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अनंत चतुर्दशी का महत्व , मुहूर्त , पूजन विधि एवं उपाय

# अनंत चतुर्दशी का महत्व , मुहूर्त , पूजन विधि एवं उपाय - Anant Chaturdashi - Pandit NM Shrimali - Best Astrologer in India **अनंत चतुर्दशी का महत्व , मुहूर्त , पूजन विधि एवं उपाय** — यह विषय मेरे पा

7 July 2026 21 min read|By Nidhi Shrimali

✨ लेखिका: निधि श्रीमाली, मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली (जोधपुर)।

अनंत चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा होती है और चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र बांधा जाता है। इसी दिन दस दिन के गणेशोत्सव का समापन और गणेश विसर्जन भी होता है, और दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण पर्व इसी दिन पूरा होता है। इस लेख में हम तिथि का नियम, अनंत व्रत की कथा, पूजा विधि, अनंत सूत्र बांधने का तरीका, गणेश विसर्जन, मंत्र और सावधानियाँ समझेंगे।

विषय सूची (Table of Contents)

  1. अनंत चतुर्दशी क्या है — परिचय
  2. 2025 और 2026 की तिथि और मुहूर्त का नियम
  3. एक दिन, तीन परंपराएँ — तुलना
  4. धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व
  5. गणेशोत्सव के दस दिन और "14" का अर्थ
  6. अनंत व्रत की कथा — सुशीला और कौंडिन्य
  7. अनंत सूत्र धारण विधि — 14 गांठें
  8. गणेश विसर्जन की विधि
  9. पूजा विधि — संकल्प से लेकर 108 जाप तक
  10. अनंत चतुर्दशी के मंत्र
  11. अनंत व्रत से जुड़ी मान्यताएँ और उनकी सीमा
  12. सावधानियां और क्या नहीं करना चाहिए
  13. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
  14. परामर्श बुक करें

अनंत चतुर्दशी क्या है — परिचय

अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चौदहवीं तिथि को मनाया जाने वाला व्रत और पर्व है। इस दिन का मुख्य विधान भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा है, जिन्हें शेषनाग पर विराजमान नारायण के रूप में ध्यान किया जाता है। पूजा के बाद चौदह गांठों वाला "अनंत सूत्र" बांधा जाता है। महाराष्ट्र और बहुत से नगरों में यही दिन गणेश चतुर्थी से शुरू हुए गणेशोत्सव का अंतिम दिन भी है, इसलिए आज बहुत से लोग इसे मुख्य रूप से गणेश विसर्जन के दिन के रूप में जानते हैं।

"अनंत" का अर्थ है जिसका अंत न हो। अनंत व्रत की कथा भविष्योत्तर पुराण में मिलती है, जहाँ भगवान कृष्ण वनवास में दुखी युधिष्ठिर को यह व्रत बताते हैं। कथा का केंद्र यह है कि कठिन समय में धैर्य और श्रद्धा न छोड़ी जाए, और जो पाया है उसका अहंकार न किया जाए।

परंपरा में यह व्रत परिवार की कुशलता और कठिन समय से उबरने की प्रार्थना के रूप में किया जाता है। यह किसी ग्रह दोष का तय उपाय नहीं है। कुंडली में कोई विशेष दोष हो, तो उसका उपाय क्या हो, यह कुंडली विश्लेषण से तय होता है।

2025 और 2026 की तिथि और मुहूर्त का नियम

तारीखों पर एक सुधार: इस लेख के पुराने संस्करण में अनंत चतुर्दशी 2026 की तारीख 26 अगस्त लिखी थी, जो सही नहीं थी। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास था, इसलिए उसके बाद के सभी पर्व लगभग एक महीना आगे खिसक गए। 2026 में गणेश चतुर्थी सितंबर के मध्य में पड़ी और अनंत चतुर्दशी उसके दस दिन बाद, सितंबर के अंतिम सप्ताह में। मिनट-स्तर के पुराने मुहूर्त भी हटा दिए गए हैं, क्योंकि वे हर शहर के लिए अलग होते हैं।

वर्ष अनंत चतुर्दशी टिप्पणी
2025 6 सितंबर 2025, शनिवार भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी
2026 सितंबर 2026 का अंतिम सप्ताह अधिक मास के कारण अगस्त में नहीं; गणेश चतुर्थी के दस दिन बाद। अपने शहर का पंचांग देखें
2027 पंचांग से देखें भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी, सामान्यतः अगस्त के अंत से सितंबर के बीच

