Numerology

गुरु राहू युति

सामान्यत: गुरु को ब्राह्मण  वर्ण का तथा राहू को चंडाल जाती का माना जाता है | अत: इनकी यह युति गुरु चंडाल योग के रूप में अशुभ मानी जाती है |इन की युति घर घराने को नष्ट करने वाली , संतान या तो होती ही नही है और अगर होती है तो एकाघ होगी या रोग ग्रस्त होगी | यानि उस बचे में जन्म से ही कुछ न कुछ शारीरिक या मानसिक  विकलांगता होती है तथा उस संतान की चिता जीवन भर सताती रहती है | यह योग  पूर्वजो के शाप से बाधित होती है  | इस योग के अशुभ परिणामस्वरूप पूर्वज स्वप्न में दीखते है | स्वप्न में खन्डहर सुना घर नजर आता है |

भावगत फल :-    लग्न स्थान में :- स्वभाव शोत रहता है अपने जन्म से 13 वर्ष  तक पिता की स्तिथि ठीक नही रहती या पिता की बचपन में ही मृत्यु हो जाती है पुरुष राशी में शिक्षा पूर्ण नही होती धन में कमी रहती है | खुद का किसी दुसरे व्यक्ति के पास गोद जाने की भावना रहती है |                                                                                            

धन स्थान में :- इस स्थान में धन सग्रह आयु के 28 वर्ष से प्रारंभ होता है | पिताजी की मृत्यु के पश्चात माँ पिता का घर छोड़ने पर ही कमाई प्रारंभ होती है | विवाह विलम्ब से सम्पन्न होता है |

 

तृतीय स्थान में :- पुरुष राशी में भाई बहने कम, तथा स्त्री राशी में इसका उल्टा यानि भाई बहेन अधिक होती है परन्तु एक भाई या बहेन मानसिक रूप से कमजोर होता है जिसका पालन पोषण आपको करना पड़ता है |

 

चतुर्थ स्थान में :- शिक्षा पूर्ण नही होती खुद का व्यवसाय नही होता नोकरी ही करनी पड़ती है | माँ बाप का सुख कम मिलता है | अपना स्वयं का घर नही बनता जीवन भर किराये के घर में रहना पड़ता है |

 

पंचम स्थान में :- पुरुष राशी में होतो पुत्र संतति कम होकर चली जाती है | विद्या पूरी नही हो पति तथा होती भी है तो बहुत मुश्किल से होती है |

 

षष्ठी स्थान में :- इस स्थान में यह युति होने पर विचित्र प्रकार के रोग उत्पन होते है चर्म रोग अधिक होते है | तथा सफ़ेद दाग की बीमारी होती है | विचित्र तथा ऐसे भगु  बन जाते है जिसकी कल्पना भी नही कर सकते यानि अचानक से मुश्किल आती है |

 

सप्तम स्थान में :- पहली पत्नि की मृत्यु होती है फिर दूसरा विवाह होता है | लेकिन दूसरी पत्नि  से संतान नही होती है |पत्नि से नही बनती लड़ाई झगड़े होते रहते है |

 

अष्टम स्थान में :-  इस स्थान में मृत्यु शांत रूप में होती है | संतान सुख , संपति , मान , समान , एश्वर्य आदि सब प्राप्त करने  के बाद मृत्यु होती है | जीवन शुख्मय व्यतीत होता है |

 

नवम स्थान में :- विवाह होना बहुत कठिन होता है और होता भी  है तो संसार चलाने में बहुत कठिनाई आती है | पत्नि  घर छोड़ कर चली जाती है अथवा तलाक होता है |

दशम स्थान में :-  अपने जन्म के पूर्व पिता की स्थति ठीक रहती है | लेकिन बाद में ख़राब हो  जाती है | खुद का भाग्योदय अपने पिता की मृत्यु के बाद होता है हर किसी से अनबन रहती है|   की मृत्यु की भी सम्भावना अधिक रहती है |

 

ग्यार्वे स्थान में :- यह योग बहुत धन देता है | जुआ , सट्टा , लोटरी , ऐसे इत्यादि में लाभ ही लाभ होता है | आयु के 48 वे वर्ष में अनाया धन लाभ होता है |

बारहवे स्थान में :- घर सुना नही होता | पत्नि तलाक देकर चली जाती है | जीवन भर नोकरी करनी पड़ती है | लेकिन किसी एक मामले में बड़ा नाम कमाता है |

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