर्वा अर्पित करें
- मोदक, लड्डू, केला, नारियल का भोग लगाएँ
- परिवार के सब सदस्य मिलकर आरती करें
- दस दिनों में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें और अगले वर्ष आने की प्रार्थना करें
विसर्जन की विधि:
- मूर्ति को स्थान से थोड़ा हिलाकर (उत्तर-पूजा के बाद) पाटे या थाली पर रखें
- दही-चावल या मोदक की पोटली साथ में रखने की परंपरा कई परिवारों में है
- विसर्जन के समय यह मंत्र बोलें:
- "ॐ गं गणपतये नमः"
- "गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थजम्बूफलसारभक्षिणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं, नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥"
- मिट्टी की मूर्ति हो तो घर पर ही बाल्टी या टब के जल में विसर्जित कर सकते हैं, और घुली मिट्टी गमले या बगीचे में डाल दें
- नदी या तालाब में विसर्जन करना हो तो नगर प्रशासन के बनाए कृत्रिम कुंड का उपयोग करें
- प्रसाद वितरित करें
विशेष नियम:
- मूर्ति मिट्टी की हो; प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति जल में नहीं घुलती और जल को प्रदूषित करती है
- मूर्ति को सम्मान से विसर्जित करें, किनारे पर छोड़कर न जाएँ
- फूल-माला और सजावट का सामान अलग इकट्ठा कर खाद में डालें
- विसर्जन का समय अपने शहर के पंचांग के शुभ चौघड़िया से चुनें; शाम और रात तक चलने वाले जुलूस भी प्रचलित हैं
शुभ मंत्र और जाप विधि
सत्यनारायण / विष्णु मंत्र:
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (108 बार)
- ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः (108 बार)
- ॐ विष्णवे नमः (108 बार)
वामन भगवान मंत्र (वामन द्वादशी पर):
- ॐ वामनाय नमः (108 बार)
- ॐ त्रिविक्रमाय नमः (108 बार)
- ॐ नमो भगवते वामनाय (21 बार)
गणेश मंत्र:
- ॐ गं गणपतये नमः (108 बार)
- ॐ श्री गणेशाय नमः (21 बार)
- वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
चंद्र मंत्र:
- ॐ सों सोमाय नमः (11 बार, चंद्र-अर्घ्य के समय)
- ॐ शशांकाय नमः (11 बार)
जाप विधि:
- प्रातः स्नान के बाद या सत्यनारायण पूजा के समय जप करें
- 108 मनकों की एक माला = 108 जप; पूरी गिनती ध्यान से पूरी करें
- विष्णु मंत्रों के लिए तुलसी की माला परंपरागत है; रुद्राक्ष की माला भी सभी देवताओं के जप में प्रयोग होती है
व्रत के 7 प्रमुख फायदे
नीचे वे लाभ हैं जो परंपरा में बताए जाते हैं। हर लाभ के साथ उसकी सीमा भी लिखी है।
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सत्य और वचन-पालन की याद — सत्यनारायण कथा का पूरा केंद्र दिया हुआ वचन निभाना है। वर्ष में कुछ बार यह कथा सुनना परिवार के लिए उसी मूल्य की याद है।
-
चंद्रमा से जुड़ी उपासना — कुंडली में चंद्रमा पीड़ित हो तो पूर्णिमा व्रत और चंद्र-अर्घ्य परंपरा में सुझाए जाते हैं। यह मन को टिकाने की साधना है; ग्रह की स्थिति नहीं बदलती।
-
परिवार का एक साथ बैठना — सत्यनारायण कथा घर में सबको, पड़ोसियों और मित्रों को साथ बिठाती है और प्रसाद सबमें बँटता है।
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कृतज्ञता का अवसर — परिवार नया काम शुरू होने, गृह प्रवेश या किसी मनोकामना पूरी होने पर यह कथा कृतज्ञता के रूप में करवाते हैं। आर्थिक समस्या का हल कथा नहीं, योजना और परिश्रम करते हैं; कथा उनके साथ श्रद्धा का सहारा है।
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मन की शांति — व्रत, कथा और पूर्णिमा की रात का शांत जप मन को स्थिर करते हैं। चिंता, अनिद्रा या उदासी लंबी चले तो डॉक्टर से मिलें; उपासना उपचार के साथ चले, उसकी जगह नहीं।
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पितरों का स्मरण — पूर्णिमा श्राद्ध और पितृपक्ष की शुरुआत से यह दिन पूर्वजों को याद करने का है। पितृ दोष के नाम पर डराने वाली बातों से बचें; कुंडली में वास्तव में क्या है, यह किसी जानकार से दिखाएँ।
-
दान का अभ्यास — पूर्णिमा पर अन्न, वस्त्र या जल का दान ज़रूरतमंद तक पहुँचे, यही इसका सबसे सीधा लाभ है।
सावधानियाँ और नियम
भाद्रपद पूर्णिमा के व्रत-पूजन में ये बातें ध्यान रखें:
आहार संबंधी:
