लेखिका: निधि श्रीमाली, ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली
बछबारस, जिसे शास्त्रों में गोवत्स द्वादशी कहा जाता है, गाय और उसके बछड़े की पूजा का व्रत है। राजस्थान और मालवा में यह भाद्रपद कृष्ण द्वादशी को, जन्माष्टमी के चार दिन बाद, मनाया जाता है। इस दिन माताएँ अपनी संतान की कुशलता के लिए व्रत रखती हैं, गाय-बछड़े की पूजा करती हैं, और गेहूँ व गाय के दूध से बनी चीज़ें नहीं खातीं। महाराष्ट्र और गुजरात में यही व्रत कार्तिक कृष्ण द्वादशी को, धनतेरस से एक दिन पहले, वसु बारस और वाघ बारस के नाम से मनाया जाता है।
सुधार: इस पृष्ठ के पिछले संस्करण में बछबारस को कार्तिक शुक्ल द्वितीया (दीपावली के बाद) का पर्व बताकर गोवर्धन पूजा और अन्नकूट से जोड़ दिया गया था। यह गलत था। बछबारस कृष्ण पक्ष की द्वादशी है, गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा है, और कार्तिक शुक्ल द्वितीया भाई दूज है। नीचे तीनों का अंतर स्पष्ट किया गया है।
विषय सूची (Table of Contents)
- बछबारस क्या है — परिचय और पृष्ठभूमि
- बछबारस 2026 — तिथि
- बछबारस, वसु बारस, गोवर्धन पूजा और गोपाष्टमी — तुलना
- बछबारस का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
- बछबारस की कथा — और गोवर्धन-लीला से अंतर
- संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध
- गो-पूजा कैसे करें — विस्तृत विधि
- बछबारस का भोजन — अन्नकूट नहीं, अंकुरित अनाज
- शुभ मंत्र और जाप विधि
- बछबारस व्रत के फल — और उनकी सीमा
- सावधानियां और नियम
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बछबारस क्या है — परिचय और पृष्ठभूमि
"बछबारस" दो शब्दों से बना है: बछ (बछड़ा, संस्कृत "वत्स") और बारस (द्वादशी, यानी बारहवीं तिथि)। इसलिए इसका संस्कृत नाम "गोवत्स द्वादशी" है, अर्थात् गाय और बछड़े की द्वादशी। पुराणों की व्रत-परंपरा में यह गाय-बछड़े के पूजन का व्रत है।
यह व्रत दो अलग समय पर मनाया जाता है, और यही भ्रम की सबसे बड़ी वजह है:
- राजस्थान, मालवा और आसपास के क्षेत्र: भाद्रपद कृष्ण द्वादशी (पूर्णिमांत गणना), जन्माष्टमी के चार दिन बाद। यहाँ इसे बछबारस या "बछ बारस" कहते हैं, और यह मुख्यतः माताओं का संतान के लिए व्रत है।
- महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण-पश्चिम भारत: कार्तिक कृष्ण द्वादशी (पूर्णिमांत; अमांत में आश्विन कृष्ण द्वादशी), धनतेरस से एक दिन पहले। महाराष्ट्र में इसे वसु बारस कहते हैं और यह दीपावली उत्सव का पहला दिन माना जाता है। गुजरात में इसे वाघ बारस कहते हैं।
बछबारस की मुख्य विशेषताएं:
- गाय और बछड़े की एक साथ पूजा (केवल गाय की नहीं)
- माताओं का संतान की कुशलता और दीर्घायु के लिए व्रत
- उस दिन गेहूँ और गाय के दूध, दही, घी का सेवन न करना
- अंकुरित मूंग, मोठ, चना और बाजरे की रोटी का भोजन
- बछबारस की कथा सुनना
