जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश - Shradh Paksha 2021

जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश – Shradh Paksha 2021

 

जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश – Shradh Paksha 2021

 


अनंत चतुर्दशी के बाद पूर्णिमा से शुरू होने वाला श्राद्घ पक्ष सर्वपितृ अमावस्या तक रहता है। इसमें पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक के बीच सोलह तिथियों के अनुसार श्राद्घ किया जाता है। अपने स्वर्गवासी पूर्वजों की शान्ति एवं मोक्ष के लिए किया जाने वाला दान एवं कर्म ही श्राद्ध कहलाता है। जिसने हमें जीवन दिया, उसके लिए, जिसने हमें जीवन देने वाले को जीवन दिया, उसके लिए तथा जो हमारे कुल एवं वंश का है, उसके लिए। इस प्रकार तीन पीढि़यों तक के लिए किया जाने वाला होम, पिण्डदान तथा तर्पण ही श्राद्धकर्म कहलाता हैं। ऐसी मान्यता है की माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। यदि अपने कर्मों के अनुसार उनको देव योनि प्राप्त होती है तो वह अमृत रूप में उनको प्राप्त होता है। जो श्रद्धा से दिया जाए, उसे श्राद्ध कहते हैं। श्रद्धा और मंत्र के मेल से जो विधि होती है, उसे श्राद्ध कहते हैं। विचारशील पुरुष को चाहिए कि संयमी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को एक दिन पूर्व ही निमंत्रण दे दें, परंतु श्राद्ध के दिन कोई तपस्वी ब्राह्मण घर पर पधारे तो उन्हें भी भोजन कराना चाहिए।जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश – Shradh Paksha 2021

जब पित्तर यह सुनते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित हो गया है तो वे एक-दूसरे का स्मरण करते हुए मनोनय रूप से श्राद्धस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तब पित्तर अपने पुत्र-पौत्रों के यहाँ आते हैं। शास्त्रों द्वारा जन्म से ही मनुष्य पर लिए तीन प्रकार के ऋण अर्थात कर्तव्य बतलाये गये हैं :-  देवऋण, ऋषिऋण तथा पितृऋण। अतः स्वाध्याय द्वारा ऋषिऋण से, यज्ञों द्वारा देवऋण से तथा संतानोत्पत्ति एवं श्राद्ध (तर्पण, पिण्डदान) द्वारा पितृऋण से मुक्ति पाने का रास्ता बतलाया गया है। इन तीनों ऋणों से मुक्ति पाये बिना व्यक्ति का पूर्ण विकास एवं कल्याण होना असंभव है।जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश – Shradh Paksha 2021

पितृ पक्ष के 15 दिन में प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सवार सकता है ,क्योंकि इन 15 दिनों में पितृ लोक से हमारे पितृ धरती पर आते है और यदि हम श्राद्ध आदि विधि से उन्हें संतुष्ट कर दे तो श्राद्ध से संतुष्ट पितृ हमे आशीर्वाद देते है ! इन 15 दिनों में यदि हम श्राद आदि क्रियाये ना करे तो हमारे पितृ भूखे ही पितृ लोक को वापिस चले जाते है और हमे श्राप दे देते है जिससे अनेकों प्रकार की विपदाए हमारे जीवन को घेर लेती है और जीवन एक तरह की नीरसता से भर जाता है ! पितरों के रुष्ट हो जाने पर घर में कलेश की स्थिति बन जाती है ! व्यक्ति का अध्यात्मिक विकास रुक जाता है ! पितरों के रुष्ट हो जाने पर घर में प्रेत बाधाऐं उत्पन्न हो जाती है और व्यक्ति का सारा धन बीमारिओं में ही निकल जाता है ! पितरों को संतुष्ट करने के अनेकों उपाय है !

|| उपाय ||

१. यदि हम कौवे की सेवा करे तो हमारे पितृ संतुष्ट होते है !

२. पितृ पक्ष में श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करे और उस पाठ का दान अपने गौत्र के पितरों के नाम पर दान करने से पितृ संतुष्ट होते है और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है !

३. यदि पितृ पक्ष में गरुड़ पूरण का पाठ किया जाए और पाठ के फल का दान अपने गौत्र के पितरों के नाम पर दान करने से पितृ संतुष्ट होते है और नरक की यातनाओं से बच जाते है एवं मोक्षगामी होते है !

४. पीपल वृक्ष की जड़ में मीठा जल अर्पित करने से और दिया जलाने से भी पितृ संतुष्ट होते है !

५. कुत्तों की सेवा करने और मछलियो को आटा खिलाने से भी पितृ संतुष्ट होते है !

६. यदि व्यक्ति अपने कुलदेवता कुलदेवी या कुलगुरु का पूजन करे तो कुल में उत्पन्न होने वाले सभी पितृ संतुष्ट हो जाते है !

७. यदि देवी भागवत का पाठ किया जाए और पाठ का पुण्य अपने पितरों के लिए दान किया जाए तो भी पितृ संतुष्ट होते है !

ऐसे अनेकों उपाएँ है जिससे पितृ संतुष्ट होते है !

शुभ प्रभात मित्रों नमामि

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटिशः नमन

श्राद्ध के हवन का विधि-विधान ****

सनातन धर्म की परम्परा के अनुसार प्रत्येक गृहस्थ को पितृगण की तृप्ति के लिए तथा अपने कल्याण के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। वैदिक परम्परा के अनुसार विधिवत् स्थापित अग्नि में बैदिक मन्त्रों की दी गयी आहुतियां धूम्र और वायु की सहायता से आदित्य मण्डल में जाती हैं। वहां उसके दो भाग हो जाते हैं। पहला भाग सूर्य रश्मियों के द्वारा पितरों के पास पितर लोकों में चला जाता है और दूसरा भाग वर्षा के माध्यम से भूमि पर बरसता है जिससे अन्न, पेड़, पौधे व अन्य वनस्पति पैदा होती है। उनसे सभी प्राणियों का भरण-पोषण होता है। इस प्रकार हवन से एक ओर जहाँ पितरगण तृप्त होते हैं, वहीँ दूसरी ओर जंगल के जीवों का कल्याण होता है।जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश – Shradh Paksha 2021

हवन- विधि

अपने माता-पिता, दादा-दादी या परदादा-परदादी के श्राद्ध के दिन नित्य नियम से निवृत्त होकर मार्जन,आचमन, प्राणायाम कर कुश (एक जंगली पवित्र घास) को धारण कर सर्वप्रथम संकल्प करना चाहिए। उसके बाद भू- संस्कारपूर्वक अग्नि स्थापित कर विधि-विधानसहित अग्नि प्रज्ज्वलित कर, अग्नि का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद पंचोपचार से अग्नि का पूजन कर उसमें चावल, जल, तिल, घी  बूरा या चीनी व सुगन्धित द्रव्यों से शाकल्य की निम्न-लिखित 14 आहुतियां देनी चाहिए। अन्त में हवन करने वाली सुरभी या सुर्वा से हवन की भस्म ग्रहण कर, मस्तक आदि पर लगा कर, गन्ध, अक्षत, पुष्प आदि से अग्नि का पूजन और विसर्जन करें और अन्त में आत्मा की शान्ति के लिए परमात्मा से प्रार्थना करें–

ॐ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या

तपोश्राद्ध क्रियादिषु।

न्यूनं सम्पूर्णताम् याति

सद्यो वंदेतमच्युतम।।

इस प्रकार विधिवत् हवन करने से पितर प्रसन्न व संतुष्ट होते हैं तथा श्राद्धकर्ता अपने कुल-परिवार का सर्वथा कल्याण करते हैं।

तृप्ति व संतुष्टि के लिए तर्पण व श्राद्ध   ****

पितरों की संतुष्टि के लिए तर्पण किया जाता है–वही श्राद्ध कहलाता है। प्रश्न यह है–हम श्राद्ध क्यों करें ? श्राद्ध न करें तो हर्ज क्या है ?