मुहूर्त का नियम:

  • उदया तिथि: जिस दिन सूर्योदय के समय चतुर्दशी हो, उसी दिन अनंत व्रत किया जाता है।
  • पूजा का समय: अनंत पूजा प्रायः दिन के पूर्वार्ध में, स्नान के बाद की जाती है, और पूजा के बाद ही सूत्र बांधा जाता है।
  • तिथि दो दिनों में बँटे तो: कुछ वर्षों में चतुर्दशी सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले दिन सुबह तक रहती है। ऐसे में पंचांग जिस दिन व्रत बताए, उसी दिन करें।
  • गणेश विसर्जन: विसर्जन के मुहूर्त पंचांग दिन भर के शुभ चौघड़िया के रूप में देते हैं; यह किसी एक घंटे तक सीमित नहीं है।

एक दिन, तीन परंपराएँ — तुलना

भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी पर तीन अलग परंपराएँ मिलती हैं, और लोग अक्सर इन्हें एक ही मान लेते हैं। इनमें अंतर समझ लें तो यह भी साफ़ हो जाता है कि आपके परिवार में कौन सा विधान ज़रूरी है।

बात अनंत व्रत (वैष्णव) गणेश विसर्जन दशलक्षण पर्व का समापन (दिगंबर जैन)
किसकी पूजा भगवान विष्णु का अनंत रूप गणेश चतुर्थी पर स्थापित गणपति उत्तम क्षमा से उत्तम ब्रह्मचर्य तक दस धर्म
मुख्य विधान पूजा, कथा, 14 गांठों का सूत्र उत्तर पूजा, आरती, जल में विसर्जन उपवास, पूजा, अगले दिन क्षमावाणी
शास्त्रीय आधार भविष्योत्तर पुराण की अनंत व्रत कथा लोक-परंपरा; सार्वजनिक उत्सव 1893 से लोकमान्य तिलक के समय से प्रसिद्ध जैन आगम और परंपरा
किसके लिए ज़रूरी जो परिवार अनंत व्रत रखता है जिसने गणेश प्रतिमा स्थापित की हो, और दस दिन रखी हो दिगंबर जैन समाज
प्रमुख क्षेत्र उत्तर भारत, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा आदि महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, गुजरात और अब पूरे देश में देश भर का दिगंबर जैन समाज

जिन घरों में गणेश प्रतिमा डेढ़, तीन, पाँच या सात दिन के लिए स्थापित होती है, उनका विसर्जन उसी दिन होता है; सबका विसर्जन अनंत चतुर्दशी तक रुकता नहीं। अनंत चतुर्दशी के अगले दिन पूर्णिमा और उसके बाद पितृ पक्ष शुरू होता है।

अनंत चतुर्दशी का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धार्मिक दृष्टि से:

  • भगवान विष्णु के शेषशायी अनंत रूप की पूजा
  • गणेश जी का विसर्जन और अगले वर्ष पुनः आगमन की प्रार्थना
  • भाद्रपद मास का अंतिम बड़ा पर्व, जिसके बाद पूर्णिमा और पितृ पक्ष आते हैं

आध्यात्मिक दृष्टि से:

  • "अनंत" का ध्यान यह याद दिलाता है कि ईश्वर सीमाओं में बँधा नहीं है
  • गणेश विसर्जन यह भाव देता है कि हर आकार अस्थायी है
  • सूत्र बांधना एक संकल्प का बाहरी चिह्न है: पूरे वर्ष यह याद रहे कि व्रत लिया है

ज्योतिषीय दृष्टि से:

  • चतुर्दशी पूर्णिमा से ठीक पहले की तिथि है। इस समय सूर्य सिंह या कन्या में होता है और चंद्रमा प्रायः कुंभ या मीन राशि में।
  • अनंत चतुर्दशी का संबंध किसी विशेष ग्रह की शांति से शास्त्रों में नहीं जोड़ा गया है। इसे शनि, राहु या कालसर्प का उपाय बताने वाले दावे परंपरा पर आधारित नहीं हैं।
  • विष्णु पूजा परंपरा में गुरु (बृहस्पति) और बुध से जोड़ी जाती है, पर व्रत का मूल भाव भक्ति है, ग्रह-उपाय नहीं।

गणेशोत्सव के दस दिन और "14" का अर्थ

इस लेख के पुराने संस्करण में "14 दिन के गणेशोत्सव" और "14 गणेश रूपों" की एक तालिका थी। वह किसी प्रचलित परंपरा पर आधारित नहीं थी, इसलिए हटा दी गई है। सही स्थिति यह है:

