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Incarnations of God जानिए भगवान के 24 अवतारों के बारे में

भगवान के 24 अवतार


Incarnations of God आज हम आपको भगवान के 24 अवतारों के बारे में बताएंगे की किस प्रकार उन्होंने धरती पर अवतार ले कर मानव जीवन का कल्याण किया था –
1-#सनत्कुमार_अवतार- भगवान ने कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार नामक ब्रह्मऋषियों के रूप में अवतार लिया। यह उनका पहला अवतार था। पृथ्वी को रसातल से लाने के लिये भगवान ने वराह के रूप में अवतार लिया तथा हिरण्याक्ष का वध किया।
संका, सानंद, सनातन, सनत्कुमार; ब्रह्मा जी के घोर ताप से प्रसन्न हो उनके चार पुत्रों के रूप में अवतार धारण किया तथा प्रलय काल में लुप्त हुए ज्ञान को पुनः ऋषियों को प्रदान किया.
यह ब्रह्मचर्य का प्रतीक है ,
सब धर्मो मे प्रथम ब्रह्मचर्य आता है ,इसके बिना मन स्थिर नही होता । ब्रह्मचर्य से मन ,बुद्धि , चित्त एवं अहंकार पवित्र होते है ,अंतःकरण शुद्ध होता है!
अतः पहला कदम ब्रह्मचर्य …

2 #वाराह_अवतार अर्थात श्रेष्ठ दिवस कौन सा ? जिस दिन सत्कर्म हो वह दिन श्रेष्ठ . वाराह अवतार संतोष सतयुग में भगवान् विष्णु के तीसरे अवतार वराह का जन्म हुआ था. विष्णु जी का यह अवतार वराह एक सूअर की तरह दिखने वाला अवतार है. सदियों से ये बात सुनते आ रहे है कि जब जब दुनिया में शैतानी ताकत बढ़ती है तो भगवान उनका कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेते है
का प्रतीक है … लोभ को मारकर , प्रभु जिस स्थिति मे रखे उसी मेँ सन्तोष करो ..

3 #नारद_अवतार का तात्पर्य है . ब्रह्मचर्य का पालन करे और प्राप्त स्थिति मे संतोष माने , उसे नारद
अर्थात् भक्ति मिले …..हमारे धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि देवर्षि नारद भगवान विष्णु के ही अवतार है ! जो कि धर्म के प्रचार और प्रसार एवं लोक कल्याण के लिए हमेशा प्रगतिशील रहते हैं !

4.#नरनारायणअवतार_ भक्ति मिले तो उसे भगवान का साक्षात्कार होता है किन्तु ज्ञान वैराग्य बिना भक्ति दृढ नही होती ..नर-नारायण हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु के दशावतार में से एक अवतार था। इस अवतार में विष्णु जी ने नर और नारायण रूप में अवतार लिये थे। इस रूप में बद्रीनाथ तीर्थ में तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने समय समय पर इस धरा पर अवतार लेकर यहा धर्म और सत्य की महिमा को आगे बढाया है | ऐसा ही एक अवतार नर नारायण का हुआ जो धर्म और लोक कल्याण के लिए महान तपस्या में लग गये.

5.#कपिल_अवतार..ज्ञान वैराग्य का ।वैराग्य को जीवन मेँ उतारो …इनको अग्नि का अवतार और ब्रह्मा का मानसपुत्र भी पुराणों में कहा गया है। श्रीमद्भगवत के अनुसार कपिल विष्णु के पंचम अवतार माने गए हैं।
कर्दम ऋषि और देवहूति से इनका जन्म हुआ
कदर्म प्रजापति के पुत्र और भगवान श्री नारायण के पांचवे अवतार ‘कपिल-मुनि’, जिन्होंने प्रलय काल में लुप्त हुए सांख्य शास्त्र तथा आत्म-ज्ञान का उपदेश दिया

6 #दत्तात्रेय का .ब्रह्मचर्य , संतोष ,ज्ञान , भक्ति एवं वैराग्य आप मे होँगे तो गुणातीत होँगे तब आप #अत्रि होँगे तो भगवान आपके यहाँ पधारेगे भगवान दत्तात्रेय,महर्षि अत्रि और उनकी सहधर्मिणी अनुसूया के पुत्र थे।इनके पिता महर्षि अत्रि सप्तऋषियों में से एक है,और माता अनुसूया को सतीत्व के प्रतिमान के रूप में उदधृत किया जाता है। Incarnations of God
भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए। वे कहते थे कि जिस किसी से भी जितना सीखने को मिले, हमें अवश्य ही उन्हें सीखने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। उनके 24 गुरुओं में कबूतर, पृथ्वी, सूर्य, पिंगला, वायु, मृग, समुद्र, पतंगा, हाथी, आकाश, जल, मधुमक्खी, मछली, बालक, कुरर पक्षी, अग्नि, चंद्रमा, कुमारी कन्या, सर्प, तीर (बाण) बनाने वाला, मकडी़, भृंगी, अजगर और भौंरा (भ्रमर) हैं।

7 #यज्ञभगवानअवतार यज्ञ अवतार -भगवान विष्णु के सातवें अवतार का नाम यज्ञ है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान यज्ञ का जन्म स्वायम्भुव मन्वन्तर में हुआ था। स्वायम्भुव मनु की पत्नी शतरूपा के गर्भ से आकूति का जन्म हुआ। वे रूचि प्रजापति की पत्नी हुई। ..

8 #ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर (जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहलाते हैं। ऋषभदेव जी को आदिनाथ भी कहा जाता है.. महाराज नाभि कुमार ऋषभदेव को राज्य देकर वन के लिये विदा हो गये। देवराज इन्द्र को धरा का यह सौभाग्य ईर्ष्या की वस्तु जान पड़ा। अखिलेश की उपस्थिति से पृथ्वी ने स्वर्ग को अपनी सम्पदा से लज्जित कर दिया था।

9 #पृथुराजा वेन के पुत्र थे। भूमण्डल पर सर्वप्रथम सर्वांगीण रूप से राजशासन स्थापित करने के कारण उन्हें पृथ्वी का प्रथम राजा माना गया है। साधुशीलवान् अंग के दुष्ट पुत्र वेन को तंग आकर ऋषियों ने हुंकार-ध्वनि से मार डाला था। राजा पृथु ध्रुव जी के वन गमन के पश्चात आगे चलकर उनके वंश में अंग नामक राजा हुये। राजा अंग बड़े भगवद भक्त थे, उनके वन चले जाने के बाद उनके पुत्र वेन को राजा बनाया गया।…

10 #मत्स्यनारायण का .यह चार क्षत्रियो के लिए जब ज्वार ब्रम्हांड को भस्म करने लगा तब एक विशाल नाव आया, जिस पर सभी चढ़े। मत्स्य भगवान ने उसे सर्पराज वासुकि को डोर बनाकर बाँध लिया और सुमेरु पर्वत की ओर प्रस्थान किया।

11 #कूर्म_अवतार कूर्म अवतार को ‘कच्छप अवतार’ (कछुआ के रूप में अवतार) भी कहते हैं। कूर्म के अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्रमंथन के समय मंदार पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। स प्रकार भगवान विष्णु, मंदर पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एवं असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नों की प्राप्ति की। इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था।…

12 #धन्वतरि_अवतार धन्वतरि को हिन्दू धर्म में क्षत्रिय नाई कुकुल के वंंशज माने जाते है। वे महान चिकित्सक थे जिन्हें देव पद प्राप्त हुआ। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये भगवान विष्णु के अवतार समझे जाते हैं। इनका पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था। शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी[4], चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस को भगवान धन्वंतरी का जन्म धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन इन्होंने आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया था।[5] इन्‍हें भगवान विष्णु का रूप कहते हैं जिनकी चार भुजायें हैं। उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं। इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है। इसीलिये धनतेरस को पीतल आदि के बर्तन खरीदने की परंपरा भी है।[6] इन्‍हे आयुर्वेद की चिकित्सा करनें वाले वैद्य आरोग्य का देवता कहते हैं। इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी। इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने ‘शल्य चिकित्सा’ का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य सुश्रुत बनाये गए थे।[7] सुश्रुत दिवोदास के ही शिष्य और ॠषि विश्वामित्र के पुत्र थे। उन्होंने ही सुश्रुत संहिता लिखी थी। सुश्रुत विश्व के पहले सर्जन (शल्य चिकित्सक) थे। दीपावली के अवसर पर कार्तिक त्रयोदशी-धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं। कहते हैं कि शंकर ने विषपान किया, धन्वंतरि ने अमृत प्रदान किया और इस प्रकार काशी कालजयी नगरी बन गयी।..