भाव सरल है: गाय अपने बछड़े को जिस ममता से पालती है, वही ममता माँ अपनी संतान के लिए माँगती है। इसलिए उस दिन गाय का दूध बछड़े के लिए छोड़ दिया जाता है।
बछबारस 2026 — तिथि
| परंपरा | तिथि | 2026 में |
|---|---|---|
| बछबारस (राजस्थान, मालवा) | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी (पूर्णिमांत) | सितंबर 2026 का पहला पखवाड़ा, जन्माष्टमी के चार दिन बाद (बीत चुकी) |
| वसु बारस / वाघ बारस (महाराष्ट्र, गुजरात) | कार्तिक कृष्ण द्वादशी (पूर्णिमांत) | नवंबर 2026 का पहला सप्ताह, धनतेरस से एक दिन पहले |
तिथि के बारे में: पिछले संस्करण में "9 नवम्बर 2026" और मिनट-स्तर के मुहूर्त दिए गए थे, जो गोवर्धन पूजा के दिन से जुड़े थे, बछबारस से नहीं। वे हटा दिए गए हैं। 2026 में अधिक ज्येष्ठ मास के कारण भाद्रपद सामान्य से देर से आया। द्वादशी किस दिन सूर्योदय के समय है, यह शहर के अनुसार बदल सकता है, इसलिए सटीक दिन अपने स्थानीय पंचांग से देखें। आसान नियम: राजस्थानी बछबारस जन्माष्टमी के चार दिन बाद आती है, और वसु बारस धनतेरस से एक दिन पहले (कभी-कभी उसी दिन)।
बछबारस, वसु बारस, गोवर्धन पूजा और गोपाष्टमी — तुलना
चारों पर्व गाय से जुड़े हैं, इसलिए आपस में मिल जाते हैं। अंतर इस तालिका में है:
| पर्व | तिथि | मुख्य पूजा | किसके लिए / भाव |
|---|---|---|---|
| बछबारस (गोवत्स द्वादशी) | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | गाय और बछड़ा साथ | माताओं का संतान के लिए व्रत; गेहूँ और गाय का दूध वर्जित |
| वसु बारस / वाघ बारस | कार्तिक कृष्ण द्वादशी, धनतेरस से एक दिन पहले | गाय-बछड़ा (महाराष्ट्र में नंदिनी का स्मरण) | दीपावली उत्सव का आरंभ; परिवार की समृद्धि |
| गोवर्धन पूजा / अन्नकूट | कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, दीपावली के अगले दिन | गोबर से गोवर्धन, अन्नकूट (छप्पन भोग) | श्रीकृष्ण के गोवर्धन-धारण का स्मरण |
| गोपाष्टमी | कार्तिक शुक्ल अष्टमी | गाय और ग्वालों का पूजन | श्रीकृष्ण के पहली बार गाय चराने जाने का दिन |
कार्तिक शुक्ल द्वितीया इनमें से किसी का दिन नहीं है; वह भाई दूज (यम द्वितीया) है।
बछबारस का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
धार्मिक दृष्टि से:
- गाय को माता मानने की परंपरा का सबसे सीधा रूप: गाय और बछड़े का साथ पूजन
- भाद्रपद की बछबारस जन्माष्टमी के तुरंत बाद आती है, इसलिए इसे गोपाल कृष्ण के गौ-प्रेम से भी जोड़ा जाता है। जन्माष्टमी के बारे में हमारा लेख कृष्ण जन्माष्टमी पढ़ें।
- संतान की कुशलता के लिए किए जाने वाले व्रतों (अहोई अष्टमी, हलषष्ठी आदि) की श्रेणी का व्रत
आध्यात्मिक दृष्टि से:
- उस दिन गाय का दूध न लेना: बछड़े का हक़ उसे लौटाने का प्रतीक
- मातृत्व और ममता का सम्मान
- सादा, बिना गेहूँ का भोजन: संयम का अभ्यास
- पशुओं के प्रति करुणा
ज्योतिषीय दृष्टि से:
- ज्योतिष में संतान का विचार पंचम भाव और बृहस्पति से होता है, और माता का चतुर्थ भाव व चंद्रमा से। गौ-सेवा को चंद्रमा और बृहस्पति से जुड़े सात्विक उपायों में गिना जाता है।
- पर व्रत कुंडली का कोई योग नहीं बदलता। संतान से जुड़ी कोई विशेष चिंता हो, तो उसका ज्योतिषीय कारण पूरी कुंडली देखकर ही समझ आता है। यह काम कुंडली विश्लेषण परामर्श में होता है।
- पिछले संस्करण में लिखा था कि कार्तिक में सूर्य धनु राशि में होता है। यह गलत है: कार्तिक में सूर्य प्रायः तुला राशि में रहता है और महीने के अंत में वृश्चिक में जाता है। भाद्रपद में सूर्य सिंह राशि में होता है।
बछबारस की कथा — और गोवर्धन-लीला से अंतर
बछबारस की लोककथा: राजस्थान में बछबारस की कथा कई रूपों में सुनाई जाती है। एक प्रचलित रूप इस प्रकार है। एक साहूकार के घर सास ने जाते समय बहू से कहा कि "गेहुँला-जौला" (गेहूँ-जौ) रांध लेना। घर में गाय के दो बछड़े थे, जिनके नाम गेहुँला और जौला थे। भोली बहू ने बात का गलत अर्थ समझा और बछड़ों को ही पका दिया। सास लौटी तो यह देखकर काँप गई। उसने गौ-माता से क्षमा माँगी और सच्चे मन से प्रार्थना की। गाय जब चरकर लौटी और अपने बछड़ों को पुकारने लगी, तो भगवान की कृपा से दोनों बछड़े जीवित होकर उसके पास दौड़ आए।
इसीलिए बछबारस के दिन गेहूँ और जौ नहीं खाए जाते, और चाकू से काटी गई चीज़ें भी कई परिवारों में वर्जित हैं। कथा का संदेश है कि गाय और उसके बछड़े का संबंध पवित्र है, और भूल हो जाए तो सच्चे पश्चात्ताप से क्षमा मिलती है। यह श्रद्धा की कथा है, इतिहास नहीं; इसे उसी भाव से सुनना चाहिए। कथा के शब्द हर गाँव और परिवार में थोड़े अलग होते हैं।
गोवर्धन-लीला अलग पर्व की कथा है: श्रीमद्भागवत (दशम स्कंध) के अनुसार श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को इंद्र-पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा के लिए कहा। क्रोधित इंद्र ने भारी वर्षा भेजी, तो कृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाए रखा। इस कथा से गोवर्धन पूजा और अन्नकूट जुड़े हैं, जो कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को होते हैं। पिछले संस्करण में यह कथा बछबारस की कथा के रूप में दी गई थी, जो सही नहीं था।
संपूर्ण पूजा विधि — चरणबद्ध
बछबारस की पूजा सुबह होती है। कुल-परंपरा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है; यह सामान्य क्रम है:
चरण 1 — सुबह स्नान और संकल्प:
- सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें
- संकल्प लें: "मैं आज गोवत्स द्वादशी का व्रत अपनी संतान की कुशलता और परिवार के कल्याण हेतु कर रही/रहा हूँ"
चरण 2 — गाय-बछड़े की पूजा:
- घर पर गाय हो, तो गाय और बछड़े को साथ खड़ा करके पूजा करें
- गाय न हो, तो पास की गौशाला जाएँ, या मिट्टी से गाय-बछड़े की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करें
- रोली, अक्षत, मौली और फूल अर्पित करें