  • गणेशोत्सव दस दिन का होता है: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को स्थापना और चतुर्दशी को विसर्जन। चतुर्थी से चतुर्दशी तक गिनें तो ग्यारह तिथियाँ बनती हैं, इसलिए कहीं-कहीं इसे "दस दिन" और कहीं "ग्यारह दिन" कहा जाता है।
  • "14" अंक अनंत व्रत से आता है, गणेशोत्सव से नहीं: चतुर्दशी चौदहवीं तिथि है, सूत्र में चौदह गांठें होती हैं, और परंपरा में इन्हें चौदह लोकों (सात ऊपर, सात नीचे) का प्रतीक माना जाता है। व्रत को चौदह वर्ष तक निभाने की परंपरा भी इसी से जुड़ी है।
  • गणेश के प्रसिद्ध नाम: गणेश जी के बारह नाम "सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः…" वाले द्वादश नाम स्तोत्र में आते हैं: सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन। इन्हें किसी विशेष दिन से जोड़ने का नियम नहीं है।

गणेश चतुर्थी की स्थापना और पूजा की पूरी विधि गणेश चतुर्थी पर हमारे लेख में है। स्थापना की सामग्री एक साथ चाहिए तो गणेश पूजा किट देख सकते हैं।

अनंत व्रत की कथा — सुशीला और कौंडिन्य

इस लेख के पुराने संस्करण में "सुशेन और माण्डव्य" के नाम से एक कथा दी गई थी, जो अनंत व्रत की प्रचलित कथा नहीं है। भविष्योत्तर पुराण में जो कथा मिलती है, और जो अनंत पूजा में पढ़ी जाती है, वह संक्षेप में इस प्रकार है।

पांडव वनवास में कष्ट झेल रहे थे। युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि इस दुख से उबरने का उपाय क्या है। कृष्ण ने उन्हें अनंत व्रत बताया और यह कथा सुनाई।

प्राचीन काल में सुमंत नाम के एक ब्राह्मण थे। उनकी पुत्री का नाम सुशीला था। सुशीला की माता के देहांत के बाद सुमंत ने दूसरा विवाह किया, और सौतेली माँ का व्यवहार सुशीला के प्रति कठोर रहा। समय आने पर सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि से हुआ। विदा होते समय भी सौतेली माँ ने उन्हें लगभग कुछ नहीं दिया।

मार्ग में एक नदी के किनारे सुशीला ने कुछ स्त्रियों को पूजा करते देखा। पूछने पर उन्होंने बताया कि यह भगवान अनंत का व्रत है, और चौदह गांठों वाला सूत्र बांधा जाता है। सुशीला ने भी वहीं व्रत किया और सूत्र बांध लिया। कुछ ही समय में कौंडिन्य और सुशीला का घर धन-धान्य से भर गया।

एक दिन कौंडिन्य ने सुशीला के हाथ में वह सूत्र देखा। यह सोचकर कि सुशीला किसी वशीकरण के लिए धागा बांधे हैं, और यह मानकर कि उनकी समृद्धि उनके अपने परिश्रम का फल है, उन्होंने सूत्र तोड़कर अग्नि में डाल दिया। इसके बाद उनकी समृद्धि धीरे-धीरे चली गई और वे दरिद्र हो गए।

अपनी भूल समझकर कौंडिन्य भगवान अनंत को खोजने वन में निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने एक आम के पेड़, एक गाय, एक बैल, दो तालाबों, एक गधे और एक हाथी से अनंत का पता पूछा, पर किसी ने कुछ नहीं बताया। थककर जब वे प्राण त्यागने को तैयार हुए, तब भगवान एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आए, उन्हें अपना विराट रूप दिखाया, और बताया कि मार्ग में मिले सब जीव पिछले जन्मों के कर्मों से बँधे प्राणी थे। भगवान ने कौंडिन्य को चौदह वर्ष तक अनंत व्रत करने को कहा। कौंडिन्य ने व्रत किया और उनका जीवन फिर सँवर गया।

कथा का संदेश: कथा का केंद्र यह नहीं कि धागा बांधते ही धन आ जाता है। केंद्र यह है कि कौंडिन्य की हानि अहंकार और श्रद्धा के अपमान से शुरू हुई, और सुधार भूल मानने, धैर्य और नियम से आया। यही इस व्रत का भाव है। भगवान विष्णु के अवतारों और रूपों के बारे में अधिक जानने के लिए विष्णु के दस अवतारों पर हमारा लेख पढ़ें।

