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प्रेम विवाह संबंधित जानकारी

प्रेम विवाह संबंधित जानकारी Pandit Nm Shriamli

प्रेम विवाह

प्रेम विवाह हेतु निर्धारित भाव एवं ग्रह जिसका उळेख हमारे पंडित जी द्वारा किया गया है पंडित एन एम श्रीमाली द्वारा बतया गया है की शास्त्रो में सभी विषयों के लिए निश्चित भाव निर्धारित किया गया है लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, एकादश, तथा द्वादश भाव को प्रेम-विवाह का कारक भाव माना गया है यथा — लग्न भाव — जातक स्वयं। पंचम भाव — प्रेम या प्यार का स्थान। सप्तम भाव — विवाह का भाव। नवम भाव — भाग्य स्थान। एकादश भाव — लाभ स्थान। द्वादश भाव — शय्या सुख का स्थान। वहीं सभी ग्रहो को भी विशेष कारकत्व प्रदान किया गया है। यथा “शुक्र ग्रह” को प्रेम तथा विवाह का कारक माना गया है। स्त्री की कुंडली में “ मंगल ग्रह “ प्रेम का कारक माना गया है। पंडित जी ने प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत बताये गए है पंचम और सप्तम भाव तथा भावेश के साथ सम्बन्ध। पंचम भाव प्रेम का भाव है और सप्तम भाव विवाह का अतः जब पंचम भाव का सम्बन्ध सप्तम भाव भावेश से होता है तब प्रेमी-प्रेमिका वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। पंचमेश-सप्तमेश-नवमेश तथा लग्नेश का किसी भी प्रकार से परस्पर सम्बन्ध हो रहा हो तो जातक का प्रेम, विवाह में अवश्य ही परिणत होगा हाँ यदि अशुभ ग्रहो का भी सम्बन्ध बन रहा हो तो वैवाहिक समस्या आएगी। लग्नेश-पंचमेश-सप्तमेश-नवमेश तथा द्वादशेश का सम्बन्ध भी अवश्य ही प्रेमी प्रेमिका को वैवाहिक बंधन बाँधने में सफल होता है। प्रेम और विवाह के कारक ग्रह शुक्र या मंगल का पंचम तथा सप्तम भाव-भावेश के साथ सम्बन्ध होना भी विवाह कराने में सक्षम होता है। सभी भावो में नवम भाव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है नवम भाव का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सम्बन्ध होने पर माता-पिता का आशीर्वाद मिलता है और यही कारण है की नवम भाव -भावेश का पंचम- सप्तम भाव भावेश से सम्बन्ध बनता है तो विवाह भागकर या गुप्त रूप से न होकर सामाजिक और पारिवारिक रीति-रिवाजो से होती है। शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है। नवमांश कुण्डली जन्म कुण्डली का सूक्ष्म शरीर माना जाता है अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है या आंशिक है और नवमांश कुण्डली में पंचमेश, सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल हो जाती है। पाप ग्रहो का सप्तम भाव-भावेश से युति हो तो प्रेम विवाह की सम्भावना बन जाती है। राहु और केतु का सम्बन्ध लग्न या सप्तम भाव-भावेश से हो तो प्रेम विवाह का सम्बन्ध बनता है। लग्नेश तथा सप्तमेश का परिवर्तन योग या केवल सप्तमेश का लग्न में होना या लग्नेश का सप्तम में होना भी प्रेम विवाह करा देता है। चन्द्रमा तथा शुक्र का लग्न या सप्तम में होना भी प्रेम विवाह की ओर संकेत करता है। -भगवान विष्णु और लक्ष्मी मां की मूर्ति के सामने बैठकर हम रुद्राक्ष की माला का जाप करना और प्रेम विवाह यन्त्र की पूजा करनी चहिये और ‘ॐ लक्ष्मी नारायणाय नमः’मंत्र का दिन में तीन बार स्फटिक का माला पर जप करें।कहते हैं कि शुक्ल पक्ष के गुरुवार से इस प्रयोग को आरंभ करना चाहिए।कहा जाता है कि तीन महीने तक हर गुरुवार को मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर विवाह की सफलता के लिए प्रार्थना करना फलदायक साबित होता है। – यदि प्रेम-विवाह में कोई बाधा आ रही हो तो 5 नारियल लेकर इसे भगवान शंकर की मूर्ति के आगे रखकर ‘ऊं श्रीं वर प्रदाय श्री नमः’मंत्र का जाप बार करें। यह जाप रूद्राक्ष की माला पर पांच माला फेरते हुए करें। इसके बाद पांचों नारियल शिव जी के मंदिर में चढ़ाएं, विवाह की बाधाएं दूर हो जायेंगी। – प्रत्येक सोमवार को यदि सुबह नहा-धोकर शिवलिंग पर ‘ऊं सोमेश्वराय नमः’ का जाप करते हुए दूध मिले जल को चढ़ाएं और वहीं मंदिर में बैठकर रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का एक माला जप करें तो विवाह की सम्भावना शीघ्र बनती नज़र आयेंगी। -और श्रीमाली जी कहते है की कामदेव रति पूजा द्वारा भी प्रेम विवाह की बाधा दूर होती है श्रीमाली जी द्वारा बातये गए निम्न तत्यो द्वारा उपयोग करने से आपकी विवाह में आ रही सारी समस्याएं दूर हो जाएगी और आप अपने प्रेमी से विवाह करने में सफलता पाएंगे।

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