पितरों के नाम से श्रद्धा पूर्वक किये गए कर्म को श्राद्ध कहते हैं। जिन अकालमृत्यु को प्राप्त या अतृप्त आत्माओं का सम्बन्ध हमारे कुल-परिवार से होता है, उनकी अपने वंशजों से यह अपेक्षा रहती है कि उनकी आने वाली पीढ़ी उनके कल्याण के लिए और आत्मा की शान्ति के लिए कुछ दान-पूण्य, भोजन-वस्त्र, अन्न-जल तर्पण आदि कर साल में एक बार पितृपक्ष में श्राद्धकर्म अवश्य करेगी जिससे उनकी मुक्ति हो जायेगी और एकबार फिर से वे भवचक्र का हिस्सा बन जायेंगे। ऐसा होने से वे न सिर्फ संतुष्ट होते हैं वल्कि कुल-परिवार को आशीर्वाद भी देते हैं।जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश – Shradh Paksha 2021

इसके ठीक विपरीत जिस परिवार में यह श्राद्धकर्म नहीं किया जाता है, चाहे जाने या अनजाने तो उस परिवार की सुख-समृद्धि, संतुष्टि नष्ट हो जाती है। इसका एकमात्र कारण पितरों का अप्रसन्न और असंतुष्ट होना ही है। जिन पितरों को अपने कुल-परिवार के सदस्यों से श्राद्धकर्म की अपेक्षा रहती है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार भी करते हैं और श्राद्धपक्ष में कुल परिवार में आते भी हैं, फिर भी वे भूखे-प्यासे, अतृप्त लौट जाते हैं तो फिर वे परिवार के सदस्यों को सताकर उन्हें संकेत भी करते हैं। यदि फिरभी वे नहीं चेते और उनकी अनदेखी करते रहे तो वे ही उनके ऊपर कहर बन कर टूट पड़ते हैं। फिर जो नुकसान होता है उसकी भरपाई संभव नहीं है। पितरों की बददुआ किसी कुल-परिवार का सुख-चैन तो छीन ही लेती है, साथ ही अनहोनी समय-समय पर घटित होने लगती है जिसकी सारी जिम्मेदारी कुल-परिवार के जिम्मेदार सदस्य की होती है। इसलिए हिन्दू समाज की यह मान्यता और परंपरा है कि श्राद्ध करने से उनके वंशज और परिवार का कल्याण होता है।जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश – Shradh Paksha 2021

हमारे धर्मशास्त्र में श्राद्ध के अनेक भेद बतलाये गए हैं। उनमें से ‘मत्स्य पुराण’ में तीन, ‘यज्ञस्मृति’ में पांच तथा

भविष्य पुराण’ में बारह प्रकार के श्राद्ध  का उल्लेख मिलता है। ये भेद निम्न हैं–

1. नित्य श्राद्ध:  प्रतिदिन किया जाने वाला तर्पण और भोजन से पहले गौ-ग्रास निकालना ‘नित्य श्राद्ध’ कहलाता है।

2. नैमित्तिक श्राद्ध:  पितृपक्ष में किया जाने वाला श्राद्ध ‘नैमित्तिक श्राद्ध’ कहलाता है।

3. काम्य श्राद्ध:  अपनी अभीष्ट कामना की पूर्ति के लिए किये गए श्राद्ध को ‘काम्य श्राद्ध’ कहते हैं।

4. वृद्धि श्राद्ध या नान्दीमुख श्राद्ध:  मुंडन, उपनयन एवं विवाह आदि के अवसर पर किया जाय तो ‘वृद्धि श्राद्ध’ या ‘नान्दी मुख श्राद्ध’ कहते हैं।

5. पार्वण श्राद्ध:  अमावस्या या पर्व के दिन किया जाने वाला श्राद्ध ‘पार्वण श्राद्ध’ कहलाता है।

6. सपिण्डन श्राद्ध:  मृत्यु के बाद प्रेतयोनि से मुक्ति के लिए मृतक पिण्ड का पितरों के पिण्ड में मिलाना ‘सपिण्डन श्राद्ध’ कहलाता है।

7. गोष्ठी श्राद्ध:  गौशाला में वंश वृद्धि के लिए किया जाने वाला श्राद्ध ‘गोष्ठी श्राद्ध’ कहलाता है।

8. शुद्धयर्थश्राद्ध:  प्रायश्चित्त के रूप में अपनी शुद्धि के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराना ‘शुद्ध्यर्थ श्राद्ध’ कहलाता है।

9. कर्मांग श्राद्ध:  गर्भाधान, सीमान्त एवं पुंसवन संस्कार के समय किया जाने वाला श्राद्ध ‘कर्मांग श्राद्ध’ कहलाता है।

10. दैविक श्राद्ध:  सप्तमी तिथि में हविष्यान्न से देवताओं के लिए किया जाने वाला श्राद्ध ‘दैविक श्राद्ध’ कहलाता है।

11. यात्रार्थ श्राद्ध:  तीर्थयात्रा पर जाने से पहले और तीर्थस्थान पर किया जाने वाला ‘यात्रार्थ श्राद्ध’ कहलाता है।

12. पुष्ट्यर्थ श्राद्ध:  अपने वंश और व्यापार आदि की वृद्धि के लिए किया जाने वाला श्राद्ध ‘पुष्ट्यर्थ श्राद्ध’ कहलाता है।

उक्त सभी प्रकार के श्राद्धों के माध्यम से व्यक्ति अपने पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा को अर्पित करता है जिससे प्रसन्न होकर उसके पितर श्राद्धकर्ता को अपने वंशज और उसके परिवार को फलने-फूलने आदि का आशीर्वाद देते हैं।