अनंत सूत्र धारण विधि — 14 गांठें

अनंत सूत्र क्या है? अनंत सूत्र कच्चे सूत का धागा है, जिसे कुमकुम, हल्दी या केसर से रंगकर लाल या पीला किया जाता है। इसमें 14 गांठें बांधी जाती हैं। पूजा में सूत्र को भगवान अनंत के सामने रखकर पूजा जाता है और फिर बांधा जाता है। प्रचलित परंपरा में पुरुष इसे दाहिनी भुजा या कलाई पर और स्त्रियाँ बाईं भुजा या कलाई पर बांधती हैं। सूत्र हर वर्ष नया बांधा जाता है; "चौदह वर्ष" की परंपरा व्रत को चौदह वर्ष तक निभाने की है, एक ही धागा चौदह वर्ष पहनने की नहीं।

गांठों पर स्मरण: गांठों के साथ कौन से नाम लिए जाएँ, इसका एक नियम सब जगह नहीं है। कई परिवार चौदह लोकों का ध्यान करते हैं, कई विष्णु के नाम लेते हैं। नीचे विष्णु के नामों वाली एक प्रचलित पद्धति दी गई है:

गांठ विष्णु नाम नाम मंत्र
1केशवॐ केशवाय नमः
2नारायणॐ नारायणाय नमः
3माधवॐ माधवाय नमः
4गोविंदॐ गोविंदाय नमः
5विष्णुॐ विष्णवे नमः
6मधुसूदनॐ मधुसूदनाय नमः
7त्रिविक्रमॐ त्रिविक्रमाय नमः
8वामनॐ वामनाय नमः
9श्रीधरॐ श्रीधराय नमः
10हृषीकेशॐ हृषीकेशाय नमः
11पद्मनाभॐ पद्मनाभाय नमः
12दामोदरॐ दामोदराय नमः
13संकर्षणॐ संकर्षणाय नमः
14वासुदेवॐ वासुदेवाय नमः

सूत्र तैयार करने की विधि:

  1. कच्चे सूत के धागे को कुमकुम या हल्दी के जल में रंगकर सुखा लें
  2. स्नान के बाद, पूजा से पहले, 14 गांठें बांधें; हर गांठ पर एक नाम लें
  3. सूत्र को पूजा की थाली में भगवान अनंत के सामने रखें और चंदन, अक्षत, पुष्प चढ़ाएँ
  4. पूजा और कथा के बाद नीचे दिए सूत्र-बंधन मंत्र के साथ बांधें
  5. अंत में "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें

गणेश विसर्जन की विधि और शुभ मुहूर्त

गणेश विसर्जन के लिए यह सरल विधि अपनाएं:

  1. उत्तर पूजा: स्नान के बाद गणेश जी का अक्षत, दूर्वा, फूल, धूप-दीप और मोदक से पूजन करें और आरती करें
  2. क्षमा प्रार्थना: पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें
  3. विसर्जन मंत्र: "यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च॥" बोलकर प्रतिमा को थोड़ा हिलाएँ, यह विदा का संकेत माना जाता है
  4. विसर्जन स्थल: मिट्टी की प्रतिमा हो तो घर में बाल्टी या टब में भी विसर्जन कर सकते हैं, और घुली मिट्टी गमले या बगीचे में डाल दें। सार्वजनिक प्रतिमाओं के लिए नगरपालिका के बनाए कृत्रिम तालाब का उपयोग करें। प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमा और रंग जल को प्रदूषित करते हैं, इसलिए मिट्टी की प्रतिमा ही लें।
  5. धातु या पत्थर की प्रतिमा: स्थायी प्रतिमा का विसर्जन नहीं होता। उसका केवल प्रतीकात्मक विसर्जन (थोड़ा जल छिड़ककर) करके उसे पूजा स्थान में रख दें।
  6. वापसी: विसर्जन के बाद घर आकर हाथ-पैर धोएँ। जो परिवार अनंत व्रत भी रखते हैं, वे अनंत पूजा प्रायः विसर्जन से पहले दिन के पूर्वार्ध में कर लेते हैं।

समय के बारे में: यह नियम नहीं है कि विसर्जन दोपहर से पहले ही हो। बड़े नगरों में शोभायात्राएँ रात तक चलती हैं, और पंचांग दिन भर के कई शुभ चौघड़िया देते हैं। अपने शहर का पंचांग देखकर समय चुनें।