13 #मोहिनी_अवतार ..यह तीन वैश्यो के लिए मोहिनी हिन्दू भगवान विष्णु का एकमात्र स्त्री रूप अवतार है। इसमें उन्हें ऐसे स्त्री रूप में दिखाया गया है जो सभी को मोहित कर ले। उसके प्रेम में वशीभूत होकर कोई भी सब भूल जाता है, चाहे वह भगवान शिव ही क्यों न हों। इस अवतार का उल्लेख महाभारत में भी आता है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं व असुरों को सागर से अमृत मिल चुका था, तब देवताओं को यह डर था कि असुर कहीं अमृत पीकर अमर न हो जायें। तब वे भगवान विष्णु के पास गये व प्रार्थना की कि ऐसा होने से रोकें। तब भगवान विष्णु ने मोहिणि अवतार लेकर अमृत देवताओं को पिलाया व असुरों को मोहित कर अमर होने से रोका। …

14 #नरसिंह_अवतार … ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
(हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्ष आत्मसमर्पण करता हूं।)
कश्यप नामक ऋषि एवं उनकी पत्नी दिति को 2 पुत्र हुए जिनमें से एक का नाम ‘हरिण्याक्ष’ तथा दूसरे का ‘हिरण्यकशिपु’ था। हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा हेतु वराह रूप धरकर मार दिया था। अपने भाई की मृत्यु से दुखी और क्रोधित हिरण्यकशिपु ने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अजेय होने का संकल्प किया।
सहस्रों वर्षों तक उसने कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। वरदान प्राप्त करके उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, लोकपालों को मारकर भगा दिया और स्वत: संपूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। देवता निरुपाय हो गए थे। वे असुर हिरण्यकशिपु को किसी प्रकार से पराजित नहीं कर सकते थे।
ब्रह्माजी की हिरण्यकश्यप कठोर तपस्या करता है। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी वरदान देते हैं कि उसे न कोई घर में मार सके न बाहर, न अस्त्र से और न शस्त्र से, न दिन में मरे न रात में, न मनुष्य से मरे न पशु से, न आकाश में न पृथ्वी में।
इस वरदान के बाद हिरण्यकश्यप ने प्रभु भक्तों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, लेकिन भक्त प्रहलाद के जन्म के बाद हिरण्यकश्यप उसकी भक्ति से भयभीत हो जाता है, उसे मृत्युलोक पहुंचाने के लिए प्रयास करता है। इसके बाद भगवान विष्णु भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लेते हैं और हिरण्यकश्यप का वध कर देते हैं। प्रह्लाद जैसी दृष्टि से देखेगे तो स्तम्भ मेँ भी भगवान के दर्शन होगे!

15 #वामन_भगवान .. हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से पाँचवें अवतार हैं जो भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को अवतरित हुए। पूर्ण निष्काम .जिसके ऊपर भक्ति का ,नीति का, का छत्र है जिसने धर्म का कवच
पहना है, एक बार वामन भगवान राजा बलि से पृथ्वी मांगने गए। Incarnations of God
वामन भगवान ने तीन पग में ही तीनों लोक नाप लिए। इसके बाद बलि ने वामन भगवान से वरदान मांगा कि आप मेरे द्वारपाल बन जाओ। वामन भगवान बहुत दिनों तक राजा बलि के द्वारपाल बने रहे। तब मां लक्ष्मी स्वयं राजा बलि के यहां वामन भगवान को लेने आई। मां लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधी। ऐसा माना जाता है कि रक्षाबंधन पर्व तभी से मनाया जाता है। मानव जीवन में त्याग जरूरी है। त्याग के बिना मानव जीवन अधूरा है। मनुष्यों को दूसरों की सहायता में सदा तैयार रहना चाहिए। यह तभी संभव होगा जब मनुष्य के हृदय में त्याग जागृत होगा। महापुरुषों का जीवन सदा त्याग से परिपूर्ण रहा है। इसलिए हम सभी को चाहिए कि उन्हें अपना आदर्श मानकर मान सम्मान, पूजन, वंदन करे। इस संसार में त्यागी व्यक्ति का यश चारों ओर फैलता है। व्यक्ति को चाहिए कि वह सामाजिक और धार्मिक कार्यों में सभी प्रकार से सहयोग करें। उसे भगवान भी नही मार सके हैँ,राजा बलि की तरह …

16 #परशुराम_आवेशावतार ॐ जामदग्न्याय विदमहे महावीराय धीमही । तन्नो परशुराम: प्रचोदयात”
भगवान विष्णु के आवेशावतार है भगवान परशुराम । स्‍वंय भगवान श्री राम ने उनकी स्‍तुति करते कहा कि मै तो सिर्फ ’’राम ‘’ हूं आप ‘’ परशुराम ‘’ है । वे ब्राह्मण के रूप में जन्में लेकिन कर्म से क्षत्रिय है । पितृ भक्ति , मातृ भक्ति और भातृ प्रेम का अद्भुत उदाहरण है, परशुराम जी का जीवन । पितृ आज्ञा से माता का शरविच्‍छेदन करने में भी नही हिचकिचाए थे । पिता की हत्‍या के बदले स्‍वरूप ही हैहय-क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार किया ।
शिवजी से उन्हें विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु , कृष्‍ण का त्रैलोक्यविजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मंत्र कल्पतरू भी प्राप्त हुए।
उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ कर सप्तद्वीपयुक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी थी ।
कलयुग मे कल्‍की अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर शस्त्रविद्या प्रदान करना शेष है ।
अमरत्‍व प्राप्‍त है परशुराम जी को सृष्टि प्रलय तक रहेगे वो धरा पर ।।
भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा संपन्न पुत्रेष्टि-यज्ञ से प्रसन्न देवराज इंद्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को विश्ववंद्य महाबाहु परशुरामजी का जन्म हुआ। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार है। पितामह भृगु द्वारा संपन्न नामकरण-संस्कार के अनन्तर राम, किंतु जमदग्निका पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किए रहने के कारण परशुराम कहलाते है । शिवजी से उन्हें श्री कृष्‍ण का त्रैलोक्यविजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मंत्र कल्पतरू भी प्राप्त हुए।
वे शस्त्रविद्या के महान गुरु है । उन्होंने पितामह भीष्‍म , गुरूदेव द्रोणाचार्य और महारथी कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। कलयुग मे कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर शस्त्रविद्या प्रदान करना अभी उनके लिए बाकी है।वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय है । उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है। भगवान परशुराम ने अश्वमेघ महायज्ञ कर सप्तद्वीपयुक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी और इंद्र के समक्ष शस्त्र त्यागकर सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेंद्र पर आश्रम बनाकर रहने लगे।
ॐ जम्दग्नाय विदमहे महावीराय धी महि तन्नो परशुरामः प्रचोदयात ! … Incarnations of God

17 #व्यासनारायणका_ज्ञानावतार ,.. ज्ञानावतार में भगवान ने सभी मनुष्य को ज्ञान दिया की जीवन में सभी का भला करना चाहिए अर्थात कर भला सो हो भला

18 #श्रीरामका_मर्यादावतार .. राम जी के काम में काही का विराम है,
जिन्दा रहे तो जगजीवन राम है,
मर भी गए तो रहने को स्वर्ग धाम है,
हमको तो काम बस राम जी के नाम से,
“जय जय श्री राम”
की तरह मर्यादा का पालन करने से कन्हैया मिलेगा ….