क्रमशः–

आगे है–नान्दी श्राद्ध तथा सांवत्सरिक श्राद्ध-

श्राद्धकर्म में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है, जैसे :- जिन व्यक्तियों की सामान्य मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध केवल पितृपक्ष की त्रायोदशी अथवा अमावस्या को किया जाता है। जिन व्यक्तियों की अकाल-मृत्यु (दुर्घटना, सर्पदंश, हत्या, आत्महत्या आदि) हुई हो, उनका श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही किया जाता है। सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध केवल नवमी को ही किया जाता है। नवमी तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम है। जिसे माता नवमी भी कहते है। संन्यासी पितृगणों का श्राद्ध केवल द्वादशी को किया जाता है। पूर्णिमा को मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध केवल भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा अथवा आश्विन कृष्ण अमावस्या को किया जाता है। नाना-नानी का श्राद्ध केवल आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को किया जाता है। पितरों के श्राद्ध के लिए ‘गया’ को सर्वोत्तम माना गया है, इसे ‘तीर्थों का प्राण’ तथा ‘पाँचवा धाम’ भी कहते है। माता के श्राद्ध के लिए ‘काठियावाड़’ में ‘सिद्धपुर’ को अत्यन्त फलदायक माना गया है। इस स्थान को ‘मातृगया’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘गया’ में पिता का श्राद्ध करने से पितृऋण से तथा ‘सिद्धपुर’ (काठियावाड़) में माता का श्राद्ध करने से मातृऋण से सदा-सर्वदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है।। श्राद्धकर्म में श्रद्धा, शुद्धता, स्वच्छता एवं पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, इनके अभाव में श्राद्ध निष्फल हो जाता है। श्राद्धकर्म से पितरों को शांति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा प्रसन्न एवं तृप्त पितरों के आर्शीवाद से हमें सुख, समृद्धि, सौभाग्य, आरोग्य तथा आनन्द की प्राप्ति होती है।जाने क्या है श्राद्ध पक्ष और केसे करे अपने पितरो को खुश – Shradh Paksha 2021

श्राद्ध में वर्जित कार्य :-

तेल की मालिश नहीं करना चाहिए। इन दिनों में संभोग को वर्जित किया गया है। इन नियमों का पालन न करने पर हमें कई दु:खों को भोगना पड़ता है। इन दिनों खाने में चना, मसूर, काला जीरा, काले उड़द, काला नमक, राई, सरसों आदि वर्जित मानी गई है अत: खाने में इनका प्रयोग ना करें। आप भी अपने पितरो का श्राद्धकर्म अपनी भक्ति एव श्रदा से करे तथा उनकी कृपा प्राप्त करे

दिवंगत पूर्वजो के प्रति श्रद्धा का पर्व पितृपक्ष 20 से 6 अक्टुम्बर  तक

श्रद्धा की तिथिय

पूर्णिमा श्रद्धा – 20 सितम्बर

प्रतिपदा श्रद्धा – 21सितम्बर

दिवतीय श्रद्धा – 22 सितम्बर

तृतीय  श्रद्धा – 23 सितम्बर

चतुर्थी श्रद्धा  – 24 सितम्बर

पंचमी श्रद्धा – 25 सितम्बर

षष्टि श्रद्धा  – 27 सितम्बर

अष्टमी श्रद्धा  – 29 सितम्बर

नवमी श्रद्धा  – 30 सितम्बर

दशमी श्रद्धा – 1 अक्टूबर

एकादशी श्रद्धा – 2 अक्टूबर

द्वादशी  श्रद्धा – 3 अक्टूबर

त्रयोदशी श्रद्धा – 4 अक्टूबर

चतुदशी श्रद्धा  – 5 अक्टूबर

अमावस्या श्रद्धा – 6 अक्टूबर

 

 

 

Note: Daily, Weekly, Monthly, and Annual Horoscope is being provided by Pandit N.M.Shrimali Ji, almost free. To know daily, weekly, monthly and annual horoscopes and end your problems related to your life click on  (Kundli Vishleshan) or contact Pandit NM Shrimali  Whatsapp No. 9929391753, E-Mail- info@panditnmshrimali.com

Connect with us at Social Network:-

social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com

 

केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा - Navratri 2021

केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा – Navratri 2021

केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा – Navratri 2021


नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। माता दुर्गा के नौ रूपों में से छठा रूप माँ कात्यायनी का होता है।केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा – Navratri 2021

माँ दुर्गा के छठे रूप को माँ कात्यायनी के नाम से पूजा जाता है। महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं। महर्षि कात्यायन ने इनका पालन-पोषण किया तथा महर्षि कात्यायन की पुत्री और उन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण देवी दुर्गा को कात्यायनी कहा गया। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इनका गुण शोधकार्य है। इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा – Navratri 2021

देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है, माँ कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गई थी। इसीलिए यह ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है। इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं। साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है।केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा – Navratri 2021

माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है। यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं। इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है तथा अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है।

देवी कात्यायनी के मंत्र :-

चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं –  दुर्गा सप्तशती पाठ विधि :-

देवी की पूजा के पश्चात भगवान शंकर और ब्रह्मा की पूजा करें। सबसे अंत में ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत, सहित सभी सामग्री हाथ में लेकर “ॐ ब्रह्मणे नम:” कहते हुए सामग्री भूमि पर रखें और दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें।केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा – Navratri 2021

इस प्रकार दुर्गा की आरती होती है। आरती में “जय अम्बे गौरी” –  दुर्गा आरती गीत भक्त जन गाते हैं ||

देवी कात्यायनी की कात्यायनी कथा :-

देवी कात्यायनी जी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार एक समय कत नाम के प्रसिद्ध ॠषि हुए तथा उनके पुत्र ॠषि कात्य हुए, उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र से, विश्वप्रसिद्ध ॠषि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। देवी कात्यायनी जी देवताओं, ऋषियों के संकटों को दूर करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में उत्पन्न होती हैं। महर्षि कात्यायन जी ने देवी पालन पोषण किया था। जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब उसका विनाश करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने अपने तेज़ और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था और  ॠषि कात्यायन ने भगवती जी कि कठिन तपस्या, पूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलायीं।केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा – Navratri 2021

महर्षि कात्यायन जी की इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। देवी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की तथा अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेने के पश्चात शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीन दिनों तक कात्यायन ॠषि ने इनकी पूजा की, दशमी को देवी ने महिषासुर का वध किया ओर देवों को महिषासुर के अत्याचारों से मुक्त किया।केसे करे माँ कत्यायानी की पूजा – Navratri 2021

 

Note: Daily, Weekly, Monthly and Annual Horoscope is being provided by Pandit N.M.Shrimali Ji, almost free. To know daily, weekly, monthly and annual horoscopes and end your problems related to your life click on  (Kundli Vishleshan) or contact Pandit NM Shrimali  Whatsapp No. 9929391753, E-Mail- info@panditnmshrimali.com

Connect with us at Social Network:-

social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com

 

 

जाने राम नवमी का महत्व - Ram Navami

जाने राम नवमी का महत्व – Ram Navami

जाने राम नवमी का महत्व – Ram Navami-2022

 


जाने राम नवमी का महत्व – Ram Navami विनम्र और सौम्य प्रवृति के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जन्मदिन के सुअवसर पर चैत्र शुक्ल मास के नवमी तिथि को रामनवमी का विशेष पर्व मनाया जाता है. पौराणिक कथानुसार आज ही के दिन त्रेता युग में रघुकुल शिरोमणि महाराज दशरथ के यहां अखिल ब्रह्माण्ड नायक भगवान विष्णु ने पुत्र के रूप में जन्म लिया था. भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले श्रीराम को भक्तगण उनके सुख-समृद्धि, पूर्ण व सदाचार युक्त शासन के लिए याद करते हैं. यह परम पवित्र त्यौहार अयोध्या सहित भारत के सभी भागों में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन बड़ी संख्यां में श्रद्धालु श्री राम की जन्मभूमि अयोध्या आते हैं और प्रातःकाल सरयू नदी में स्नान कर भगवान के मंदिर में जाकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा-अर्चना करते हैं. इस पावन अवसर पर भक्तगण पूरे दिन रामायण का पाठ करते हैं. अयोध्या में इस दिन हर्षोल्लास पूर्वक भगवान राम, सीता लक्ष्मण और भक्त हनुमान की रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं.

