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Amavasya अमावस्या का महत्व

Amavasya

अमावस्या का महत्व


Amavasya

पंडित एन एम श्रीमाली जी के अनुसार अमावस्या या अमावस हिंदू कैलेंडर के अनुसार वह तिथि होती है जिसमें चंद्रमा लुप्त हो जाता है व रात को घना अंधेरा छाया रहता है। हिंदू मास को दो हिस्सों में विभाजित किया जाता है जिसमें चंद्रमा बढ़ता रहता है वह शुक्ल पक्ष कहलाता है पूर्णिमा की रात के पश्चात चांद घटते-घटते अमावस्या तिथि को पूरा लुप्त हो जाता है। इस पखवाड़े को कृष्ण पक्ष कहते हैं। पंचांग के अमांत मास का अंत भी इसी तिथि को माना जाता है। सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है जो कि बहुत ही पुण्य फलदायी मानी गई है। वहीं यदि यह तिथि शनिवार को पड़े तो शनि अमावस्या कहलाती है यह तिथि बहुत ही सौभाग्यशाली मानी जाती है। इसके अलावा सोमवार, मंगलवार व बृहस्पतिवार की अमावस्या को यदि अनुराधा, विशाखा या स्वाति नक्षत्र रहता है तो यह भी बहुत ही शुभ योग माना जाता है। अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव माने जाते हैं इसलिये श्राद्ध कर्म या पितर शांति के लिये भी यह तिथि अनुकूल मानी जाती है। Amavasya

अमावस्या का महत्व

ज्योतिष शास्त्र व धार्मिक दृष्टि से यह तिथि बहुत महत्वपूर्ण होती है। पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिये इस तिथि का विशेष महत्व होता है क्योंकि इस तिथि को तर्पण, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही पुण्य फलदायी माना जाता है। भारत का प्रमुख त्यौहार दीपावली अमावस्या को ही मनाया जाता है। सूर्य पर ग्रहण भी इसी तिथि को लगता है। कोई जातक यदि काल सर्पदोष से पीड़ित है तो उससे मुक्ति के उपाय के लिये भी अमावस्या तिथि काफी कारगर मानी जाती है।

पिठोरी अमावस्‍या (Pithori Amavasya) को भाद्रपद अमावस्‍या (Bhadrapad Amavasya) भी कहा जाता है. इस दिन महिलाएं बच्‍चों की मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं.

हिन्‍दू धर्म में अमावस्‍या (Amavasya) का विशेष महत्‍व है. स्‍नान, दान और विशेषकर पितरों के तर्पण के लिए अमावस्‍या को बेहद शुभकारी और मंगलकारी माना जाता है. वैसे तो अमावस्‍या हर महीने आती है, लेकिन भाद्रपद यानी कि भादो महीने की अमावस्‍या (Bhadrapad Amavasya) का महत्‍व बहुत ज्‍यादा है. दरअसल, भादो कृष्‍ण के जन्‍म का महीना है और इस दौरान पड़ने वाली अमावस्‍या और पूर्णिमा के व्रत का प्रभाव कई गुना माना जाता है. भाद्रपद अमावस्‍या या पिठोरी अमावस्‍या (Pithori Amavasya) इसलिए भी खास है क्‍रूोंकि इस दिन धार्मिक कार्यों के लिए कुशा यानी कि घास एकत्रित की जाती है. मान्‍यता है कि धार्मिक कार्यों के लिए पिठोरी अमावस्‍या के दिन इकट्ठा की गई घास बहुत फलदाई होती है. इसके अलावा पिठोरी अमावस्‍या के दिन महिलाएं अपने बच्‍चों और पति के लिए व्रत रखती हैं और माता दुर्गा की पूजा करती हैं. Amavasya

पिठोरी आमावस्‍या का महत्‍व 

पिठोरी अमावस्‍या को भाद्रपद अमावस्‍या (Bhadrapad Amavasya) भी कहा जाता है. आंध्र प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक और तमिलनाडु में पिठोरी अमावस्‍या (Pithori Amavasya) को पोलाला अमावस्‍या (Polala Amavasya) कहते हैं. मान्‍यता के अनुसार मां पार्वती ने इंद्र की पत्‍नी को पिठोरी अमावस्‍या का महात्‍म्‍य बताते हुए कहा था कि इस व्रत को रखने से बच्‍चे बहादुर बनते हैं और उन्‍हें सुख-समृद्धि मिलती है. यही नहीं भाद्रपद माह की अमावस्या पर धार्मिक कार्यों के लिए कुश एकत्रित की जा सकती है. मान्यता है कि धार्मिक कार्यों, श्राद्ध कर्म आदि में इस्तेमाल की जाने वाली घास अगर इस दिन एकत्रित की जाए तो वह साल भर तक पुण्य फलदाई होती है. कुश एकत्रित करने के कारण ही इसे कुशग्रहणी अमावस्या (Kushgrahini Amavasya) भी कहा जाता है. पौराणिक ग्रंथों में इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है.