- अंकुरित मूंग, मोठ, चना और बाजरा भोग में रखें
- गाय-बछड़े की परिक्रमा करें
चरण 3 — कथा और संतान का तिलक:
- बछबारस की कथा सुनें या पढ़ें
- कई घरों में माँ पूजा के बाद अपनी संतान को तिलक लगाती है और भोग का प्रसाद देती है
चरण 4 — भोजन:
- पूजा के बाद व्रत का भोजन: बाजरे या मक्के की रोटी, अंकुरित अनाज की सब्ज़ी
- गेहूँ, जौ और गाय का दूध, दही, घी उस दिन न लें
- गाय को भी अंकुरित अनाज, हरा चारा और गुड़ खिलाएँ
जो परिवार किसी कारण से स्वयं विधिवत पूजा नहीं कर सकते, वे पुरोहित से अपने नाम और गोत्र के संकल्प सहित ऑनलाइन ई-पूजा करवा सकते हैं।
गो-पूजा कैसे करें — विस्तृत विधि
बछबारस पर गाय की पूजा का अर्थ है गाय और बछड़े दोनों की पूजा।
गाय और बछड़े को सजाना:
- गाय-बछड़े को साफ़ पानी से नहलाएँ (गौशाला में यह काम वहाँ के सेवक से पूछकर करें)
- माथे पर रोली या हल्दी का तिलक
- गले में मौली और फूलों की माला
- सींगों पर हल्का रंग या मौली, अगर पशु सहज रहे
तिलक और मंत्र:
- रोली-अक्षत से तिलक
- गौ-माता की प्रार्थना: "ॐ सुरभ्यै नमः" (सुरभि, यानी कामधेनु, गौ-माता का पौराणिक नाम है)
भोग:
- भिगोए और अंकुरित मूंग, मोठ, चना
- बाजरे की रोटी (गेहूँ की नहीं)
- गुड़
- हरा चारा
पशु का ध्यान:
- गाय या बछड़ा डरे या बेचैन हो, तो ज़बरदस्ती माला या रंग न लगाएँ
- उस दिन बछड़े को उसकी माँ का दूध पूरा पीने दें; यही व्रत का भाव है
- प्लास्टिक, बासी या मसालेदार खाना न खिलाएँ
बछबारस का भोजन — अन्नकूट नहीं, अंकुरित अनाज
पिछले संस्करण में यहाँ अन्नकूट के छप्पन भोग की सूची थी। अन्नकूट गोवर्धन पूजा का भोग है, बछबारस का नहीं। बछबारस का भोजन इसके उलट बहुत सादा होता है।
बछबारस पर क्या खाया जाता है:
- बाजरे या मक्के की रोटी
- अंकुरित मूंग, मोठ और चने की सब्ज़ी या सलाद
- कई घरों में भैंस या बकरी के दूध से बनी चीज़ें (गाय के दूध की जगह)
- मौसमी फल
क्या नहीं खाया जाता:
- गेहूँ और जौ (कथा के "गेहुँला-जौला" के कारण)
- गाय का दूध, दही, घी, मक्खन
- कई परिवारों में चाकू से काटी गई सब्ज़ियाँ
अन्नकूट के बारे में संक्षेप में: अन्नकूट का अर्थ है "अन्न का पर्वत"। गोवर्धन पूजा पर मंदिरों और घरों में अनेक व्यंजन पर्वत के रूप में सजाकर कृष्ण को अर्पित किए जाते हैं। "छप्पन भोग" की लोक-व्याख्या यह है कि गोवर्धन धारण के सात दिनों में कृष्ण ने भोजन नहीं किया, और दिन के आठ भोजन के हिसाब से 7 × 8 = 56 भोग बने। पिछले संस्करण में लिखा था कि "कृष्ण ने 56 दिन अन्नकूट लगाया", जो किसी कथा में नहीं है।
शुभ मंत्र और जाप विधि
गौ-माता के लिए:
- ॐ सुरभ्यै नमः
- ॐ कामधेनवे नमः
श्रीकृष्ण (गोपाल) के लिए:
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
- ॐ श्री कृष्णाय नमः
- ॐ गोविन्दाय नमः ("गोविन्द" का अर्थ ही है गायों का पालक)
जाप विधि:
- 108 मनकों की माला पर एक माला; सामान्य व्रती के लिए 1 से 11 माला पर्याप्त