          नवमी के दिन जो श्रदालु मन से पूजा – अर्चना करता है। उसे योग , लगन ,गृह , वार और सभी तरह का अनुकूल संयोग प्राप्त होता है। अतः  संसार के सारे लौकिक और अलोकिक फलो कि प्राप्ति के लिए श्री राम का उच्चारण करना व उनके पावन दो नाम के अक्षरो का उच्चारण करना ही हमे सीधी प्राप्त कराता है। जाने राम नवमी का महत्व – Ram Navami 


उपाय :-

रोग निवारण के लिए :-  यदि कोई व्यक्ति रोग से पीड़ित है तो किसी एक ब्राम्हण व किसी विद्वान् को बिठाकर 108 बार(श्री रामरक्षास्तोत ) पाठ करवाने चाहिए  और जब ये पथ हो जाए तो एक स्वछ पात्र में गंगा जल को 108 बार पाठ सुनाकर  उस रोगी को पिला देना चाहिए जिससे असाध्य रोग श्री राम कि कृपा से ठीक हो जाते है। 
सभी तरह के कल्याण के लिए :- जिस व्यक्ति को सभी तरह के सुख , यश , और विजय कि परम अपेक्षा हो तो वह इस राम तारक मंत्र का प्रतिदिन 108 बार शुद्ध आसन पर बैठकर पूर्वाभिमुख होकर जप करे। जाने राम नवमी का महत्व – Ram Navami
                                         रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। 
                                         रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः।।

गृह दोष निवारण के लिए :- सभी ग्रहो कि शांति के लिए व्यक्ति को रोजाना “रामायण “का पाठ करना चाहिए। प्रतिदिन सुबह 1100 बार जप करने से लाभ होगा। मिथुन , व कन्या राशि वाले व्यक्ति को प्रतिदिन श्री राम कि पूजा करनी चहिए। श्रीराम कि पूजा मन और तन को आनंद में भिगो देती है। जाने राम नवमी का महत्व – Ram Navami-2022

 

Note: Daily, Weekly, Monthly and Annual Horoscope is being provided by Pandit N.M.Shrimali Ji, almost free. To know daily, weekly, monthly and annual horoscopes and end your problems related to your life click on (Kundali Vishleshan) or contact Pandit NM Srimali  Whatsapp No. 9929391753,E-Mail- info@panditnmshrimali.com

Connect with us at Social Network:-

social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com

Kese Kare Ganesh Yantra Se BHagwan Ganesh Ji KI pooja

Kese Kare Ganesh Yantra Se BHagwan Ganesh Ji KI pooja

Kese Kare Ganesh Yantra Ke BHagwan Ganesh Ji KI pooja


Ganesh Yantra भगवान गणेश को भगवान शिव तथा मां पार्वती के पुत्र के रूप में जाना जाता है जिनकी पूजा तथा उपासना से कार्यों में आने वाले विघ्न बाधाएं दूर हो जातीं हैं तथा कार्यों में सफलता प्राप्त होती है जिसके चलते ज्योतिष में हजारों सालों से श्री गणेश मंत्र का प्रयोग भगवान गणेश का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिए तथा अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए चलता रहा है वैदिक ज्योतिषी श्री गणेश यंत्र के प्रयोग का परामर्श नये कार्यों को शुरु करने के लिए तथा उनमें सफलता प्राप्त करने के लिए, कार्यों में आने वाली विघ्न बाधाओं को दूर करने के लिए, सुख, समृद्धि, धन, वैभव, श्री गणेश कृपा तथा अन्य बहुत सी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता हैं
 
श्री गणेश यंत्र को स्थापित करने से प्राप्त होने वाले लाभ किसी जातक को पूर्ण रूप से तभी प्राप्त हो सकते हैं जब जातक द्वारा स्थापित किया जाने वाला श्री गणेश यंत्र शुद्धिकरण, प्राण प्रतिष्ठा तथा उर्जा संग्रह की प्रक्रियाओं के माध्यम से विधिवत बनाया गया हो तथा विधिवत न बनाए गए श्री गणेश यंत्र को स्थापित करना कोई विशेष लाभ प्रदान करने में सक्षम नहीं होता।  Ganesh Yantra शुद्धिकरण के पश्चात श्री गणेश यंत्र को श्री गणेश मंत्रो की सहायता से एक विशेष विधि के माध्यम से उर्जा प्रदान की जाती है किसी भी श्री गणेश यंत्र की वास्तविक शक्ति इस यंत्र को श्री गणेश मंत्रों द्वारा प्रदान की गई शक्ति के अनुपात में ही होती है तथा इस प्रकार जितने अधिक मंत्रों की गणेश के साथ किसी श्री गणेश यंत्र को उर्जा प्रदान की गई हो, उतना ही वह श्री गणेश यंत्र शक्तिशाली होगा। 
 
विधिवत बनाया गया श्री गणेश यंत्र प्राप्त करने के पश्चात आपको इसे अपने ज्योतिषि के परामर्श के अनुसार अपने घर में पूजा के स्थान अथवा अपने बटुए अथवा अपने गले में स्थापित करना होता है। उत्तम फलों की प्राप्ति के लिए श्री गणेश यंत्र को बुधवार वाले दिन स्थापित करना चाहिए तथा घर में स्थापित करने की स्थिति में इसे पूजा के स्थान में स्थापित करना चाहिएGanesh Yantra  इसके अतिरिक्त आप अपने श्री गणेश यंत्र को इस दिन ही अपने ज्योतिष के परामर्श अनुसार अपने बटुए में, अथवा अपने गले में भी स्थापित कर सकते हैं।
 
