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बिल्व/बेल पत्र

बिल्व/बेल पत्र

बिल्व पत्र के बारे में सामान्य जानकारियाँ –

बेल पत्र को शुद्ध हिंदी या संस्कृत में बिल्व पत्र कहते है | शास्त्रों में बेल / बिल्व पत्र को बहुत ही पवित्र पत्र माना गया है | बेल-पत्र , भगवान शिव के त्रि -नेत्र के सामान त्रि -पत्तों का जोड़ होता है शायद इसलिए ही भगवान शिव को यह अधिक प्रिय है | ऐसी मान्यता है कि बेल पत्र को त्रि-देव और त्रि नेत्र का प्रतीक माना जाता है , इसी कारण बेल पत्र को शुभ कार्यों व पूजा -पाठ वाले स्थान पर सर्वप्रथम रखा जाता है |

बेल पत्र के कई प्रकार , गुणधर्म , महत्व , उपयोगिताएँ होते हैं

बिल्व वृक्ष –

बिल्व पत्र के वृक्ष/पेड़ को ” श्री वृक्ष ” भी कहा जाता है इसे ” शिवद्रुम ” भी कहते है। बिल्वाष्टक और शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि बेल पत्र के तीनो पत्ते त्रिनेत्रस्वरूप् भगवान शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं। बिल्व पत्र के पूजन से सभी पापो का नाश होता है ।

बिल्व वृक्ष की उत्पत्ति –

स्कंद-पुराण में बेल पत्र के वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में कहा गया है कि एक बार जब माता पार्वती के ललाट पर पसीना आया तब उन्होंने अपनी उँगलियों से पसीना पोछकर उसे फेंक दिया , उस समय माता के ललाट के पसीने की कुछ बूंदें एक पर्वत पर जा गिरी जिस पर्वत का नाम था मंदार पर्वत | मंदार पर्वत पर माता के पसीने की बूंदों से एक वृक्ष की उत्पत्ति हुई, वह था बेल वृक्ष |

शास्त्रों में बेल वृक्ष के वर्णन में लिखा गया है कि बेल वृक्ष की जड़ों में माँ गिरिजा, इसके तने में माँ माहेश्वरी तथा इसकी शाखाओं में माँ दक्षयायनी का वास है | इतना हि नहीं बेल पत्र की पत्तियों में माँ पार्वती तथा इसके फूलों में माँ गौरी और बेल पत्र के फलों में माँ कात्यायनी का वास होता हैं।

बिल्व/बेल का पेड़ बहुत हि पवित्र होता है| यह पूर्ण रूप से समृद्धि देने वाला वृक्ष होता है | बेल वृक्ष को सम्पन्नता का प्रतीक भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि बेल वृक्ष को घर में उगने या लगाने से माता लक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती है क्योकि बेल वृक्ष में माता लक्ष्मी का भी वास होता है तथा जातक भी वैभवशाली भी बनता है |

बिल्व /बेल पत्र के प्रकार –

बिल्व पत्र के प्रकारबिल्व पत्र चार प्रकार के होते हैं – अखंड बिल्व पत्र, तीन पत्तियों के बिल्व पत्र, छः से 21 पत्तियों तक के बिल्व पत्र और श्वेत बिल्व पत्र। इन सभी प्रकार के बेल पत्रों का अलग अलग महत्व , पूजा विधि होते हैं

1. अखंड बेल पत्र – अखंड बिल्व पत्रइसका विवरण बिल्वाष्टक में इस प्रकार है – ‘‘अखंड बिल्व पत्रं नंदकेश्वरे सिद्धर्थ लक्ष्मी’’। यह अपने आप में लक्ष्मी सिद्ध है। एकमुखी रुद्राक्ष के समान ही इसका अपना विशेष महत्व है। यह वास्तुदोष का निवारण भी करता है। इसे गल्ले में रखकर नित्य पूजन करने से व्यापार में चैमुखी विकास होता है।

2. तीन पत्तियों वाला बेल पत्र – तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्रइस बिल्व पत्र के महत्व का वर्णन भी बिल्वाष्टक में आया है जो इस प्रकार है- ‘‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम् त्रिजन्म पाप सहारं एक बिल्वपत्रं शिवार्पणम’’ यह तीन गणों से युक्त होने के कारण भगवान शिव को प्रिय है। इसके साथ यदि एक फूल धतूरे का चढ़ा दिया जाए, तो फलों में बहुत वृद्धि होती है।तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्रइस तरह बिल्व पत्र अर्पित करने से भक्त को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। रीतिकालीन कवि ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है- ‘‘देखि त्रिपुरारी की उदारता अपार कहां पायो तो फल चार एक फूल दीनो धतूरा को’’ भगवान आशुतोष त्रिपुरारी भंडारी सबका भंडार भर देते हैं।

3. छः से 21 पत्तियों वाला बेल पत्र – जिस प्रकार रुद्राक्ष के कई मुख होते हैं उसी प्रकार बेल पत्र कई पत्तियों वाले होते हैं | इन कई पत्तों वाले बेल पत्र में छः से लेकर इक्कीस (2 1) पत्तों तक के पत्र पाए जाते हैं | यह मुख्यतः नेपाल में तथा दुर्लभ रूप से भारत में भी पाए जाते हैं |

4. श्वेत बेल पत्र – श्वेत /सफेद बेल पत्र , यह दुर्लभ जाती का बेल पत्र होता है , इसके वृक्ष /पेड़ पर हरे पत्तों के स्थान पर श्वेत यानि सफेद रंग के पत्ते पाए जाते हैं | यह कुदरत की अनमोल देन हैं | सफेद आक , फूल आदि की तरह श्वेत बेल पत्र भी भगवान शिव को अति प्रिय है |

बेल पत्र तोड़ने व अर्पित के तरीके –

बेलपत्र के पेड़ की टहनी से चुन-चुनकर सिर्फ बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए, कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़ना चाहिए।

शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना बेलपत्र के बिना पूरी नहीं होती। लेकिन एक बेलपत्र में तीन पत्तियां अवश्य ही होनी चाहिए तभी वह बिलपत्र शिवलिंग पर चढ़ने योग्य होता है।

बेलपत्र को भगवान शिव पर चिकनी तरफ से ही अर्पित करें।

शिवलिंग पर बेल पत्र चडाने के फायदे –

अगर बेलपत्र पर ॐ नम: शिवाय या राम राम लिखकर उसे भगवान भोलेनाथ पर अर्पित किया जाय तो यह बहुत ही पुण्यदायक होता है।

शास्त्रों के अनुसार रविवार के दिन बेलपत्र का पूजन करने से समस्त पापो का नाश होता है।

तृतीया तिथि के स्वामी देवताओं के कोषाध्यक्ष एवं भगवान भोलाथ के प्रिय कुबेर जी है । तृतीया को बेलपत्र चढ़ाकर कुबेर जी की पूजा करने , उनके मन्त्र का जाप करने से अतुल ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। और अगर कुबेर जी की पूजा बेल के वृक्ष के नीचे बैठकर, अथवा शिव मंदिर में की जाय तो पीढ़ियों तक धन की कोई भी कमी नहीं रहती है |

 

 

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