- फलाहार, एक समय भोजन या निर्जल व्रत, अपने स्वास्थ्य के अनुसार चुनें। मधुमेह, रक्तचाप या कोई नियमित दवा चल रही हो तो निर्जल व्रत न रखें और डॉक्टर से पूछें।
- मांस और मदिरा से बचें; सात्विक भोजन लें। प्याज-लहसुन का नियम अपनी पारिवारिक परंपरा से मानें।
- गर्भवती महिलाएँ व्रत से पहले अपने डॉक्टर से अवश्य पूछें।
पूजा संबंधी:
- विष्णु और सत्यनारायण पूजा में तुलसी दल अवश्य चढ़ाएँ। (शिव और गणेश पूजा में तुलसी नहीं चढ़ाई जाती।)
- दीपक घी का जलाएँ।
- कथा एक बार शुरू करें तो पाँचों अध्याय पूरे करें, और प्रसाद सबको दें।
व्यक्तिगत:
- क्रोध, असत्य और निंदा से बचें; कथा का संदेश यही है।
- मासिक धर्म के दौरान पूजा के नियम परिवारों में अलग-अलग हैं, अपने परिवार की परंपरा मानें। कथा सुनने पर कहीं रोक नहीं है।
ज्योतिषीय:
- चंद्र-दर्शन को लेकर जो रोक प्रसिद्ध है, वह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) की रात की है, पूर्णिमा की नहीं। पूर्णिमा पर चंद्र-दर्शन और अर्घ्य शुभ माने जाते हैं।
- कुंडली के किसी विशेष दोष के लिए उपाय करना हो, तो पहले कुंडली दिखाएँ; सामान्य व्रत के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भाद्रपद पूर्णिमा 2026 कब है?
2026 में ज्येष्ठ अधिक मास होने के कारण भाद्रपद पूर्णिमा सितंबर के अंतिम सप्ताह में पड़ी, और 2026 के लिए यह तिथि बीत चुकी है। इस लेख के पुराने संस्करण में लिखी 30 अगस्त की तारीख गलत थी। किसी भी वर्ष की सही तारीख और तिथि-समय अपने शहर के पंचांग में भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा देखकर लें; व्रत उस दिन रखें जिस शाम चंद्रोदय के समय पूर्णिमा हो।
क्या भाद्रपद पूर्णिमा से ही पितृपक्ष आरंभ होता है?
भाद्रपद पूर्णिमा के दिन पूर्णिमा श्राद्ध होता है, और पितृपक्ष का पहला पूरा दिन इसके अगले दिन की प्रतिपदा है। इसलिए कई पंचांग पितृपक्ष को पूर्णिमा से गिनते हैं और कई प्रतिपदा से। यह पखवाड़ा पूरे भारत में एक ही है; केवल महीने का नाम अलग है: पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) इसे आश्विन कृष्ण पक्ष कहता है और अमांत पंचांग (महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण) भाद्रपद कृष्ण पक्ष। यह सर्वपितृ अमावस्या पर समाप्त होता है।
क्या गणेश विसर्जन के बाद पूर्णिमा पूजा हो सकती है?
हाँ। गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी को होता है और भाद्रपद पूर्णिमा उसके अगले दिन आती है, इसलिए दोनों में कोई टकराव नहीं है। विसर्जन के अगले दिन सत्यनारायण पूजा और चंद्र-अर्घ्य सामान्य रूप से किए जाते हैं।
सत्यनारायण व्रत कब करना चाहिए?
सत्यनारायण व्रत किसी भी पूर्णिमा पर किया जा सकता है, और बहुत से परिवार हर महीने की पूर्णिमा पर कथा करते हैं। एकादशी, संक्रांति, गृह प्रवेश, विवाह, जन्मदिन या किसी काम के पूरा होने पर भी यह कथा करवाई जाती है। कथा स्वयं कहती है कि इसे किसी भी दिन श्रद्धा से किया जा सकता है; संध्या का समय प्रचलित है।
क्या वामन जयंती का विशेष महत्व है?
वामन जयंती भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को है, पूर्णिमा को नहीं। यह भगवान विष्णु के पाँचवें अवतार का प्राकट्य-दिवस है। उस दिन व्रत, वामन-पूजन और दही-चावल या अन्न का दान प्रचलित है। कथा का संदेश वचन-पालन और विनम्रता है, जैसा बलि और वामन दोनों के आचरण में दिखता है।
क्या इस दिन पितरों का तर्पण करें?
हाँ, जिन पितरों का देहांत पूर्णिमा तिथि को हुआ था, उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है। अन्य पितरों का श्राद्ध पितृपक्ष में उनकी अपनी तिथि पर होता है। तर्पण जल, काले तिल और कुशा से किया जाता है। पूरी विधि और तिथियों की सूची पितृपक्ष वाले लेख में है।
क्या चंद्र दर्शन का इस दिन विशेष फल है?
पूर्णिमा पर चंद्र-दर्शन और अर्घ्य परंपरा में शुभ माने जाते हैं। चंद्रोदय के बाद जल में थोड़ा दूध, अक्षत और सफेद फूल मिलाकर अर्घ्य दें और "ॐ सों सोमाय नमः" का 11 बार जप करें। इसे मन को शांत करने की साधना मानें; चंद्रमा से जुड़ा कोई ग्रह-दोष इससे "हट" जाने का वादा कोई नहीं कर सकता।
क्या इस दिन शादी-विवाह या मुंडन करवाना शुभ है?