पूजा विधि — संकल्प से लेकर 108 जाप तक

चरण 1 — संकल्प: प्रातः स्नान के बाद शुद्ध आसन पर बैठें। दीपक और अगरबत्ती जलाएं। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प लें — "मैं अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर भगवान अनंत की पूजा और व्रत करता/करती हूँ। मेरे परिवार की कुशलता बनी रहे और कठिन समय में धैर्य मिले।"

चरण 2 — अनंत की स्थापना:

  • भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। कई परिवारों में कुश से सात फनों वाले शेषनाग का आकार बनाकर उसे "अनंत" के रूप में पूजा जाता है।
  • पास में जल से भरा कलश रखें; कुछ परंपराओं में कलश पर ही अनंत की स्थापना होती है।

चरण 3 — पूजन:

  • पंचामृत और फिर शुद्ध जल से अभिषेक करें
  • चंदन, कुमकुम, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें (विष्णु पूजा में तुलसी मुख्य है; बेलपत्र शिव पूजा में चढ़ता है)
  • फल और मिठाई का भोग लगाएँ। उत्तर भारत में मालपुए या पुए का भोग प्रचलित है।

चरण 4 — कथा: ऊपर दी गई सुशीला और कौंडिन्य की कथा पढ़ें या सुनें। अनंत पूजा में कथा को व्रत का अंग माना जाता है।

चरण 5 — अनंत सूत्र धारण: पूजित सूत्र को नीचे दिए मंत्र के साथ बांधें। परंपरा के अनुसार पुरुष दाहिने और स्त्रियाँ बाएँ हाथ में बांधती हैं। पिछले वर्ष का सूत्र उतारकर किसी पेड़ की जड़ में रख दें या बहते जल में प्रवाहित कर दें।

चरण 6 — जाप और आरती:

  • "ॐ अनंताय नमः" मंत्र का 108 बार जाप
  • समय हो तो "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" की एक माला
  • भगवान विष्णु की आरती करें

व्रत में कई परिवार दिन में एक बार बिना नमक का भोजन करते हैं। मधुमेह, रक्तचाप, गर्भावस्था या कोई दवा चल रही हो तो उपवास का नियम अपने डॉक्टर से पूछकर ही तय करें; पूजा और सूत्र बांधना बिना उपवास के भी किया जा सकता है। पूजा किसी पंडित से विधिवत करवानी हो तो हमारी ई-पूजा सेवा से पूछ सकते हैं।

अनंत चतुर्दशी के शुभ मंत्र

सूत्र बांधते समय का मंत्र:

अनंत संसार महासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्यनंतसूत्राय नमो नमस्ते॥

अर्थ: हे वासुदेव, इस अनंत संसार रूपी महासागर में डूबे हुए मुझे उबारिए, और मुझे अपने अनंत रूप में लगाइए। इस अनंत सूत्र को बार-बार नमस्कार।

जप के मंत्र:

  • ॐ अनंताय नमः (सर्वाधिक प्रचलित)
  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (द्वादशाक्षर मंत्र)
  • ॐ नमो नारायणाय (अष्टाक्षर मंत्र)

जाप विधि:

  • स्नान के बाद, पूजा के समय जप करें
  • तुलसी की माला वैष्णव जप में प्रचलित है; हमारे संग्रह में तुलसी जाप माला उपलब्ध है
  • व्रत के दिन कम से कम एक माला (108) जप करें
  • समय हो तो विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें

अनंत व्रत से जुड़ी मान्यताएँ और उनकी सीमा

इस भाग के पुराने संस्करण में संतान, दीर्घायु, गंभीर रोगों से रक्षा, काला जादू और शनि-राहु की शांति जैसे दावे थे। अनंत व्रत की कथा इनमें से कोई वादा नहीं करती, इसलिए उन्हें हटाकर वही रखा गया है जो परंपरा मानती है, और साथ में उसकी सीमा भी।

  1. कठिन समय में धैर्य: युधिष्ठिर को यह व्रत वनवास के दुख में बताया गया था। परंपरा इसे कठिन समय में मन को टिकाए रखने का व्रत मानती है।

  2. परिवार की कुशलता की प्रार्थना: बहुत से परिवार इसे पूरे परिवार की ओर से करते हैं और हर सदस्य को सूत्र बांधते हैं।

  3. वर्ष भर का स्मरण: हाथ पर बँधा सूत्र पूरे वर्ष संकल्प की याद दिलाता है।

  4. अहंकार से बचने की सीख: कौंडिन्य की कथा बताती है कि समृद्धि आने पर उसका श्रेय केवल अपने को देना और श्रद्धा का अपमान करना पतन की शुरुआत है।