19 #बलराम_अवतार संक्षिप्त परिचय बलराम अन्य नाम दाऊ, संकर्षण, बलभद्र अवतार शेषनाग वंश-गोत्र वृष्णि वंश (चंद्रवंश) कुल यदुकुल पिता वसुदेव माता रोहिणी पालक पिता नन्दबाबा जन्म विवरण देवकी के सातवें गर्भ में भगवान बलराम पधारे थे। योगमाया ने उन्हें संकर्षित करके नन्द के यहाँ निवास कर रही रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया था। समय-काल महाभारत काल परिजन देवकी, रोहिणी, श्रीकृष्ण, सुभद्रा (बहन) गुरु संदीपन विवाह रेवती (पत्नी) विद्या पारंगत गदा युद्ध में पारंगत प्रसिद्ध मंदिर दाऊजी मन्दिर, मथुरा अस्त्र-शस्त्र गदा संदर्भ ग्रंथ महाभारत, भागवत अन्य जानकारी यदुवंश के उपसंहार के बाद शेषावतार बलराम ने समुद्र तट पर आसन लगाकर अपनी लीला का संवरण किया। बलराम ‘नारायणीयोपाख्यान’ में वर्णित व्यूहसिद्धान्त के अनुसार विष्णु के चार रूपों में दूसरा रूप ‘संकर्षण'[1] है। संकर्षण बलराम का अन्य नाम है, जो कृष्ण के भाई थे। सामान्यतया बलराम शेषनाग के अवतार माने जाते हैं और कहीं-कहीं विष्णु के अवतारों में भी इनकी गणना है। जब कंस ने देवकी-वसुदेव के छ: पुत्रों को मार डाला, तब देवकी के गर्भ में भगवान बलराम पधारे। योगमाया ने उन्हें आकर्षित करके नन्द बाबा के यहाँ निवास कर रही श्री रोहिणी जी के गर्भ में पहुँचा दिया। इसलिये उनका एक नाम संकर्षण पड़ा। संकर्षण के बाद प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध का नाम आता हे जो क्रमश: मनस् एवं अहंकार के प्रतीक तथा कृष्ण के पुत्र एवं पौत्र हैं। ये सभी देवता के रूप में पूजे जाते हैं। इन सबके आधार पर चतुर्व्यूह सिद्धान्त की रचना हुई है। कृष्ण-बलराम, देवकी-वसुदेव से मिलते हुए, द्वारा- राजा रवि वर्मा जगन्नाथजी की त्रिमूर्ति में कृष्ण, सुभद्रा ता बलराम तीनों साथ विराजमान हैं। इससे भी बलराम की पूजा का प्रसार व्यापक क्षेत्र में प्रमाणित होता है। बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है। बलराम जी साक्षात शेषावतार थे। बलराम जी बचपन से ही अत्यन्त गंभीर और शान्त थे। श्री कृष्ण उनका विशेष सम्मान करते थे। बलराम जी भी श्रीकृष्ण की इच्छा का सदैव ध्यान रखते थे। ब्रजलीला में शंखचूड़ का वध करके श्रीकृष्ण ने उसका शिरोरत्न बलराम भैया को उपहार स्वरूप प्रदान किया। कंस की मल्लशाला में श्रीकृष्ण ने चाणूर को पछाड़ा तो मुष्टिक बलरामजी के मुष्टिक प्रहार से स्वर्ग सिधारा। जरासन्ध को बलराम जी ही अपने योग्य प्रतिद्वन्द्वी जान पड़े। यदि श्रीकृष्ण ने मना न किया होता तो बलराम जी प्रथम आक्रमण में ही उसे यमलोक भेज देते। बलराम जी का विवाह रेवती से हुआ था। महाभारत युद्ध में बलराम तटस्थ होकर तीर्थयात्रा के लिये चले गये। यदुवंश के उपसंहार के बाद उन्होंने समुद्र तट पर आसन लगाकर अपनी लीला का संवरण किया। श्रीमद्भागवत की कथाएँ शेषावतार बलरामजी के शौर्य की सुन्दर साक्षी हैं। … Incarnations of God

20 #कृष्णावतार ..प्रत्येक भारतीय भागवत पुराण में लिखित ‘श्रीकृष्णावतार की कथा’ से परिचित हैं। श्रीकृष्ण की बाल्याकाल की शरारतें जैसे – माखन व दही चुराना, चरवाहों व ग्वालिनियों से उनकी नोंक–झोंक, तरह – तरह के खेल, इन्द्र के विरुद्ध उनका हठ (जिसमें वे गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठा लेते हैं, ताकि गोकुलवासी अति वर्षा से बच सकें), सर्वाधिक विषैले कालिया नाग से युद्ध व उसके हज़ार फनों पर नृत्य, उनकी लुभा लेने वाली बाँसुरी का स्वर, कंस द्वारा भेजे गए गुप्तचरों का विनाश – ये सभी प्रसंग भावना प्रधान व अत्यन्त रोचक हैं।
राम और कृष्ण एक है
मनुष्य दिन के बारह बजे भूख के कारण भान भूलता है.. रात को निवृत्ति मे काम सुख याद आता है …
…अतः प्रातः राम एवं शाम को कृष्ण का स्मरण करो … Incarnations of God

21 #हरि_अवतार .. धर्म ग्रंथों के अनुसार प्राचीन समय में त्रिकूट नामक पर्वत की तराई में एक शक्तिशाली गजेंद्र अपनी हथिनियों के साथ रहता था। एक बार वह अपनी हथिनियों के साथ तालाब में स्नान करने गया। वहां एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और पानी के अंदर खींचने लगा। गजेंद्र और मगरमच्छ का संघर्ष एक हजार साल तक चलता रहा। अंत में गजेंद्र शिथिल पड़ गया और उसने भगवान श्रीहरि का ध्यान किया। गजेंद्र की स्तुति सुनकर भगवान श्रीहरि प्रकट हुए और उन्होंने अपने चक्र से मगरमच्छ का वध कर दिया। भगवान श्रीहरि ने गजेंद्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया।

22 #हयग्रीवातार …धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार मधु और कैटभ नाम के दो शक्तिशाली राक्षस ब्रह्माजी से वेदों का हरण कर रसातल में पहुंच गए। वेदों का हरण हो जाने से ब्रह्माजी बहुत दु:खी हुए और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु की गर्दन और मुख घोड़े के समान थी। तब भगवान हयग्रीव रसातल में पहुंचे और मधु-कैटभ का वध कर वेद पुन: भगवान ब्रह्मा को दे दिए।

23 #बुद्धावतार . बुद्धावतार भगवान् विष्णु के दश अवतारों में ९वाँ अवतार और चौबीस अवतारों में से तेईसवें अवतार माने गए हैं। आधुनिक मान्यतानुसार गौतम बुद्ध को ही बुद्धावतार माना जाता है परन्तु पुराणों के विस्तृत अध्ययन से ज्ञात होता है कि गौतम तथा बुद्ध दोनो भिन्न व्यक्ति थे। जैसे भागवत स्कन्ध १ अध्याय ६ के श्लोक २४ में –

ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्। बुद्धोनाम्नाजनसुतः कीकटेषु भविष्यति॥
अर्थात्, कलयुग में देवद्वेषियों को मोहित करने नारायण कीकट प्रदेश (बिहार या उड़ीसा) में अजन के पुत्र के रूप में प्रकट होंगे।[1] जबकि गौतम का जन्म वर्तमान नेपाल में राजा शुद्धोदन के घर हुआ था। हंसावतार भी कुछ विद्वान मानते है ..

24 👉अभी होना है #कल्कि_अवतार… कल्कि पुराण हिन्दुओं के विभिन्न धार्मिक एवं पौराणिक ग्रंथों में से एक हैं यह एक उपपुराण है। इस पुराण में भगवान विष्णु के दसवें तथा अन्तिम अवतार की भविष्यवाणी की गयी है और कहा गया है कि विष्णु का अगला अवतार (महा अवतार) “कल्कि अवतार होगा। इसके अनुसार ४,३२० वीं शती में कलियुग का अन्त के समय कल्कि अवतार लेंगें।
इस पुराण में प्रथम मार्कण्डेय जी और शुक्रदेव जी के संवाद का वर्णन है। कलयुग का प्रारम्भ हो चुका है जिसके कारण पृथ्वी देवताओं के साथ, विष्णु के सम्मुख जाकर उनसे अवतार की बात कहत है। भगवान विष्णु के अंश रूप में ही सम्भल गांव में कल्कि भगवान का जन्म होता है। उसके आगे कल्कि भगवान की दैवीय गतिविधियों का सुन्दर वर्णन मन को बहुत सुन्दर अनुभव कराता है।

भगवान् कल्कि विवाह के उद्देश्य से सिंहल द्वीप जाते हैं। वहां जलक्रीड़ा के दौरान राजकुमारी पद्यावती से परिचय होता है। देवी पद्यिनी का विवाह कल्कि भगवान के साथ ही होगा। अन्य कोई भी उसका पात्र नहीं होगा। प्रयास करने पर वह स्त्री रूप में परिणत हो जाएगा। अंत में कल्कि व पद्यिनी का विवाह सम्पन्न हुआ और विवाह के पश्चात् स्त्रीत्व को प्राप्त हुए राजगण पुन: पूर्व रूप में लौट आए। कल्कि भगवान पद्यिनी को साथ लेकर सम्भल गांव में लौट आए। विश्वकर्मा के द्वारा उसका अलौकिक तथा दिव्य नगरी के रूप में निर्माण हुआ।

हरिद्वार में कल्कि जी ने मुनियों से मिलकर सूर्यवंश का और भगवान राम का चरित्र वर्णन किया। बाद में शशिध्वज का कल्कि से युद्ध और उन्हें अपने घर ले जाने का वर्णन है, जहां वह अपनी प्राणप्रिय पुत्री रमा का विवाह कल्कि भगवान से करते हैं।