श्री गणेश यंत्र की स्थापना के दिन नहाने के पश्चात अपने यंत्र को सामने रखकर 11 या 21 बार श्री गणेश मंत्र का जाप करें तथा तत्पश्चात अपने श्री गणेश यंत्र पर थोड़े से गंगाजल अथवा कच्चे दूध के छींटे दें, भगवान गणेश से इस यंत्र के माध्यम से अधिक से अधिक शुभ फल प्रदान करने की प्रार्थना करें तथा तत्पश्चात इस यंत्र को इसके लिए निश्चित किये गये स्थान पर स्थापित कर दें। आपका श्री गणेश यंत्र अब स्थापित हो चुका है तथा इस यंत्र से निरंतर शुभ फल प्राप्त करते रहने के लिए आपको इस यंत्र की नियमित रूप से पूजा करनी होती है। प्रतिदिन स्नान करने के पश्चात अपने श्री गणेश यंत्र की स्थापना वाले स्थान पर जाएं तथा इस यंत्र को नमन करके 11 या 21 श्री गणेश बीज मंत्रों के उच्चारण के पश्चात अपने इच्छित फल इस यंत्र से मांगें। यदि आपने अपने श्री गणेश यंत्र को अपने बटुए अथवा गले में धारण किया है तो स्नान के बाद इसे अपने हाथ में लें तथा उपरोक्त विधि से इसका पूजन करें तथा अपना इच्छित फल इससे मांगें। अपने पास स्थापित किए गये श्री गणेश यंत्र की नियमित रूप से पूजा करने से आपके और आपके श्री गणेश यंत्र के मध्य एक गणेशशाली संबंध स्थापित हो जाता है जिसके कारण यह यंत्र आपको अधिक से अधिक लाभ प्रदान करने के लिए प्रेरित होता है  गणेश यंत्र सबसे महत्वपूर्ण, शुभ और शक्तिशाली यंत्र होता है जो न केवल लाभ देता है तथा व्यक्ति के लिए शुभ फलदायक होता है. गणेश भगवान को विघ्नहर्ता तथा सर्वकार्यों में प्रथम पूज्य माना जाता है, इन्हीं के यंत्र स्वरुप को अपनाकर व्यक्ति सभी कष्टों से मुक्ति एवं सुख तथा समृद्धि पाता है. यह यंत्र समस्त सांसारिक इच्छाओँ को पूरा करने का स्रोत है. किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करनी हो तो भगवान गणेश की पूजा उत्तम फल प्रदान करने वाली होती है. भगवान गणेश का पूजन यंत्र के रूप में करने से शुभ फलों में वृद्धि होती है  चिउड़ा अथवा नारिकेल अथवा मरिच से प्रतिदिन एक हजार आहुति देने से एक महीने के भीतर बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त होती है। जीरा, सेंधा नमक एवं काली मिर्च से मिश्रित अष्टद्रव्यों से प्रतिदिन एक हजार आहुति देने से व्यक्ति एक ही पक्ष (15दिनों) में कुबेर के समान धनवान् हो जाता है। इतना ही नहीं प्रतिदिन मूलमन्त्र से 444 बार तर्पण करने से मनुष्यों को मनो वांिछत फल की प्राप्ति हो जाती हैश्री गणेश यंत्र के सामने गाय के घी से मिश्रित अन्न की आहुतियाँ देने से समृद्धि की कमी नहीं होती. Ganesh Yantra अष्टद्रव्यों से प्रतिदिन आहुति देने से व्यक्ति धनवान बनता है. भगवान श्रीगणेश यंत्र की स्थापना करने पर यंत्र के समक्ष  सुबह-शाम दीपक व भोग लगाएं तथा आरती किया करें. श्रीगणेश यंत्र की स्थापना ईशाण कोण में करें. स्थापना इस प्रकार करें कि यंत्र का मुख पश्चिम की ओर रहे.
 
गणेश यंत्र महत्व और लाभ | Benefits and Significance of Ganesh Yantra
 
Ganesh Yantra यंत्र की पूजा, साधना की एक ऐसी विधि है, जिसका उल्लेख शास्त्रों में दिया गया है. यंत्र स्तोत्र का पाठ करने मात्र से इनकी आराधना हो जाती है साधक को आसन पर बैठकर दीपक जलाकर यज्ञ करना चाहिए इससे उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे इसकी आराधना करने से साधक के शत्रुओं का शमन तथा कष्टों का निवारण होता है.  परंतु विशेष रूप से बुद्धि, शास्त्रार्थ और प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करने, सर्वश्रेष्ठ, प्रभावी एवं उपयुक्त मानी गई है. असाध्य रोगों से छुटकारा पाने, संकट से उद्धार पाने और नवग्रहों के दोष से मुक्ति के लिए भी इस मंत्र की साधना की जा सकती है.  वैदिक एवं पौराणिक शास्त्रों में इनका वर्णन अनेक स्थलों पर मिलता है. इसका जप नित्य नियत संख्या में ही करना चाहिए जप का दशांश हवन, तर्पण करके ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए.श्रीगणेश यंत्र का नित्य विधि-विधान से पूजन करने से विशेष उपलब्धियां और सिद्धियां प्राप्त होती है। धन की प्राप्ति, अष्ट सिद्धि एवं नव निधि की प्राप्ति के लिए यह अचूक यंत्र है। Ganesh Yantra

Note: Daily, Weekly, Monthly and Annual Horoscope is being provided by Pandit N.M.Shrimali Ji, almost free. To know daily, weekly, monthly and annual horoscopes and end your problems related to your life click on  (Kundli Vishleshan) or contact Pandit NM Shrimali  Whatsapp No. 9929391753, E-Mail- info@panditnmshrimali.com

Connect with us at Social Network:-

social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com

कैसे करे गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश जी की पूजा - Ganesh Chaturthi - 2021

कैसे करे गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश जी की पूजा – Ganesh Chaturthi – 2021

कैसे करे गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश जी की पूजा – Ganesh Chaturthi – 2021

 


कैसे करे गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश जी की पूजा – Ganesh Chaturthi – 2021 गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा बुद्धि, ज्ञान व बल बढ़ाने तथा सुख-समृद्धि देने वाली मानी जाती है। सुख-वैभव की कामनापूर्ति के लिए, आय में वृद्धि के लिए चतुर्थी, बुधवार तथा 10 दिवसीय गणेशोत्सव में निम्नलिखित विधि-मंत्र से भगवान गणेश का ध्यान करना चाहिए। मान्यता है कि यह सिद्ध मंत्र सृष्टि बनाने वाले स्वयं ब्रह्मा ने श्री गणेश की भक्ति के लिए प्रकट किया था।  


मंत्र :- “ॐ वक्रतुण्डाय हुम्” 
श्री गणेश को केसरिया चंदन, अक्षत, दूर्वा, सिंदूर से पूजा व गुड़ के लड्डुओं का भोग लगाने के बाद इस गणेश मंत्र का स्मरण करें। पूर्व दिशा की ओर मुख कर पीले आसन पर बैठ हल्दी या चन्दन की माला से कम से कम 108 बार जप करें। मंत्र जप के बाद भगवान गणेश की चंदन धूप व गोघृत आरती कर आय में वृ‍द्धि की कामना करें। पत्र, पुष्प, फल और जल के द्वारा भक्ति भाव से की गई गणेश पूजा भी लाभदायक रहती है। कैसे करे गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश जी की पूजा – Ganesh Chaturthi – 2021