  5. आर्थिक कठिनाई में: परंपरा में इसे समृद्धि से जोड़ा जाता है, पर व्रत किसी आय या व्यापार की गारंटी नहीं है। कर्ज़ या व्यापार की कठिनाई में किसी योग्य वित्तीय सलाहकार से भी मिलें।

  6. स्वास्थ्य: सूत्र किसी रोग से रक्षा नहीं करता। रोग हो तो डॉक्टर से इलाज पहले कराएँ; व्रत और प्रार्थना उसके साथ श्रद्धा के रूप में करें। संतान की इच्छा में भी पहले डॉक्टर से मिलें।

  7. विवाह में देरी: यह व्रत मांगलिक दोष या किसी कुंडली दोष का उपाय नहीं है। विवाह से जुड़ी चिंता हो तो कुंडली मिलान और कुंडली देखकर ही उपाय तय करें।

सावधानियां और क्या नहीं करना चाहिए

  1. स्नान के बाद ही सूत्र बांधें: परंपरा में पूजा और सूत्र धारण स्नान के बाद ही किए जाते हैं।

  2. मासिक धर्म के समय: कई परिवारों में इस समय स्त्रियाँ स्वयं पूजा नहीं करतीं और परिवार का कोई और सदस्य पूजा करके सूत्र दे देता है। यह पारिवारिक रीति का विषय है; जो रीति आपके घर में है, वही मानें।

  3. 14 गांठों का विधान: अनंत सूत्र में 14 गांठें होती हैं। बाज़ार से लें तो गांठें गिन लें।

  4. टूटे सूत्र का अपमान न करें: यदि सूत्र टूट जाए तो उसे किसी पेड़ की जड़ में रख दें या बहते जल में प्रवाहित कर दें। कूड़े में न फेंकें।

  5. एक हाथ पर एक अनंत सूत्र: हर वर्ष नया सूत्र बांधते समय पिछला उतार दें।

  6. गणेश विसर्जन में सुरक्षा: गहरे पानी में न उतरें, बच्चों को जल के पास अकेला न छोड़ें, और भीड़ वाले घाट की जगह कृत्रिम तालाब चुनें।

  7. सूत्र का रंग: सूत्र प्रायः लाल, पीला या केसरिया होता है।

  8. सात्विक भोजन: अनंत चतुर्दशी के दिन शाकाहारी, सात्विक भोजन ही करें।

  9. क्रोध और असत्य से बचें: व्रत के दिन क्रोध, निंदा, असत्य और हिंसा से बचना चाहिए।

  10. सूत्र का सम्मान: अनंत सूत्र पवित्र वस्तु है। इसे मुँह में लेना या पैरों के नीचे रखना अपमानजनक माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अनंत चतुर्दशी 2026 कब है?

2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण अनंत चतुर्दशी अगस्त में नहीं, सितंबर के अंतिम सप्ताह में, गणेश चतुर्थी के दस दिन बाद पड़ी। इस लेख के पुराने संस्करण में लिखी 26 अगस्त 2026 की तारीख गलत थी। सटीक दिन और मुहूर्त के लिए अपने शहर का पंचांग देखें।

क्या एक बार अनंत सूत्र बांध लें तो काम हो जाता है?

सूत्र कोई ताबीज़ नहीं है जो बांधते ही काम कर दे। परंपरा में व्रत चौदह वर्ष तक निभाने की बात है, और हर वर्ष अनंत चतुर्दशी को नया सूत्र बांधा जाता है। चौदह वर्ष पूरे होने पर उद्यापन किया जाता है।

14 गांठें कैसे बांधें?

कच्चे सूत के धागे को कुमकुम या हल्दी से रंगें और स्नान के बाद, पूजा से पहले, उसमें 14 गांठें बांधें। हर गांठ पर विष्णु का एक नाम लें (ऊपर की तालिका देखें) या चौदह लोकों का ध्यान करें। फिर सूत्र को पूजा में रखकर पूजें और पूजा के बाद बांधें।

क्या स्त्रियां भी अनंत सूत्र धारण कर सकती हैं?

हाँ। स्त्रियाँ अनंत व्रत रखती हैं और सूत्र प्रायः बाएँ हाथ में बांधती हैं। कथा में व्रत सबसे पहले सुशीला ने ही किया था। मासिक धर्म के समय की रीति परिवार के अनुसार होती है। गर्भवती स्त्रियाँ उपवास का नियम डॉक्टर से पूछकर ही तय करें; पूजा और सूत्र बिना उपवास के भी हो सकते हैं।

क्या गणेश विसर्जन अनिवार्य है?