पिठोरी अमावस्‍या पूजा विधि 
 पिठोरी अमावस्‍या का व्रत केवल विवाहित महिलाएं और मांएं करती हैं.
 इस दिन सुबह उठकर पवित्र नदी में स्‍नान कर लें. अगर ऐसा न हो जाए तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल छिड़क लें.
 स्‍नान के बाद स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण कर व्रत का संकल्‍प लें.
 पीठ का मतलब होता है आटा. इस दिन 64 देवियों की पूजा का विधान है और आटे से इन देवियों की प्रतिमा बनाई जाती है.
 इन सभी 64 देवियों को वस्‍त्र पहनाएं. बेसन का आटा गूंथकर उससे हार, मांग टीका, चूडी और काने के बाले बनाकर देवी को चढ़ाएं.
 फिर सभी देवियों को एक थाली या पाटे में रख लें और उन पर पुष्‍प चढ़ाएं.
 पूजा के लिए गुझिया, शक्‍कर पारे, गुड़ के पारे और मठरी बनाएं और देवियों को भोग लगाएं.
 अब आरती उतारें.
 विधि-विधान से पूजा करने के बाद पंडित जी या घर के बड़े को पूजा के पकवान दें और उनके चरण स्‍पर्श करें.
यथा सामर्थ्‍य पंडित जी को खान खिलाएं और दान-दक्षिणा देकर विदा करें.  Amavasya

भाद्रपद अमावस्‍या के दिन क्‍या करें: 
व्रत के अलावा भाद्रपद यानी कि पिठोरी अमावस्‍या के दिन इन धार्मिक कार्यों को करने का विधान है:
 सुबह जल्‍दी उठकर स्‍नान करें और सूर्य को अर्घ्‍य दें.
 फिर बहते जल में तिल प्रवाहित करें.
पिंडदान करें और यथा सामथ्‍र्य ब्राह्मणों या गरीबों को दान दें.

अमावस्या के दिन जो वृक्ष, लता आदि को काटता है अथवा उनका एक पत्ता भी तोड़ता है, उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है (विष्णु पुराण)
शनि और पितृदोष से छुटकारा पाने के लिए उड़द या उड़द की छिलकेवाली दाल, काला कपड़ा, तला हुआ पदार्थ एवं दूध गरीबों में दान करें ।

नकारात्मक ऊर्जा मिटाने के लिए
घर में हर अमावस्या अथवा हर १५ दिन में पानी में खड़ा नमक (१ लीटर पानी में ५० ग्राम खड़ा नमक) डालकर पोछा लगायें । इससे नेगेटिव एनेर्जी चली जाएगी । अथवा खड़ा नमक के स्थान पर गौझरण अर्क भी डाल सकते हैं । Amavasya

धन-धान्य व सुख-संम्पदा के लिए
हर अमावस्या को घर में एक छोटा सा आहुति प्रयोग करें।
सामग्री : 1. काले तिल, 2. जौं, 3. चावल, 4. गाय का घी, 5. चंदन पाऊडर, 6. गूगल, 7. गुड़, 8. देशी कर्पूर, गौ चंदन या कण्डा।
विधि: गौ चंदन या कण्डे को किसी बर्तन में डालकर हवनकुंड बना लें, फिर उपरोक्त ८ वस्तुओं के मिश्रण से तैयार सामग्री से, घर के सभी सदस्य एकत्रित होकर नीचे दिये गये देवताओं की 1-1 आहुति दें।
आहुति मंत्र
1. ॐ कुल देवताभ्यो नमः
2. ॐ ग्राम देवताभ्यो नमः
3. ॐ ग्रह देवताभ्यो नमः
4. ॐ लक्ष्मीपति देवताभ्यो नमः
5. ॐ विघ्नविनाशक देवताभ्यो नमः Amavasya

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