षोड़षोपचार विधि से श्री गणेश की पूजा की जाती है। गणेश की पूजा अगर विधिवत की जाए, तो इनकी पतिव्रता पत्नियां रिद्धि-सिद्धि भी प्रसन्न होकर घर-परिवार में सुख शांति और संतान को सुंदर विद्या-बुद्धि देती है।

गणेश शिवजी और पार्वती के पुत्र हैं। उनका वाहन मूषक है। गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार गणेश जी को केतु का देवता माना जाता है, और जो भी संसार के साधन हैं, उनके स्वामी श्री गणेशजी हैं। हाथी जैसा सिर होने के कारण उन्हें गजानन भी कहते हैं। गणेशजी का नाम हिन्दू शास्त्रो के अनुसार किसी भी कार्य के लिये पहले पूज्य है। इसलिए इन्हें आदिपूज्य भी कहते है। गणेश की उपासना करने वाला सम्प्रदाय गणपतेय कहलाते है। कैसे करे गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश जी की पूजा – Ganesh Chaturthi – 2021

भगवान गणेश को समृद्धि, बुद्धि और अच्‍छे भाग्‍य का देवता माना जाता है। भगवान गणेश, सर्वशक्तिमान माने जाते है। भगवान गणेश, मनुष्‍यों के कष्‍ट हर लेते है और उनकी पूजा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। परंपरा के अनुसार, हर धार्मिक उत्‍सव और समारोह की शुरूआत भगवान गणेश की पूजा से ही शुरू होती है। गणेश भगवान का रूप, मनुष्‍य और जानवर के अंग से मिलकर बना हुआ है। इसकी भी भगवान गणेश की पूजा में बड़ी भूमिका है जो गहरे आध्‍यात्मिक महत्‍व को दर्शाती है। कैसे करे गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश जी की पूजा – Ganesh Chaturthi – 2021

भगवान गणेश को सभी अच्‍छे गुणों और सफलताओं का देवता माना जाता है, इसीलिए लोग हर अच्‍छे काम को करने से पहले गणेश जी की पूजा करना शुभ मानते है। भगवान गणेश के जन्‍मदिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। हिंदू धर्म के लोग, आध्‍यात्मिक शक्ति के लिए, कार्य सिद्धि के लिए और लाभ प्राप्ति के लिए भगवान गणेश का पूजन धूमधाम से करते है। भगवान गणेश को सभी दुखों का हर्ता, संकट दूर करने वाला, सदबुद्धि देने वाला माना जाता है। उनकी पूजा करने से आध्‍यात्मिक समृद्धि मिलती है और सभी बाधाएं दूर होती है।


                                                        ॐ वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ।
                                                           
निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्एषु सर्वदा।।

 Flower Note: Daily, Weekly, Monthly and Annual Horoscope is being provided by Pandit N.M.Shrimali Ji, almost free. To know daily, weekly, monthly and annual horoscopes and end your problems related to your life click on  (Kundali Vishleshan) or contact Pandit NM Shrimali  Whatsapp No. 9929391753,E-Mail- info@panditnmshrimali.com

Connect with us at Social Network:-

social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com

गणेश चतुर्थी का महत्त्व - Ganesha Chaturthi 2021

गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021

 

गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021

 


हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल चतुर्थी को हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार गणेश चतुर्थी मनाया जाता है. गणेश पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी दिन समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करनेवाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश का आविर्भाव हुआ था. इन्हें देवसमाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। श्री गणेशजी बुद्धि के देवता हैं। गणेशजी का वाहन चूहा है। ऋद्धि तथा सिद्धि इनकी दो पत्नियाँ हैं। इनका सर्वप्रिय भोग मोदक (लड्डू) है। इस दिन रात्रि में चंद्रमा का दर्शन करने से मिथ्या कलंक लग जाता है। 
गणेश चतुर्थी व्रत कैसे करे  ,गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021
* इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ। 
* इसके बाद सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर से गणेशजी की प्रतिमा बनाएँ। 
* गणेशजी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर मुँह पर कोरा कपड़ा बाँधकर उस पर स्थापित करें। 
पश्चात ‘मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये’ मंत्र से संकल्प लें। 
संकल्प मंत्र के बाद श्रीगणेश की षोड़शोपचार पूजन-आरती करें। गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं। गणेश मंत्र ऊँ गं गणपतयै नम: बोलते हुए 21 दूर्वा दल चढ़ाएं। गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021
* फिर दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डुओं का भोग लगाएँ। इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास ही रखें और 5 ब्राह्मण को दान कर दें। शेष लड्डू प्रसाद के रूप में बांट दें। 
गणेश चतुर्थी व्रत में सावधानियाँ :-
* गणेशजी की पूजा सायंकाल के समय की जानी चाहिए। 
* पूजनोपरांत नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए। नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देने का तात्पर्य है कि जहाँ तक संभव हो, इस दिन (भाद्रपद चतुर्थी को) चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए। इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है। यदि सावधानी बरतने के बावजूद चंद्र दर्शन हो ही जाएँ तो फिर स्यमन्तक की कथा सुनने से कलंक का प्रभाव नहीं रहता। 
गणेश चतुर्थी व्रत फल :-
वस्त्र से ढंका हुआ कलश, दक्षिणा तथा गणेश प्रतिमा आचार्य को समर्पित करके गणेशजी के विसर्जन का उत्तम विधान माना गया है। गणेशजी का यह पूजन करने से बुद्धि और ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति तो होती ही है, विघ्न-बाधाओं का भी समूल नाश हो जाता है। गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021
श्रीगणेश चतुर्थी विघ्नराज, मंगल कारक, प्रथम पूज्य, एकदंत भगवान गणपति के प्राकट्य का उत्सव पर्व है। आज के युग में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मानव जाति को गणेश जी के मार्गदर्शन व कृपा की आज हमें सर्वाधिक आवश्यकता है। आज हर व्यक्ति का अपने जीवन में यही सपना है की रिद्धि सिद्धि, शुभ-लाभ उसे निरंतर प्राप्त होता रहे, जिसके लिए वह इतना अथक परिश्रम करता है। ऐसे में गणपति हमें प्रेरित करते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं। 
विषय का ज्ञान अर्जन कर विद्या और बुद्धि से एकाग्रचित्त होकर पूरे मनोयोग तथा विवेक के साथ जो भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु परिश्रम करे, निरंतर प्रयासरत रहे तो उसे सफलता अवश्य मिलती है। गणेश पुराण के अनुसार गणपति अपनी छोटी-सी उम्र में ही समस्त देव-गणों के अधिपति इसी कारण बन गए क्योंकि वे किसी भी कार्य को बल से करने की अपेक्षा बुद्धि से करते हैं। बुद्धि के त्वरित व उचित उपयोग के कारण ही उन्होंने पिता महादेव से वरदान लेकर सभी देवताओं से पहले पूजा का अधिकार प्राप्त किया। गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021
गणेश चतुर्थी की कथा :-
एक बार भगवान शंकर स्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोगावती नामक स्थान पर गए। उनके जाने के बाद पार्वती ने स्नान करते समय अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसे सतीव कर दिया। उसका नाम उन्होंने गणेश रखा। पार्वती जी ने गणेश जी से कहा- ‘हे पुत्र! तुम एक मुद्गर लेकर द्वार पर जाकर पहरा दो। मैं भीतर स्नान कर रही हूं। गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021 इसलिए यह ध्यान रखना कि जब तक मैं स्नान न कर लूं,तब तक तुम किसी को भीतर मत आने देना। उधर थोड़ी देर बाद भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिव जी वापस आए और घर के अंदर प्रवेश करना चाहा तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उसका सिर, धड़ से अलग करके अंदर चले गए। टेढ़ी भृकुटि वाले शिवजी जब अंदर पहुंचे तो पार्वती जी ने उन्हें नाराज़ देखकर समझा कि भोजन में विलम्ब के कारण महादेव नाराज़ हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया और भोजन करने का निवेदन किया। तब दूसरी थाली देखकर शिवजी ने पार्वती से पूछा-‘यह दूसरी थाली किस के लिए लगाई है?’ गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021  इस पर पार्वती जी बोली-‘ अपने पुत्र गणेश के लिए, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है।’ यह सुनकर शिवजी को आश्चर्य हुआ और बोले- ‘तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? किंतु मैंने तो अपने को रोके जाने पर उसका सिर धड़ से अलग कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी।’ यह सुनकर पार्वतीजी बहुत दुखी हुईं और विलाप करने लगीं। उन्होंने शिवजी से पुत्र को पुनर्जीवन देने को कहा। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर उस बालक के धड़ से जोड़ दिया। पुत्र गणेश को पुन: जीवित पाकर पार्वती जी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पति और पुत्र को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन किया। यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को घटित हुई थी। इसलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है। गणेश चतुर्थी का महत्त्व – Ganesha Chaturthi 2021