जिसने गणेश चतुर्थी पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की हो, उसके लिए विसर्जन उस स्थापना का अंत है, और वह स्थापना के दिनों के अनुसार (डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन) होता है। धातु या पत्थर की स्थायी प्रतिमा का केवल प्रतीकात्मक विसर्जन होता है। अनंत व्रत गणेश विसर्जन पर निर्भर नहीं है; जिस घर में गणेश स्थापना न हुई हो, वहाँ भी अनंत पूजा और सूत्र पूरे माने जाते हैं।

क्या अनंत सूत्र बाजार में मिलता है?

हाँ, अनंत सूत्र पूजा-सामग्री की दुकानों और मंदिरों के आसपास आसानी से मिल जाता है। घर पर कच्चे सूत से बनाना भी सरल है। बाज़ार से लें तो गांठें गिन लें, क्योंकि कभी-कभी उनमें 14 की जगह कम गांठें होती हैं।

क्या पहले से काला धागा या अन्य सूत्र पहना हो तो क्या करें?

पहले से कलावा या काला धागा पहना हो तो अनंत सूत्र उसी के साथ उसी हाथ में या दूसरी भुजा पर बांध सकते हैं; इसका कोई कड़ा निषेध नहीं है। एक साथ दो अनंत सूत्र न बांधें; हर वर्ष पुराना उतारकर नया बांधें। काले धागे को किसी ग्रह से रक्षा का साधन मानने का शास्त्रीय आधार नहीं है; यह लोक-मान्यता है।

क्या इस व्रत को बार-बार करना पड़ता है?

परंपरा में अनंत व्रत हर वर्ष अनंत चतुर्दशी को किया जाता है, और चौदह वर्ष पूरे होने पर उद्यापन होता है। यह संकल्प का विषय है। स्वास्थ्य या परिस्थिति के कारण किसी वर्ष पूरा विधान न हो सके, तो केवल पूजा और सूत्र बांधना भी किया जाता है।


अनंत चतुर्दशी का भाव स्थायित्व और श्रद्धा है। गणेश विसर्जन यह याद दिलाता है कि हर आकार अस्थायी है, और अनंत सूत्र यह कि ईश्वर का कोई अंत नहीं। भगवान विष्णु के शेषशायी रूप की प्रतिमा घर के पूजा स्थान के लिए चाहिए तो पारद शेषनाग विष्णु-लक्ष्मी या हमारा देव प्रतिमा संग्रह देख सकते हैं। यदि जीवन में बार-बार कोई एक ही समस्या आ रही है, तो उसका कारण और उपाय कुंडली देखकर तय करना बेहतर है।

शुभकामनाएँ सहित,
निधि श्रीमाली
मुख्य ज्योतिषी, पंडित NM श्रीमाली, जोधपुर
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[ { "question": "अनंत चतुर्दशी 2026 कब है?", "answer": "2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण अनंत चतुर्दशी अगस्त में नहीं, सितंबर के अंतिम सप्ताह में, गणेश चतुर्थी के दस दिन बाद पड़ी। सटीक दिन और मुहूर्त के लिए अपने शहर का पंचांग देखें।" }, { "question": "क्या एक बार अनंत सूत्र बांध लें तो काम हो जाता है?", "answer": "सूत्र कोई ताबीज़ नहीं है। परंपरा में व्रत चौदह वर्ष तक निभाने की बात है, हर वर्ष अनंत चतुर्दशी को नया सूत्र बांधा जाता है, और चौदह वर्ष पूरे होने पर उद्यापन किया जाता है।" }, { "question": "14 गांठें कैसे बांधें?", "answer": "कच्चे सूत के धागे को कुमकुम या हल्दी से रंगकर स्नान के बाद उसमें 14 गांठें बांधें, हर गांठ पर विष्णु का एक नाम लें या चौदह लोकों का ध्यान करें, फिर सूत्र को पूजा में रखकर पूजें और पूजा के बाद बांधें।" }, { "question": "क्या स्त्रियां भी अनंत सूत्र धारण कर सकती हैं?", "answer": "हाँ। स्त्रियाँ अनंत व्रत रखती हैं और सूत्र प्रायः बाएँ हाथ में बांधती हैं; कथा में व्रत सबसे पहले सुशीला ने ही किया था। मासिक धर्म के समय की रीति परिवार के अनुसार होती है।" }, { "question": "क्या गणेश विसर्जन अनिवार्य है?", "answer": "जिसने गणेश चतुर्थी पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की हो, उसके लिए विसर्जन स्थापना का अंत है। अनंत व्रत गणेश विसर्जन पर निर्भर नहीं है; जिस घर में गणेश स्थापना न हुई हो, वहाँ भी अनंत पूजा और सूत्र पूरे माने जाते हैं।" }, { "question": "क्या पहले से काला धागा या अन्य सूत्र पहना हो तो क्या करें?", "answer": "पहले से कलावा या काला धागा पहना हो तो अनंत सूत्र उसी के साथ या दूसरी भुजा पर बांध सकते हैं। एक साथ दो अनंत सूत्र न बांधें; हर वर्ष पुराना उतारकर नया बांधें।" }, { "question": "अनंत व्रत की असली कथा क्या है?", "answer": "भविष्योत्तर पुराण की कथा में कृष्ण युधिष्ठिर को सुशीला और कौंडिन्य ऋषि की कथा सुनाते हैं: सुशीला के अनंत सूत्र बांधने से घर समृद्ध हुआ, कौंडिन्य ने अहंकार में सूत्र अग्नि में डाल दिया और सब खो बैठे, फिर भूल मानकर चौदह वर्ष व्रत किया और जीवन सँवरा।" } ]