उसके बाद इसमें नारद जी, आगमन् विष्णुयश का नारद जी से मोक्ष विषयक प्रश्न, रुक्मिणी व्रत का प्रसंग और अंत में लोक में सतयुग की स्थापना के प्रसंग को वर्णित किया गया है। वह शुकदेव जी की कथा का गान करते हैं। अंत में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और शर्मिष्ठा की कथा है। इस पुराण में मुनियों द्वारा कथित श्री भगवती गंगा स्तव का वर्णन भी किया गया है। पांच लक्षणों से युक्त यह पुराण संसार को आनन्द प्रदान करने वाला है। इसमें साक्षात् विष्णु स्वरूप भगवान कल्कि के अत्यन्त अद्भुत क्रियाकलापों का सुन्दर व प्रभावपूर्ण चित्रण है। जो कल्कि पुराण का अध्ययन व पठन करते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं॥ जय कल्कि महाराज


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Grah Dosh कुंडली में ग्रह दोष

Grah Dosh कुंडली में ग्रह दोष


Grah Dosh हम हमारे आस पास गली मोहले ,परिवार ,समाज आदि मेदेखने में आता है कि कोई व्यक्ति किसी घर में रहने जाता है तो देखते है की यकायक ही वह दिन दुगनी और रत चोगुनी तरक्की करता है तथा ज्ञान का तेजी से होता है | घर के सभी लोग बहुत उन्नति करते है | सब कार्य बहुत ही अच्छे से सम्पन्न होते है घर में शुभकार्य होते है | तथा कई बार इसके विपरीत परिणाम भी प्राप्त होते ही जेसे कोई व्यक्ति किसी घर में प्रवेश करता है तोह सब कुछ गलत ही होता है , धंधा बंद हो जाता है , नोकरी छुट जाती है ,       प्रवति बदलकर पिशाचिक परवर्ती हो जाती है या कई साल बिस्तर पैर पड़े रहना पड़ता है , कितनी भी धन कमाये लेकिन खर्चा अधिक ही होता है | यानि आमदनी अठ्नी और खर्चा रूपया की स्थति बनी रहती है ,दुर्घटना से घर के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाति है | एसी स्थति का विचार करने पर पाया जाता है की पूर्व में उस घर में रहने वाला मालिक निसंतान मरा हो या उस घर में पूर्व में कोई मर्डर या आत्म हत्या या किसी व्यक्ति की जलने से मृत्यु या उस घर में किसी ब्राह्मण की हत्या हो रखी हो | उस मरने वाले व्यक्ति की दुखी आत्मा के फलस्वरूप उस घर में सुख का अनुभव नही होता है | तो ऐसे व्यक्ति की कुंडली में निम्न योग मिलते है जिनमे लग्न के चतुर्थ भाव में रहू या शनि बेठा होगा या कुंडली में चंद्रमा के चतुर्थ भाव में रहू या शनि बेठा  होगा | तो यह स्थति देखने को मिलती है | Grah Dosh

उपाय :- ऐसे घर में रहने वाले व्यक्ति को सूर्य उपासना करनी चाहिए  तथा उस घर में जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई हो उसकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध , दर्पण , ब्राह्मण भोजन तथा धर्म कार्य करने चाहिए | ग्रह शांति , वास्तु दोष नाशक यंत्र चोकी घर के पानी के स्थान पर स्थापित करे | घर में तुलसी का पोधा लगाये और सैम के समय उसके पास एक दीपक अवश्य जलाये |Grah Dosh

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Shiv Pooja

Shiv Pooja & Abhishek शिव पूजा एवं अभिषेक

शिव पूजा एवं अभिषेक


1) भगवान शिव पर कभी भी तुलसी नही चढ़ानी चाहिए क्योंकि तुलसी भगवान विष्णु की भार्या है अतः तुलसी शैलिग्राम पर यानि विष्णु भगवान को चढ़ानी चाहिए | भगवान शिव के भोग में भी तुलसी का उपयोग नही करना चाहिए | Shiv Pooja 

2) भगवान शिव का अभिषेक कभी भी शंख में जल भरकर नही रखना चाहिए | भगवान शिव ने शंखचुर नामक राक्षस का वध किया था | विष्णु भगवान की पूजा आराधना में शंख का उपयोग किया जाना शुभ माना जाता है |

3) भगवान शिव की पूजा आराधना में कुमकुम का उपयोग नही करना चाहिए | भगवान शिव वैरागी है, शमशान वासी है | नर मुंड की माला व भस्म ही उनका श्रृंगार है | शिव जी पर कुमकुम, हल्दी का उपयोग नही करना चाहिए | कनेर, केतकी के पुष्प नही चढाने चाहिए | Shiv Pooja

4) शिव जी पर कभी भी काले तिल नही चढाने चाहिए ऐसा माना जाता है की तिल भगवान विष्णु के शरीर के मेल से बने हुए है अतः भगवान शिव पर इनको नहीं चढ़ाना चाइये

 :- भगवान शिव पर हमे क्या चढ़ाना चाहिए :-

  1. भगवान शिव पर चावल चढाने चाहिए | चावल चढाने से घर में धन की वृद्धि होती है |
  2. भगवान शिव पर चन्दन का लेप करना चाहिए | जिससे मान समान मिलता है |
  3. गेंहू चढाये | जिससे आपको संतान की प्राप्ति होगी |
  4. भगवान शिव पर जलधारा चढाने से संतान की प्राप्ति होती है और भगवन सूर्य की कृपा हम पर बनी रहती है |
  5. भगवान शिव को घी अवश्य चढ़ाए | जिससे शाररिक बल मिलता है |
  6. भगवान शिव को गन्ने का रस अर्पित करना चाहिए | जिससे सुख में और धन धान्य में वृद्धि होगी |
  7. भगवान शिव को इत्र चढाने से मन में शुद्धता आती है |
  8. भगवान शिव को शहद चढाने से पारिवारिक सुख में वृद्धि होगी |
  9. भगवान शिव को गंगाजल चढाने से मोक्ष की प्राप्ति होगी |
  10. भगवान शिव को शक्कर मिश्रित दूध चढ़ाये जिसे सुख समृद्धि मैं वृद्धि होगी |
  11. भगवान शिव को दही चढाने से धन धान्य मैं वृद्धि होगी |
  12. भगवान शिव को दूध चढाने से पुत्र प्राप्ति होती है |

 :- भगवान शिव पर हमे कोनसे फुल अर्पित करने चाहिए :-

  1. भगवान शिव पर लाल सफ़ेद आक के फुल चढाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है |
  2. भगवान शिव पर चमेली के फुल चढाने से वाहन सुख प्राप्ति होती है |
  3. भगवान शिव पर हरी दुब चढाने से आयु में वृद्धि होगी |
  4. भगवान शिव को केसर चढाने से क्रोध पर नियंत्रण होता है |

भगवान शिव पर या(विजया) भांग चढाने से राहु और केतु की समस्या से शांति प्राप्त होती है यानि राहु और केतु के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है | Shiv Pooja

 

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Maha Shivratri

Maha Shivratri 2019 राशि अनुसार महा शिवरात्रि

महा शिवरात्रि 


 Maha Shivratri महा शिवरात्रि को फाल्गुन मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है | इस साल यह 4 मार्च को है, सोमवार को है | पूजा 4 मार्च को 12 :07 से 12 : 57 तक 5 मार्च को 06 : 46 से 03 : 26 तक रहेगा | इस बार विशेष महत्व है शिवरात्रि का क्योंकि सोमवार को महाशिवरात्रि है | महा शिवरात्रि वेसे तो हर माह चतुर्दशी तिथि प्रारंभ 4 मार्च को 4:28 मिनट से 5 मार्च मंगलवार 07:07 मिनट तक रहेगी |

मेष राशी के स्वामी भगवान हनुमान जी है | इस राशी के लिए लाल रंग शुभ माना जाता है अतः शिवलिंग पर जलाभिषेक के  बाद अबीर और गुलाल अवश्य चढाये | Maha Shivratri

वृषभ राशी के स्वामी शुक्र और भगवान शिव का वाहन वृषभ यानि बेल  है इनके लिए सफेद रंग शुभ माना गया है अतः आप दही से भगवान शिव का अभिषेक करे | 

मिथुन राशि  का स्वामी बुध है और इस राशि के लिए  हरा रंग शुभ है | अतः आप भगवान शिव पर जलाभिषेक के पश्चात् शिवलिंग पर हरी दूर्वा, बेलपत्र एवं फल के रूप में बैर चढ़ाए |

कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा है जिनको भगवान शिव ने अपनी जटाओ में विराजित करा हुआ है | इस राशि के जातको को भगवान  शिव पर दूध से अभिषेक करना चाहिए जिससे आपको मानशिक शांति प्राप्त होगी|

सिंह राशि का स्वामी सूर्य है जिसका शुभ रंग लाल है अतः आप जलाभिषेक के पश्चात लाल पुष्प भगवान शिव पर अवश्य चढ़ाए,   जिससे आपको नोकरी में उन्नति व तरक्की प्राप्त होगी |