- सुबह पूजा के बाद जाप करें
- वैष्णव परंपरा में तुलसी की माला प्रयोग होती है
- संख्या से अधिक भाव और नियमितता का महत्व है
बछबारस व्रत के फल — और उनकी सीमा
माताएँ यह व्रत श्रद्धा से रखती हैं। हर फल के साथ उसकी सीमा भी लिखी है, क्योंकि व्रत प्रार्थना है, गारंटी नहीं।
1. संतान की कुशलता की प्रार्थना: यही इस व्रत का मूल भाव है। बच्चे की बीमारी में डॉक्टर पहले आते हैं; व्रत और प्रार्थना इलाज के साथ चलते हैं।
2. संतान की कामना: कुछ स्त्रियाँ संतान-प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत रखती हैं। गर्भधारण में कठिनाई हो, तो पहले स्त्री-रोग विशेषज्ञ से जाँच कराएँ।
3. पशुओं के प्रति करुणा: गौ-सेवा का सीधा लाभ गाय को मिलता है: अच्छा चारा, साफ़ पानी, देखभाल। पशु बीमार हो तो पशु-चिकित्सक को दिखाएँ।
4. परिवार में एकता: साथ बैठकर कथा सुनना और एक जैसा सादा भोजन करना परिवार को जोड़ता है।
5. संयम का अभ्यास: एक दिन गेहूँ और दूध छोड़ना संयम सिखाता है।
6. ज्योतिषीय दृष्टि: गौ-सेवा को सात्विक उपाय माना जाता है, पर यह मांगलिक, कालसर्प या किसी अन्य योग को "दूर" नहीं करती। पिछले संस्करण के ऐसे दावे हटा दिए गए हैं।
7. स्वास्थ्य: पिछले संस्करण में गौ-पूजा से चर्म, पेट और नेत्र रोग ठीक होने की बात लिखी थी। पूजा किसी रोग की दवा नहीं है; किसी भी रोग में डॉक्टर से मिलें।
सावधानियां और नियम
1. व्रत के नियम:
- गेहूँ, जौ और गाय के दूध से बनी चीज़ें उस दिन न लें
- मांस, मदिरा और तामसिक भोजन वर्जित
- चाकू से कटी चीज़ों का नियम अपने परिवार की परंपरा अनुसार मानें
2. गाय के प्रति व्यवहार:
- गाय या बछड़े को मारें या डराएँ नहीं
- बछड़े को उसकी माँ से अलग न करें
- बासी, प्लास्टिक में बँधा या मसालेदार भोजन न खिलाएँ
- सड़क पर घूमती गायों को भोजन देते समय यातायात का ध्यान रखें
3. स्वास्थ्य संबंधी:
- गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ, और मधुमेह या किसी नियमित दवा वाली स्त्रियाँ कठोर व्रत न रखें; डॉक्टर से पूछकर फलाहार या सादा भोजन करें
- अंकुरित अनाज ताज़ा हो; बहुत पुराना अंकुरित अनाज पेट खराब कर सकता है
4. सामाजिक:
- कलह, निंदा और कटु वचन से बचें
- सामर्थ्य अनुसार गौशाला में चारा या दान दें
5. तिथि:
- अपने क्षेत्र की परंपरा देखें: भाद्रपद या कार्तिक
- सटीक दिन स्थानीय पंचांग या मंदिर से पूछें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बछबारस और गोवर्धन पूजा एक ही हैं या अलग?
अलग हैं। बछबारस (गोवत्स द्वादशी) कृष्ण पक्ष की द्वादशी को गाय-बछड़े की पूजा का व्रत है: राजस्थान में भाद्रपद में, महाराष्ट्र-गुजरात में धनतेरस से एक दिन पहले। गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, दीपावली के अगले दिन, होती है और उसमें गोबर का गोवर्धन और अन्नकूट बनता है।
अन्नकूट के छप्पन भोग क्या हैं?