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Frequently Asked Questions

अनंत चतुर्दशी 2026 कब है?+
2026 में ज्येष्ठ अधिक मास के कारण अनंत चतुर्दशी अगस्त में नहीं, सितंबर के अंतिम सप्ताह में, गणेश चतुर्थी के दस दिन बाद पड़ी। सटीक दिन और मुहूर्त के लिए अपने शहर का पंचांग देखें।
क्या एक बार अनंत सूत्र बांध लें तो काम हो जाता है?+
सूत्र कोई ताबीज़ नहीं है। परंपरा में व्रत चौदह वर्ष तक निभाने की बात है, हर वर्ष अनंत चतुर्दशी को नया सूत्र बांधा जाता है, और चौदह वर्ष पूरे होने पर उद्यापन किया जाता है।
14 गांठें कैसे बांधें?+
कच्चे सूत के धागे को कुमकुम या हल्दी से रंगकर स्नान के बाद उसमें 14 गांठें बांधें, हर गांठ पर विष्णु का एक नाम लें या चौदह लोकों का ध्यान करें, फिर सूत्र को पूजा में रखकर पूजें और पूजा के बाद बांधें।
क्या स्त्रियां भी अनंत सूत्र धारण कर सकती हैं?+
हाँ। स्त्रियाँ अनंत व्रत रखती हैं और सूत्र प्रायः बाएँ हाथ में बांधती हैं; कथा में व्रत सबसे पहले सुशीला ने ही किया था। मासिक धर्म के समय की रीति परिवार के अनुसार होती है।
क्या गणेश विसर्जन अनिवार्य है?+
जिसने गणेश चतुर्थी पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की हो, उसके लिए विसर्जन स्थापना का अंत है। अनंत व्रत गणेश विसर्जन पर निर्भर नहीं है; जिस घर में गणेश स्थापना न हुई हो, वहाँ भी अनंत पूजा और सूत्र पूरे माने जाते हैं।
क्या पहले से काला धागा या अन्य सूत्र पहना हो तो क्या करें?+
पहले से कलावा या काला धागा पहना हो तो अनंत सूत्र उसी के साथ या दूसरी भुजा पर बांध सकते हैं। एक साथ दो अनंत सूत्र न बांधें; हर वर्ष पुराना उतारकर नया बांधें।
अनंत व्रत की असली कथा क्या है?+
भविष्योत्तर पुराण की कथा में कृष्ण युधिष्ठिर को सुशीला और कौंडिन्य ऋषि की कथा सुनाते हैं: सुशीला के अनंत सूत्र बांधने से घर समृद्ध हुआ, कौंडिन्य ने अहंकार में सूत्र अग्नि में डाल दिया और सब खो बैठे, फिर भूल मानकर चौदह वर्ष व्रत किया और जीवन सँवरा।
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Written by

Nidhi Shrimali

Vedic Astrologer

Nidhi Shrimali is a Vedic astrologer with 18+ years of experience specializing in Kundali Vishleshan, Kundli Milan, Vastu Shastra, and Numerology. 1,425+ Google reviews, 4.8 rating. Based in Jodhpur, Rajasthan.

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