कन्या राशि का स्वामी बुध है इस राशि के लिए हरा रंग शुभ माना गया है | अतः आप भांग शिव पर अर्पित करे जिससे आपको जीवन में पूर्ण सुख प्राप्त होगा | आपको जीवन में सोभाग्य प्राप्त होगा |

तुला राशि का स्वामी शुक्र है इस राशि के जातको को भगवान शिव पर पंचामृत यानि ( दूध ,दही , घी , शहद,शकर ) से अभिषेक करे | जिससे आपको धन की देवी लक्ष्मी का वैभव प्राप्त होगा |

वृश्चिक राशी के स्वामी बजरंग बलि है इनका शुभ रंग लाल है इस राशि के जातको को गिलोय की बूटी के रसअभिषेक करना चाहिए एवं लाल रंग की वस्तुए भगवान शिव पर अर्पित करनी चाहिए | Maha Shivratri

धनु राशि के स्वामी भगवान देवगुरु ब्रहस्पति है | इस राशि के जातको के लिए पीला रंग शुभ माना गया है | इस राशि के जातको को कच्चे दूध में केशर मिलाकर शिव जी पर अर्पित करना चाहिए जिससे आपको शिक्षा एवं व्यापर में आ रही बाधाओं से छुटकारा मिलेगा |

मकर राशि के स्वामी शनि भगवान है | इस राशि के जातको को गन्ने के रस से शिव जी का अभिषेक करना चाहिए | जिससे शनि देव की कृपा आप बनी रहेगी

कुम्भ राशि के स्वामी भगवान शनि है इस राशि के जातको को भगवान शिव पर सरसों के तेल से अभिषेक करना चाहिए | जिसे आप निरोगी रहेंगे और बड़ी से बड़ी बीमारी से निजात पा सकेंगे |

मीन राशि के स्वामी भगवान देवगुरु ब्रहस्पति है | इस राशि के जातको को भगवान शिव पर शहद से अभिषेक करना चाहिए | जिससे आपके धन में वृद्धि होगी और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होगी | Maha Shivratri

 

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guru vichar

Guru Vichar गुरु विचार

गुरु विचार


Guru Vichar गुरु गृह विहानो का प्रीतिक है समाज में शिक्षक, प्राघ्यापक ,     प्रवचनकार , साधू सन्यासीयो पर गुरु का प्रभाव अधिक होता है | गुरु का अर्थ है गु = अज्ञान रु = नाशक  यानि अज्ञान का नाशक | अज्ञानरूप , अंधकार ,अज्ञानता गुरु के उपदेश से या उनके सनिह्य से ज्ञानरूपता यानि प्रकाश में विलिन हो जाता है  यानि के अज्ञान की समाप्ति और ज्ञान की प्राप्ति गुरु के बिना संभव ही नही है ज्ञान के स्वामित्व के कारण ही गुरु को दोनों का मंत्री कहा गया है | गुरु का  वूर्ण पिल्ला गोरा है | गुरु के अधिकार के व्यक्ति धन संपदा का संचय नही करते तथा न ही उसकी फ़िक्र करते है | कांसे धातु पर गुरु का अधिकार माना गया है | गुरु को ईशान कोण का अधिपत्य है | गुरु के अधिपत्य वाले व्यक्तियों का शरीर मोटा सुद्रढ़ वूर्ण पिला गोरा होता है | कुंडली में गुरु बलवान हो तो व्यक्ति विहान ,बुद्धिमान,लेखक , व्यवहार से उदाजित , दुसरो की परवाह न करने वाला खुद तकलीफ सहकर भी दुसरो की तकनीकी दूर करने वाला होता है | सामाजिक कार्यो में ध्यान देने वाला होता है |कानून का जानकर व अगिनत भाषाओ को जानने वाला होता है | रुपया , पैसा , कपडे , खाने -पिने के मामले में बेफिक्र होते है | गुरु अगर 1,3,5,7,9,11, में हो तो गुरु से ही खुद का व्यवसाय करता है | कुंडली में गुरु अगर स्त्री राशी 2,4,6,8,10,12,में हो तो गुरु में नोकरी करता है लेकिन बाद में स्वयं का व्यापर करता है | किन्तु दशम स्थान का गुर जीवनभर नोकरी ही करता है | guru vichar

सामान्यत : मेष , मिथुन , सिंह , धनु , और मीन राशियो में गुरु उतम फल देता है | तुला , वृश्चिक , मकर व कुम्भ में मध्यम फल मिलता है तथा वृषभ , कन्या और कर्क में अशुभ फल मिलता है | गुरु धनु और मीन राशी का स्वामी है |

गुर के सूर्य , चंद्र , मंगल मित्र है , बुध , शुक्र शत्रु है | गुरु की 5,7,9 हिन्ट होती है | अंक 3 का स्वामी गुरु है |गुरु मुख्य रूप से ज्ञान , शुख , धन व अनुशासन का अधिष्ठता  है | गुरु के प्रभाव वश व्यक्ति अनुशासन में रहता है व दुसरो से भी अपेक्षा रखता है | मह्त्वकंसी होते है | सामाजिक राजनेतिक ,धार्मिक तथा अघ्ययन में विशेष हानि होती है | अशुभ गुर के प्रभाववश वाले कवी धनाभाव , संतान पीड़ा , अज्ञानता , अनेतिकता तथा अनुशासनहीनता के कारण व्यक्ति कष्ट पाता  है| अशुभ गुरु के प्रभाववश कफ ,जिगर के रोग , जलोदर , पाचन क्रिया के रोग तथा वसा यानि fat से उत्पन रोग होने के chance ज्यादा होते है | guru vichar

Guru Vichar ( गुरु की महादशा )

गुरु की महादशा 16 साल की होती है | गुरु जब चंद्रमा से दुसरे, पाचवे , सातवे , नवमे व ग्यार्वे भाव में भ्रमण करता है तो भ्रम परिणाम देता है अगर कोई किसी गुरु गृह के दोष से पीड़ित है अथवा गुरु की महादशा से गुजर रहा हो तो एसे जातक विष्णु भगवन की पूजा आराधना करनी चाहिए , पीपल की पूजा करे , गुरु यंत्र पेंडेंट धारण करे |  5 मुखी रुद्राक्ष धारण करे , पिली वस्तुओ का दान करे , पुखराज धारण करे | भोजन में केसर का प्रयोग करे | नाभि पर केसर लगये केसर का तिलक करे | मंदिर में सेवा करे , श्री यन्त्र की पूजा करे , केले का व्रक्ष लगाये | guru vichar

 

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Taurus Vrishabh rashiphal

वृषभ राशिफल

 

जिनके नामाक्षर इ ,उ ,ए ,ओ ,वा , वी , वि , वू ,वे ,वो से नाम प्रारम्भ होता हो उनकी राशि वृषभ होती  है | इस राशि के नक्षत्र कृतिका , रोहिणी और मृगशिरा होते है | वृषभ राशि के जातको के लिए यह वर्ष औसत रहेगा | अर्थात आपको मेहनत के जितना ही फल मिलेगा  स्वास्थय का भी विशेष ख्याल रखना पड़ेगा | पारिवारिक दृष्टि से भी यह वर्ष उतार चढ़ाव वाला रहेगा पर आप अपनी सूझ बुझ से पारिवारिक मामलो को सुलझा लेंगे | जीवन साथी से पूरा सहयोग प्राप्त होगा | शिक्षा की दृष्टि से  विद्यार्थियों के लिए अनुकूल रहेगा | शिक्षा में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे |

 

आर्थिक स्थिति  

यह वर्ष आर्थिक दृष्टि से अच्छा जाने वाला है | साल की शुरुआत में आपके किये गए निवेश का आपको फायदा मिलेगा | कोई इनाम भी आप  प्राप्त कर सकते है परन्तु लाभ के साथ साथ आपको अपने खर्च पर भी नियंत्रण करना जरुरी है वहीं आर्थिक स्थिति मजबूत होने की अपेक्षा डामाडोल भी हो सकती है | साल के मध्य में आर्थिक स्थिति और  मजबूत होगी | आपको व्यापार या नौकरी में बड़ा लाभ मिल सकता है | इस साल आप बड़ी प्रोपर्टी या लग्ज़री वस्तुए खरीद सकते है | साल के अंतिम व्यापार में और शेयर बाजार में निवेश में सावधानी बरतें अन्यथा नुकसान  हो सकता है | इस समय कहीं से अटका हुआ धन यानि उधार दिया हुआ पैसा आपको वापस मिल सकता है |

 