छप्पन भोग गोवर्धन पूजा पर कृष्ण को अर्पित किए जाने वाले 56 व्यंजन हैं, बछबारस का भोग नहीं। लोक-व्याख्या है कि गोवर्धन धारण के सात दिन कृष्ण ने भोजन नहीं किया, और दिन के आठ भोजन के हिसाब से 7 × 8 = 56 भोग बने। बछबारस पर इसके उलट सादा भोजन होता है: बाजरे की रोटी और अंकुरित अनाज।
क्या गाय को रोटी खिलाना अनिवार्य है?
अनिवार्य नहीं। बछबारस पर गेहूँ वर्जित है, इसलिए रोटी खिलानी हो तो बाजरे की रोटी दें। गाय के लिए अंकुरित अनाज, हरा चारा और गुड़ पर्याप्त हैं।
क्या बछबारस का व्रत दूसरे दिन रख सकते हैं?
परंपरा में व्रत द्वादशी तिथि को ही रखा जाता है। तिथि दो दिनों में बँटी हो, तो प्रायः वह दिन लिया जाता है जिस दिन सूर्योदय के समय द्वादशी हो; पर क्षेत्रीय पंचांग इसमें अलग हो सकते हैं, इसलिए अपने पंडित या पंचांग से पूछें। बीमारी या यात्रा जैसी मजबूरी में अपने कुल के बड़ों से सलाह लें।
क्या केवल गाय की पूजा पर्याप्त है, या गोवर्धन-पूजा भी जरूरी है?
बछबारस पर गोवर्धन-पूजा का विधान नहीं है; वह अलग दिन का पर्व है। बछबारस पर गाय और बछड़े की साथ पूजा, कथा और व्रत के नियम ही पूरे हैं।
क्या बछबारस पर बछड़े की पूजा विशेष रूप से की जाती है?
हाँ। नाम ही "बछ" (बछड़ा) से बना है। गाय और बछड़े की पूजा साथ होती है, और उस दिन गाय का दूध बछड़े के लिए छोड़ दिया जाता है।
क्या बछबारस केवल कृषक समाज का त्यौहार है?
नहीं। गाँवों में यह पशुपालक परिवारों में अधिक दिखता है, पर शहरों में भी माताएँ गौशाला जाकर या मिट्टी की गाय-बछड़े की प्रतिमा बनाकर यह व्रत रखती हैं।
क्या बछबारस के दिन दान का विशेष महत्व है?
हाँ, गौशाला में चारा, गुड़ या सेवा का दान इस दिन विशेष माना जाता है। दान का फल गिनती में नहीं मापा जा सकता; पिछले संस्करण का "100 गुना फल" वाला दावा किसी ग्रंथ से प्रमाणित नहीं था, इसलिए हटा दिया गया है।
बछबारस माँ और संतान के रिश्ते को गाय और बछड़े के रिश्ते से जोड़ने वाला व्रत है। उस दिन बछड़े का दूध उसे लौटाया जाता है और माँ अपनी संतान के लिए प्रार्थना करती है। इसी सरल भाव में इस व्रत का महत्व है।
शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
ज्योतिषी, पंडित एनएम श्रीमाली
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Frequently Asked Questions
बछबारस और गोवर्धन पूजा एक ही हैं या अलग?+
अन्नकूट के छप्पन भोग क्या हैं?+
क्या गाय को रोटी खिलाना अनिवार्य है?+
क्या बछबारस का व्रत दूसरे दिन रख सकते हैं?+
क्या केवल गाय की पूजा पर्याप्त है?+
क्या बछबारस केवल कृषक समाज का त्यौहार है?+
क्या बछबारस के दिन दान का विशेष महत्व है?+
Written by
Nidhi Shrimali
Vedic Astrologer
Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.