Namkaran Sanskar Pooja | नामकरण संस्कार पूजा | By Astrologer Nidhi Ji Shrimali |

निवारण पूजा 8 1 | Panditnmshrimali

Namkaran Sanskar Pooja


There is a law of naming ceremony in all religions. The naming ceremony is the fifth rite in Hindu religious rituals. However, it has special significance in Sanatan Dharma. It is said that the sanskaras of the child are revealed by the naming of the child. This sanskar awakens the tendency of karma in the child. This sanskar should be performed on the tenth day after the birth of the child. If for some reason this sanskar is not performed on the tenth day, then there is a provision to do it for three months or the next year. The reason for this is that according to Parashara Smriti, in the Sutak of birth, Brahmin in ten days, Kshatriya in twelve days, Vaishya in fifteen days. A Shudra is purified in a day and a Shudra in a month. On this day, after the worship, the child is tasted of honey. The advantage of naming names according to constellations or zodiac signs is that it makes it easier to make horoscopes. The name should also be kept very beautiful and meaningful.

Ayurvedabhivriddhish siddhirvyavahatetha | 
Namakarmaphalam tvett samudishtam manishibhih ||

That is, due to the naming ceremony, there is an increase in age and speed, and in worldly behaviour, the fame of the name creates a different existence of a person.

Therefore, the naming ceremony should be done only after the uncleanness has passed, because there is a close relation of man with the name. Names are usually two – one secret name and the other common name.

  • In this sacrament, the child is offered a graciously sweet speech after licking honey, the sun is shown and it is wished that the child should imbibe the brilliance of the sun, along with it, by bowing down to the land, devotion is given to the culture of God. Taking the new name of the baby, everyone wishes him to be Chiranjeevi, pious, healthy and prosperous.
  • According to Indian thought, the soul is immortal. The body perishes, but the accumulated sanskaras of the soul remain with it. At what time, in which constellation, zodiac, etc. the child was born, all this happens according to a certain law. The priest or pandit of the house names the child according to the birth-nakshatra, planet, zodiac, etc. of the child. It is mentioned in Valmiki Ramayana that the naming of four brothers like Shri Ram etc. is mentioned by Maharishi Garg for naming Shri Krishna on the basis of his virtues and religions.
  • There are three bases of nomenclature. First, identify the constellation in which the child is born. Therefore the name should start with the letter assigned to the constellation so that the birth constellation can be known from the name and the astrological horoscope can also be understood. Second, basically, the scientificity of names should be made and thirdly, from the name of his caste name, lineage, gotra etc. it should be known.

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नामकरण संस्कार पूजा


सभी धर्मों में नामकरण संस्कार का विधान है। नामकरण संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में पंचम संस्कार है।  हालांकि सनातन धर्म में इसका विशेष महत्व है। कहा जाता है कि बच्चे के नामकरण से बच्चे के संस्कारों का पता चलता है। यह संस्कार बच्चे में कर्म की प्रवृत्ति को जगाता है। यह संस्कार बालक के जन्म होने के दसवें दिन में कर लेना चाहिये। यदि किसी कारण से दसवें दिन यह संस्कार नहीं किया जाता है, तो तीन महीने या अगले वर्ष इसे करने का प्रावधान है।इसका कारण यह है कि पाराशर स्मृति के अनुसार जन्म के सूतक में ब्राह्मण दस दिन में, क्षत्रिय बारह दिन में, वैश्य पंद्रह दिन में और शूद्र एक मास में शुद्ध होता है। इस दिन पूजा के बाद बच्चे को शहद का स्वाद चखाया जाता है। नक्षत्र या राशियों के अनुसार नाम रखने से लाभ यह है कि इससे जन्मकुंडली बनाने में आसानी रहती है। नाम भी बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण रखना चाहिये।

आयुर्वेडभिवृद्धिश्च सिद्धिर्व्यवहतेस्तथा ।
नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभिः ।।

अर्थात् नामकरण-संस्कार से आयु तथा तेज़ की वृद्धि होती है एवं लौकिक व्यवहार में नाम की प्रसिद्धि से व्यक्ति का अलग अस्तित्तव बनता है।

अतः अशौच बीतने पर ही नामकरण-संस्कार करना चाहिये, क्योंकि नाम के साथ मनुष्य का घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। नाम प्रायः दो होते हैं- एक गुप्त नाम दूसरा प्रचलित नाम।

  • इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर शालीनतापूर्वक मधुर भाषण कर, सूर्यदर्शन कराया जाता है और कामना की जाती है की बच्चा सूर्य की प्रखरता-तेजस्विता धारण करे, इसके साथ ही भूमि को नमन कर देवसंस्कृति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाता है। शिशु का नया नाम लेकर सबके द्वारा उसके चिरंजीवी, धर्मशील, स्वस्थ एवं समृद्ध होने की कामना की जाती है।
  • भारतीय चिंतन के अनुसार आत्मा अजर-अमर है। शरीर नष्ट होता है, कितुं जीवात्मा के संचित संस्कार उसके साथ लगे रहते हैं। बालक किस समय, किस नक्षत्र, राशि आदि में उत्पन्न हुआ, यह सब एक निश्चित विधान के अनुसार होता है। घर का पुरोहित या पंडित बालक के जन्म-नक्षत्र, ग्रह, राशि आदि के अनुसार बालक के नामकरण करता है। वाल्मीकि रामायण में वर्णित है कि श्री राम आदि चार भाइयों का नामकरण महर्षि गर्ग द्वारा श्री कृष्ण का नामकरण उनके गुण-धर्मों के आधार पर करने का उल्लेख है।
  • नामकरण के तीन आधार माने गए हैं। पहला, जिस नक्षत्र में शिशु का जन्म होता है, उस नक्षत्र की पहचान रहे। इसलिए नाम नक्षत्र के लिए नियत अक्षर से शुरू होना चाहिए, ताकि नाम से जन्म नक्षत्र का पता चले और ज्योतिषीय राशिफल भी समझा जा सकें। दूसरा, मूलरुप से नामों की वैज्ञानिकता बनें और तीसरा यह की नाम से उसके जातिनाम, वंश, गौत्र आदि की जानकारी हो जाए।

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