करियर और शिक्षा की दृष्टि से  

यह वर्ष करियर की दृष्टि से उतार चढ़ाव वाला रहेगा | करियर में आपको वर्ष के प्राम्भ में अत्यधिक मेहनत  करनी पड़ेगी | परन्तु उसके सकारात्मक परिणाम के लिए आपको इंतज़ार करना पड़ सकता है परन्तु आपको वर्ष के प्रारम्भ में लाभ प्राप्त होगा | साल के मध्य में आपको आकस्मिक लाभ प्राप्त होगा | करियर में भी आपको उचित सफलता मिलेगी | आपको अपने कार्यक्षेत्र में उच्च पदाधिकारी (सीनियर्स) का पूरा सहयोग मिलेगा | नौकरी पेशा व्यक्तियों  के अंत में प्रमोशन भी मिल सकता है व्यापार में कोई भी निर्णय उस पर पूर्ण विचार करें | अन्यथा साल के अंतिम महीनो में जल्दबाजी का दुष्परिणाम भुगतना पद सकता है | विद्यार्थियों लिएयह वर्ष शुभ फलदायक रहेगा | इंजीनियरिंग और वाणिज्य से जुड़े छात्रों को अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे | साल के मध्य में छात्रों को सकारात्मक परिणाम मिलेंगे | किन्तु साल के अंतिम चरण में विशेष मेहनत की आवश्यकता रहेगी | कुल मिलाकर विद्यार्थियों के लिए यह वर्ष बहुत सकारात्मक परिणाम देने वाला साबित होगा |

 

पारिवारिक स्थिति 

पारिवारिक दृष्टि से यह वर्ष बहुत अच्छा जायेगा | आपको अपने पारिवारिक सदस्यो का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा साल की शुरुआत में आपके पारिवारिक सदस्यों के बिच कुछ मनमुटाव हो सकता है  मनमुटाव ज्यादा समय तक नहीं रहेगा | साल के मध्य में आपकी और आपकी सन्तान के मध्य संबंध और अधिक मजबूत होंगे | इस समय संतान संबंधी कोई शुभ समाचार भी आपको प्राप्त होंगे | माता -पिता के स्वास्थ्य का पूरा ख्याल रखें | आप वर्ष के अंत  धार्मिक यात्रा पर जा सकते है पारिवारिक मामलो में भी कोर्ट – कचहरी के विवादो में आपको सफलता प्राप्त हो सकती है परन्तु पारिवारिक एकता इस समय आवश्यक है | परिवार में व्यर्थ की बहस करने से बचे अपने गुस्से को कंट्रोल करें |

 

प्रेम प्रसंग एवं वैवाहिक जीवन 

इस साल आपको अपने पार्टनर का भरपूर सहयोग प्राप्त होगा | यदि आप  किसी से प्रेम करते है तो आपको उसका भरपूर सहयोग मिलेगा | वर्ष के शुरुआत में आपके जीवन साथी के साथ संबंध अच्छे होंगे | परन्तु वाद – विवाद की स्थिति को टालने का प्रयास करें वरना मतभेद उत्पन्न हो सकते है | साल के मध्य में यदि कोई मतभेद हो भी गए हो है तो वह दूर हो जायेंगे |  साल के अंत तक आपके और आपके पार्टनर के बीच रिश्ता और अधिक मजबूत होगा | आप दोनों एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करेंगे | एक बात का विशेष ध्यान रखिये की आपके और आपके पार्टनर के मध्य कोई तीसरा हस्तक्षेप न करें | अन्यथा गलतफहमियाँ बढ़ सकती है | अपने पार्टनर के स्वास्थ्य का भी ख्याल रखें , पर आपके सहयोग से स्वास्थ्य संबंधी  समस्या भी जल्द ही दूर हो जाएगी |

 

स्वास्थ्य की  दृष्टि से  

स्वास्थ्य की दृष्टि से यह वर्ष मिले -जुले परिणाम देने वाला रहेगा | इस वर्ष के प्रारम्भ में आपका स्वास्थ्य अनुकूल बना रहेगा |  इस समय आप अपनी फिटनेस पर बहुत ध्यान परन्तु साल के मध्य में कार्यक्षेत्र में व्यस्तता के कारन स्वास्थ्य भी प्रभावित होगा | इस समय आपको  बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है | बाहर के खाने (स्ट्रीट फ़ूड ) से परहेज़ करना आवश्यक है | साल के अंत में जीवन साथी के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखें | वरना छोटी सी बीमारी विकराल  ले सकती है | आपके प्यार और देखभाल से उन्हें जल्द ही स्वास्थ्य लाभ मिलेगा | उदर संबंधी बीमारियो और मांस पेशियों संबंधित बीमारियों के प्रति सजग रहें |

 

वृषभ के उपाय 

1 – “ॐ द्रां द्रीं द्रों स :शुक्राय नम : ” का जाप करें |

2 – सफेद वास्तुओं का इस्तेमाल अधिक करे | सफेद वस्त्र , पहने जेब में सफेद रुमाल रखें , दूध , खीर , साबूदाना का खाने     में इतेमाल करें |

3 – चांदी का संग्रह करे | चांदी की दुर्गा माँ या अन्य देवी -देवताओं की मूर्तियां  पूजा कक्ष में पुष्य नक्षत्र में ख़रीदे | या शुक्रवार को शुभ मुहूर्त में खरीदकर घर में स्थापित करें |

4 –  पत्नी का सम्मान कर , सुगंधित द्रव्य इत्र आदि का इतेमाल करें |

5 – छोटी कन्यायों को भोजन कराएं व् चरण स्पर्श करके उन्हें उपहार दें |

6 – शुक्रवार को गाय के दूध  से स्नान करें |

7 – शिव अभिशेख पंचामृत से करें |

8 – किसी काणे व्यक्ति को सफ़ेद वस्त्र, मिठाई  दान में देंवें

dhanteras

Dhanteras Festival of Wealth

|धनतेरस |

दीप जले तो रोशन आपका जहान हो, पूरा आपका हर एक अरमान हो
माँ लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहे आप पर, इस धनतेरस पर आप बहुत धनवान हो

इस बार धनतेरस का शुभ मुहूर्त – प्रदोष काल – शाम 5:30 से 8:04 तक | स्थिर लग्न – सायं 6:10 से 8:१० तक |

 

इस बार धनतेरस dhanteras दिनाक  5 नवम्बर 2018 को आएगी | और यह प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के  कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है | इसी दिन से दीपावली के पंच दिवसीय पर्व शुरू होते है | इस दिन भगवान धन्वन्तरी की पूजा आराधना कर उनसे आरोग्य और अच्छे स्वाश्थ्य की कामना की जाती है | प्रचलित कथा अनुसार इस दिन समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक भगवान  धन्वन्तरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे | इस पर उन्होंने देवताओं को अमृतपान कराकर अमर कर दिया था | साथ ही इस दिन को धन के देवता कुबेर के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है | इसलिए इस दिन सोने चांदी के आभूषण और बर्तन , नयी वस्तुएं आदि खरीदना अत्यधिक शुभ माना जाता है साथ ही इस दिन यम का दीपक जलाने का विधान है ताकि मृत्यु के देवता यमराज की कृपा हम पर बनी रहे और हमारे परिवार में इस जन्म और अगली सात पीड़ियों तक किसी की अकाल मृत्यु न हों |

इस दिन पूजा करने के लिए सर्वप्रथम एक बजोट रखें उस पर स्वस्तिक बना कर भगवान गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें | उन्हें पंचामृत से स्नान कराकर शुद्ध जल से स्नान करवाए फिर इन्हें स्थापित करें | उसके पश्चात उन्हें धुप दीप , नैवैध्य , ताम्बुल और दूर्वा चढ़ाकर  “ ॐ गं गणपतये नमः “ का जाप करते हुए उनका आह्वान करें | कुमकुम , रोली , अक्षत चड़ा कर उनकी पूजा करें | उसके पश्चात भगवान धन्वन्तरी की मूर्ति या तस्वीर न हो तो एक सुपारी पर मोली बांधकर मन ही मन उनके प्रतिरूप का आह्वान करते हुए उसे स्थापित करें | इसके पश्चात धन के देवता कुबेर की मूर्ति स्थापित कर उनका इस  मंत्र से आह्वान करें और उनके धुप दीप नैवैद्य के रूप तुलसी दल चढ़ाएं क्योंकि उन्हें औषधीय चढ़ाना अतिप्रिय है और मंत्र का उच्चारण इसके पश्चात् धन देवता कुबेर की मूर्ति स्थापित कर उनका इस मंत्र से आह्वान करें और उनके ऊपर धुप दिप नैवैद्य चढ़ायें | और कुमकुम आदि से पूजा करें | अब अंत में मिटटी का दीपक रखें | जिसे हम यम का दीपक कहते है | वह दीपक दक्षिण दिशा में मुँह होना चाहिए | उसमें  तेल डालें और जोत जलाएं | अब उसमें एक सफेद कोड़ी डालें ध्यान रहे की दीपक बुझे नहीं | अब उसे घर के मुख्य द्वार पर रखें | दिया बुझने पर उसमे से कोड़ी निकाल कर घर तिजोरी में रखें |