 

 

Note: Daily, Weekly, Monthly, and Annual Horoscope is being provided by Pandit N.M.Shrimali Ji, almost free. To know daily, weekly, monthly and annual horoscopes and end your problems related to your life click on (Kundali Vishleshan) or contact Pandit NM Srimali  Whatsapp No. 9929391753, E-Mail- info@panditnmshrimali.com

Connect with us at Social Network:-

Find us on Youtube     Find us on Facebook     Find us on Instagram     Find us on Twitter     Find us on Linkedin

नवरात्रि में कैसे करे माँ के नव रूपों की पूजा जाने - Navrati 2021

नवरात्रि में कैसे करे माँ के नव रूपों की पूजा जाने – Navrati 2021

नवरात्रि में कैसे करे माँ के नव रूपों की पूजा जाने

 


नवरात्रि में कैसे करे माँ के नव रूपों की पूजा जाने – Navrati 2021 माँ दुर्गा शक्ति की महादेवी है। शिव-शक्ति है, प्रकृति है, भद्रा है, भाग्य नियन्ता है, गौरी स्वरूपा, सबका कल्याण करने वाली व कार्य सिद्ध करने वाली अखिल ब्रह्माण्ड की महाशक्ति एवं ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री, माँ जगदम्बे के नौ रूपों की उपासना का अवसर पाकर श्रद्धालु धन्य हो जाते है। शक्ति सभी दिशाओ में गतिशील है देवी भगवती के अनंत रूप है। नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना विशेष रूप से करने का विधान है। जिसमे 

1.शैलपुत्री- नौ दुर्गाओ में सर्वप्रथम हिमालय की पुत्री भगवती शैलपुत्री का नाम आता है। माँ दुर्गा ने देवासुर संग्राम में प्रथम दिन शैलपुत्री का रूप धारण कर असुरो का संहार किया था। भौतिक एवं आध्यात्मिक इच्छाओ की पूर्ति के लिए इनकी साधना करते है।  

2. ब्रह्मचारिणी- माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की आराधना करने से रोग-शोक से मुक्ति मिलती है। नवरात्रि में कैसे करे माँ के नव रूपों की पूजा जाने – Navrati 2021

3. चंद्रघंटा – माँ चंद्रघंटा की आराधना करने से  समस्त पाप एवं बधाए दूर होती है।

 4. कूष्मांडा- कूष्मांडा माँ सृष्टी की आदि स्वरूपा आदि शक्ति है। इनकी आराधना करने से आयु, यश, बल, एश्वर्य की प्राप्ति होती है। 

5. स्कंदमाता- कुंठा, कलह एवं द्वेष से मुक्ति के लिए भगवती स्कंदमाता की आराधना की जाती है। 

6. कात्यानी- भगवती कात्यानी की  आराधना धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष तथा भय-विनाश के लिए की जाती है। 

7. कालरात्रि- नवरात्र के सातवे दिन भगवती कालरात्रि की पूजा-अर्चना शास्त्र विहित है। अकाल मृत्यु के भय से ग्रसित, व्यापार में, सर्विस में, रोजगार में आने वाली बाधा माँ की कृपा से दूर हो जाती है। 

8. महागौरी- नवरात्र के आठवे दिन भगवती महागौरी की आराधना की जाती है। उपासक, विशेष  रूप से वे साधक जो सात दिनों की साधना में मूलाधार से सहस्त्रार चक्र तक सफल हो गए होते है।

 9. सिद्धिदात्री- नवरात्र के नवे दिन भगवती सिद्धिदात्री की उपासना का विधान है। यह महादुर्गा की नवी शक्ति है। नवरात्र से तात्पर्य नव अहोराज से लिया गया है अर्थात जो पर्व नौ दिन नौ रत चल, उसे नवरात्र कहते है नवरात्र में नवें दिन दुर्गा के नौ रूपों का ध्यान व आराधना की जाती है नवरात्रि में कैसे करे माँ के नव रूपों की पूजा जाने – Navrati 2021 , अत: इस नवरात्र पर माँ दुर्गा की असीम कृपा व आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नवरात्री पूजन पैकेट हमारे द्वारा उपलब्ध करवाया जा रहा है, जिसमे आप पाएंगे – दुर्गा प्रतिमा, दुर्गा बिस्सा यंत्र, दुर्गा यंत्र  पेंड़ेंड , दुर्गा जप माला, लक्ष्मी दायक कौड़िया , अष्टगंध , सिंदूर।  

 

Note: Daily, Weekly, Monthly and Annual Horoscope is being provided by Pandit N.M.Shrimali Ji, almost free. To know daily, weekly, monthly and annual horoscopes and end your problems related to your life click on (Kundali Vishleshan) or contact Pandit NM Shrimali  Whatsapp No. 9929391753,E-Mail- info@panditnmshrimali.com

Connect with us at Social Network:-

social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com social network panditnmshrimali.com

Aditya Hridaya Stotra Benefits For Good Luck

Aditya Hridaya Stotra Benefits For Good Luck

Aditya Hridaya Stotra Benefits For Good Luck 

 