सामान्यतः नहीं। भाद्रपद पूर्णिमा चातुर्मास (देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी) के बीच आती है, जिसमें विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश के मुहूर्त प्रायः नहीं निकाले जाते, और इसके अगले दिन से पितृपक्ष भी शुरू होता है। विवाह के मुहूर्त प्रायः देवउठनी एकादशी के बाद मिलते हैं। सत्यनारायण कथा, दान और पूजा के लिए यह दिन उत्तम है।
मुझे आशा है कि इस लेख से भाद्रपद पूर्णिमा और इसके आसपास के पर्वों का सही क्रम स्पष्ट हुआ होगा। भगवान सत्यनारायण आपके परिवार पर कृपा बनाए रखें।
शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली
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इस लेख में बताई गई बातें सामान्य मार्गदर्शन हैं। आपकी कुंडली में चंद्रमा या किसी अन्य ग्रह की स्थिति क्या है और कौन सी उपासना उपयुक्त है, यह व्यक्तिगत परामर्श में देखा जाता है।
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अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक और शैक्षिक जानकारी के लिए है। बताए गए लाभ परंपरागत मान्यताएँ हैं, गारंटी नहीं। तिथि और मुहूर्त अपने शहर के पंचांग से मिलाएँ। स्वास्थ्य संबंधी विषयों में डॉक्टर की सलाह लें।
[ { "question": "भाद्रपद पूर्णिमा 2026 कब है?", "answer": "2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण भाद्रपद पूर्णिमा सितंबर के अंतिम सप्ताह में पड़ी और यह तिथि बीत चुकी है; पहले लिखी 30 अगस्त की तारीख गलत थी। किसी भी वर्ष की तारीख अपने शहर के पंचांग में भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा देखकर लें।" }, { "question": "क्या भाद्रपद पूर्णिमा से ही पितृपक्ष आरंभ होता है?", "answer": "भाद्रपद पूर्णिमा को पूर्णिमा श्राद्ध होता है और अगले दिन की प्रतिपदा से पितृपक्ष का पहला पूरा दिन शुरू होता है। यह पखवाड़ा पूरे भारत में एक ही है; पूर्णिमांत पंचांग इसे आश्विन कृष्ण और अमांत पंचांग भाद्रपद कृष्ण कहता है। यह सर्वपितृ अमावस्या पर समाप्त होता है।" }, { "question": "गणेश विसर्जन के बाद पूर्णिमा पूजा हो सकती है?", "answer": "हाँ। गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी को होता है और भाद्रपद पूर्णिमा उसके अगले दिन आती है, इसलिए विसर्जन के बाद सत्यनारायण पूजा और चंद्र-अर्घ्य सामान्य रूप से किए जाते हैं।" }, { "question": "सत्यनारायण व्रत कब करना चाहिए?", "answer": "किसी भी पूर्णिमा पर, और बहुत से परिवार हर महीने करते हैं। एकादशी, संक्रांति, गृह प्रवेश, विवाह, जन्मदिन या किसी काम के पूरा होने पर भी यह कथा करवाई जाती है; संध्या का समय प्रचलित है।" }, { "question": "वामन जयंती का क्या विशेष महत्व है?", "answer": "वामन जयंती भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को है, पूर्णिमा को नहीं। यह विष्णु के पाँचवें अवतार का प्राकट्य-दिवस है; उस दिन व्रत, वामन-पूजन और अन्न-दान प्रचलित है। कथा का संदेश वचन-पालन और विनम्रता है।" }, { "question": "इस दिन पितरों का तर्पण करना चाहिए?", "answer": "जिन पितरों का देहांत पूर्णिमा तिथि को हुआ था, उनका श्राद्ध इसी दिन होता है; अन्य पितरों का पितृपक्ष में उनकी अपनी तिथि पर। तर्पण जल, काले तिल और कुशा से किया जाता है।" }, { "question": "चंद्र दर्शन का इस दिन विशेष फल है?", "answer": "पूर्णिमा पर चंद्र-दर्शन और अर्घ्य शुभ माने जाते हैं। चंद्रोदय के बाद जल, थोड़ा दूध, अक्षत और सफेद फूल से अर्घ्य दें और 'ॐ सों सोमाय नमः' का 11 बार जप करें। यह मन को शांत करने की साधना है, किसी ग्रह-दोष को हटाने की गारंटी नहीं।" } ]Ready for expert guidance?
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Frequently Asked Questions
भाद्रपद पूर्णिमा 2026 कब है?+
क्या भाद्रपद पूर्णिमा से ही पितृपक्ष आरंभ होता है?+
गणेश विसर्जन के बाद पूर्णिमा पूजा हो सकती है?+
सत्यनारायण व्रत कब करना चाहिए?+
वामन जयंती का क्या विशेष महत्व है?+
इस दिन पितरों का तर्पण करना चाहिए?+
चंद्र दर्शन का इस दिन विशेष फल है?+
Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.