धनतेरस dhanteras का पर्व कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। इस दिन दिपावली का पांच दिवसीय त्यौहार शुरू होता है।
प्रचलित कथा के अनुसार इस दिन समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस पर उन्होने देवताओं को अमृतपान कराकर अमर कर दिया था। इसको लेकर आयु और स्वस्थता की कामना हेतु धनतेरस पर भगवान धवंतरि का पूजन किया जाता है।
पंडित एन एम श्रीमाली के अनुसार इसी दिन भगवान धवंतरि पूजन भी किया जाता है। शाम के समय दीपक जलाकर घर, दुकान को सजाया जाता है। इसके साथ ही मंदिर गौशाओ, नदी के घाट, तालाब एवं बगीचे में भी दीपक जलाएं जाते है। इस अवसर पर तांबे, पीतल, चांदी के गृह उपयोगी नवीन बर्तन व आभूषण भी खरीदते है। बदलते समय के अनुसार अब लोगों की पंसद और जरूरत दोनों बदल गई है। जिसके कारण धनतेरस के दिन अब बर्तनों ओर आभूषणों के अलावा, वाहन, मोबाइल आदि भी खरीदे जाने लगे है।

जातकों जाने धनतेरस dhanteras पर्व का महत्व

धनतेरस dhanteras पर्व पर भगवान धन्वन्तरि की पूजन किया जाता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था। इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी है। उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बडा कोई धन नहीं है।
वहीं दूसरी ओर भगवान धन्वन्तरि कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए ही धनतेरस पर्व के अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा हैं। अंत: में पंडित निधि श्रीमाली के अनुसार ये दिन खरीददारी के लिए बहुत ही शुभ होता है। इस दिन खरीदी गई कोई भी वस्तु लंबे समय तक शुभ फल प्रदान करती है।
पंडित एन एम श्रीमाली के अनुसार धनतेरस dhanteras के दिन समृद्वि प्राप्त करने के लिए किया गया। कोई भी उपाय असरदार होता हैं। धनतेरस के दिन किसी भी शुभ समय में किया जाए तो घर में स्थिर लक्ष्मी का निवास होता है।

जाने जातकों धनतेरस पर किए जाने वाले उपाय

धार्मिक स्थल पर लगाए केले का पौधा-
धनतेरस dhanteras पर्व के दिन किसी भी धार्मिक स्थल पर केले के दो पौधे लगाए साथ ही इन पौधों की सार संभाल करें। इसके साथ ही इन पौधों के पास कोई भी एक सुगंधित पौधा जरूर लगाएं। केले का पौधा जैसे जैसे विशाल होगा। इसके साथ ही आपके आर्थिक लाभ रास्ते प्रशस्त होंगे।
मोर की मिट्टी की करें पूजा-
धनतेरस dhanterasपर्व के दिन पूजा के समय किसी ऐसे स्थान की मिट्टी जहां मोर नाचा हो लाकर पूजा करें। इस मिट्टी को लाल कपडे में बांधकर तिजोरी में रखने से घर पर हमेशा लक्ष्मी की कृपा दृष्टि बनी रहती है।
धनतेरस पर्व पर गाय के लिए जरूर निकाले भोजन-
धनतेरस व दीपावली के पर्व के दिन घर की रसोई में जो भोजन बनता है। उस भोजन में से सर्वप्रथम कुछ भाग गाय के लिए जरूर निकालना चाहिए। जिससे घर में लक्ष्मी का निवास रहता है।
माँ लक्ष्मी जी को अर्पित करें लौंग-
धनतेरस पर्व पर लक्ष्मी पूजन के बाद लक्ष्मी या किसी भी देवी को लौंग अर्पित करें। यह उपाय दीपावली के दिनों में रोज करें। इस उपाय से आर्थिक लाभ होगा।
निर्धन लोगों को दान करे सफेद चीजें-
धनतेरस पर्व पर सफेद पदार्थ एवं चीजें जैसे कपडे, आटा आदि निर्धन लोगों को दान करे। जिससे आर्थिक लाभ के योग बनते है।
घर पर लाए चांदी के लक्ष्मी जी व गणेश-
धनतेरस के पर्व पर घर में गणेश व लक्ष्मी जी की चांदी की प्रतिमाएं लाना शुभ माना गया। इस दिन यह प्रतिमाएं लाने से धन, सफलता व उन्नति बढती है।
धनतेरस पर्व पर करे कुबेर को प्रसन्न-
धनतेरस पर्व के दिन धूप, दीप, नैवैद्ध से पूजन करने के बाद इस मंत्र का जाप करें। इस मंत्र का जाप करने से भगवान कुबेर बहुत खुश होते हैं। जिससे धन और वैभव की प्राप्ति होती है।

यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा

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धनतेरस 2018 पूजा विधि , शुभ मुहूर्त एवं कथा Best Dhanteras Puja Video of 2018

 

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निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी को क्‍यों कहते हैं भीम एकादशी, जानें तिथ‍ि और पूजा का शुभ समय

                                 निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी(भीम एकादशी ) को सभी एकादश‍ियों में श्रेष्‍ठ माना गया है। इसकी एक कथा पांडवकाल से जुड़ी है जिसमें भीम ने एक व्रत से कई व्रत का पुण्‍य प्राप्‍त किया था।
एक वर्ष में कुल 24 एकादशी आती हैं। यदि किसी वर्ष में पुरुषोत्तम मास आता है तो इसमें एकादशियों की संख्‍या 26 हो जाती है। इन सारी एकादशियों में निर्जला एकादशी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।
ज्‍योतिष के जानकार निधि श्रीमाली  बताते हैं कि यह व्रत निराजल रखा जाता है। इस वजह से ये व्रत बहुत कठिन माना जाता है। वहीं इस महापर्व पर भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। 2018 में निर्जला एकादशी 23  जून को आ रही है। पद्म पुराण में निर्जला एकादशी के महत्‍व को बताया गया है।
वैसे इस एकादशी से मिलने वाले पुण्‍य का उल्‍लेख पांडवकाल में भी किया गया है। भीम से जुड़ी एक कथा में इस बात का वर्णन है क‍ि कैसे उन्‍होंने एक ही व्रत से भगवान व‍िष्‍णु को प्रसन्‍न क‍िया था।


तिथि और मुहूर्त (Nirjala Ekadashi)



एकादशी तिथि का आरंभ 23 जून 2018 को 03:19 बजे से होगा। वहीं एकादशी तिथि की समाप्ति 24 जून 2018 को 03:52 बजे होगी। व्रत खोलने का शुभ मुहूर्त 24 जून 2018 को दोपहर 1:59 से शाम 04:30 के बीच है।

 

जानें क्‍यों कहते हैं भीम एकादशी

 

सारे पांडव भीम को छोड़कर वर्ष के सारे एकादशी का व्रत रखते थे। भीम बिना भोजन के नहीं रह पाते थे। इस बात की ग्लानि हमेशा भीम को रहती थी मगर करें तो क्या करें भूख को नियंत्रित नहीं कर पाते थे। इस समस्या के समाधान के लिए वो महर्षि व्यास के पास गए और अपनी सारी व्यथा सत्यता पूर्वक सुनाई।
यह सुनकर व्यास जी ने एक बार बिना जल के निर्जला एकादशी व्रत रखने को कहा। इस प्रकार यह एक व्रत सारे एकादशी के बराबर पुण्य देगा इसीलिए इस एकादशी को भीम एकादशी भी कहते हैं।

Nirjala Ekadashi व्रत के नियम

 

इस व्रत को निराजल रखकर विष्णु पूजा करें। सत्यनारायण जी की कथा सुनें। श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें। अन्न और वस्त्र का गरीबों में दान करें। ध्‍यान रखें क‍ि इस व्रत का पारण अगली तिथि द्वादशी को सूर्योदय के बाद किया जाता है।

इस प्रकार नियम पूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत रहकर इस महान व्रत के पुण्य का लाभ उठाएं और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करें।

निर्जला एकादशी(Nirjala Ekadashi)  के दिन कोनसी राशि के जाताक को क्या दान करना चाहिए जीससे पलट पलट जाये गई जातको की किसमत

निर्जला एकादशी के महापर्व पर भगवान विष्णु की उपासना के साथ साथ राशि अनुरूप दान भी करें। कलयुग में भगवान के नाम का जप और दान ये ही दोनों पुण्यदायी हैं। अतः इस निर्जला एकादशी को बिना जल ग्रहण किये विष्णु जी की उपासना के साथ साथ दान भी करना चाहिए।