सूर्य देव आराधना 

Aditya Hridaya Stotraगवान भाष्कर की आराधना आरोग्य मात्र ही नहीं प्रदान करती। यह व्यक्ति की विजय भी सुनिश्चित करती है। सूर्यपूजा यश कीर्ति प्रदायी है। विजय की प्राप्ति और शत्रुनाश के लिए भगवान सूर्य को समर्पित आदित्यहृदय स्तोत्रम् एक अचूक अस्त्र है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से मिर्गी, ब्लड प्रैशर मानसिक रोगों में सुधार होने लगता है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास में वृद्धि होने के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता व सिद्धि मिलने की संभावना बढ़ जाती है।      
पूजन विधि        

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ आरम्भ करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार का दिन शुभ माना गया है। Aditya Hridaya Stotra इस दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता के सामने पूर्व की ओर खड़े होकर एक ताम्बे के कलश में जल भरकर उसमे लाल कुमकुम,अक्षत, लाल पुष्प एवं मोली डालकर निम्न मंत्र का जप करते हुये अर्ग्य देना चाहिए एवं तत्पश्चात पूजा क्क्ष में सूर्य यन्त्र के सामने बैठकर आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए।  इसके बाद आने वाले प्रत्येक रविवार को यह पाठ करते रहना चाहिए। बीज मंत्र निम्न प्रकार है :-
                     ” ॐ घ्रणी सूर्याय नम: “


आदित्य हृदय स्त्रोतम 
Aditya Hridaya Stotra इस स्तोत्र का संबंध राम-रावण युद्ध से है। इस स्त्रोत का उल्लेख वाल्मीकि कृत रामायण के लंका कांड में हुआ है। राम-रावण युद्ध के अंतिम चरण में भीषण युद्ध होने के बावजूद रावण की पराजय के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। वह मायावी शक्तियों का प्रयोग कर भगवान राम की सेना को भयभीत कर रहा था। राम उसकी हर शक्ति को निष्प्रभावी कर रहे थे,लेकिन रावण को नुकसान नहीं पहुंचा पा रहे थे। इस स्थिति में राम-रावण युद्ध का कोई अंत होता नहीं दिख रहा था। यहीं से आदित्यहृदय स्तोत्रम् की पूर्वपीठिका प्रारंभ होती है। श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख अगस्त्य मुनि, जो युद्ध देखने के लिये देवताओं के साथ आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले कि हे राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा सकोगे। यह गोपनीय स्तोत्र आदित्यहृदयं परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय प्राप्त होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।  “भगवन सूर्य अपनी अनंत किरणों से शुशोभित है। ये नित्य उदय होने वाले देवताओ और असुरो से नमस्कृत , विवस्वान नाम से प्रसिद्द , प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी है। तुम इनका पूजन करो। सम्पूर्ण देवता इन्ही के स्वरूप है।  ये तेज की र्राशी तथा किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले है।  ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरो सहित सम्पूर्ण लोको का पालन करते है।  ये ही ब्रम्हा , विष्णु , शिव , स्कन्द , प्रजापति , इंद्रा , कुबेर , काल , यम , चन्द्रमा , वरुण , पितर , वसु , साध्य , अश्विनी कुमार , मरुद्रण , मनु वायु , अग्नि , प्रजा , प्राण , ऋतुओ को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज है।  इन्ही के नाम आदित्य , सविता ,  सूर्य , खग , पुषा , गभास्तिमान , सुवर्ण सदृश , भानु , हिरण्यरेता , दिवाकर , हरिदश्व , सहस्त्रार्ची , सप्तसप्ति , मरीचिमान , तिमिरोन्मथन , शम्भू , त्वष्टा , मार्तन्डक, अंशुमान , हिरण्यगर्भ , शिशिर , तपन , अहस्कर रवि , अग्निगर्भ , अदितिपुत्र , शंख , शिशिरनाशन , व्योमनाथ , तमोभेदी , ऋग , यजु और सामवेद के पारगामी , घनवृष्टि , अपामित्र , विन्ध्यावी पल्लवगम , आतापी , मंडली , मृत्यु , पिगल , सर्वतापन , कवि  , विश्व , महातेजस्वी , रक्त , सर्वभावोद्द्व , नक्षत्र , गृह और तारो के स्वामी , विश्वभावन , तेजस्वियो में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा है।  आपको नमस्कार है।  ‘पुर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है।  ज्यतिर्गाणो के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।  आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है।  आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते है। आपको बारम्बार नमस्कार है।  सहस्त्रो किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है। Aditya Hridaya Stotra आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्द है। आपको नमस्कार है।  उग्र , वीर और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है।  कमलो को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तंड को प्रणाम है।  आप ब्रम्हा , विष्णु , शिव के भी स्वामी है।  सूर आपकी संज्ञा है , यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है , आप प्रकाश से परिपूर्ण है , सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है , आप रोद्र रूप धारण करने वाले है , आपको नमस्कार है।  आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले है , सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप है , आपको नमस्कार है।  आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के सामान है , आप हरि  और विश्वकर्मा है , तम के नाशक , प्रकाश स्वरूप और जगत के साक्षी है , आपको नमस्कार है।  रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतो का संहार , सृष्टि और पालन करते है।  ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुचते है और वर्षा करते है।  ये सब भूतो में अंतर्यामी रूप से स्थित हॉकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते है।  ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्र पुरुषो को मिलाने वाले फल है।  देवता , यज्ञ और यज्ञो के फल भी ये ही है।  सम्पूर्ण लोको में जितनी क्रियाये होती है , उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ है।  राघव ! विपत्ति में , कष्ट में , दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्य देव का कीर्तन करता है , उसे दुःख नहीं भोगना पडता। Aditya Hridaya Stotra  इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो।  इस आदित्य ह्र्दय का तीन बार जप करने से कोई भी युद्ध में विजय प्राप्त कर सकता है।  महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावन का वध कर सकोगे।  यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे , उसी प्रकार चले गये। अगत्स्य का उपदेश सुनकर सुनकर श्रीरामचंद्र का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्ध चित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके भगवान् सूर्य को देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उनमें उत्साह का नवसंचार हुआ। इसके पश्चात भगवान राम ने पूर्ण उत्साह के साथ रावण पर  आक्रमण कर उसका वध कर दिया। आदित्यहृदय एक ऐसा स्तोत्र है जिसका अवलंबन विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने स्वयं किया।  इसलिए ,इस स्तोत्र का प्रभाव असंदिग्ध है।


शनि मंत्र 
                   ” ॐ शं शनिश्चराय नम: ।”

 

 

Note: Daily, Weekly, Monthly, and Annual Horoscope is being provided by Pandit N.M.Shrimali Ji, almost free. To know daily, weekly, monthly and annual horoscopes and end your problems related to your life click on (Kundali Vishleshan) or contact Pandit NM Srimali  Whatsapp No. 9929391753, E-Mail- info@panditnmshrimali.com

Connect with us at Social Network:-

Find us on Youtube     Find us on Facebook     Find us on Instagram     Find us on Twitter     Find us on Linkedin