इस वर्ष निर्जला एकादशी 2018 (आम ग्यारस ) का पर्व 23 जून को है। इस एकादशी का व्रत करने से 24 एकादशियों के व्रत के समान फल मिलता है। इसका व्रत करने से कई जन्मों के पापों का नाश होता है। सूर्योदय से ही व्रत का आरम्भ कर देना चाहिए।

ब्रम्हमुहूर्त में श्री विष्णुसहस्त्रनाम से व्रत का आरम्भ कीजिये और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय महामंत्र का जप करते रहिये। वास्तव में निर्जला व्रत यानि बिना जल के व्रत रहा जाये।

निर्मल मन अर्थात मन में काम, क्रोध, मद और लोभ का स्थान न हो और न ही ईर्ष्या और द्वेष हो। व्रत का आरम्भ सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक चलता है। इस दिन अन्न का त्याग आवश्यक है।

निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी(Nirjala Ekadashi)

राशिओ के अनुसार दान की वश्तु
1. मेष- गेहू,गुड़ ,लाल वस्त्,रक्त दान
2. वृष- इत्र, सफेद वस्त्र, शक्कर, अंधे गरीब व्यक्ति को अन्न और वस्त्र का दान
3. मिथुन- वस्त्र,गाय को पालक खिलाइए, चिड़ियों को दाना पानी,अन्न दान
4. कर्क- चांदी का चंद्रमा, धार्मिक पुस्तक, अन्न और वस्त्र
5. सिंह- ताम्र पात्र, बर्तन, गेहूं, गुड़
6. कन्या- वस्त्र,अन्न,चांदी , गाय को हरा चारा
7. तुला- चांदी ,स्टील के बर्तन, अन्न दान,मीठा और जल
8. वृश्चिक- रक्त दान, गेहूं, गुड़, अन्न दान
9. धनु- धार्मिक पुस्तक, कलम, अन्न और वस्त्र
10. मकर- लोहे की बाल्टी, अन्न दान, मीठा और जल
11. कुंभ- लोहे की वस्तु, गरीबों में भोजन का दान, अन्न दान
12. मीन- धार्मिक पुस्तक, अन्न दान, राहगीरों को मीठा और जल का दान, छाता का दान

 

Shani Jayanti(शनि जयंती) in hindi 2018

Shani Jayanti

Shani Jayanti

शनि गृह का परिचय

शनि सूर्य देव के पुत्र और यमराज के भाई है| ये नीलवर्ण एवं नपुंसक गृह है | परन्तु उनकी अपने पिता से बनती नहीं है | इनकी गति अत्यंत धीमी होती है इसलिए इनको शनेश्वर , सनीचर , शनैःचर  भी कहा जाता है |

शनि गृह का नाम सुनते ही प्राय भय पैदा होने लगता है जबकि शनि लोकतान्त्रिक पद्धति के पालक तथा संसार की हर चल और अचल वास्तु से सम्बन्ध रखने के कारण येआमजन का गृह है ज्योतिष में शनि को न्यायप्रिय गृह माना गया है | यह किसी के साथ अन्याय नहीं करते है बल्कि भाग्य और उस व्यक्ति के कर्मो के अनुसार उसे वैभव या दंड प्रदान करते है |नवग्रह मंडल में शनिको सेवक का पद प्राप्त है| ये पश्चिम दिशा के स्वामी है | शनि गृह को मकर और कुम्भ राशि का अधिपत्य प्राप्त है | बुध , शुक्र और राहु शनि के मित्र है | इनकी महा दशा 19  वर्ष की होती है |ये विशेष रूप से आयु के कारक गृह है | इनकी सप्तम दृष्टि के अतिरिक्त तृतीय और दशम स्थान पर भी विशेष दृष्टि रहती है|तृतीय , षष्ट , अष्टम , दशम और द्वादश भाव का शनि को कारक  माना गया है|आगामी 15  मई को शनि जयंती है | इस दिन की गयी उपासना का विशेष महत्त्व है | जो लोग शनि की साढ़ेसाती और ढय्या से प्रभावित हो या शनि देव जिन्हे प्रतिकूल प्रभाव दे रहे हो वे शनि जयंती पर इनके मंत्र जाप , दान एवं पूजा करके लाभान्वित हो सकते है |

शनि देव जयंती कब है (When is shani jayanti)

शनि जयंती आगामी 15 मई को है|

शनि देव जयंती पे केसे करे शनि को प्रसन्न

शनि की साढ़े साती एवं ढैया

शनि की साढ़े साती और ढैया कब होती है इस बारे में विचार करते है | शनि गृह क्योकि सूर्य से बहुत दूर है इसलिए यह 30 वर्ष में अपनी परिक्रमा पूर्ण करता है | अतः प्रत्येक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहता है | इसलिए शनि जब अपनी राशि से पहले वाली राशि में आता है तब ही शनि की साढ़े साती शुरू हो जाती है एवं अगली राशि ( जन्मराशि जिसमे चन्द्रमा स्थित हो ) से निकल नहीं जाता है तब तक रहती है यदि आपकी राशि मकर है तो आपका चन्द्रमा मकर राशि में है | आपको शनि की साढ़े साती आपसे जब पहले की राशि यानि धनु राशि में जब शनि आएगा तब से शुरू हो जायेगी यह शनि ढाई वर्ष धनु और ढाई वर्ष आपकी राशि यानि मकर राशि में रहेगा और ढाई वर्ष कुम्भ राशि में रहेगा यानि आपसे पहले वाली राशि धनु आपकी राशि मकर और आपसे अगली राशि यानि कुम्भ राशि में में जब तक शनि रहेगा तब तक आपको शनि की साढ़े साती लगी रहेगी | इसके आलावा जब शनि जन्मराशि से चतुर्थ और अष्टम स्थान में आता है तो शनि की ढैया शुरू होती है |  शनि की साढ़े साती और ढैया शुभ है या अशुभ यह मूल्यांकन शनि गृह व्यक्ति के कर्मो के आधार पर करते है क्युकी शनि देव न्यायाधीश है और व्यक्ति के कर्मानुसार फल प्रदान करते है इसलिए यदि किसी व्यक्ति के कर्म अच्छे किये हुए है और उसकी राशि में शनि गृह उच्च का है तो वह साढ़े साती और ढैया में भी ओर अधिक वैभव और यश प्राप्त करता है | और यदि व्यक्ति के कर्म बुरे है और शनि नीच का है तो शनि की साढ़े साती और ढैया का दुष्प्रभाव उसे भगतना ही पड़ेगा | शनि यदि किसी की राशि में वक्री है तो उस वयक्ति को भी अचानक कुछ शनि वक्री के प्रभावों का सामना करना पड़ता ही है | अतः शनि जयंती पर उन्हें प्रसन्न करने के कुछ विशेष उपाय करने चाहिए

शनि जयंती पे क्या करे (what to do on shani jayanti)

इस दिन  सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र पहन कर  के मंदिर जाकर शनि देव जी को तिल्ली के तेल का दीपक करे और अगर शनि मंदिर आसपास न  हो तो हनुमान जी के दर्शन करे इससे शनि देव प्रसन्न होते है |  काली वस्तुओ का दान करे जैसे काळा तिल, काले वस्त्र आदि | शनि जयंती पर शनि चालीसा का पाठ अवश्य करे इससे शनि के दोष मुक्ति मिलती है | काली गाय को गुड़ खिलाये | किसी भिखारी जिसके चप्पल टूट गए है  पाँव है उसे चप्पल का दान करे |

शनि जयंती पर पूजन विधि (shani jayanti puja vidhi)

शनि पूजा के लिए एक चौशनि देव जयंती की ले | और उस पर काला कपड़ा बिछा दे उस पर काले उड़द का अष्ट दल  बना कर शनि पूजन पैकेट में उपलब्ध सामग्री को निकल कर उस पर रख दे इस पूजन पैकेट में शनि का छल्ला , शनि माला , शनि यन्त्र , काले घोड़े की नाल , शनि पेन्डेन्ट , काले तिल , तीली का तेल आदि सामग्री है | शनि यन्त्र पर तीली  द्वारा अभिषेक करे | और यह अभिषेक शनि के बीज मंत्र का जाप करते  हुए करे | जब शनि के जाप पूर्ण हो जाए तो फिर हनुमान चालीसा का पाठ करे अंत में रुद्राभिषेक करके शनि यन्त्र को अपने पूजा कक्ष में रख दे और शनि पेन्डेन्ट  को और शनि  छल्ले को धारण कर ले और घोड़े की नाल को घर के मुख्य द्वार के ऊपर सामने की तरफ लगा दे | शनि जयंती पर शनि की साढ़े साती और ढैया जिन्हे लगी हुई है उन्हें यह पूजन विधि अवश्य करनी चाहिए |

शनि जयंती पर शनि गृह का बीज मंत्र

ॐ शं शनिश्चराय नमः